(5) पोलिस ,सेना और देश की सुरक्षा और हथियार रखने और बनने के बारे में अक्सर पूछे गए प्रश्न

 

(1) सेना के अफसर को कम वेतन क्यों मिलती है ?

मनमोहन सिंह को वित्त-मंत्री बनने की शर्त , अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई.एम.एफ.) ने पी.वी.नरसिम्हा राव और भारत के ऊंचे वर्ग के लोगों के सामने रखी थी, भारत को कर्ज के मुसीबत से निकालने के लिए | दूसरे शब्दों में, भारत के नागरिकों ने या भारत के सांसदों ने मनमोहन सिंह को वित्त-मंत्री नहीं बनाया था , आई.एम.एफ ने बनाया था | क्योंकि मनमोहन सिंह आई.एम.एफ (अमेरिका) का एजेंट था |
भारतीय सेना के लोग का वेतन बहुत कम है, जबकि अमेरिका में सैनिक को बहुत अच्छा वेतन मिलता है | उदाहरण से , अमेरिका में सैनिक पोलिस वालों से कहीं ज्यादा वेतन मिलता है | भारत में भी ,1990 तक सैनिकों को अच्छा वेतन मिलता था |

भारत में अभी, उनको पुलिसवालों और प्रायवेट में उस स्तर के कुशलता वालों के मुकाबले बहुत कम वेतन मिलता है |
संविधान में ऐसी कोई धारा नहीं है, जो कहती है कि सेना के अफसरों के वेतन , पोलिस के उसी तुलना वाले पद के वेतन के सामान होना चाहिए | ये दिशा-निर्देश बहुत पहले , इंदिरा गाँधी द्वारा बनाया गया था, 1970 के शुरुवाती दशक में जब पोलिस में भ्रष्टाचार इतना ज्यादा नहीं था और सेना में भत्तों का मूल्य (केन्द्रीय विद्यालय, सेना के स्कूल, क्लबों, पेंशन,प्लाट आदि.,) बहुत ज्यादा थी जो भत्ते प्रायवेट में और पोलिस वालों को मिलते हैं, उनके मुकाबले | 1991 तक ये साफ़ हो गया कि सैनिक को कम वेतन मिल रहा है , पुलिसवाले और आई.ऐ.एस.(बाबू) के मुकाबले , अगर सारे भत्ते भी जोड़ दिए जायें |
तो 1991 में, ये दिशा-निर्देश को बदलने का समय हो गया था, जो सैनिकों के वेतन को पोलिस-कर्मियों के वेतन से जोड़ता था | सैनिकों के वेतन पुलिसवालों के बुनियादी वेतन और मानी हुई ऊपरी (अनौपचारिक) आमदनी से जोड़ी जानी चाहिए थी | लेकिन मनमोहन सिंह ने जोर दिया कि सैनिकों को पोलिस-वाले के बुनियादी वेतन से ज्यादा वेतन नहीं मिलना चाहिए और सैनिकों के वेतन बढ़ाने के लिए मन कर दिया | और मनमोहन सिंह कोई मूर्ख नहीं था | उसे मालूम था कि आई.ऐ.एस (बाबू) /पोलिस-कर्मियों के बुनियादी वेतन कोई इतने ज्यादा नहीं है ,जितने रिश्वतें वो लेते हैं उसको देखते हुए |
प्रधानमंत्री और वित्त-मंत्री ने बराबर एक गलत नीति पालन की है , सैनिकों को कम वेतन देने की 20 सालों से | 1-2 सालों से नहीं, 20 सालों से | ये एक बहुत लंबा समय है कोई असल में गलती करने के लिए | उनके इस काम से , अभी सैनिक बहुत हताश हैं  | कम वेतन और बहुत सारे अपमान `टीम्स ऑफ इंडिया` जैसे विदेशी कंपनियों के एजेंट द्वारा , ने एक ज्वालामुखी खड़ा कर दिया है, जो कभी भी फट सकता है |

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