0227. हर नागरिक का कर्त्तव्य — `जनसेवक को मेसेज-आदेश` प्रचार तरीका

0. पूरे लेख का सारांश

संविधान के उद्देश्यिका (भूमिका) के अनुसार, नागरिकों का संवैधानिक कर्तव्य है अपने जनसेवकों को आदेश देना |

हमें कोई आपत्ति नहीं कि आप कौन से नेता या पार्टी का समर्थन करते हैं या विरोध या विरोध करने का कौन सा तरीका अपनाते हैं | लेकिन, केवल एक लाउड-स्पीकर लगा कर अपने प्रिय नेता या पार्टी की जय-जयकार करने या सोशियल मीडिया पर, ऑनलाइन अपने प्रिय नेता की जय-जयकार करना, आपके प्रिय नेता को इस देश के प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनाने या आपकी प्रिय पार्टी को सत्ता में लाने के लिए अपर्याप्त है | क्यूंकि केवल हमारे सासदों, विधायकों, आदि जनसेवकों के पास अधिकार है कि किसी को प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बना सकते हैं या किसी पार्टी को सत्ता में ला सकते हैं या भारतीय राजपत्र में समाधान-ड्राफ्ट को राजपत्र में छपवा सकते हैं |

और केवल किसी नेता या पार्टी के लिए नारेबाजी करने से ये भी सिद्ध नहीं होता है कि आप वास्तव में उस नेता/पार्टी के समर्थक हैं | यदि आप वास्तव में अपने प्रिय नेता/पार्टी का समर्थन करना चाहते हैं या कोई समाधान-ड्राफ्ट को लागू करवाना चाहते हैं, तो आपको अपने सांसद, विधायक आदि, जनसेवकों को जरुरी मेसेज-आदेश भी देने चाहिए (अपने विरोध/समर्थन के तरीकों के साथ) कि आपके प्रिय नेता को देश का प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनाने के लिए तुरंत प्रस्ताव शुरू करवाएं संसद या विधानसभा में या आपके प्रिय पार्टी को बढ़ावा करे | और भेजे गए मेसेज-आदेश अधिक से अधिक जनता को बताएं फेसबुक वाल-नोट, ब्लॉग, पर्चे, गूगल डोक आदि द्वारा, ताकि जनता को प्रमाण मिले और दूसरों को भी ऐसा करने की प्रेरणा मिले | `जनसेवक को मेसेज-आदेश` भेजने के लिए और भेजे गए मेसेज-आदेश जनता को दिखाने के लिए, आपके समय के केवल 5-10 मिनट ही लगेंगे |

हमारे सासदों, विधायकों, आदि जनसेवकों के पास ही अधिकार है कि भारतीय राजपत्र में समाधान-ड्राफ्ट को छपवाएं, कानून बनाएँ और प्रक्रिया-ड्राफ्ट पर वोट करें | तो, जब तक हम आम-नागरिक अपने जनसेवकों को एक प्रामाणिक रूप से नहीं बताते कि हमें उनसे वास्तव में क्या चाहिए और क्या नहीं, तब तक जनसेवकों और दूसरे नागरिकों को कैसे पता चलेगा ? उदाहरण, यदि आप चाहते हैं कि आपके सांसद, प्रधानमंत्री एफ.डी.आई. (विदेशी प्रत्यक्ष निवेश) के लिए अनुमति नहीं दें, तो उन्हें कैसे पता चलेगा ? क्या आपने अपने सांसद को मेसेज-आदेश भेजा कि वो एफ.डी.आई. के लिए अनुमुती नहीं दे ? यदि नहीं, तो ये आपका दोष है कि आपने अपने सांसद को मेसेज-आदेश नहीं भेजा कि आपको एफ.डी.आई. नहीं चाहिए | इसलिए, अपने जनसेवकों को मेसेज-आदेश भेजना हमको एक जिम्मेदार नागरिक बनाता है |

इस तरह, हमको अपना संवैधानिक कर्तव्य निभाना चाहिए | क्यूँ हमें 5 साल तक इन्तेजार करना चाहिए ?  हम क्यूँ पांच साल के लिए सोयें या 5 साल के लिए रोयें और पांच साल में केवल एक ही दिन जागृत रहें ? ऐसा करना कोई लोकतंत्र नहीं है | और यदि कोई जनसेवक हजारों नागरिकों की नहीं सुनता है, तो कृपया उसकी प्रमाण सहित पोल खोलें और उसको किसी भी दिन बदल सकें ऐसे `जनसेवक को मेसेज-आदेश` का सिस्टम का प्रयोग करें, ना कि हम उस बुरे जनसेवक को 5 साल बर्दाश्त करें |

एक और झूठ जो सुब्रमनियम, मोदी, केजरीवाल और दूसरे नेता, कार्यकर्ताओं और आम-नागरिकों को बोलते हैं – `अपने पसंद के नेता और पार्टी को बहुमत से चुना कर जितवाओ और हम सभी अच्छे कानून बनायेंगे` ये पूरी तरह से असंभव है | क्यों ? मान लीजिए, किसी तरह एक पार्टी को लोकसभा में बहुमत भी मिल जाती है, लेकिन उसको 5-10 साल या ज्यादा चाहिए राज्यसभा में बहुमत पाने के लिए और कानूनों को पारित करने के लिए | यदि ये भी किसी तरह संभव हो गया कि कोई कानून दोनों सदनों में पारित हो गया, तो विदेशी कम्पनियाँ सुप्रीम-कोर्ट में अपने एजेंट जजों द्वारा उस कानून को रद्द करवा सकती हैं | इसीलिए केवल कुछ गिने-चुने लोग ही शक्तिशाली विदेशी कंपनियों का सामना नहीं कर सकते क्योंकि आज विदेशी कंपनियों का अधिकतर मीडिया और न्यायपालिका पर प्रभाव है |

अकेले, बिना किसी समूह में, प्रभावशाली तरीकों का उपयोग करके महीने में 15-20 घंटे काम करने वाले, केवल 2-4 लाख कार्यकर्ता और कुछ करोड़ आम-नागरिक चाहिए देश के लिए अच्छे कानून-प्रक्रियाओं पर जन-आन्दोलन खड़ा करने के लिए और प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री को मजबूर करने के लिए कि वे इन कानून-ड्राफ्ट को भारतीय राजपत्र में डालें | मैं श्रोताओं से विनती करूँगा कि वे अध्ययन करें कि कैसे बदलाव आये थे असली, सफल, कार्यकर्ता-आधारित, जन-अन्दोलान के द्वारा, जैसे भारतीय नौसेना विद्रोह, 1946 , आपातकाल जन-आन्दोलन, 1977 आदि |

हम चिंतित कार्यकर्ता, इस बात का प्रचार करते हैं कि सभी कार्यकर्ताओं को पहले सभी जनसमूहों द्वारा दिए गए कानून-ड्राफ्ट पढ़कर ही फैसला करना चाहिए कि वो देश में कौन सी व्यवस्था चाहते हैं और तब ही कार्यकर्ताओं को अपने संसद, विधायक या प्रधान मंत्री को वो कानून-ड्राफ्ट सरकारी राजपत्र में छपवाने का आदेश देना चाहिए | नागरिक अपने सांसद को मेसेज-आदेश भी भेज सकता है कि संसद में तुरंत प्रस्ताव शुरू किया जाये ताकि उसके प्रिय नेता को प्रधानमंत्री बनाया जाये | फिर, कार्यकर्ताओं को अपने भेजे गए मेसेज-आदेश अपने वाल-नोट, ब्लॉग आदि पर डालना चाहिए (जहाँ पर जनता आसानी से ढूँढ सके और पढ़ सके), ताकि जनता को सबूत मिले और दूसरों भी ऐसा करने की प्रेरणा मिले |

भेजे गए मेसेज-आदेश, डबल नहीं हों या दोहराए नहीं गए हों (मेसेज-आदेश विशिष्ट हों), ये सुनिश्चित करने के लिए, मोबाइल नंबर के हरेक सिम को एक वोटर आई.डी. (पहचान पत्र) के साथ जोड़ा (चिन्हित) जा सकते हैं और बाद में अंगुली के छापों के साथ जोड़ा जा सकता है | जनसेवक का पब्लिक मोबाइल उसके वेबसाइट के साथ जोड़ा जा सकता है ताकि जनता द्वारा भेजे गए सारे मेसेज-आदेश अपने आप जनसेवक के वेबसाइट पर प्रकाशित हों और सभी को दिखें | हर मेसेज-आदेश के साथ भेजने वाले का नाम, उसका पता, मोबाइल नंबर और वोटर आई.डी. होगा | इस तरह, डबल या दोहराए गए मेसेज सॉफ्टवेर द्वारा आसानी से हटाये जा सकते हैं और कोई भी नागरिक आसानी से जनसेवक की वेबसाइट पर प्रकाशित मेसेज-आदेशों की जांच कर सकता है |

जनसेवक का समय नहीं बिगड़े, इसके लिए संक्षिप्त कोड (कूट संकेत) बनाये जा सकते हैं नागरिकों द्वारा या जनसेवकों द्वारा और वे संक्षिप्त कोड जनसेवक की वेबसाइट पर दर्ज किया जायेगा | सॉफ्टवेर समान शोर्ट कोड वाले मेसेज-आदेशों के ऑटोमैटिक समूह बनाएगा (स्वतः वर्गीकरण) | इस प्रकार, जनसेवक को हरेक मेसेज-आदेश पढ़ना नहीं होगा और सभी को जनता की राय प्रामाणिक तरीके से भी पता चलेगी और जनसेवक का समय भी बच जायेगा |

इस प्रक्रिया को पैसों से, गुंडों द्वारा या मीडिया द्वारा प्रभावित नहीं किया जा सके, इसके लिए नागरिकों के पास एक सुरक्षा धारा होगी कि `कोई भी नागरिक अपनी राय कभी भी बदल सकता है और किसी संक्षिप्त कोड के लिए आखरी भेजा गया मेसेज-आदेश ही सिस्टम पर दर्ज होगा` | कोई भी लाखों लोगों को करोड़ों रुपये रोज नहीं दे सकता और ना ही उनको दबाने के लिए हजारों गुंडे हमेशा के लिए रख सकता है |

जिन नागरिकों के पास मोबाइल फोन नहीं हैं, वे पहले से दर्ज संक्षिप्त कोड पर अपनी राय दे सकते हैं, पटवारी (लेखपाल/तलाटी/ग्राम-अधिकारी) के दफ्तर या कोई भी जनसेवक द्वारा उल्लेख किये गए सरकारी दफ्तर जा कर, अपने को वोटर कार्ड, फोटो (महिलाओं के लिए वैकल्पिक) और अंगुली के छाप द्वारा अपनी जांच करवाकर और एक रूपया शुल्क देकर | कृपया इस प्रचार-प्रक्रिया और प्रयोगकर्ता द्वारा भुगतान किये गए सिस्टम की अधिक जानकारी को इस लेख के सैक्शन 2.2 में देखें |

लाखों-करोड़ों आम नागरिकों के सांसद / प्रधानमंत्री को एस-एम-एस द्वारा आदेश दिए जाने पर निम्नलिखित परिणाम होंगे :

(1) इससे मेसेज-आदेश भेजने वाले लोगों की संख्या का एक जांच किये जा सकने वाला (सत्यापनीय) सबूत बनेगा और फिर (2) यह संख्या महात्मा उद्धम सिंह जैसे निडर कार्यकर्ताओं को प्रेरित करेगी के वो प्रधान मंत्री से मिलें और उन्हें राजपत्र (हर महीने या हर सप्ताह छपने वाली सरकारी पत्रिका) में वो कानून डालने को कहें | (3) इससे या तो प्रधान मंत्री जनता के दबाव में आकर वो ड्राफ्ट राजपत्र में छाप देंगे या फिर जनता और महात्मा उद्धम सिंह की विनतियों के कारण वर्त्तमान प्रधानमंत्री या जनता द्वारा लाये गए अगले प्रधान मंत्री उस कानूनी व्यवस्था को सरकारी राजपत्र में छापेंगे |  ज्ञात इतिहास में किसी ने भी अहिंसा-मूर्ति उधम सिंह को कभी भी विरोध नहीं किया था |

और इस तरह, जनता द्वारा पसंद किया गया प्रक्रिया-ड्राफ्ट सरकारी राजपत्र में छाप दी जाएगी या आपके प्रिय नेता प्रधानमंत्री बन जायेंगे |

इस लेख में हमने व्यवस्था परिवर्तन करने के लिए प्रयोग किये गए कुछ तरीकों की तुलना की है और समझाया है कि एस-एम-एस के द्वारा सीधे आदेश देना क्यूँ एक श्रेष्ठ उपाय है दूसरे तरीकों की तुलना में, जैसे धरना-अनशन, पत्र लिखना, नारेबाजी आदि | तथा हमने संभव कारण दिए हैं कि क्यूँ कांग्रेस नेता, अन्ना हजारे, अरविन्द भाई, सुब्रमनियम इत्यादी अपने समर्थकों को एस.एम.एस द्वारा मंत्रियों तथा अन्य जन-सेवकों को मेसेज-आदेश देने से मना कर रहे हैं |

1. आप, जो कि हमारे देश के आम नागरिक हैं, पूर्णतः स्वाधीन और हमारे देश के असली मालिक हैं और यह आपका संवैधानिक कर्त्तव्य है कि आप जनसेवक जैसे प्रधान मंत्री, जज, मुख्य मंत्री, विधान सभा सदस्य इत्यादी को आदेश भेजें |

1.1 हमारे संविधान का प्रियाम्बल / उद्देश्यिका / भूमिका क्या है और किस तरह से वो जनता को सत्ता (स्वाधीनता) देती है, कृपया पढ़ें

प्रियाम्बल या उद्देश्यिका किसी भी दस्तावेज़ का आरंभिक परिचय होता है जिसमें उस दस्तावेज़ का लक्ष्य , उद्देश्य और महत्त्व होता है | कृपया गूगल सर्च पर “भारतीय संविधान की उद्देश्यिका/प्रियाम्बल” ढूँढें | आप पाएंगे कि उसकी शुरुआत ही “हम, भारत के लोग ..” से होती है और इसलिए हम भारत के लोगों का भारत पर संवैधानिक रूप से सम्पूर्ण प्रभुत्व है | संविधान के प्रियाम्बल में लिखा हुआ है कि भारत के नागरिक स्वाधीन/प्रधान हैं और और इस तरह से सशक्त भी हैं कि वो राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, जज तथा बाकि सभी जनसेवक पदों पर बैठे लोगों को आदेश भेज सकते हैं किसी भी ऐसे विषय पर, जिसमें जनता के अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है और शीघ्र हस्तक्षेप की ज़रूरत है | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार हम सभी भारतीय नागरिकों को अपने कर्त्तव्य का पालन करते हुए सभी जनसेवकों जैसे जज, प्रधान मंत्री, सांसद सदस्य, मुख्यमंत्री इत्यादी को आदेश भेजना चाहिए |

1.2 संविधान की उद्देश्यिका और नागरिकों की प्रधानता (प्रभुत्व / सत्ता) का पूरा अर्थ

हम भारत के लोग, भारत को एक [सम्पूर्ण] प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी

पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य] बनाने के लिए, तथा उसके समस्त

नागरिकों को:

सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय,

विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता ,

प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए,

तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता

और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए

दृढ़-संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 इ0 (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हज़ार चेह विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं |

http://en.wikipedia.org/wiki/Preamble_to_the_Constitution_of_India

———————————-उद्देश्यिका समाप्त————————————–

” हम भारत के लोग….. दृढ़-संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 इ0 को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं |” दर्शाता है गणतंत्र में सत्ता हमेशा नागरिक के हाथ में होती है |

यह इस बात पर भी जोर देता है कि भारत का संविधान खुद भारत के लोगों ने अपने लिए बनाया है और यह हमें किसी भी विदेशी ताकत ने नहीं सौंपा |

प्रधानता (प्रभुत्व / सत्ता) का मतलब :  नागरिकों को सर्वोपरी (सबसे मुख्य) अधिकार है कि वो देश के भीतरी तथा बाहरी विषयों में निर्णय लें | कोई भी बहरी शक्ति भारत सरकार या भारत के नागरिकों को आदेश नहीं दे सकता है |

`प्रधानता (स्वाधीनता)` का अर्थ, कहने वाले की मानसिकता और उसकी जनता को गुमराह करने की मंशा पर भी निर्भर है | कुछ कुबुद्धिजीवी जैसे समाचारपत्र लेखक, राजनीती विज्ञान के प्राध्यापक (प्रोफेस्सर) इत्यादी हममें गुलाम-मानसिकता रखना चाहते हैं | इसलिए वो हमें लेख का ऐसा अर्थ बताते हैं जिससे हमें लगे कि हम लोगों को जनसेवकों को जैसे प्रधान मंत्री, उच्च न्यायाधीश, मुख्य मंत्री, विधान-सभा सदस्य इत्यादी को किसी भी साधन द्वारा आदेश देना ज़रूरी नहीं है, जैसे एस.एम.एस., मेल आदि | मगर हम लोग (सच्चे कार्यकर्ता) जो चाहते हैं कि लोग इस गुलाम-मानसिकता का त्याग करें, हम `प्रधानता (स्वाधीनता)` का अर्थ “जन-सेवकों को आदेश देना हमारा कर्त्तव्य है” बताते हैं |

1.3 संविधान की उद्देश्यिका के द्वारा संविधान के अनेकार्थी और अनिश्चित विषयों का स्पष्टीकरण |

भारत के सुप्रीम-कोर्ट ने, केसवानान्दा मुक्कदमे में, पाया कि उद्देश्यिका का इस्तेमाल संविधान के अनेकार्थी और अनिश्चित विषयों के स्पष्टीकरण में हो सकता है जहाँ एक बात के कई अर्थ निकले जा सकते हैं | 1995 में “केन्द्रीय सरकार बनाम भारतीय जीवन बीमा निगम” मुक्कदमे में भी सुप्रीम-कोर्ट ने एक बार फिर माना कि उद्देश्यिका हमारे संविधान का एक अखंड भाग है  |

2. क्या कारण है कि मंत्रियों और बाकी जन-सेवकों जैसे प्रधान मंत्री, प्रधान जज, मुख्य मंत्री, विधान सभा सदस्य इत्यादी को ज़रूरी आदेश भेजना नारेबाज़ी, नेता-पूजन और चुनावों का इंतज़ार करने से ज्यादा अच्छा है ?

2.1 सारांश :

हम, चिंतित कार्यकर्ता, इस बात का प्रचार करते हैं कि सभी कार्यकर्ताओं को पहले सभी जनसमूहों द्वारा दिए गए कानून-ड्राफ्ट (व्यवस्था विधान लेखन) पढ़कर ही फैसला करना चाहिए कि वो देश में कौन सी व्यवस्था चाहते हैं और तब ही कार्यकर्ताओं को अपने सांसद, विधायक या प्रधान मंत्री को वो कानून-ड्राफ्ट सरकारी राजपत्र में छपवाने का आदेश देना चाहिए | फिर, कार्यकर्ताओं को अपने भेजे गए मेसेज-आदेश अपने वाल-नोट, ब्लॉग आदि पर डाले (जहाँ पर जनता आसानी से ढूँढ सके और पढ़ सके), ताकि जनता को सबूत मिले और दूसरों भी ऐसा करने की प्रेरणा मिले |

लाखों-करोड़ों आम नागरिकों के सांसद / प्रधानमंत्री को एस-एम-एस द्वारा आदेश दिए जाने पर निम्नलिखित परिणाम होंगे :

(1) इससे मेसेज-आदेश भेजने वाले लोगों की संख्या का एक जांच किये जा सकने वाला (सत्यापनीय) सबूत बनेगा और फिर (2) यह संख्या महात्मा उद्धम सिंह जैसे निडर कार्यकर्ताओं को प्रेरित करेगी कि वो प्रधान मंत्री से मिलें और उन्हें राजपत्र (हर महीने या हर सप्ताह छपने वाली सरकारी पत्रिका) में वो कानून डालने को कहें | (3) इससे या तो प्रधान मंत्री जनता के दबाव में आकर वो ड्राफ्ट राजपत्र में छाप देंगे या फिर जनता और महात्मा उद्धम सिंह की विनतियों के कारण वर्त्तमान प्रधानमंत्री या जनता द्वारा लाये गए अगले प्रधान मंत्री उस कानूनी व्यवस्था को सरकारी राजपत्र में छापेंगे |

और इस तरह, जनता द्वारा पसंद किया गया प्रक्रिया-ड्राफ्ट सरकारी राजपत्र में छाप दी जाएगी या आपके प्रिय नेता प्रधानमंत्री बन जायेंगे |

इस लेख में हमने व्यवस्था परिवर्तन करने के लिए प्रयोग किये गए कुछ तरीकों की तुलना की है और समझाया है कि एस-एम-एस के द्वारा सीधे आदेश देना क्यूँ एक श्रेष्ठ उपाय है दूसरे तरीकों की तुलना में, जैसे धरना-अनशन, पत्र लिखना, नारेबाजी आदि | तथा हमने संभव कारण दिए हैं कि क्यूँ कांग्रेस नेता, अन्ना हजारे, अरविन्द भाई, सुब्रमनियम इत्यादी अपने समर्थकों को एस.एम.एस द्वारा मंत्रियों तथा अन्य जन-सेवकों को मेसेज-आदेश देने से मना कर रहे हैं |

===========सारांश का अंत===========

2.2 “एस.एम.एस द्वारा आम नागरिकों का जनसेवकों को आदेश” का विस्तार में वर्णन

2.2.1 सबसे पहले कदम जो कार्यकर्ताओं को उठाने होंगे (1-3) | इन 3 कार्यों (कदम) को करने के लिए कुल लगभग 5 मिनट ही लगेंगे |

1. मंत्रियों के मोबाईल फ़ोन के नंबरों की प्राप्ती –

कार्यकर्ताओं को हमारा सुझाव है कि वे भारत के सुप्रीम-कोर्ट प्रधान जज (उच्चतम न्यायाधीश), प्रधान मंत्री और राष्ट्रपति आदि., का नंबर प्राप्त करें और उनको एस. एम.एस द्वारा आदेश भेजना शुरू करें | सभी नागरिकों को सिर्फ सरकारी नंबरों पर ही आदेश भेजना चाहिए क्यूंकि वे ही जनता के पैसों से जनसेवकों (जनता के नौकर) को उपलब्ध हुए हैं |

सांसदों के 80% मोबाइल नंबर लोकसभा वेबसाइट पर उपलब्ध है (http://164.100.47.132/LssNew/Members/statelist.aspx ) | नागरिकों को बाकी के सांसदों के नंबर पाने के लिए, अपने क्षेत्र के सांसद या उनके पार्टी अध्यक्ष या सांसद के पार्टी के अन्य सांसदों को फोन करके या उनको पत्र या ई-मेल द्वारा ये आदेश देना चाहिए कि सांसद अपने पब्लिक फोन को लोकसभा की वेबसाइट पर सार्वजनिक करें | ये आदेश भेजने के बाद, नागरिकों को जनसेवकों को अपने भेजे आदेशों और विंतियों को जनसमूह को बताना चाहिए अपने ब्लॉग, फेसबुक वाल नोट आदि पर डाल कर या पर्चे बाँट कर | इसी तरह, दूसरे जनसेवक जैसे विधायक, जज, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति का भी नंबर लेने के लिए नागरिकों को दबाव डालना चाहिए |
यदि कुछ हजार नागरिक इस प्रकार किसी जनसेवक को अपना पब्लिक मोबाइल सार्वजनिक करने के लिए आदेश/विनती करते हैं और जनसमूह को भी उस जनसेवक को अपने आदेश/विनती के बारे में बताते हैं और यदि वो जनसेवक फिर भी अपना पब्लिक मोबाइल नंबर सार्वजनिक करने से मना करता है, तो वो जनसेवक की पोल खुल जायेगी लाखों लोगों में |

जन-सेवकों की दिनचर्या में विघ्न न डले, इसके लिए उपाय –

अगर यह जनसेवक सोचते हैं कि इतने सारे एस.एम.एस रोज़ सँभालने मुश्किल हैं, तो हमारा सुझाव है कि वे एक अलग मोबाईल नंबर ले लें जो सिर्फ जन-समस्याओं को समर्पित हो | तथा इस नंबर को वे एक सर्वर (कंप्यूटर का एक यन्त्र) के साथ जोड़ दें | इस प्रकार यह रोज़ के एस.एम.एस उनकी दिनचर्या को भंग नहीं करेंगे |

2. अपने जनसेवकों को पहली बार मेसेज-आदेश भेजना = जनसेवक को पहला मेसेज-आदेश

पहला आदेश यह हो सकता है कि प्रधान मंत्री, सुप्रीम-कोर्ट प्रधान जज, मुख्य मंत्री, सांसद, विधायक इत्यादी को जितने भी आदेश उनके सरकारी नंबर पर आते हैं, वे उन्हें अपनी सरकारी वेबसाइट पर तुरंत डाल दें – सभी जन-सेवक जनता के आदेशों के लिए एक सरकारी नंबर रख सकते हैं जिसे वे एक दस टेरा बाईट संग्रह क्षमता वाले कम्प्यूटर से जोड़ सकते हैं | इस प्रकार याचिकाओं का संग्रह अरबों में हो सकता है | तथा सर्वर कई लाखों एस.एम.एस एक मिनट में दर्ज कर सकते हैं |

जनसेवक को पहले मेसेज-आदेश का एक उदाहरण (तिर्च्छे अकसर समझाने के लिए हैं)  –

“मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

(आदेश का विषय नागरिक अपनी जरुरत अनुसार बदल सकते हैं) मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि लोकसभा अध्यक्ष को आदेश दें कि तुरंत प्रस्ताव शुरू करें कि श्री क.ख.ग. (आपके प्रिय नेता) को प्रधानमंत्री बनाया जाये | और मैं आपको उस प्रस्ताव में `हाँ` वोट करने का आदेश देता हूँ |

और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

जनसेवक को पहले मेसेज-आदेश का एक और उदाहरण

“मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

(आदेश का विषय नागरिक अपनी जरुरत अनुसार बदल सकते हैं) मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि प्रधानमंत्री को आदेश दें कि राजपत्र में तुरंत छापें कि कि यदि कोई नागरिक-वोटर चाहे तो वो किसी भी दिन अपने कलेक्टर के दफ्तर जाकर, 20 रुपये प्रति पन्ना देकर, अपनी एफिडेविट स्कैन करवाकर प्रधानमंत्री वेबसाइट पर रखवा सकेगा |

और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

3. भेजे गये मेसेज-आदेशों को नागरिकों को सार्वजनिक करके जनता को दिखाने चाहिए ताकि जनता को सबूत मिले और दूसरों को भी ऐसा करने की प्रेरणा मिले –

केवल सांसद, विधायक आदि को पहला मेसेज-आदेश भेजना पर्याप्त नहीं है जनसेवकों पर दबाव बनाने के लिए | जनसेवकों पर दबाव बनाने के लिए, नागरिकों को जनता को ये प्रमाण देना होगा कि उन्होंने जनसेवक को आदेश भेजे हैं | इसीलिए, नागरिकों को अपने भेजे गए मेसेज-आदेश अपने फेसबुक वाल-नोट, ब्लॉग आदि पर डालना चाहिए (जहाँ जनता आसानी से ढूँढ सके और पढ़ सके) या कोई अन्य सुविधाजनक तरीके जैसे पर्चे आदि द्वारा जनसमूह को बताना चाहिए ताकि जनता को प्रमाण मिले और दूसरे नागरिकों को भी ऐसा करने की प्रेरणा मिले |

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2.2.2 यदि सांसद आदि जनसेवक हजारों सार्वजनिक मेसेज-आदेश, जो सार्वजनिक दिखाए गए हैं, का कोई जवाब नहीं देता, तो जनसेवक की पोल लाखों लोगों में खुल जायेगी

यदि कुछ 200-300 नागरिक जनसेवक को मेसेज-आदेश भेज देते हैं और अपने भेजे गए मेसेज-आदेश सार्वजनिक करके जनसमूह को बताते हैं और जनसेवक कोई जवाब नहीं देता, तो जनसेवक पर पर्याप्त दबाव नहीं होने के कारण कोई भी परिणाम नहीं आएगा | लेकिन, यदि जनसेवक के क्षेत्र के कुछ हजार नागरिक भी ऐसा करते हैं, मतलब कि मेसेज-आदेश भेज कर अपने मेसेज-आदेश जनसमूह को बताते हैं और जनसेवक कोई जवाब नहीं देता, तो जनसेवक की पोल लाखों नागरिकों में खुल जायेगी | फिर, इस प्रक्रिया के कारण, कम से कम जनता को इस जन-विरोधी सांसद, जो हजारों नागरिकों का भी जवाब नहीं देता, से छुटकारा मिल जायेगा |
तो, यदि आपको लगता है कि आपका सांसद जन-विरोधी है, हजारों नागरिकों की बात भी नहीं सुनाता है, तो उस बुरे सांसद को 5 साल बर्दाश्त करने की बजाय, उसकी पोल जनता में खोलनी चाहिए, उसको मेसेज-आदेश भेज कर और उसके जवाब या ख़ामोशी को फेसबुक वाल नोट, ब्लॉग, पर्चे आदि द्वारा जनता को बता कर, ताकि जनता को प्रमाण मिले और दूसरे नागरिकों को भी ऐसा करने की प्रेरणा मिले |

2.2.3. संभव बहाने और आपतियाँ, जो जनसेवक बता सकता है इस सिस्टम को लागू नहीं करने के लिए और आपत्तियों को दूर करने के लिए सरल समाधान-कदम (स्टेप) जो जनसेवक लागू कर सकते हैं –

ये भी सम्भावना है कि जनसेवक जनता के दबाव के कारण जवाब तो देता है, लेकिन वैध या गलत आपतियाँ और कारण देता है, अपने पब्लिक मोबाइल को अपनी वेबसाइट से ना जोड़ने के लिए | और इस तरह जनता के दबाव से बचने का प्रयास करता है, बिना ये सिस्टम को अपनी वेबसाइट पर लागू किये |

आयें देखते हैं कुछ आपत्तियां जो जनसेवक दे सकता है अपने पब्लिक मोबाइल को अपनी वेबसाइट के साथ ना जोड़ने के लिए और इन आपत्तियों को दूर करने के लिए सरल समाधान –

1) जनसेवक की संभव आपत्ति नंबर 1 – एक ही नागरिक-वोटर द्वारा दोहराए गए मेसेज-आदेश और इसका सरल समाधान = मोबाइल नंबर के हरेक सिम को पहचान पत्र (वोटर आई.डी.) के साथ जोड़ना 

संभव आपत्ति
जनसेवक ये कह सकता है कि ” एक नागरिक-मतदाता एक ही मेसेज कई बार भेज सकता है एक सिम से या कई सिम से | नकलों के दोहराव के कारण, सांसद को भेजे गए मेसेज-आदेश जो सांसद के वेबसाइट पर दर्शाये गए हैं, उससे असली जनता की राय का नहीं पता चलता है | इसीलिए, इस तरह के सिस्टम को लागू करने से नागरिक भ्रमित होंगे |

इस आपत्ति को समाप्त करने के लिए सरल समाधान जो लागू किया जा सकता है –

हर मोबाईल नंबर की हरेक सिम को उसके मालिक के ‘मतदाता पहचान पत्र’ और बाद में अंगुली के छाप के साथ चिन्हित करना या जोड़ना जिस से प्रमाणिकता सुनिश्चित हो सके और एक ही नागरिक से एक ही संदेश के दोहराव की समाप्ति सुनिश्चित हो सके

जन-आदेशों की विशिष्टता सुनिश्चित करने के लिए मोबाईल नंबर की हरेक सिम को उसके मालिक के ‘मतदाता पहचान पत्र’ के साथ चिन्हित या जोड़ा जा सकता है | जैसे अगर किसी नागरिक के पास अगर दो मोबाईल नंबर हैं, तो उनमें से सिर्फ एक ही जनसेवकों के कंप्यूटर अथवा मोबाईल में पंजीकृत होगा | और बाकि सभी नंबर सूची से निकाल दिए जायेंगे कंप्यूटर के सॉफ्टवेर द्वारा | इससे एक ‘मतदाता पहचान पत्र-मोबाईल नंबर सूची’ या डाटाबेस तैयार हो जायेगा जिसमें मतदाता का नाम, पता, मोबाइल नंबर और पहचान पत्र संख्या होगा |

मतदाताओं से विनती की जायेगी कि वे अपनी मोबाईल कम्पनी से संपर्क साधें और उन्हें अपना नाम, पता और मतदाता पहचान पत्र संख्या सम्बंधित जनसेवक के ईमेल पर भेजने के लिए कहें और सांसद भी अपने क्षेत्र के मोबाइल सेवा देने वाली कम्पनियों (ऑपरेटर) को कह सकता है कि वे उस क्षेत्र के उनके ग्राहकों के पहचान पत्र (वोटर आई.डी) के साथ उनका मोबाइल का बिल उसको ई-मेल द्वारा भेजें |

ये डाटाबेस बन जाने के बाद, मेसेज-आदेश जो जनसेवक की वेबसाइट पर अपने आप प्रकाशित होंगे, की जांच कोई भी नागरिक आसानी से स्वयं कर सकता है | सॉफ्टवेर की मदद से कंप्यूटर एक ही नागरिक के एक से अधिक नंबरों को सूची से निकाल देगा |

शुरुआत में मान लीजिये 10 प्रतिशत तक गलतियाँ हो भी जायें, मगर यह मंत्रियों की तानाशाही से तो बहुत बेहतर होगा | बाद में, इन गलतियों को भी समाप्त किया जा सकता है, नागरिकों के अंगुली के छाप लेकर और उनको मोबाइल नंबर की हरेक सिम के साथ जोड़ कर |

सभी मतदाताओं के एस-एम-एस उनके मोबाईल नंबर सहित स्थायी रूप से जनता के समक्ष रखे जायेंगे | भेजा गया एस-एम-एस, वेबसाइट पर भेजने वाले के नाम और मतदाता प्रमाण पत्र के साथ आएगा |

2) जनसेवक की संभव आपत्ति नंबर 2 – नागरिकों द्वारा झूठे दावे कि उन्होंने सर्वर को मेसेज-आदेश भेजे हैं और समाधान = फीडबैक मेसेज सिस्टम –

सम्भव आपत्ति –

जनसेवक ये कह सकता है कि “ नागरिक-वोटर जनसेवक को मेसेज-आदेश भेजने के झूठे दावे कर सकते हैं, जबकि सच्चाई में जनसेवक के सर्वर पर कोई भी मेसेज-आदेश नहीं आया | “

इस आपत्ति को समाप्त करने के लिए सरल समाधान जो लागू किया जा सकता है – फीडबैक एस.एम.एस (कन्फर्म करने वाला मेसेज) –

जवाब में सम्बंधित सर्वर एक कन्फर्म करने वाला, एस-एम-एस द्वारा, मतदाता को भेजेगा, जैसे `धन्यवाद, हमें आपका चयन आदेश “विधायक इस्तीफा-हाँ” मिल चुका है` अथवा `धन्यवाद, हमें आपका चयन आदेश “विधायक इस्तीफा-ना” मिल चुका है`| मतदाताओं की संख्या को मद्देनज़र रखते हुए देखा जाये तो अगर कोई नागरिक सौ – दो सौ नकली एस-एम-एस भेज भी देता है, तो अंतिम निर्णय पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ेगा | और अगर कोई हजारों नकली सन्देश भेज देता है, तो वो पुष्टि (कन्फर्म) करने वाला सन्देश और वेबसाइट द्वारा पकड़ा जायेगा |

अब सवाल आता है कि क्या कोई वेबसाइट का दुरुपयोग कर सकता है ? हाँ, पर केवल वेबसाइट का एडमिन (पद्धति प्रबंधक) ही ऐसा कर सकता है | लेकिन अगर ऐसा हुआ, तो वेबसाइट पर हुए बदलाव साफ़ तौर पर पूरी दुनिया के सामने आ जायेंगे और उन्हें अगले ही क्षण, पुराना डाटा वापिस डाला जा सकता है | यह कई तरीकों से हो सकता है | इस तरह कन्फर्म करने वाला सन्देश और वेबसाइट के स्थायी लेख प्रमाण द्वारा यह सिस्टम नकल और जालीपने से सुरक्षित है | और अगर किसी ने 1 प्रतिशत भी जाली सन्देश भेजे, तो वो सबूत के साथ पकड़ा जायेगा |

3) जनसेवक की संभव आपत्ति नंबर 3 – जनसेवक और उसके कर्मचारियों के पास कुछ भी समय नहीं बचेगा यदि ये सिस्टम लागू किया गया तो |

संभव आपत्ति

“ यदि इस सिस्टम को लागू किया जाता है, तो जनसेवक और उसके कर्मचारियों के पास अपना काम करने के लिए कुछ भी समय नहीं होगा क्यूंकि उनका सारा समय उनकी वेबसाइट पर प्राप्त मेसेज पढ़ने और उनके जवाब देने में चला जायेगा |

इस आपत्ति को समाप्त करने के लिए सरल समाधान जो लागू किया जा सकता है – एस-एम-एस के लिए संक्षिप्त कोड (शोर्ट कोड=कूट संकेत) का निर्माण और एक ही विषय के मेसेज के लिए सॉफ्टवेर अपने आप समूह बनाएगा – एक ही संक्षिप्त कोड के लिए, किसी भी सिम से भेजा गया केवल अंतिम मेसेज ही सर्वर पर दर्ज होगा

जनसेवकों को सभी आदेश अलग अलग पढ़ने की आवश्यता नहीं है, आम नागरिक या जनसेवक संक्षिप्त कोड का निर्माण कर सकते हैं जो एस.एम. एस के द्वारा भेजें जाएँ और कंप्यूटर पर उन कोड को अलग अलग श्रणियों में डाला जा सकता है | जैसे “अफज़ल फांसी-हाँ” अथवा ” अफज़ल फांसी-ना “, “प्रधान मंत्री इस्तीफा-हाँ” या “प्रधान मंत्री इस्तीफा-ना” इत्यादी | इससे जन-सेवकों का समय बचेगा |  तथा कलेक्टर के दफ्तर जाकर या जनसेवक के दफ्तर जाकर सौ रुपये और एक एफिडेविट (शपथपत्र) जमा करके एक आम नागरिक नए कोड (शोर्ट कोड=कूट संकेत) को जनसेवक की वेबसाइट पर दर्ज करने की विनती भी कर सकता है |

किसी एक मुद्दे पर संदेशों का ऑटोमैटिक समूह बनाना (स्वतः वर्गीकरण) – एक ही संक्षिप्त कोड के लिए, किसी भी सिम से भेजा गया केवल अंतिम मेसेज ही सर्वर पर दर्ज होगा |

कंप्यूटर अलग-अलग मोबाइल से आये एक ही सन्देश को सॉफ्टवेर द्वारा ऑटोमैटिक तरीके से समूह बना सकता है | यदि कोई मतदाता-नागरिक एक ही मुद्दे पर दो राय प्रस्तुत करने वाले सन्देश भेजता है, तो उनमें से केवल उस नंबर से आखरी भेजा गया सन्देश दर्ज होगा | जैसे यदि वो पहले “अफज़ल को फांसी-हाँ” भेजता है और फिर “अफज़ल को फांसी-ना” तो सिर्फ “अफज़ल को फांसी-ना” वाला आखरी भेजा गया सन्देश दर्ज होगा |

इस प्रकार, संक्षिप्त कोड और एक ही शोर्ट कोड पर भेजे गए मेसेज के ऑटोमैटिक समूह बनाने के कारण, जनसेवकों को सारे मेसेज पढ़ने नहीं पढेंगे और फिर भी उन्हें जनता की राय पता चल जायेगा | इस प्रकार, जनसेवकों का समय बरबाद नहीं होगा और उन्हें और सभी नागरिकों को जनता की राय प्रामाणिक तरीके से पता चलेगी |

और जैसे-जैसे, यह एस-एम-एस द्वारा जनसेवकों को आदेश भेजने का तरीका फैलेगा, यह सिस्टम और अच्छा (विकसित) भी होगा | एक ही व्यक्ति द्वारा दो नंबरों से संदेशों के भेजने को रोकने के लिए सिर्फ मोबाइल नंबर के सिम और मतदाता पहचान पत्र को आपस में जोड़ने की आवश्यकता होगी | इस सुविधा के लिए, मोबाइल कंपनियां एक महीने में पहले 100 एस-एम-एस के लिए 10 पैसे का और फिर अगले 100 एस-एम-एस के लिए 50 पैसे का शुल्क ले सकती हैं |

4) जनसेवक की संभव आपत्ति नंबर 4 – ये प्रक्रिया पैसों से, गुंडों द्वारा या मीडिया द्वारा आसानी से प्रभावित की जा सकती है

संभव आपात्ति –

“ इस प्रक्रिया को पैसों से आसानी से खरीदा जा ससकता है, मतलब कि नागरिकों को कोई अमीर, भ्रष्ट व्यक्ति पैसे देकर खरीद लेगा और उसको फायदा पहुँचाने वाले मेसेज-आदेश करने के लिए कहेगा | इसी तरह, आमिर, प्रभावशाली व्यक्ति इस प्रक्रिया को बिकाऊ मीडिया और गुंडों द्वारा प्रभावित कर सकते हैं ”

इस आपत्ति को समाप्त करने के लिए सरल समाधान जो लागू किया जा सकता है

एक सुरक्षा उपाय जो आम नागरिक उपयोग कर सकते हैं एक मतदाता अपना मेसेज-आदेश कभी भी बदल सकता है; एक नागरिक द्वारा एक संक्षिप्त कोड पर अंतिम भेजा गया मेसेज सर्वर पर दर्ज होगा | इस प्रकार, इस सुरक्षा ऊपाय के कारण नागरिकों की राय पैसे से, गुंडों से और बिकी हुई मीडिया द्वारा प्रभावित नहीं की जा सकेगी | कोई भी राय खरीदने के लिए रोज़-रोज करोड़ों रूपए नहीं खर्च कर सकता और ना ही कोई रोज़ लाखों लोगों पर हजारों गुंडे छोड़ सकता है |

क्यूंकि जनता नागरिकों द्वारा जनसेवक को भेजे गए मेसेज-आदेश को जनसेवक की वेबसाइट पर कभी भी देख सकेगी, नागरिक भेजे गए मेसेज-आदेशों का एक छोटा सैम्पल लेकर जांच कर सकते हैं कि भेजे गए मेसेज आदेश और उन मेसेज को भेजने वाले व्यक्ति असली हैं या नकली | फिर, यदि कोई मीडिया झूठ बोलने का प्रयत्न करता है, तो उसकी पोल तुरंत खुल जायेगी |

5) जनसेवक की संभव आपत्ति नंबर 5 – बहुत लोगों के पास मोबाइल नहीं है और इसीलिए वे `जनसेवक को मेसेज-आदेश` का प्रचार का तरीका का उपयोग नहीं कर पाएंगे

इस आपत्ति को समाप्त करने के लिए सरल समाधान जो लागू किया जा सकता है –

पटवारी (तलाटी, लेखपाल) या जनसेवक द्वारा निश्चित कोई अन्य सरकारी दफ्तरों को आदेश दिया जा सकता है कि उन दफ्तरों पर जाकर, कोई भी नागरिक अपनी हां/ना जनसेवक की वेबसाइट पर पहले से दर्ज संक्षिप्त कोड पर कर सकेगा |

इस प्रकार, जिन नागरिकों के पास मोबाइल नहीं है या उनको मेसेज भेजना नहीं आता है, वे पास के पटवारी के दफ्तर या जनसेवक द्वारा निश्चित अन्य कोई सरकारी दफ्तर जाकर, अपना हाँ/ना दर्ज कर सकते हैं, जनसेवक की वेबसाइट पर पहले से ही दर्ज संक्षिप्त कोड पर, एक रुपये का शुल्क देकर और अपने आपको पहचान पत्र, फोटो (महिलाओं के लिए वैकल्पिक) और अंगुली के छाप द्वारा अपनी पहचान करवाकर | नागरिक-मतदाता बिना कोई शुल्क दिए, अपनी राय किसी भी दिन रद्द भी कर सकते हैं |

इसके अलावा, आजकल प्रयोग किये हुए मोबाइल 500 रुपयों के लगभग बिकते हैं | ऐसे प्रयोग किये हुए मोबाइल को जनसेवक या कोई अमीर व्यक्ति, गरीबों को दान कर सकता है | और गरीबों के लिए, कुछ सरकारी नंबर पर मेसेज भेजना मुफ्त किया जा सकता है |

नोट

नागरिकों द्वारा जनसेवक को (सीधे) ई-मेल, पत्र या फोन का भी उपयोग किया जा सकता है, जब नागरिक के पास, किसी भी कारण, मेसेज-आदेश भेजने की कोई सुविधा ना हो | लेकिन मेसेज-आदेश की तुलना में, ई-मेल, पत्र या फोन द्वारा दिए गए आदेशों को सिद्ध करना काफी कठिन कार्य है | `जनसेवक को मेसेज-आदेश` के प्रचार के तरीके की तुलना में, जनसेवक को ई-मेल, पत्र भेजना या उसको फोन करने के तरीकों में कहीं अधिक नागरिकों की सीधी भागीदारी चाहिए, जनसेवकों पर पर्याप्त दबाव बनाने के लिए कि जनसेवक मजबूर हो जायें नागरिकों के आदेशों को राजपत्र में छाप कर तुरंत लागू करने के लिए |

इस लिए, नागरिकों को हर प्रयास करना चाहिए जनसेवकों पर दबाव डालने के लिए कि जनसेवक वेबसाइट पर अपना पब्लिक मोबाइल बताये और फिर नागरिकों को जनसेवकों को मेसेज-आदेश भेजने चाहिए | यदि नागरिक जनसेवक को पत्र लिख रहे हैं या फोन कर रहे हैं, तो भी नागरिकों के लिए जनसेवकों को मेसेज-आदेश भेजना जरुरी है |

2.3 अन्ना हजारे, अरविन्द केजरीवाल तथा सुब्रमनियम जैसे नेताओं द्वारा सुझाये गए अभियान (प्रचार) के तरीके :

मान लीजिये कि भारतीय राजपत्र में एक प्रक्रिया-ड्राफ्ट छपवाना है | ये ड्राफ्ट अन्ना/केजरीवाल का “जनलोकपाल, बिना राईट टू रिकॉल जनलोकपाल” या हमारा प्रस्तावित “एस-एम-एस द्वारा राईट टू रिकॉल प्रधान मंत्री” या कोई और भी हो सकता है |

फिर, आम आदमी किन तरीकों का प्रयोग करके अपना समर्थन या विरोध दर्ज करा सकता है ताकि उसके विरोध या समर्थन का सबूत हो, जो किसी भी आम-नागरिक द्वारा जांच किया जा सके ?

हमारा सुझाव यह है के आम-नागरिक मंत्रियों अथवा अन्य जनसेवकों को एस-एम-एस के द्वारा आदेश देकर अपना पसंदीदा कानून-ड्राफ्ट (प्रणाली) राजपत्र में छपवा सकता है या संवैधानिक बदलावों के विषयों में, संसद में पारित करवा सकता है |

अन्ना हज़ारे और अरविन्द केजरीवाल और अन्य अधिकतर नेताओं ने ही इस बात का विरोध किया है कि आम आदमी और कार्यकर्ताओं को कानून-ड्राफ्ट पढ़ने की या उनपर निर्णय ले कर प्रधानमंत्री, सांसद, अन्य जनसेवकों को एस-एम-एस द्वारा आदेश देने की ज़रूरत है |

अन्ना हज़ारे, सुब्रमनियम और केजरीवाल ने केवल निम्नलिखित सुझाव प्रस्तावित किये हैं :

1. संवाददाता सम्मलेन बुलवाना – जिसमें नेता सम्मलेन में भाग लें और कार्यकर्ता केवल दर्शक बने रहें |

2. भूख हड़ताल (अनशन) – नेता मंच पर अनशन करें और जनता नारे चिल्लाये |

3. नेता पूजन – कुछ कार्यकर्ता बाकी सभी कार्यकर्ताओं और नागरिकों को संपर्क करें और उनके सामने अपने नेता का गुणगान करते हुए उनको यह झूठा आश्वासन दें कि उनके नेता चुनावों के बाद बिकेंगे नहीं और न ही भ्रष्ट होंगे |

4. नारे बाज़ी – अपने प्रिय नेता और प्रिय पार्टी की जय-जय करना या अपनी प्रिय मांग के लिए नारेबाजी – जमीन पर या ऑनलाइन

5. झंडे फहराना और समूह प्रदर्शन (रैली) करना |

6. मोमबत्तियां जलाना

7. और विशेषकर, अगले चुनावों का इंतज़ार करने को कहते हैं |

8. यदि कोई समाधान लाने के लिए कानून-ड्राफ्ट मांगे, तो उसे कहना के “एक विशेष समिति बनाई गई है ड्राफ्ट्स के लिए”

9. जो नेता कोर्ट के चक्कर लगते हैं लेकिन किसी को भी सजा नहीं दिलवाते और ना ही कोई सकारात्मक परिणाम आता है, उन नेताओं की चमचागिरी करना या उनकी जय-जय कार करना |

इत्यादी…..

ये नेता सरकार से तो हमेशा नागरिक-चार्टर (सरकारी कर्मचारियों के लिए कार्य पूरा करने की एक समय-सीमा (समय निश्चित कार्यक्रम)) की मांग करते हैं, लेकिन कभी भी अपने प्रस्तावों और वायदों के ड्राफ्ट देने की समय-सीमा (एक समय निश्चित कार्यक्रम) कार्यकर्ताओं द्वारा पूछने पर भी, अपनी वेबसाइट पर नहीं डालते |

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2.4 ‘प्रधानमंत्री, सांसद और बाकी जनसेवकों को एस.एम.एस द्वारा आदेश देना’ के क्या फायदे हैं अनशन, नारेबाजी और दूसरे प्रचार के तरीकों की तुलना में ?

1. सबसे पहले, ये हर एक आम नागरिक का संवैधानिक कर्त्तव्य है कि वो सभी जन-सेवकों जैसे प्रधान मंत्री, सुप्रीम-कोर्ट प्रधान जज, मुख्य मंत्री, सांसद, विधायक इत्यादी को ज़रूरी और उचित आदेश (एस.एम.एस, मेल द्वारा) दे |

केवल अपने प्रिय नेता या अपने प्रिय पार्टी या अपने प्रिय मांग के लिए नारेबाजी करना अपर्याप्त है | ऐसा करने से, आपके प्रिय नेता प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री नहीं बन जायेंगे या आपकी प्रिय मांग लागू नहीं होगी | सोशियल साईट पर या रैलियों में नारेबाजी करने का कोई लाभ नहीं है, जब तक आप, एक आम-नागरिक अपने जनसेवकों को प्रामाणिक रूप से आदेश नहीं देते, क्यूंकि केवल सांसद, विधायक आदि जनसेवकों के पास आधिकार हैं कि वे आपके प्रिय नेता को प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बना सकते हैं या आपके प्रिय मुद्दे को राजपत्र में छपवाकर लागू करवा सकते हैं |

2. `जनसेवकों को मेसेज-आदेश` जनसेवकों को आदेश देने का प्रामाणिक तरीका है, जिसमें कुल जन-समर्थन की संख्या सिद्ध करने के लिए किसी भी बिकी हुई मीडिया के समर्थन की ज़रूरत नहीं है | भेजा गया एस.एम.एस आदेश तथा भेजने वाले व्यक्ति, दोनों को साबित किया जा सकता है | मोबाईल नंबर के हरेक सिम को एक मतदाता प्रमाण पत्र के साथ जोड़ने से एक ही व्यक्ति से एक ही आदेशों के दोहराव (द्विरावृति) को जनसेवक की वेबसाइट का सॉफ्टवेर हटा सकता है और सही कुल जन-समर्थन संख्या का पता लगाया जा सकता है |

3. `जनसेवक को मेसेज-आदेश` प्रचार-तरीके में छेड़-छाड़ संभव नहीं है – न तो मीडिया, न पैसा और न ही किसी प्रकार की गुंडागर्दी द्वारा लोगों के समर्थन की संख्या में किसी प्रकार की हेर-फेर की जा सकती है क्योंकि जनता कभी भी सरकारी वेबसाइट पर जाकर सारी जानकारी स्वयं जांच कर सकती है |

4. इस तरीके के प्रयोग करने से नेता, कार्यकर्ता और आम आदमी एक ही स्तर पर आकर खड़े हो जाएँगे | कोई भी किसी से ज्यादा शक्तिशाली नहीं रहेगा |

5. इस तरीके में आम आदमी अपना विरोध एक प्रामाणिक तरीके से कर सकता है , मतलब कि आम आदमी विरोध करेने वालों की संख्या के सबूत और अन्य सबूत देकर विरोध कर सकता है और इसीलिए जनसेवकों पर प्रभावशाली तरीके से दबाव डाल सकता है |

6. यह एक विकेन्द्रित (फैला हुआ, कार्यकर्ता और आम-आदमी आधारित) आन्दोलन होगा जिसे दबाना सरकार की क्षमता के बहार होगा –

– सरकार के लिए एक केन्द्रित (सिमटा हुआ, नेता-आधारित) आन्दोलन को दबाना ज्यादा कठिन नहीं होता जैसे ‘बाबा रामदेव का जनांदोलन’ या ‘अन्ना का आन्दोलन’ जहाँ कोई नेता अनशन को शुरू करने का या समाप्त करने का आदेश या दूसरे आदेश अपने चेले-कार्यकर्ताओं को देता है |

– लेकिन, `जनसेवक को मेसेज-आदेश` के प्रचार-तरीके में हिस्सा लेने वालों की बड़ी संख्या होने के कारण, सरकार के लिए ये संभव नहीं है कि एक विकेन्द्रीयकृत तरीके जैसे `जनसेवक को मेसेज आदेश` को दबाना, बिना दबाने की कोशिश करने वालों की सबूत सहित पोल लाखों के सामने खुले |

7. `जन्सवेक को मेसेज-आदेश` प्रचार-तरीके में सरकार द्वारा किए गए, कोई भी संभव अत्याचार जनसमूह में बंट जाएंगे | और इसीलिए कुछ ही लोगों को भारी नुकसान झेलने की संभावना बहुत कम होगी है, रैली, अनशन, धरना, आदि की तुलना में, इन कारणों से – 

– यदि प्रधान-मंत्री एस.एम.एस भेजनेवाले व्यक्ति को दंडित करने का निर्णय लेता है, तो उसे सभी लोगों को दंडित करना पड़ेगा; जबकि लाठी-चार्ज में कुछ ही दुर्भाग्यपूर्ण लोग बुरी तरह से पीटे जाएंगे और बाकी लोग बच जाएंगे |
– यदि प्रधान-मंत्री एस.एमएस भेजनेवाले को दंडित करने का निर्णय लेता है, तब पहले नेताओं को प्रकोप झेलना पड़ेगा और फिर ही समर्थकों को झेलना पड़ेगा ; जबकि रैलियों में समर्थकों को बुरी तरह से पीटा जाता है और रैली, अनशन में नेता बच जाते हैं !!!

8. “ जनता के एस.एम.एस-आदेश जनसेवकों की लिए ” प्रचार-तरीके का भरोसेमंद रिकोर्ड – एक भरोसे लायक एस.एम.एस का रिकोर्ड दो फोन कोंपनियों के सर्वरों और एस.एम.एस. पाने वाले के पास भी रहेगा  |

9. ये प्रचार-तरीका सस्ता है प्रधानमंत्री / मुख्य मंत्री को एस.एम.एस के द्वारा आदेश भेजना बहुत सस्ता है और प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री / सांसद आदि जनसेवक अपने सार्वजनिक मोबाइल नंबर पर 100 एस.एम.एस हर महीने आम-नागरिक के लिए भेजने को मुफ्त कर सकते हैं | इस तरह ज्यादातर नागरिक कम से कम 100 लोग एस.एम.एस करने में समर्थ हो पाएंगे |

10. ये अपनी राय देने या प्रदर्शन का तरीका अधिकतर जनसंख्या के द्वारा प्रयोग किया जा सकता है ये  70% से अधिक मतदाताओं की जनसंख्या के लिए सस्ता उपाय है अपनी राय देने के लिए (ट्राई के आंकड़ों के अनुसार, देखें – http://en.wikipedia.org/wiki/Telecommunications_statistics_in_India ) ; बाकी लोगों को मुफ्त, सस्ते मोबाइल दिये जा सकते हैं ; सस्ते मोबाइल का दाम 500 रुपयों से कम होता है और उनको कुछ 20 करोड़ लोगों को दिये जाना संभव है | और जिनके पास मोबाइल नहीं है, वे अपने पास के पटवारी (लेखपाल, टालती) दफ्तर या पास के जनसेवक द्वारा निश्चित सरकारी दफ्तर जाकर अपनी हां/ना की राय दे सकते हैं पहले से दर्ज संक्षिप्त कोड पर | जिन लोगों को मेसेज करना नहीं आता, वे लोग जनसेवक को मेसेज भेजने के लिए दूसरे लोगों की मदद ले सकते हैं क्यूंकि मेसेज भेजना कोई रोकिट विज्ञानं नहीं है |

11. स्वतःसमूहिकरण (अपने आप समूह बनाना) यदि आम-नागरिक आदेश देते हैं और प्रधान-मंत्री चाहता है, तब प्रधान-मंत्री लोगों को एस.एम.एस के लिए संक्षिप्त कोड (छोटे अक्षरों) का प्रयोग करने को कह सकता है (जैसे संक्षिप्त कोड “अफजल फांसी हाँ “ या संक्षिप्त कोड “ अफजल फांसी नहीं “ ) और तब प्रधान-मंत्री ऐसे सस्ते तरीके द्वारा, करोड़ों लोगों की राय कुछ मुद्दों पर तो ले ही सकता है, यदि हर मुद्दे पर प्रधानमंत्री नागरिकों की राय नहीं भी ले, तो भी |

जबकि ऐसे तरीके जो अन्ना, अरविंद भाई आदि ने सुझाए हैं –– जैसे कि नारेबाजी, प्रदर्शन करना, मोमबत्ती  जलाना, नेता पूजन और चुनाव जीतने की प्रतीक्षा करना –– इनमें ऐसी कोई भी विशेषताएं नहीं हैं |

2.5. प्रदर्शन करना, मोमबत्ती जलाना, नेता पूजन और चुनाव जीतने की प्रतीक्षा करना, इन सब के भारी दुष्प्रभाव और नुकसान — जनसेवकों को एस.एम.एस के द्वारा आदेश भेजने की तुलना में  

अब, मैं समय-बर्बाद करने वाले नेताओं के कुछ तरीकों की तुलना “आम-नागरिकों द्वारा अपने प्रधानमंत्री और अन्य जनसेवकों को मेसेज-आदेश” के तरीके से करूंगा, ताकि समय-बरबादी करने वाले नेताओं के तरीकों का नागरिकों को होने वाला नुकसान सामने आये |

  1. जमीन पर या सोशियल साईट पर अपने प्रिय नेताओं के लिए नारेबाजी करना या अपने प्रिय मांग के लिए नारेबाजी करना – केवल एक लाउड-स्पीकर लगाकर नारेबाजी करना या सोशियल साईट पर नारेबाजी करना अपने प्रिय नेता के लिए या अपनी प्रिय मांग को पूरा करवाने के लिए अपर्याप्त है ; ऐसे करने से आपका प्रिय नेता कभी भी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री नहीं बनेगा और ना ही आपकी प्रिय मांग कभी लागू होगी |

    केवल नारेबाजी करना बेकार है, जब तक हम, आम-नागरिक अपने जनसेवकों के सामने प्रामाणिक तरीके से, अपनी स्पष्ट मांग प्रक्रिया-ड्राफ्ट के रूप में नहीं रखते और उन्हें अपने प्रस्तावित प्रक्रिया-ड्राफ्ट को तुरंत भारतीय राजपत्र में छपवाने का आदेश नहीं देते | सांसद और विधायक आदि जनसेवकों के पास अधिकार है आपके प्रिय नेता को प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनाने के लिए और उनके पास ये भी अधिकार है कि प्रक्रिया-ड्राफ्ट को भारतीय राजपत्र में छपवाएं ताकि आपकी प्रिय मांग लागू हो सके |

  2. पत्रकारों का सम्मेलन : इस तरीके में, अरविंद भाई आदि लोग बड़े नेता बन जाएंगे और आम आदमी को इसमें कुछ नहीं मिलेगा | क्यूँ ?? क्या भारत में हर आम आदमी पत्रकारों का सम्मेलन बुला सकता है ? जवाब है नहीं | और मान लीजिये, यदि 1 करोड़ भारत के आम आदमी पत्रकारों का सम्मेलन बुला लेते हैं, तब क्या बिकाऊ पत्रकार उनमें से पाँच लाख सम्मेलनों में भी जाएंगे और क्या फिर वो ऐसे सम्मेलनों का वैसे ही प्रसार करेंगे जैसे कि अरविन्द भाई के सम्मेलन का करते हैं ?

    नहीं | बिकाऊ पत्रकार सिर्फ उन सम्मेलनों मे जाते हैं और प्रचार करते हैं, जिनके लिए जिंदल जैसे लोग उन्हें पैसे देते हैं या फिर पत्रकारों के मीडिया-मालिकों को पैसे देते हैं | और हममें से अधिकतर आम आदमी के पास इतना पैसा नहीं है कि हम पत्रकारों को उतना पैसा दे सकें या फिर पत्रकारों के मीडिया के मालिकों को पैसे दे सकें |

  3. अन्ना, अरविंद भाई किसी भी विषय पर अनशन करते हैं | लेकिन, क्या हर आम आदमी अनशन कर सकता है ? मान लीजिये अगर 1 करोड़ नागरिक अनशन करते हैं, तब भी क्या पत्रकार उन सभी अनशनों को समान रूप से प्रचार करेंगे ? नहीं | बिकाऊ पत्रकार सिर्फ उन्हीं अनशनों को दिखाएंगे जिसके लिए उन्हें जिंदल आदि पैसे दे रहे हैं |
  4. क्या हर आम आदमी हर दिन रैली में भाग ले सकता है ? नहीं |
  5. क्या हर आम आदमी सप्ताह में एक बार रैली में भाग ले सकता है ? नहीं |
  6. क्या हर आम आदमी नेता पूजन कर सकता है ? हाँ, वो कर सकता है | पर तब क्या होगा जब वो नेता बिक जाएगा ? उदाहरण, लालू यादव, मुलायम यादव, नितीश कुमार आदि की लोग 1977 तक अंधभक्ति करते थे और ये सभी नेता चुनाव जीतने के 6 महीने के अंदर अंदर बिक गए
  7. क्या हर आम आदमी कोर्ट के चक्कर लगा सकता है या हर आम आदमी जनहित-याचिका दर्ज कर सकता है ? नहीं | केवल वे ही व्यक्ति, जिनके पास जज के साथ अच्छे संपर्क हैं या पैसे वाले हैं, कोर्ट में जनहित-याचिका दर्ज करवा पाते हैं, मतलब जनहित-याचिका ज्यादातर भ्रष्ट जज और उनके रिश्तेदारों द्वारा फिक्स किये जाते हैं ताकि उनके प्रायोजक विदेशी कम्पनियों और बड़ी कम्पनियों को फायदा हो |

पर क्या हर आम आदमी प्रधान-मंत्री को मेसेज द्वारा आदेश दे सकता है ? सहज रूप से, भारत में 70% से अधिक मतदाताओं के पास मोबाइल फोन है और इसलिए वो सभी लोग प्रधान-मंत्री या मुख्य-मंत्री को मेसेज भेज सकते हैं यदि वो भेजना चाहें तो | और शेष के लोग पटवारी (तलाटी, लेखपाल) के दफ्तर या जनसेवक द्वारा निश्चित कोई पास के सरकारी दफ्तर जा सकते हैं पहले से दर्ज संक्षिप्त कोड पर अपनी राय देने के लिए |

  • भारत की 75 करोड़ नागरिक-मतदाताओं में से कम से कम 30-40 करोड़ लोग एस.एम.एस कर सकते हैं जबकि अनशन और पत्रकार सम्मलेन जैसे कार्य कुछ लाख आम आदमी ही कर सकते हैं या फिर कुछ हज़ार उच्च वर्ग के लोग ही कर सकते हैं | और रैली में भाग लेना भारत के अधिकतर नागरिकों के लिए संभव नहीं है क्यूंकी उनके पास रैली के स्थान तक यात्रा करने के लिए पैसा नहीं है और ना ही उनके पास वहाँ तक जाने के लिए घंटो-घंटों का समय है | उसके अलावा क्या होगा अगर बिकाऊ मीडिया उनकी रैली की खबर छापने से माना कर दे या फिर रैली में भाग लेने वाले कार्यकर्ताओं की संख्या झूठी बता दे ?

मेसेज-आदेश लाखों-करोड़ों लोगों द्वारा एक नेता को भेजे जा सकते हैं जेसे कि भ्रष्ट सोनिया गांधी या फिर भ्रष्ट सूप्रीम कोर्ट के जज खरे या फिर भ्रष्ट मनमोहन आदि | पेरन्तु लाखों-करोड़ों लोग इन भ्रष्ट नेताओं को घेर नहीं सकते |

  • एक जमीनी विरोध प्रदर्शन जैसे रैली या नारेबाजी अपना कोई भी स्थायी रिकोर्ड नहीं छोड़ता | नेताओं के एस.एम.एस का रिकोर्ड फोन कोंपनियों द्वारा एक साल तक सुरक्षित रखे जाते हैं और मंत्रियों, जज को आदेश दिया जा सकता है कि उनके पब्लिक मोबाइल और उनके वेबसाइट को जोड़ें ताकि नागरिकों ने उनको जो मेसेज-आदेश उनके पब्लिक मोबाइल पर दिए हैं, वे अपने आप जनसेवक की वेबसाइट पर प्रकाशित हों और भेजे गए मेसेज-आदेशों का रिकोर्ड जनसेवक की वेबसाइट पर सभी को उपलब्ध हो | फिर, उन मेसेज-आदेशों को सभी नागरिक दख सकेंगे और कोई भी नागरिक भेजे गए मेसेज-आदेशों की जांच भी कर सकेगा कि कितने असली हैं और कितने नकली |
  • और जमीनी विरोध-प्रदर्शन बहुत महंगे होते हैं, उनमें सारी जनता की ऊर्जा व्यर्थ हो जाती है और वे सिर्फ छुट्टियों के दिनों मे ही संभव है, नहीं तो भाग लेने वाले व्यक्ति के रोजी-रोटी का नुकसान होता है | यदि मीडिया जमीनी विरोध की खबर न दिखाये, तो फिर जमीनी विरोध-प्रदर्शन का कोई लाभ नहीं होता  जबकि एसएमएस द्वारा आज्ञा भेजना बहुत ही सस्ता मधायम है, हर कोई इसे कर सकता है | जबकि एक मेसेज भेजना सस्ता है तथा भेजे गए मेसेज-आदेश का रिकोर्ड लोग देख भी सकते हैं बिना बिकाऊ मीडिया की दया के |

इस तरह “जनसेवक को मेसेज-आदेश” से समर्थकों की संख्या का सबूत, दूसरे तरीकों की तुलना में, बहुत कम कीमत में और कहीं अधिक प्रभावशाली तरीके से प्राप्त हो सकता है | नारेबाजी और मोमबत्ती जलाने में कार्यकर्ताओं का घंटों-घंटों समय खर्च होगा और उनको आने-जाने (यातायात) के लिए 100 रुपये से 300 रुपये लगेंगे और दूसरे खर्चे भी होंगे | इसके अलावा, यदि `जनसेवकों को मेसेज-आदेश` नहीं भेजे गए, तो अपने प्रिय नेता को प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनाने के लिए केवल नारेबाजी करना बेकार है | क्यूंकि केवल सांसदों के पास किसी व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाने का अधिकार है और केवल विधायकों के पास कीस व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाने का अधिकार है |  

तो कुल मिलाकर, समर्थकों की संख्या सिद्ध करने के लिए जनसेवकों को मेसेज-आदेश भेजना कहीं अधिक प्रभावशाली है | इस प्रचार के तरीके को बिकाऊ मीडिया से भी कोई समर्थन नहीं चाहिए, ये कम खर्चे वाली है | और भी कई सारे लाभ हैं, इस प्रचार-तरीके के अन्य प्रचार तरीकों की तुलना में | 

इस प्रचार-तरीके के विरोध में एक तर्क जो दिया जाता है – “ भारत में बहुत सारे लोगों के पास मोबाइल फोन नहीं है” | देखिये, कितने लोगों के पास समय और पैसा दोनों है रैली में बार-बार जाने के लिए ? निश्चित ही, 70 % से अधिक नागरिक-मतदाता के पास मोबाइल हैं और वे जनसेवकों को मेसेज द्वारा आदेश दे सकते हैं | जबकि उतने लोगों के पास बार-बार रैली में जाने के लिए पैसा और समय नहीं होगा | इसलिए हर तरह से, जनसेवकों को मेसेज भेजकर जन-समर्थन की संख्या सिद्द करना एक जयादा अच्छा तरीका है |
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2.6. बिना स्पष्ट मांगों के विरोध-प्रदर्शन करना व्यर्थ है

बिना स्पष्ट मांगों के विरोध-प्रदर्शन करना व्यर्थ है | यदि सरकारी कर्मचारियों को विस्तृत निर्देश (या ड्राफ्ट) नहीं दिए गए और यदि कोई ऐसा तरीका नहीं बताया गया, जिससे आम-नागरिक सरकारी कर्मचारियों को प्रस्तावित प्रक्रिया का दुरुपयोग करने से रोक सकें, तो फिर ऐसी बिना स्पष्ट मांग के विरोध-प्रदर्शन करने का उल्टा असर पड़ेगा | कैसे ? नेता चुनाव जीतने के बाद, ऐसा कानून नहीं बनाएगा जो आपके मन में था, लेकिन एक कमियों वाला कानून बनाएगा और कहेगा कि ये कानून जनता की मांग के कारण लाया गया है |

उदाहरण, यदि आपने मांग की थी- “मजबूत भ्रष्टाचार विरोधी कानून लाओ ” पर उसका ड्राफ्ट आपने नहीं दिया, तब नेता ऐसा कमियों वाला कानून बना सकते हैं, जो धनी या प्रभावशाली अपराधियों को आपस में सांठ-गाँठ बना कर सजा से बचने का अवसर दे | और आम-नागरिक इस कमियों वाले कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए कुछ नहीं कर सकते हैं |

इसलिए, हर एक सच्चे कार्यकर्ता या देशभक्त को अपने सुझावों के लिए ड्राफ्ट देना चाहिए और अपने नेता को ये अनुरोध करना चाहिए कि ये ड्राफ्ट अपने वेबसाइट या घोषणा-पत्र पर डाले, ताकि विभिन्न सरकारी कर्मचारी उसका सही से पालन कर सकें |

2.7. क्यूँ भ्रष्ट नेता और भ्रष्ट उच्च वर्ग के लोग नारेबाजी करने, मोमबत्ती जलने, नेता को पूजने पर आग्रह करते हैं (उनका गुप्त उद्देश्य क्या है) और वे क्यूँ “आम-नागरिकों द्वारा जनसेवक को मेसेज-आदेश” का विरोध करते हैं — ताकि सच्चे कार्यकर्ता थक जायें, बड़े नेताओं का प्रभाव बना रहे और आज का भ्रष्ट सिस्टम वैसे ही चलता रहे

   एक और झूठ जो सुब्रमनियम, मोदी, केजरीवाल और दूसरे नेता, कार्यकर्ताओं और आम-नागरिकों को बोलते हैं – `अपने पसंद के नेता और पार्टी को बहुमत से चुनकर जितवाओ और वे सभी अच्छे कानून बनायेंगे` ये पूरी तरह से असंभव है | क्यों ? मान लीजिए, किसी तरह एक पार्टी को लोकसभा में बहुमत भी मिल जाती है, लेकिन उसको 5-10 साल या ज्यादा चाहिए राज्यसभा में बहुमत पाने के लिए और कानूनों को पारित करने के लिए | यदि ये भी किसी तरह संभव हो गया कि कोई कानून दोनों सदनों में पारित हो गया, तो विदेशी कम्पनियाँ सुप्रीम-कोर्ट में अपने एजेंट जजों द्वारा उस कानून को रद्द करवा सकती हैं | इसीलिए केवल कुछ गिने-चुने लोग ही शक्तिशाली विदेशी कंपनियों का सामना नहीं कर सकते क्योंकि आज विदेशी कंपनियों का अधिकतर मीडिया और कोर्ट पर प्रभाव है |

अकेले, बिना किसी समूह में, प्रभावशाली तरीकों का उपयोग करके महीने में अच्छे समाधान-ड्राफ्ट के  प्रचार के लिए केवल 15-20 घंटे देने वाले, केवल 2-4 लाख कार्यकर्ता और कुछ करोड़ आम-नागरिक चाहिए देश के लिए अच्छे कानून-प्रक्रियाओं पर जन-आन्दोलन खड़ा करने के लिए और प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री को मजबूर करने के लिए कि वे इन कानून-ड्राफ्ट को भारतीय राजपत्र में डालें | मैं श्रोताओं से विनती करूँगा कि वे अध्ययन करें कि कैसे बदलाव आये थे असली, सफल, कार्यकर्ता-आधारित, जन-अन्दोलान के द्वारा, जैसे भारतीय नौसेना विद्रोह, 1946, आपातकाल जन-आन्दोलन, 1977 आदि | (जिसमें आम-नागरिकों ने इंदिरा को मजबूर किया था राजपत्र में छापने के लिए कि `आपातकाल समाप्त किया जाता है`)

कांग्रेस के शीर्ष नेता, राष्ट्रीय सेवा संघ के शीर्ष के लोग, अन्ना हजारे, अरविन्द केजरीवाल, सुब्रमण्यम स्वामी सभी ने इस प्रस्ताव का बहुत विरोध किया है | इन सभी ने मंत्रियों और बाकी जन-सेवकों को एस.एम.एस., द्वारा आदेश देने से इनकार किया है और अभी तक, स्वयं कभी भी एस-एम-एस द्वारा एक भी कानून-ड्राफ्ट, जो आम आदमी को सत्ता और अधिकार दे, ऐसा ड्राफ्ट छपवाने का आदेश किसी भी मंत्री तथा बाकी जन-सेवकों को नहीं दिया है |

इन सभी नेताओं ने जोर डाला है कि कार्यकर्ता कभी भी प्रधानमंत्री एवं अन्य मंत्रियों को एस-एम-एस द्वारा कोई आदेश न दें और नारेबाजी, समूह प्रदर्शन (रैली), नेता-भक्ति आदि में ही खुद को सीमित रखकर अगले चुनावों का इंतज़ार करें | हमारे विचार से, यदि यह तरीके अकेले किये जायें और जनसेवकों को मेसेज-आदेश नहीं भेजे जायें, तो वे बेकार हैं और समय की बर्बादी हैं | लेकिन हम इन तरीकों का विरोध नहीं करते और न ही किसी कार्यकर्ता से आग्रह करते हैं कि ये सब न करें, केवल इतना कहते हैं कि अपने तरीकों के अलावा 5 मिनट दें अपने जनसेवकों को मेसेज-आदेश भेजने के लिए और भेजे गए मेसेज-आदेशों को अपने फेसबुक वाल नोट, ब्लॉग आदि पर जनता को बताने के लिए |

लेकिन कांग्रेस के शीर्ष के नेता, राष्ट्रीय स्वयंसेवी सेवा संघ के शीर्ष के नेता, अन्ना हज़ारे, अरविन्द केजरीवाल, सुब्रमण्यम स्वामी आदि साफ़ तौर पर अपने कार्यकर्ताओं से कहते हैं कि उन्हें मंत्रियों को एस.एम.एस के द्वारा आदेश नहीं भेजना चाहिए | क्यूँ ? हमें नहीं पता | उन्हीं से पूछिए |

हम कार्यकर्ताओं को नारेबाजी करने या मोमबत्ती जलने को छोड़ने के लिए नहीं कह रहे हैं | लेकिन हम ये विनती कर रहे हैं कि कार्यकर्ता अपने सांसद, जज, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति आदि को आवश्यक मेसेज-आदेश भेजें | लेकिन अजीब बात है कि समय-बरबादी करने वाले नेताओं ने अपने कार्यकर्ताओं को बोला है कि वे जज, प्रधानमंत्री, सांसद, आदि को मेसेज-आदेश ना भेजें !!!

क्यूँ काँग्रेस के शीर्ष के नेता, राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ के शीर्ष के लोग, अन्ना, अरविंद भाई आदि बड़े नेता नारे लगाने या रैली करने पर जोर देते हैं, इसका एक संभव कारण है कि ऐसा करते-करते कार्यकर्ता थक जाएँ, कार्यकर्ता आज के बुरे सिस्टम को सुधारने के लिए कुछ कार्य ना कर पाएं और आज का भ्रष्ट सिस्टम पहले जैसा कायम रहे | दूसरा कारण ये है कि ये समय बर्बाद करने वाले नेता, ऐसा कोई तरीका नहीं चाहते जो कि बिना नेता का हो और जो स्वचालित (स्वतंत्र) हो |

समान्यतः नारे लगाना, मोमबत्ती जलाना आदि कार्यों के लिए एक संगठन कि जरूरत पड़ती है, जबकि मेसेज के द्वारा आदेश भेजना कोई भी अकेले या छोटे समूह में कर सकता है | और यदि मैसेज-आदेश अच्छा है, तो वह बिना नेता के आदेशों के ही, लोगों तक पहुँच जाएगा | इस प्रकार, यदि नागरिक “प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उच्च न्यायधीश आदि को मेसेज के द्वारा आदेश भेजते हैं “, तब नेताओं की राजनीति नहीं चलेगी और सच्चा व्यवस्था-परिवर्तन होगा और सच्चे कार्यकर्ता जीत जायेंगे |

तब, यदि जनसेवकों को मेसेज के द्वारा आदेश भेजना प्रचलित हो जाता है, तो सभी अनशन की दुकान वालों का धंधा चौपट हो जाएगा | इसीलिए, इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि ज्यादातर नेताओं ने “नागरिकों को जनसेवकों को मेसेज-आदेश करना चाहिए” के सुझाव को नज़र-अंदाज़ किया |

ये समय-बरबाद करने वाले नेता, इस बात पर भी ज़ोर देते हैं कि चुनावों का इंतज़ार करो | तब, कार्यकर्ता एक ही बदलाव कर सकते हैं कि संसद में नए व्यक्ति लायें, बिना सिस्टम में कोई भी बदलाव लाये | इस प्रकार, पुराना भ्रष्ट सिस्टम पहले जैसे चलता रहेगा क्यूंकि इसकी कोई गारंटी नहीं है कि इन नए सांसदों में से 80% कल दबेंगे नहीं या बिकेंगे नहीं | और जब ऐसा होता है, कुछ कार्यकर्ता इतने दुखी हो जाते हैं कि वे राजनैतिक सक्रियता (देश की व्यवस्था सुधारने का कार्य) हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ देते हैं |

लेकिन, यदि कार्यकर्ता खुद से “प्रधानमंत्री, सांसद आदि जनसेवकों को मेसेज-आदेश” भेजना शुरू कर देते हैं, तब सभी बड़े नेता जैसे भाजपा, काँग्रेस, आ. आ. पार्टी आदि के बड़े नेताओं का कार्यकर्ताओं पर प्रधानता (वर्चस्व) समाप्त हो जायेगी |

यदि कार्यकर्ता अपने सांसद, प्रधानमंत्री आदि जनसेवकों को स्वयं (खुद) मेसेज-आदेश भेजना शुरू कर देते हैं, तो फिर कोई भी आंदोलन अधिक तेजी से चलेगा लेकिन फिर कांग्रेस-शीर्ष, राष्ट्रिय स्वयं-सेवक संग के शीर्ष के बड़े नेता, अन्ना, अरविन्द भाई आदि का कार्यकर्ताओं में प्रभाव कम हो जायेगा और उनका राजनैतिक मूल्य भी कम होगा और ये नेता समाज के केन्द्र-बिंदु में नहीं रहेंगे | इसके अलावा, यदि आम-नागरिक जनसेवकों को मेसेज-आदेश सीधे भेजना शुरू कर देते हैं, तब ये नेताओं की मुद्दों पर नियंत्रण करने की क्षमता कम हो जायेगी क्यूंकि फिर नागरिक उन मुद्दों पर मेसेज-आदेश भी भेज सकते हैं, जो नेताओं को व्यक्तिगत कारणों से नहीं चाहिए या पसंद ना हों |

इसके अलावा, विदेशी कम्पनियों के मालिक और ईसाई धर्म-प्रचारक, ऐसे समय बरबाद करने वाले नेताओं का प्रचार करने के लिए, बिकाऊ-मीडिया वालों को बहुत अधिक धन दे रहे हैं | विदेशी कम्पनियों के मालिक और ईसाई धर्म-प्रचारक नहीं चाहते कि नागरिक अपने जनसेवकों को मेसेज द्वारा आदेश करें क्यूंकि यदि ऐसा होगा तो, जनसेवक जनहित कार्य करने के लिए मजबूर हो जायेंगे और बहुत सारे जनहित के कार्य विदेशी कम्पनियों के मालिक और ईसाई धर्म-प्रचारकों के भ्रष्ट तरीकों के विरुद्ध जाते हैं |

आजकल ,कार्यकर्ता ये मानते हैं कि बिना बड़े नेता के देश की व्यवस्था में अच्छा बदलाव लाना संभव नहीं है और इसलिए कार्यकर्ता बड़े नेताओं के निर्देशों की प्रतीक्षा करते रहते हैं | इस प्रकार, कार्यकर्ता अपना समय बरबाद करते हैं और आज की भ्रष्ट व्यवस्था कायम रहती है | लेकिन, यदि कार्यकर्ता स्वयं निर्णय लेना शुरू करें कि कौन से प्रक्रिया-ड्राफ्ट देश के आम-नागरिकों के लिए हितकारी हैं और स्वयं इन जनहित के ड्राफ्ट का प्रचार करें, तब बड़े नेता या नेता कार्यकर्ताओं के समय को बर्बाद नहीं कर पाएंगे और फिर उच्च वर्ग के लोगों की इन समय बरबाद करने वाले नेताओं द्वारा भ्रष्ट व्यवस्था को कायम रखने की क्षमता कम हो जायेगी |

2.8. `जनसेवकों को मेसेज-आदेश` के अनुसार किये गए नागरिकों के कार्य संचयी होंगे और एक दूसरों को बढ़ाने वाले होंगे (योगात्मक) जबकि दूसरे प्रचार-तरीकों में किये गए अधिकतर कार्य एक दूसरों को काटते हैं

यदि हम सच्चे कार्यकर्ता सभी कार्यकर्ताओं और नागरिकों को ये आदत डलवा देते हैं, कि वे स्वयं, सीधे अपने जनसेवक जैसे प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक आदि को मेसेज-आदेश भेजते हैं, तब फिर समय बरबाद करने वाले कार्य, जो अन्ना, अरविन्द भाई, सुब्रमनियम, भा.ज.पा., कांग्रेस आदि द्वारा प्रचार किये जाते हैं, का अंत होगा |

और इस प्रचार-तरीके के उपयोग से, कार्यकर्ताओं के कार्य एक दिशा वाले हो जायेंगे और `संचयी` हो जायेंगे, मतलब यदि अलग-अलग लोगों की अलग-अलग मांगें हैं, तो ये प्रचार-तरीके के उपयोग से, उनके मांगों के लिए किये गए कार्य एक दूसरे को काटेंगे नहीं लेकिन कार्य एक दूसरे के प्रभाव को बढ़ाएंगे और एक स्तर पहुँचने के बाद, परिणाम दिखना शुरू हो जायेंगे |

उदाहरण – यदि कुछ नागरिक अपने जनसेवक को कोई कानून रद्द करने के लिए मेसेज-आदेश देते हैं और दूसरे नागरिक उस जनसेवक को वो ही कानून चालू रखने के लिए मेसेज-आदेश भेजते हैं लेकिन दोनों श्रेणियों के नागरिकों ने अपने जनसेवक को अपने पब्लिक मोबाइल को अपने पब्लिक वेबसाइट के साथ जोड़ने के लिए मेसेज-आदेश किया ताकि भेजे गए मेसेज-आदेश अपने आप जनसेवक के वेबसाइट पर प्रकाशित हों और सभी नागरिकों को दिखें और सभी नागरिक प्रामाणिक तरीके से जान सकें कि जनता की राय क्या है |

तो फिर, ये दोनों, आपस में एक दूसरे के विपरीत लगने वाले कार्य, जनता की राय इकठ्ठा करने का एक पारदर्शी और प्रामाणिक तरीका का बढ़ावा कर रहे हैं | तो, `जनसेवक को मेसेज-आदेश` के इस प्रचार-तरीके में नागरिकों द्वारा किये गए कार्य एक दूसरे को काटते नहीं हैं, बलकी एक दूसरे के प्रभाव को बढ़ाते ही हैं | जबकि, दूसरे प्रचार-तरीकों में नागरिकों द्वारा किये गए अधिकतर कार्य एक दूसरे को काटते हैं |

2.9 सभी कार्यकर्ताओं और नागरिकों में अपने जनसेवकों को स्वयं, सीधे मेसेज-आदेश भेजने की आदत डालना और असली व्यवस्था परिवर्तन (सक्रियतावाद) को बढ़ावा देना

हर बार, जब कार्यकर्ताओं का एक समूह किसी समस्या पर बोले, तब हम असली कार्यकर्ता दूसरे कार्यकर्ताओं को कह सकती हैं कि अपने जनसेवकों जैसे प्रधानमंत्री, सांसद आदि को मेसेज-आदेश भेजें  कि उन समस्याओं को कम करने के लिए आवश्यक समाधान-ड्राफ्ट को भारतीय राजपत्र में छपवाएं | और साथ ही उन कार्यकर्ताओं को जनसेवकों को ये भी मेसेज-आदेश करना चाहिए कि जनसेवक अपने पब्लिक फोन पर प्राप्त मेसेज-आदेशों को जनसेवक के वेबसाइट पर डाले |

इसके अलावा, जब भी कोई नागरिक देश की कोई बड़ी समस्या के बारे में बात करे, हम सच्चे कार्यकर्ता, उस समस्या को दूर करने के लिए, भारतीय राजपत्र में छपवाने के लिए समाधान-ड्राफ्ट अपने जनसेवकों को भेज सकते हैं और फिर सभी कार्यकर्ताओं/नागरिकों को कह सकते हैं कि इन समाधान-ड्राफ्ट को समर्थन करने के लिए जनसेवकों को मेसेज-आदेश करें |

संक्षिप्त में, सभी कार्यकर्ता और नागरिक इस प्रकार असल में व्यवस्था परिवर्तन को बढ़ावा दे सकते हैं –

(1) चर्चा करके निर्णय करें कि देश के आम-नागरिकों के लिए कौन से समाधान-ड्राफ्ट की आवश्यकता है –
सच्चे कार्यकर्ताओं को सभी कार्यकर्ताओं और नागरिकों से कहना चाहिए कि वे चर्चा करके निर्णय करें
कि देश के आम-नागरिकों के लिए कौन से प्रक्रिया-ड्राफ्ट हितकारी हैं और फिर –

(2) जनसेवकों को ई-मेल, पत्र, मेसेज आदि द्वारा समाधान-ड्राफ्ट भेजना
सभी कार्यकर्ताओं और नागरिकों   को वे समाधान-ड्राफ्ट, जो उनको लगता है कि देश के आम-नागरिकों के लिए अच्छे हैं, अपने जनसेवकों को ई-मेल, पत्र, मेसेज आदि के द्वारा भेजने चाहिए और फिर –

(3) अपने जनसेवकों को मेसेज-आदेश भेजना कि वे समाधन-ड्राफ्ट को राजपत्र में छपवाएं और जनसेवकों को प्राप्त मेसेज-आदेशों को जनसेवक अपने वेबसाइट पर डालें –
सच्चे कार्यकर्ताओं को सभी कार्यकर्ताओं  और नागरिकों से कहना चाहिए कि अपने जनसेवकों को मेसेज द्वारा आदेश दें कि उनके पसंद का  समाधान-ड्राफ्ट राजपत्र में छपवाएं और अपने जनसेवकों को ये भी मेसेज-आदेश दें कि अपना पब्लिक मोबाइल और पब्लिक वेबसाइट को आपस में जोड़ें, ताकि उनके द्वारा प्राप्त सभी मेसेज-आदेश अपने  आप जनसेवक की वेबसाइट पर प्रकाशित हो जायें और सभी नागरिक उन मेसेज-आदेशों को कभी भी देख सकें और जांच कर सकें

(4) नागरिकों को अपने जनसेवकों को भेजे गए आदेश जनता को दिखाने चाहिए –
नागरिकों को अपने  जनसेवकों को मेसेज, पत्र आदि द्वारा भेजे गए आदेश को अपने फेसबुक वाल, नोट, पर्चे आदि द्वारा  जनता को दिखाने चाहिए, ताकि जनता को प्रमाण मिले और दूसरे नागरिक भी ऐसा करने के लिए  प्रेरित हों |

(5) सभी कार्यकर्ता-नेताओं से कहना कि अपने जनसेवकों को मेसेज-आदेश भेजें कि जनहित के प्रक्रिया-ड्राफ्ट को राजपत्र में छपवाएं और भेजे गए मेसेज-आदेश को जनसेवक अपने वेबसाइट पर दिखाए –
सच्चे कार्यकर्ताओं को सभी कार्यकर्ताओं और नागरिकों से कहना चाहीये कि अपने कार्यकर्ता-नेता को   बोलें कि अपने जनसेवक को मेसेज-आदेश भेजीं कि जनहित के प्रक्रिया-ड्राफ्ट को तुरंत राजपत्र में  छपवाएं और अपने जनसेवको को ये भी आदेश दें कि उनको प्राप्त सभी मेसेज-आदेशों को अपने
वेबसाइट पर प्रकाशित करें |

जब एक संख्या से ज्यादा नागरिकों ने अपने जनसेवक को मेसेज-आदेश किये हैं और अपने भेजे मेसेज-आदेशों को जनता को भी दिखाया है सबूत के तौर पर, तो फिर जनसेवक मजबूर हो जायेगा कोई जवाब देने के लिए या उसकी पोल खुल जायेगी लाखों-करोड़ों के सामने |.

और केवल जनसेवक को मेसेज-आदेश भेजना एक प्रकार का टी.सी.पी. (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली = नागरिकों का अधिकार कि वो किसी भी दिन अपना एफिडेविट, स्कैन करवाकर, प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर रखवा सकें, ताकि नागरिकों की राय दबाई नहीं जा सके, बिना दबाने का प्रयास करने वाली की पोल लाखों-करोड़ों में खुले ; चैप्टर 1, सैक्शन 1.3, www.prajaadhinshasan.blog.com देखें, टी.सी.पी. के ड्राफ्ट के लिए) | कैसे ?

क्यूंकि आम-नागरिक यदि अपने जनसेवक को मेसेज-आदेश भेजते हैं और अपने भेजे गए मेसेज-आदेश जनसमूह को (मतलब, अधिक से अधिक लोगों को) बताते हैं, तो फिर जनता को सबूत मिलेगा और दूसरे नागरिकों को भी ऐसा करने की प्रेरणा मिलेगी | और जब, अपनी-अपनी मांगो को पूरा करवाने के लिए, पर्याप्त संख्या में नागरिक इस प्रामाणिक तरीके से अपना प्रचार करते हैं, तब जनसेवक मजबूर हो जायेंगे अपना पब्लिक मोबाइल और अपनी वेबसाइट को जोड़ने के लिए और जनसेवक मजबूर हो जायेंगे इस `जनसेवक को मेसेज-आदेश` प्रक्रिया को और प्रभावशाली बनाने के लिए कदम उठाने के लिए |

महत्त्व का मुद्दा ये है कि नागरिकों में अपने जनसेवक जैसे प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक आदि को मेसेज–आदेश भेजने की आदत डलवाना | एक बार नागरिकों को ऐसी आदत डल जाये, तो फिर नागरिक अपने आप मांग करेंगे कि उनका मेसेज-आदेश वेबसाइट पर आना चाहिए और समान मेसेज-आदेश के सॉफ्टवेर द्वारा समूह बनने चाहिए |

2.10 कार्यकर्ताओं को सुझाव

हमारी राय में, अनशन, नारेबाजी, रैली करना, मोमबती जलाना, नेता का पूजन करना आदि. सब समय की बरबादी है | लेकिन, फिर भी यदि आपको ये कार्य करने ही हैं, तो कृपया करें | लेकिन, ये कार्य करने के साथ कुछ ऐसा कार्य करें जो वे सभी नागरिक भी कर सकते हों, जिनके पास पैसा या समय नहीं है रैलियों में जाने के लिए, मोमबत्ती जलने के लिए, नेता का पूजन करने आदि के लिए — कृपया अपने जनसेवक को मेसेज-आदेश करें कि वे आपके पसंद के जनहित के समाधान-ड्राफ्ट को भारतीय राजपत्र में छपवाएं या अपने सांसद को मेसेज-आदेश दें कि आपके प्रिय नेता को देश का प्रधानमंत्री बनाने के लिए तुरंत संसद में प्रस्ताव शुरू करवाएं |

केवल इतना कहना पर्याप्त नहीं है कि आप किसी जनहित के ड्राफ्ट का समर्थन करते हैं या किसी नेता का समर्थन करते हैं | कृपया अपने जनसेवक को जरूरी मेसेज-आदेश भेजें और उसके बाद, अपने भेजे गए मेसेज-आदेशों को अपने ब्लॉग, वेबसाइट, फेसबुक वाल नोट, पर्चों आदि तरीकों द्वारा ज्यादा से ज्यादा लोगों को बताएं ताकि जनता को सबूत मिले और दूसरे नागरिकों को भी ऐसा करने की प्रेरणा मिले | यदि आपके पास ब्लॉग नहीं है, तो फिर आप अपने भेजे गए मेसेज-आदेश को righttorecall.rtr@gmail.com पर भी ई-मेल कर सकते हैं, ताकि वो मेसेज-आदेश http://righttorecallmails.blogspot.in/ वाले ब्लॉग पर अपने आप छप जाये और समूह-बद्ध हो जाये |

यदि भेजे गए मेसेज-आदेशों की संख्या करोड़ों में पहुँच जायेगी, तो फिर महात्मा उधम सिंह जैसे वीर पुरुषों को प्रेरणा मिलेगी कि वे प्रधानमंत्री से मिलें और फिर वर्तमान प्रधानमंत्री या अगला प्रधानमंत्री वो जनहित का ड्राफ्ट भारतीय राजपत्र में छ्पवायेगा |

2.11 कुछ अतिरिक्त सुविधाएं जो सांसद आदि जनसेवक गरीबी की रेखा के नीचे नागरिक, जिनके पास मोबाइल नहीं है, उनके लिए अपनी राय जनसेवकों को देने का एक प्रामाणिक और विश्वसनीय तरीका दे सकते हैं

2.11.1 कैसे सांसद एक विश्वसनीय `संक्षिप्त कोड सिस्टम` बना सकता है जिसमें नागरिक स्वयं वे अपने पसंद के संक्षिप्त कोड की अर्जी एफिडेविट पर दे सकते हैं

1. कोई भी नागरिक-मतदाता सांसद के दफ्तर जाकर, एक निश्चित शुल्क देकर, एफिडेविट (जो किसी भी कार्यपालक मैजिस्ट्रेट (एक्सिक्यूटिव मैजिस्ट्रेट) द्वारा प्रमाणित होगा) पर अपना शोर्ट कोड देगा, जो वो नागरिक सांसद की वेबसाइट पर दर्ज करवाना चाहता है | और नागरिकों को एक रसीद दी जायेगी, जिसमें नागरिकों की वोटर आई.डी. संख्या नम्बर और एफिडेविट नंबर होगा |

2. सांसद के कर्मचारी एफिडेविट की जांच कर सकते हैं, ताकि उसमें कुछ मानहानी करने वाले शब्द न हों | सांसद और उसके कर्मचारी, एफिडेविट को स्वीकृत करके सांसद के वेबसाइट पर दर्ज कर सकते हैं या उनको खारिज (अस्वीकृत) कर सकते हैं, वेबसाइट पर कारण बताते हुए | अस्वीकृत एफिडेविट की एक हार्ड कॉपी सांसद के दफ्तर पर, रिकोर्ड के तौर पर रखी जायेगी |

3. सांसद के कर्मचारी एफिडेविट को वेबसाइट पर अपलोड करेंगे और एक संक्षिप्त कोड जारी करेंगे जैसे वोटर#.0001, वोटर#.0002 आदि, जहाँ वोटर# उस मतदाता का वोटर संख्या नंबर है, जिसने ये प्रस्ताव किया है या यदि सांसद यदि उचित समझें तो मतदाता द्वारा अपने एफिडेविट पर मांगे गए संक्षिप्त कोड को भी जारी कर सकता है |

4. सांसद कोई डोमेन नाम खरीद सकता है, जैसे `mpname.com` | सांसद के कर्मचारी, डोमेन पर एफिडेविट को डाल सकते हैं, जैसे mpname.com\tcp\voter#001.htm , mpname.com\tcp\voter#002.htm

5. फिर, दूसरे नागरिक पंजीकृत संक्षिप्त कोड के लिए मेसेज-आदेश भेज सकते हैं जैसे संक्षिप्त कोड वोटर#.0010 हाँ या संक्षिप्त कोड वोटर#.0010 ना आदि आदि | मतलब कि मेसेज-आदेश में पंजीकृत संक्षिप्त कोड के साथ केवल `हाँ` या `ना` जोड़ना है |

2.11.2 सिस्टम जो सांसद आदि जनसेवक गरीब नागरिक, जिनके पास मोबाइल नहीं है, उनके लिए चालू कर सकते हैं ताकि बिना मोबाइल के गरीब भी अपनी राय दे सकें –

1. गरीबी रेखा के नीचे के नागरिक, जिनके पास मोबाइल नहीं है, उनको चुम्बकीय कार्ड (मैग्नेटिक कार्ड) या स्मार्ट कार्ड (लगभग बीस रुपये का) दिया जायेगा डाक द्वारा या सांसद के दफ्तर पर |

2. गरीब, जिनके पास मोबाइल नहीं है, उनको 10 रुपये का एफिडेविट पर अपनी राय लिख कर सांसद के दफ्तर में जमा करनी होगी | सांसद के कर्मचारी नागरिकों का अंगुली का छाप, चुम्बकीय कार्ड, अंगुली के छाप द्वरा उनकी जांच करके, उनके एफिडेविट को तुरंत स्कैन करके सांसद के वेबसाइट पर रखेंगे | मान-हानि के शब्दों वाली एफिडेविट खारिज की जायेगी और खारिज करने का कारण सांसद के वेबसाइट पर दिया जायेगा | अस्वीकृत एफिडेविट की एक हार्ड कॉपी सांसद के दफ्तर में रखी जायेगी |

3. पहले वर्ष में, सांसद की पूंजी के 500 लाख में से, सांसद हरेक गरीब नागरिक-मतदाता, जिसके पास मोबाइल नहीं है, उनपर 50 रुपये प्रति गरीब नागरिक-मतदाता खर्च करेगा (मतलब 20 रुपये चुम्बकीय कार्ड के लिए और 2-3 एफिडेविट हर साल का खर्चा) | इस तरह, सभी नागरिक-मतदाता, पहले वर्ष के बाद, प्रामाणिक तरीके से अपने सांसद को अपने मेसेज-आदेश दे सकते हैं |

4. दूसरे वर्ष से, सांसद उसको प्राप्त सांसद-पूंजी में से आधे पैसे और अन्य दान से प्राप्त पैसे जैसे पार्टी का चंदा, आदि से प्रयोग किये गए (सैकंड हैण्ड) मोबाइल, गरीब, बिना मोबाइल के मतदाताओं को मुफ्त दिया जायेगा |

और शेष का पैसा, सांसद गरीब, बिना मोबाइल के मतदाता को हर वर्ष 2-3 मुफ्त एफिडेविट देने के लिए करेगा |

2.12  कैसे हम टी.सी.पी. , राईट टू रिकॉल-प्रधानमंत्री और दूसरे समाधान-ड्राफ्ट को लागू करवा सकते हैं कार्यकर्ता-आधारित जन-आन्दोलन द्वारा ?

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1. नागरिकों में देश के लिए जरूरी समाधान-ड्राफ्ट के बारे में चर्चा और आम सहमति बनाना  —>

2. जनसमूह में समाधान-ड्राफ्ट का बढ़ावा और मेसेज और मेल द्वारा नेताओं को आदेश भेजना कि वे समाधान-ड्राफ्ट को राजपत्र में छपवाएं —>

3. भेजे गए मेसेज और मेल को अपने फेसबुक वाल नोट, ब्लॉग आदि पर रखना, मतलब ऐसी जगह रखना जहाँ कोई भी आसानी से, कभी भी देख सके, ताकि जनता को प्रमाण मिले और दूसरों को भी ऐसा करने की प्रेरणा मिले —->

4. भेजे गए मेसेज और मेल के सबूतों का नेता पर दबाव और उधम सिंह जैसे वीर का नेताओं पर दबाव —>

5. नेता (प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री) कानूनों को राजपत्र में छापने के लिए मजबूर हो जायेंगे (जैसे इंदिरा मजबूर हो गयी थी १९७७ में छपने के लिए कि `आपातकाल समाप्त किया जाता है` और बहुत सारे अन्य उदाहरण)

3. यदि करोड़ों नागरिक अपने सांसद को मेसेज द्वारा आदेश भेजते हैं, समाधान-ड्राफ्ट को राजपत्र में छपवाने के लिए, तब महात्मा उधम सिंह / भगत सिंह जैसे वीर पुरुषों को प्रेरणा मिलेगी कि वे प्रधानमंत्री से मिलें और फिर करोड़ों लोगों के सबूतों के दबाव और उधम सिंह के दबाव के कारण, वर्त्तमान प्रधानमंत्री या अगले प्रधानमंत्री मबूर हो जायेंगे, नागरिकों के द्वारा मांगे गए समाधान-ड्राफ्ट को राजपत्र में छपवाने के लिए

एक अकसर पूछा गया प्रश्न : मान लीजिए, करोड़ों नागरिकों ने अपने प्रधानमंत्री/सांसद को एक निश्चित कानून-ड्राफ्ट को राजपत्र में छपवाने के लिए मेसेज-आदेश किया | लेकिन हमारे नेताओं की चमड़ी बहुत मोटी है | तो क्या ये मोटी चमड़ी वाले प्रधानमंत्री/सांसद इन मेसेज-आदेशों को मानेंगे ?

उत्तर : यदि करोड़ों नागरिकों ने अपने सांसद/प्रधानमंत्री को किसी निश्चित कानून-ड्राफ्ट को राजपत्र में तुरंत छापने के लिए मजबूर किया, तब फिर वे मेसेज-आदेशों से ही प्रधानमंत्री राजपत्र में वो कानून-ड्राफ्ट छपवाने के लिए मजबूर नहीं होंगे ; लेकिन ये मेसेज-आदेशों से अहिंसा-मूर्ति महात्मा उधम सिंह जैसे वीर पुरुषों को  प्रेरणा मिलेगी कि वे प्रधनमंत्री से मिलें और करोड़ों लोगों द्वार दिए गए सबूत और ये उधम सिंह जैसे वीर मिलकर वर्तमान प्रधानमंत्री (या अगले प्रधानमंत्री) को मजबूर करेंगे कि नागरिकों द्वारा मांग किया गया कानून-ड्राफ्ट को राजपत्र में छपवाएं |

हमें विस्तार से बताने दीजिए |

हमने, कार्यकर्ताओं के लिए, एक नया प्रचार-तरीके का प्रस्ताव किया है और हमारी राय में, ये प्रचार-तरीका नारेबाजी, चरखा गुमाने, मोमबत्ती जलाने और केवल चुनाव लड़ने के तरीकों से कहीं ज्यादा अच्छा है | हम कार्यकर्ताओं से यह अनुरोध करते हैं कि –

  1. कार्यकर्ताओं को पहले ये निश्चय करना चाहिए कि वे कौन से समाधान-ड्राफ्ट को भारतीय राजपत्र में छपवाना चाहते हैं |
  2. फिर, कार्यकर्ताओं को वो समाधान-ड्राफ्ट प्रधानमंत्री, सांसद आदि जनसेवक को पत्र, ई-मेल या प्रधानमंत्री की वैबसाइट के जरिये भेजना है और एक क्रम संख्या (सिरियल नंबर) लेना चाहिए या फिर कार्यकर्ताओं को उसे स्थानीय कलेक्टर के पास जमा करवाना चाहिए और कलेक्टर के दफ्तर से दिनांक और जमा करने का नंबर लेना चाहिए या यदि किसी और कार्यकर्ता ने समाधान-ड्राफ्ट पहले से भेजा है, तो उस से क्रम संख्या लेना चाहिए |
  3. और फिर कार्यकर्ताओं को प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री को एस.एम.एस. द्वारा आदेश देना चाहिए कि वे उस प्रक्रिया-ड्राफ्ट (मसौदे) को राजपत्र में छापें |

    कार्यकर्ताओं को अपना मतदाता संख्या नंबर, तारीख भी एस.एम.एस. में बतानी चाहिए | इसके अलावा, कार्यकर्ता अपने जनसेवकों को मेसेज-आदेश भेज सकते हैं कि संसद में उनके प्रिय नेता को देश का प्रधानमंत्री बनाने के लिए तुरंत प्रस्ताव शुरू करें |

  4. कार्यकर्ताओं को अपने नेता जैसे अरविंद भाई, अन्ना, सुब्रमनियम आदि से सांसद / मुख्यमंत्री / विधायकों को एस.एम.एस. द्वारा आदेश देने के लिए कहना चाहिए | यदि ये बड़े नेता वास्तव में एस.एम.एस. द्वारा प्रधानमंत्री / सांसद आदि जनसेवकों को आदेश भेजते हैं, तो फिर और नागरिकों को राजी करना आसान हो जायेगा कि वे अपने जनसेवकों को अपने आदेश एस.एम.एस करें |
  5. कार्यकर्ताओं को अपने साथी कार्यकर्ताओं को कदम-1 (स्टेप-1) से कदम 4 और कदम-5 भी लाने के लिए कहना चाहिए |

कार्यकर्ता हम से एक वैध सवाल पूछते हैं कि क्यों ये मोटी चमड़ी वाले प्रधानमंत्री \ सांसद एस.एम.एस द्वारा भेजे गए इन आदेशों का पालन करेंगे, भले ही करोड़ों नागरिक इस तरह के एस.एम.एस भेजें ? फिर क्यों हम, कार्यकर्ताओं को प्रधानमंत्री\सांसदों को एस.एम.एस द्वारा आदेश देने के लिए कह रहे हैं ?

देखिये, हमारी ऐसी कोई भी धारणा नहीं है कि प्रधानमंत्री \ सांसद कोई भी समाधान-ड्राफ्ट (मसौदे) को केवल इसीलिए छापेंगे क्योंकि इन्हें करोड़ों नागरिकों के द्वारा एस.एम.एस के माध्यम से आदेश दिया गया है | एस.एम.एस द्वारा करोड़ों आदेश के सबूत और वो भी मीडिया के समर्थन के बिना, अहिन्सा-मूर्ति महात्मा उधम सिंह (या अहिन्सामूर्ति महात्मा भगत सिंह) के जैसे वीरों को विश्वास दिला देंगे कि उन्हें प्रधानमंत्री के साथ मिलना चाहिए, उनसे मुलाकात का समय लेकर या समय लिए बिना (नियुक्ति के साथ या नियुक्ति के बिना) | और वे प्रधानमंत्री को समझाने की कोशिश करेंगे की इस समाधान-ड्राफ्ट  को वह राजपत्र में छपवाए |

और उधम सिंह / भगत सिंह जैसे वीर किसी को समझाने में काफी कुशल होते हैं | वर्त्तमान प्रधानमंत्री या अगले प्रधानमंत्री इनसे निश्चित रूप से सहमत होंगे | आखिरकार, उधम सिंह / भगत सिंह जैसे वीरों ने 1947 में ब्रिटिश सांसदों को ब्रिटिश राजपत्र में `भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम` छपवाने को मजबूर किया था और 1977 में इंदिरा गांधी को भारत के राजपत्र में `आपातकालीन को समाप्त करने` के ड्राफ्ट को छापने के लिए मजबूर किया | उधम सिंह / भगत सिंह (जैसी वीरों) ने ऐसा तब किया जब ये साबित हो गया कि करोड़ों नागरिकों में किसी समाधान-ड्राफ्ट को राजपत्र में छपवाने पर आम-सहमति है

(राजपत्र या सरकारी आदेश मासिक या साप्ताहिक पत्रिका है जो सरकार के द्वारा जारी की जाती है और सभी सरकारी कर्मचारियों को इनमें प्रकाशित कानूनों का पालन करना होता है|) उसी तरह, उधम सिंह / भगत सिंह (जैसी वीर) अभी भी प्रधानमंत्री या अगले प्रधानमंत्री को राजी कर सकते हैं उस ड्राफ्ट को राजपत्र में छापने के लिए, जो जनसमूह की मांग है |

4. ऊधम सिंह का अर्थ

उधम सिंह का अर्थ है उधम सिंह के प्रकृति के व्यक्ति जो वीर, जान का खतरा उठाने के लिए तैयार रहते हैं, राष्ट्र-भक्त, बुद्धिमान होते हैं, अकेले काम करते हैं बिना किसी के निर्देश के | देश में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए वे समय बर्बाद करने वाले और अंत में हिंसा का परिणाम लाने वाले तरीके जैसे अनशन, धरना आदि के तरीके नहीं अपनाते और सबसे अधिक अहिंसात्मक तरीके अपनाते हैं देश में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए | वे जन-समूह के आम-राय के अनुसार काम करते हैं, अधिकारीयों से आम-नागरिकों के लिए अधिकार प्राप्त करने के लिए और इसीलिए उन्हें करोड़ों आम-नागरिकों का समर्थन प्राप्त होता है | उधम सिंह के कुछ उधाहरण हैं-  भगत सिंह, उधम सिंह, नेताजी सुभास चन्द्र बोस, 1946 नौसेना विद्रोह के नौसैनिक, 1977 आपातकाल-विरोधी आन्दोलन के कार्यकर्ता, आदि |

संक्षिप्त में उधम सिंह कोई भी वीर, बुद्धिमान और देशभक्त व्यक्ति हो सकता है | वे एक हो सकता है, या अनेक हो सकते हैं | वो मैं भी हो सकता हूँ या आप भी हो सकते हैं |

अहिंसा मूर्ति उधम सिंह का मतलब है कोई भी आम आदमी जो औसत आम आदमी से इस काम के प्रति ज्यादा समर्पित है |

समर्पण के स्तर होते हैं —

(क) कोई अपने समय का एक सप्ताह में 4 घंटे खर्च करते हैं और कोई एक सप्ताह में 20 घंटे खर्च करते हैं या इससे ज्यादा |

(ख) कोई अपनी आय का 1% खर्च करते हैं, कोई आय का 10% खर्च करते हैं या इससे ज्यादा |

(ग) कोई कुछ भी खतरा नहीं उठाएगा, कोई जेल में कुछ दिनों के लिए खतरा उठाएगा तो कोई अपने जीवन को खतरे में डालेगा |

उधम सिंह जैसा वीर, ऊपर लिखे सभी तीन श्रेणियों में बहुत उच्च श्रेणी के होते हैं |

उधम सिंह जैसा वीर, तभी कार्य कर सकता है जब वह आश्वस्त हो कि बहुमत एक विशिष्ट परिवर्तन चाहता है | बहुमत के सिद्ध इच्छा के अभाव में, उधम सिंह जैसे वीर निष्क्रिय (सोये हुए) रहेंगे |

“ नेता ” केवल नियंत्रण और नाम चाहते हैं ताकि वे इसके द्वारा नाम, पैसा और शक्ति पा सकें |

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तो कुल मिलाकर, हम उस प्रधानमंत्री पर विश्वास करने के लिए नहीं कह रहे हैं, जो भारत के लिए अमेरिकी वायसराय के तरह है | हम आप सब से पूछ रहे हैं कि आप उधम सिंह / भगत सिंह जैसे वीर के पिछले सिद्ध (ट्रैक) रिकॉर्ड को देखो | 1940 के दशक में, नागरिकों की अपील के कारण उधम सिंह / भगत सिंह जैसे वीरों ने अपना काम किया और जिसके कारण, हमें 1947 में आजादी मिली और उधम सिंह जैसे वीरों के कारण, 1977 में आपातकाल समाप्त हो गया | उसी तरह, यदि हम उधम सिंह / भगत सिंह जैसे वीरों को फिर से कार्य करने के लिए अपील करें तो वे निश्चित रूप से फिर से कार्य करेंगे और हमें दूसरी आजादी मिल जायेगी |

1910-1947 में, मोहनभाई गांधी के चलते, स्वतंत्रता दिलाने में देर हुई क्यूंकि उन्होंने नागरिकों को भगत सिंह / उधम सिंह जैसे वीरों का विरोध करने के लिए कहा (उन्होंने उधम सिंह को पागल और भगत सिंह को गुमराह युवक कहा था) और काफी समय चरखा चलाने में, भजन गाने और खादी बेचने आदि में बर्बाद किया | और बिकाऊ ब्रिटिश मीडिया जैसे टाइम्स ऑफ़ इंडिया आदि ने उसे महात्मा के रूप में पेश किया था | लेकिन अधिकांश नागरिकों ने मोहनभाई गाँधी को महात्मा तो दूर, मार्ग-दर्शक (रास्ता दिखाने वाला) भी नहीं समझा | उदाहरण के लिए, 1938 के कांग्रेस के चुनाव सुभाष चन्द्र बोस ने, मोहनभाई गांधी के ना चाहते हुए भी, जीता था |

उसी तरह, आज विदेशी विशिष्ट वर्ग चाहते हैं कि भारतीय कार्यकर्ता केवल मोमबत्ती जलाने में, नारा लगाने में, चुनावों के इंतज़ार में, चुनाव में अपना समय बर्बाद करें | विदेशी उच्च वर्ग के लोग, कभी नहीं चाहते कि भारतीय कार्यकता उधम सिंह / भगत सिंह जैसे वीरों को अपील करें, ताकि ये वीर प्रधानमंत्री को आवश्यक कानून-ड्राफ्ट राजपत्र में प्रकाशित करने के लिए राजी कर सकें |

इसी तरह, यदि करोड़ों नागरिक सुप्रीम कोर्ट के प्रधान जज को किसी जनहित याचिका की प्रक्रिया को तेजी से पूरी करने के लिए कहें, तो शायद सिर्फ उस एस.एम.एस से जनहित याचिका की प्रक्रिया तेजी से पूरी नहीं होगी | लेकिन इन एस.एम.एस. से प्रेरित होकर, उधम सिंह जैसे वीर (अहिंसा मूर्ति उधम सिंह), जनहित याचिका के पक्ष में होंगे और वे अपने तर्क से वर्त्तमान सुप्रीम कोर्ट के प्रधान जज (या अगले सुप्रीम-कोर्ट प्रधान जज) को राजी कर सकेंगे कि वो जनहित याचिका पर जल्दी से काम करें |

जनहित के आन्दोलन का लक्ष्य होना चाहिए कि अहिंसा-मूर्ति उधम सिंह जैसे वीरों को ये बताना कि बहुमत नागरिक व्यवस्था में क्या परिवर्तन चाहते हैं | अंत में, जनहित के कानून इसीलिए नहीं आते क्यूंकि हम 500 पुराने सांसदों को 500 नए सांसदों से बदलते हैं या जनहित के कानून इसीलिए भी नहीं आते क्यूंकि हम 100 दिनों के लिए अनशन करते हैं या हम नारेबाजी करते हैं या रैली (जुलूस) निकालते हैं | व्यवस्था में जनहित के बदलाव तभी आते हैं, जब अहिंसा-मूर्ति उधम सिंह जैसे वीर पुरुषों को प्रामाणिक तरीके से ये पता चल जाये कि नागरिकों के बहुमत को क्या चाहिए | जब अहिंसा-मूर्ति उधम सिंह को स्पष्ट रूप से ये पता चल जाये कि नागरिकों के बहुमत को क्या चाहए, तब वे कानूनों को राजपत्र में छपवाने के लिए प्रधानमंत्री से मिलते हैं |

और कभी-कभी प्रधानमंत्री, उधम सिंह जैसे वीरों से मिलने से पहले ही कानून को राजपत्र में छपवा देते हैं या कभी अगला प्रधानमंत्री उस कानून को राजपत्र में छपवाता है | लेकिन व्यवस्था में परिवर्तन तभी आता है, जब उधम सिंह जैसे वीर पुरुषों को बहुमत जनता की राय के बारे में पता चलता है |

“जनसेवक को मेसेज-आदेश” का मतलब जनसेवकों को प्रामाणिक तरीके से मेसेज भेजना है और उधम सिंह जैसे वीर पुरुषों को आश्वासन देना है कि बहुमत नागरिक क्या चाहते हैं |

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5. “आम जनता द्वारा जनसेवक को मेसेज-आदेश” पर कुछ प्रश्न और उत्तर

प्रश्न 1 – “जनसेवक को मेसेज-आदेश” भेजने से क्या फर्क पड़ेगा ?

उत्तर 1 –

क्योंकि  नागरिकों के द्वारा एस.एम.एस के माध्यम से प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक आदि जनसेवकों को सीधे आदेश भेजा जा रहा है तो नारेबाजी और रैली के तुलना में, इसके बहुत सारे फायदे हैं | सबसे पहले, जनसेवक को मेसेज-आदेश भेजने में सभी मेसेज-आदेश भेजने वालों को एक समान दर्जा मिल रहा है — चाहे वो आम आदमी हो या अरविन्द भाई की तरह का एक बड़ा नेता | जबकि आजकल के प्रदर्शन में, बड़े नेता उभर रहे हैं और आम आदमी को कोई पूछता नहीं है |

दूसरा, जनसेवकों को मेसेज-आदेश भेजने में बिकाऊ मीडिया से कम योगदान की जरूरत है क्योंकि ये रैली नहीं है और कोई भी रैली तभी सफल होती है जब ये बिकाऊ मीडिया उस रैली का प्रचार करता है |

तीसरा, मेसेज-आदेश भेजने से एक प्रामाणिक और जांचा जा सकने वाला सबूत बनता है, जबकि नारे लगाने से ऐसा नहीं हो सकता है  | इसके और भी कई अन्य अधिक फायदे हैं |

प्रश्न 2 – “ जज, प्रधानमंत्री आदि जनसेवकों को मेसेज द्वारा आदेश” प्रचार-तरीका असंभव है | क्यूंकि मुझे लगता है कि कोई भी मोबाइल इतने ज्यादा मेसेज प्राप्त नहीं कर सकता | मेसेज-आदेश भेजने की कुछ तकनीकी सीमा तो होगी | “

उत्तर 2 –

यदि एक सर्वर बनाकर सभी मोबाइल नंबर को उनके वोटर आई.डी के साथ जोड़ दिया जाये तो इसमें क्या असंभव है ? इससे लोगों की पहचान भी सुनिश्चित हो जाएगी और करोड़ों एस.एम.एस भी स्वीकार हो जायेंगे| पहले से ही बहुत जगह आज ऐसी तकनीक का उपयोग होता है | सर्वर प्रति मिनट लाखों एस.एम.एस स्वीकार कर सकते हैं |

प्रधान जज (मुख्य न्यायाधीश) या प्रधानमंत्री एस.एम.एस के माध्यम से नागरिकों से आदेश लेने के लिए एक सार्वजनिक नंबर को नियुक्त सकते हैं और उस नंबर को कंप्यूटर, जिसमें 10 टेरा-बाईट हार्ड डिस्क लगा हो, उसके साथ जोड़ सकते हैं | अब एस.एम.एस प्राप्त करने और रखने की सीमा अरबों में है | यहाँ तक कि जनसेवकों को सभी संदेशों को व्यक्तिगत रूप से देखने की जरूरत भी नहीं है | वे संक्षिप्त कोड बना सकते हैं और नागरिकों को सिर्फ कोड भेजने को कह सकते हैं और कंप्यूटर का उपयोग कर एस.एम.एस के समूह कोड के अनुसार बना सकते हैं |

संक्षिप्त कोड जैसे  “अफजल फांसी हाँ’”, “अफजल फांसी ना”, “प्रधानजज बदलो हाँ”, “प्रधानजज बदलो ना”, “प्रधनमंत्री बदलो हाँ”, “प्रधानमंत्री बदलो नहीं” आदि हो सकता है|

और 100 रुपये शुल्क और एक एफिडेविट (हलफनामे) को सांसद या कलेक्टर के दफ्तर पर जमा करके, एक नागरिक इस प्रणाली में एक नया कोड जोड़ सकते हैं जैसे “अफजल फांसी हाँ” अफजल फांसी ना” |

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फोन कंपनी में एस.एम.एस 3 साल के लिए रिकॉर्ड में रहते हैं | अब यदि, करोड़ों नागरिकों के द्वारा राष्ट्रपति को  “अफजल फांसी हाई” मेसेज-आदेश भेजा जायेगा और यदि ऐसा राष्ट्रपति कोई भी जवाब नहीं देता, तो राष्ट्रपति बदलने और अगले राष्ट्रपति को राजी करने के लिए “तार्किक कदम” उठाने का औचित्य बढ़ जायेगा |

जनसेवक को एस.एम.एस करना सिर्फ एक ई-पोस्टकार्ड भेजने की तरह है |

यदि जनता का बहुमत, सुप्रीम कोर्ट के प्रधान जज “अफजल फांसी हां” भेजें, तो यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के प्रधान-जज पर बंधनकारी तो नहीं है, लेकिन यदि ऐसा हुआ तो सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट प्रधान जज की पोल खुल जायेगी कि इन्होनें जनता के बहुमत की विनती / आदेश को नजरंदाज किया है और फिर उधम सिंह जैसे बहादुर लोग, अपना कार्य करने के लिए प्रेरित होंगे |

कानून के हिसाब से, अब सवाल उठता है कि सही-गलत का निर्णय कौन लेगा — जूरी सदस्य या वर्त्तमान व्यस्था के भ्रष्ट, भाई-भतिजेवाद वाले जज | हम बाद वाले श्रेणी की परवाह नहीं कर रहे हैं | और मुझे नहीं लगता है कि जूरी सदस्यों को कुछ गैर-कानूनी या असंवैधानिक लगेगा कि नागरिक सुप्रीम-कोर्ट के जजों को मेसेज द्वारा आदेश भेजें | ये वैसे ही है, जैसे किसी कंपनी के हिस्सेदार उस कंपनी के अध्यक्ष को मेसेज द्वारा आदेश भेजें |

प्रश्न 3 – क्या होगा यदि सांसदों के पास हजारों मेसेज-आदेश इकठ्ठा हो गए ?

उत्तर 3 –

यदि सांसद के पास हजारों मेसेज-आदेश इकठ्ठा हो गए हैं, तो सांसद निम्नलिखित कदम उठा सकते हैं :

1. सांसद जनता के लिए एक अलग मोबाइल नंबर का प्रयोग कर सकते हैं, जो कि कंप्यूटर से जुड़ा हो | सांसद को भेजा जाने वाला मेसेज-आदेश सांसद की वेबसाइट पर कंप्यूटर प्रकाशित करेगा और जनता को एक फीडबैक एस.एम.एस भी मिल जाएगा | सांसद के कर्मचारी, भेजे जाने वाले एस.एम.एस को पढ़ कर सांसद को एक रिपोर्ट दे सकते हैं |
2. सांसद या नागरिक भी शोर्ट कोड (संक्षिप्त कोड) जैसे “अफजल फांसी हाँ” और “अफजल फांसी ना” बना सकते हैं और अधिकांश नागरिक इस शॉर्टकोड का उपयोग कर सकते हैं और कंप्यूटर अपने आप (स्वतः) इन सब मेसेज-आदेश के संक्षिप्त कोड के अनुसार समूह बना सकता है और सबको पता चल जायेगा कि जनता की राय क्या है |

इस तरह, यह संभव है कि नागरिक अपने सांसद को एस.एम.एस के माध्यम से आवश्यक आदेश भेजकर संवैधानिक कर्तव्य को पूरा किया जा सकता है |

प्रश्न 4 – एक नागरिक कई मेसेज-आदेश भेज सकता है, जिसके लिए नकली व्यक्तिगत जानकारी वाले फर्जी नंबर का भी प्रयोग किया जा सकता है |

उत्तर 4 –

1. किसी सिम की पहचान (विशिष्टता) सुनिश्चित करने के लिए, हर मोबाइल नंबर के सिम को मतदाता पहचान पत्र के साथ जोड़ा जा सकता है | जैसे यदि मेरे पास दो मोबाइल नंबर हैं, तो सिर्फ एक ही को मतदाता पहचान पत्र के साथ जोड़ा जा सकता है और जनसेवक के मोबाइल नंबर से जुड़ा कंप्यूटर मेरे दूसरे मोबाइल से भेजे मेसेज-आदेश को अस्वीकार कर देगा |

2. यदि एक व्यक्ति एक ही मोबाइल का उपयोग करते हुए कई आदेश भेजता है, तो कंप्यूटर उन सब मेसेज-आदेशों को संक्षिप्त कोड के अनुसार समूह में बंटेगा और एक संक्षिप्त कोड के लिए कंप्यूटर केवल उस मोबाइल से भेजे गए अंतिम आदेश को ही गिनेगा | उदाहरण, यदि मैं “पहले “अफजल फांसी हां” भेजता हूँ और फिर बाद में “अफजल फांसी ना” भेजता हूँ, तो कंप्यूटर आखरी भेजे गए मेसेज-आदेश “अफजल फांसी ना” को गिनेगा |

और जैसे-जैसे  “नागरिकों के द्वारा प्रधानमंत्री, सुप्रीम कोर्ट के प्रधान जज, आदि जनसेवकों को मेसेज द्वारा आदेश भेजने” का चलन बढ़ेगा, निश्चित रूप से यह सिस्टम का भी विकास होगा | सबसे पहले, इस सिस्टम में केवल एक चीज की जरूरत है – पहचान सुनिश्चित करने के लिए सारे मोबाइल को मतदाता पहचान पत्र से जोड़ना, ताकि एक व्यक्ति मेसेज-आदेश भेजने के लिए दो या अधिक नंबर का उपयोग न कर सके | और इन मेसेज-आदेश भेजने का शुल्क इस प्रकार रखा जा सकता है – एक महीने में पहले 100 मेसेज-आदेश तक 10 पैसे और बाद के मेसेज-आदेशों के लिए 50 पैसा लिया जा सकता है |

प्रश्न 5 – भारत के सांसदों के मोबाइल नंबर प्राप्त करने का क्या लिंक है ? कृपया एक मेसेज-आदेश का उदाहरण दें |

उत्तर 5 –

कृपया ध्यान दें ये वो लिंक है, जिसमें से आप को भारत के सभी सांसदों का मोबाइल नंबर मिल सकता है और इसका उपयोग आप एस.एम.एस से उन्हें आवश्यक आदेश देकर, अपने मनचाहे जनहित के कानून-ड्राफ्ट को पारित करवाने के लिए प्रयोग कर सकते हैं –

http://164.100.47.132/LssNew/Members/statelist.aspx

विकल्प लिंक – http://www.mediafire.com/?6q9o6ycsy1j93ut

मेसेज-आदेश के उदाहरण –
1) “मैं, क.ख.ग., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका हर नागरिक का कर्त्तव्य है कि वो अपने सांसद, आदि जनसेवकों को जरूरी आदेश भेजे मेसेज द्वारा | इसीलिए मैं, आपको आदेश दे रहा हूँ कानून-अध्यादेश लागू करने के लिए जो नाबालिक की उम्र 18 से 14 कर दे हिंसक बलात्कार और हत्या के लिए | और इसको 1-जनुअरी-2010 से लागू किया जाये ताकि दिल्ली बस मामले में आरोपी को फांसी दी जा सके |
और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपने वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

2) [सांसद के नाम], मैं XXX XXX, मतदाता ___________ [आपके चुनाव-क्षेत्र का नाम] जिसके आप सांसद हैं | संविधान की उद्देश्यिका हर नागरिक का कर्त्तव्य है कि वो अपने सांसद, आदि जनसेवकों को जरूरी आदेश भेजे मेसेज द्वारा | इसीलिए मैं, आपसे विनती करता हूँ कि आप अपनी सुविधा के लिए, एक अलग पब्लिक मोबाइल नंबर रखें, जिसपर एस.एम.एस के माध्यम से नागरिकों का आदेश प्राप्त हो और उस नंबर को संसद भवन की वेबसाइट पर अपने वेब-पेज पर डाल दें | धन्यवाद |

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यदि आपके पास किसी सांसद या व्यक्ति का सार्वजनिक मोबाइल नंबर नहीं है, तो आप उसे पत्र भेजें या फोन करें और उसे अपना पब्लिक मोबाइल नंबर को सार्वजनिक वेबसाइट या ब्लॉग पर डालने को कहें |

प्रश्न 6 – “नागरिकों के `जनसेवकों को मेसेज-आदेश प्रचार-तरीके में, नागरिक क्या करें यदि सांसद, विधायक, आदि जनसेवक अपने पब्लिक मोबाइल को सार्वजनिक नहीं करते, यहाँ तक कि अपना पब्लिक ई-मेल या जनता को अपने लैंड-लाइन नंबर भी नहीं देते हैं ?  उदाहरण, चेन्नई के सांसद ने अपना मोबाइल या ई-मेल को सार्वजनिक नहीं किया है और लैंड-लाइन पर काल करने पर कोई भी फोन नहीं उठता है | तो फिर, क्या हमें राष्ट्रपति या लोकसभा अध्यक्ष को लिखना चाहिए, सांसद के पब्लिक मोबाइल नंबर पाने के लिए ?

आम-नागरिकों के लिए सबसे अच्छा तरीका क्या है अपने सांसद, विधायकों, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, जज आदि को मजबूर करने के लिए कि वे अपना पब्लिक के लिए मोबाइल नंबर को सार्वजनिक करें ? “

उत्तर 6 –

ऐसे मामलों में, आप पार्टी के अध्यक्ष या लोकसभा अध्यक्ष को आदेश भेज सकते हैं मेसेज करके या लैंड-लाइन या पत्र द्वारा कि वो अपने पार्टी के सांसद को आदेश दे कि अपना एक मोबाइल नंबर जनता के लिए इन्टरनेट पर सार्वजनिक करे | इसके अलावा, आप रेजस्त्रिकृत पत्र द्वारा ये आदेश सीधा आपने क्षेत्र के सांसद को भी भेज सकते हैं |

यदि कुछ हजार नागरिक भी ऐसा करते हैं और अपने भेजे गए आदेशों को जनता को बताते हैं, फेसबुक नोट, पर्चे, गूगल डोक, आदि, द्वारा और सांसद कोई भी जवाब नहीं देता है, तब सांसद की पोल लाखों-करोड़ों के सामने खुल जायेगी | नागरिकों को क्यूँ ऐसे निकम्मे सांसद को एक क्षण के लिए भी बर्दाश्त करना चाहिए, जो नागरिकों का जवाब तक नहीं देता ? सभी नागरिक, चाहे वे किसी भी पार्टी के समर्थक हों, उनको ऐसे निकम्मे सांसद की पोल खोलनी चाहिए |

इसके अलावा, आप उसी पार्टी के दूसरे सांसद, जो उस सांसद के पास के क्षेत्र का सांसद है, उसको भी आदेश भेज सकते हैं कि वो आपके आदेश को आपके क्षेत्र के सांसद को दे सके |

उदाहरण – लाल किशन अडवानी ने इन्टरनेट पर अपना मोबाइल नंबर नहीं डाला है | इसीलिए, मैं नागरिकों से विनती कर रहा हूँ कि राजनाथ सिंह, जो अडवाणी के पार्टी का अध्यक्ष है, उसको आदेश दें कि अडवाणी को बोले कि अडवाणी अपना पब्लिक मोबाइल को इन्टरनेट पर डाले |

और अडवानी गांधीनगर का सांसद है, और पास के लोकसभा चुनाव क्षेत्र अहमदाबाद (पश्चिम) और अहमदाबाद (पूर्व) हैं, जिनके सांसद हरिन पाठक और किरीट सिंह सोलंकी हैं, जो दोनों भा.ज.पा. से हैं | इसीलिए, मैं गांधीनगर के नागरिकों से विनती कर रहा हूँ कि अडवाणी के लिए आदेश हरिन भाई या सोलंकी भाई को भेजें और उनसे विनती करें कि वे आदेश अडवाणी तक पहुंचा दें |

ये हरिन भाई और सोलंकी भाई का नैतिक कर्तव्य है कि वे अडवाणी को सार्वजनिक रूप से बोलें कि वे अपना पब्लिक मोबाइल नंबर इन्टरनेट पर डाल दे |

प्रश्न 7 – सांसद और जनसेवकों को मेसेज द्वारा आदेश भेजने के बजाय, हम उनको पत्र क्यों नहीं लिखते जिसमें समर्थकों के हस्ताक्षर होंगे ?

उत्तर 7 –

मेसेज द्वारा आदेश, अपने जनसेवकों को आदेश भेजने के लिए एक प्रामाणिक और सबसे सस्ता तरीका है |
आप पत्र भी भेज सकते हैं अपने जनसेवक को, लेकिन फिर दूसरे नागरिक ये जांच नहीं कर सकते हैं कि भेजे गए पत्र असली हैं और नकल (डुप्लिकेट) नहीं हैं | और फिर, मेसेज भेजने की तुलना में पत्र भेजना अधिक महंगा है और कठिन है, इसीलिए अधिक लोग इस प्रचार-तरीके को नकल करके अपना नहीं सकते हैं |

सांसद आसानी से ये कह सकता है कि उसे कोई भी पत्र नहीं मिला है | लेकिन महत्पूर्ण व्यक्तियों का मेसेज फोन कम्पनियों के रिकोर्ड में रहता है | और मेसेज-आदेश आसानी से दोबारा भी भेजे जा सकते हैं | सांसद ये भी कह सकते हैं कि हस्ताक्षर नकली हैं | लेकिन मोबाइल के सिम कार्ड की नकल करना आसान नहीं है | और एक बार कुछ हजार नागरिक मेसेज-आदेश भेज देते हैं और भेजे गए मेसेज-आदेशों को अपने वाल-नोट, ब्लॉग आदि पर जनता को दिखाते हैं (जहाँ जनता आसानी से ढूँढ सके और पढ़ सके) और फिर भी सांसद कोई जवाब नहीं देता, तो सांसद की लाखों-करोड़ों में पोल खुल जायेगी |

कृपया पत्र भेजने के लिए और समर्थकों के हस्ताक्षर इकठ्ठा करने के लिए लगना वाला समय और पैसे का गणित करें और उसकी तुलना मेसेज-आदेश भेजने के लिए लगने वाला समय और पैसे से करें |

किसी भी प्रचार-तरीके में यदि कम समय और पैसा खर्च होता है, तो अधिक लोग उसकी नकल करके उस तरीके को अपना सकते हैं | आप बताएं कि 75 करोड़ नागरिक-मतदाताओं में से कितने नागरिक एक जगह इकट्ठे हो सकते हैं या पत्र लिख सकते हैं या निजी रूप से अपने सांसद को मिल सकते हैं ? ऐसा कुछ लाख लोग ही कर सकते हैं | और कितने लोग 5-10 मिनट का समय निकाल कर अपने सांसद को मेसेज-आदेश भेज सकते हैं ? ऐसा करोड़ों लोग कर सकते हैं | इसलिए, मैं “जनसेवक को मेसेज-आदेश” के प्रचार-तरीके का समर्थन करता हूँ |

प्रश्न 8 – क्या मतदाता पहचान पत्र पर्याप्त है जांच करने के लिए ? मतदाता पहचान पत्र की आसानी से बड़े स्तर पर नकल की जा सकती है |

उत्तर 8 –

मतदाताओं को अपना मतदाता पहचान पत्र संख्या अपने फोन कंपनी को देना होगा | फोन कंपनी को (मोबाइल नंबर, मतदाता पहचान पत्र संख्या, ग्राहक का नाम, ग्राहक का पता) सांसद को भेजना होगा | सांसद और उसके कर्मचारी, उन (मतदाता पहचान पत्र संख्या, ग्राहक का नाम, ग्राहक का पता) को मतदाता सूची से मिलान करके जांच करेंगे | तो फिर, यदि कोई बड़े स्तर पर मतदाता पहचान पत्रों की नकल करता है, तो फिर उसको पहले बड़े स्तर पर मतदाता-सूची के साथ छेड़-छाड करनी होगी | ये आसान नहीं है | इसके अलावा कुछ समय के बाद, अंगुली के छाप लिए जा सकते हैं, जिससे बड़े स्तर पर नकल करना संभव नहीं होगा, बिना लाखों-करोड़ों में नकल करने का प्रयास करने वाले (जालसाज) की पोल खुले |


प्रश्न
9 –

हमको कैसे पता चलेगा कि अधिकतर लोगों को इस “जनसेवकों को मेसेज-आदेश” के प्रचार-तरीके के बारे में पता है और उन्होंने अपने जनसेवकों को मेसेज द्वारा आदेश भेजा है या नहीं ?

उत्तर 9 –

अंदाज से हम पता लगा सकते हैं कि एक क्षेत्र में कितने लोगों ने अपने जनसेवकों को मेसेज-आदेश किया है | हम क्रम-रहित तरीके से 30 लोगों को चुन सकते हैं | यदि 10 लोग ये कहें कि उन्होंने ऐसा मेसेज नहीं भेजा, तो फिर 33% लोगों ने मेसेज-आदेश किया है अपने जनसेवकों को |

प्रश्न 10 –
बिजली-दर कम करने के लिए और ब्रिजेंदर सिंह को वापस बिजली नियामक बनाने के लिए “ दिल्ली मुख्यमंत्री/दिल्ली विधायकों को मेसेज” अभियान (मुहिम) में और दूसरे “जनसेवक को मेसेज-आदेश” के अभियानों में आम-नागरिक कैसे जांच कर सकते हैं कि भेजे गए मेसेज-आदेश असली नागरिकों के ही हैं ?

उत्तर 10 –

जब तक सांसद भेजे गए मेसेज-आदेशों को अपनी वेबसाइट पर नहीं दिखता, सही तरीके से ये नहीं जांच की जा सकती कि कितने लोगों ने मेसेज-आदेश भेजें हैं | कोई भी आम-नागरिक अपने 100 मित्रों/रिश्तेदारों में से 10 क्रम-रहित तरीके से फोन करके पूछ सकता किस उन्होंने मेसेज-आदेश भेजा है या नहीं | यदि 4 व्यक्ति `हां` बोलते हैं, तो शायद 40% दिल्ली ने मेसेज-आदेश भेजा है |  इस अंदाज करने के तरीके में कमी हो सकती है और ये कानूनी उद्देश्यों के लिए अच्छा नहीं है, लेकिन राजनैतिक उद्देश्यों के लिए पर्याप्त है |

यदि सांसद, उसको प्राप्त मेसेज-आदेशों को अपनी वेबसाइट पर दिखता है, तो फिर एक आम-नागरिक क्रम रहित तरीके से 10 मेसेज-आदेशों को चुन सकता है और उनको फोन करके जांच कर सकता है |

कृपया ध्यान दें कि “जनसेवकों को मेसेज-आदेश” एक प्रचार तरीका है और एक राजनैतिक साधन है, जो अरविन्द भाई आदि नेताओं द्वारा प्रयोग किये गए तरीके से कहीं श्रेष्ट है | अरविन्द भाई ने जो मुहिम का तरीका का प्रयोग किया — “शीला दीक्षित को पत्र लिखो ; लेकिन भारतीय डाक का प्रयोग मत करो पत्र पहुँचाने के लिए ; एक सुपर डाकिया जिसका नाम अरविन्द भाई है, वो पत्रों को शीला दीक्षित तक पहुँचायेगा “ !!! अरविन्द भाई के इस तरीके में, अरविन्द भाई वे पत्र पहुँचायेगा जिनके विषय अरविन्द भाई को पसंद हैं और जिन पत्रों के विषय अरविन्द भाई को पसंद नहीं हैं, उन पत्रों को अरविन्द भाई फाड़ देगा |

प्रश्न 11 – क्या नागरिक-मतदाता को अपने मोबाइल के सिम को वोटर आई.डी.(पहचान पत्र) से जोड़ना जरूरी है ?

उत्तर 11 –

हरेक नागरिक-मतदाता निर्णय करेगा कि उसे अपना मोबाइल नंबर को मतदान पहचान पत्र संख्या (वोटर आई.डी) के साथ जोड़ना है कि नहीं | जब भी मतदाता मेसेज-आदेश भेजेगा, तो उसे सर्वर से एक फीडबैक मेसेज आएगा (पुष्टि का मेसेज) | और यदि उसका मोबाइल नंबर पंजीकृत (रजिस्टर) नहीं है, तो उसको एक फीडबैक मेसेज आएगा कि उसके पूरे विवरण नहीं हैं सर्वर पर |

जिस वेबसाइट पर मेसेज-आदेश प्रकाशित होंगे, उस वेबसाइट पर दो सूची होंगी — `जांच किये हुए नंबरों` की सूची और `बिना जांच किये हुए नंबरों` की सूचि | `जाँच किये हुए नंबर` की सूची में जिन मोबाइल नंबर को मतदाता पहचान पत्र संख्या से जोड़ा गया है, ऐसे मोबाइल नंबर से भेजे गए मेसेज-आदेश होंगे | `बिना जांच किये हुए नंबर` की सूची में वे मेसेज-आदेश होंगे, जो ऐसे मोबाइल नंबर से भेजे गए हैं जो किसी मतदाता पहचान पत्र संख्या से नहीं जोड़े गए हैं |

`बिना जांच किये हुए नंबरों` की सूची, इतनी ज्यादा अव्यवस्थित और भ्रमित करने वाली होगी कि जल्दी ही उसका कुछ भी राजनैतिक मूल्य नहीं रहेगा | इसलिए, सच्चे कार्यकर्ता और मतदाता अपने मतदाता पहचान पत्र द्वारा अपने मोबाइल नंबरों की जांच करवाएंगे |
प्रश्न 12 – उन मेसेज का क्या होगा, जो उन लोगों ने सांसद को भेजा है, जिनका नाम मतदाता सूचि में नहीं है, यानी कि रजिस्ट्रीकृत मतदाता नहीं हैं और उन मेसेज का क्या होगा जो उन मतदाताओं ने सांसद को भेजा है, जिनका चुनाव क्षेत्र सांसद के चुनाव क्षेत्र से भिन्न है ?

उत्तर 12 –

जो व्यक्ति पंजीकृत मतदाता नहीं हैं या 18 साल से कम आयू के हैं, वे अपने लिए अलग श्रेणी की मांग कर सकते हैं “अभी मतदाता नहीं” और जो पंजीकृत मतदाता नहीं हैं, उनके मेसेज उस श्रेणी में डाले जा सकते हैं |

मेसेज, जो सांसद के चुनाव क्षेत्र के मतदाताओं के नहीं हैं, उनको “सांसद के चुनाव क्षेत्र के बहार” मेसेज श्रेणी में रखा जायेगा |

प्रश्न 13 – मैं मेरे पसंदीदा नेता का विरोध नहीं करना चाहता | तो मैं उसे मेसेज द्वारा आदेश भेजना नहीं चाहता |

उत्तर 13 –

आप अपने पसंदीदा नेता का विरोध नहीं कर रहे हैं | यदि आपको लगता है कि वह आम नागरिकों के लिए कुछ अच्छा कर रहा है, तो आप उसे एस.एम.एस / मेल के माध्यम से उसे बधाई दे सकते हैं |

और उसे वेबसाइट, ब्लॉग पर भी डाल सकते हैं और इससे दूसरों को भी ऐसा करने की प्रेरणा मिलेगी | नेता को सुझाव देकर आप उसके पब्लिक में किये गए काम को आगे से और सुधारने में मदद कर सकते हैं | अधिकतर नेता स्वयं जनता से सुझाव मांगते हैं |

लोकतंत्र का यह मतलब नहीं है की आप सिर्फ वोट करें या एक पार्टी या नेता का समर्थन करें और फिर 5 साल के लिए सो जायें | आप सब को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नेता या पार्टी अच्छे से काम कर रहे हैं या नहीं | लोकतंत्र का मतलब है कि आम–नागरिकों को “जनसेवकों को मेसेज-आदेश”, टी.सी.पी., जूरी सिस्टम आदि द्वारा हरेक दिन देश को चलाने के कार्यों में भाग लेना चाहिए |

प्रश्न 14 – “ यदि फोन नंबर को पब्लिक वेबसाइट पर सार्वजनिक दिखाया जायेगा, तो हम कैसे अनचाहे (ऊट-पटांग) फोन और रद्दी मेसेज (स्पैम) आने से रोक सकते हैं ?
क्या आप सोचते हैं हैं कि औरतें इस प्रचार-तरीके का प्रयोग करेंगी, यदि इस तरीके में फोन को पब्लिक वेबसाइट पर सार्वजनिक किया जायेगा ? “

उत्तर 14 –

यदि किसी नंबर को ब्लाक करने (नाकाबंदी) की सुविधा मुफ्त कर दी जाये, तो स्पैम (रद्दी मेसेज) को रोका जा सकता है |

इसके अलावा, जब कीस मोबाइल नंबर को एक निश्चित संख्या के मोबाइल ने ब्लाक कर दिया है, तो फिर कुछ समय के लिए, उस मोबाइल की दूसरे मोबाइल को मेसेज भेजने की सुविधा बंद कर देनी चाहिए | और फिर भी मोबाइल का प्रयोग करने वाला, स्पैम करना (रद्दी मेसेज भेजना) चालू रखता है, तो मेसेज भेजने की सुविधा हमेशा के लिए बंद कर देनी चाहिए |

आज, मतदाता सूची इन्टरनेट पर है, इसीलिए कोई भी महिलाओं का भी पता देख सकता है |

अनचाहे फोन को आने से निम्नलिखित प्रकार से रोका जा सकता है –

1. मान लीजिए `एफ` एक फोन मालिक है

2. `एफ` सीमित बात-चीत का विकल्प चुन सकता है

ऐसे मामले (सीमित बातचीत) में, केवल वे ही व्यक्ति `एफ` को फोन कर सकते हैं, जो `एफ` अपनी सूची में जिनका नाम देता है मोबाइल कंपनी को |

3. यदि `एम` चाहता है कि अपने को `एफ` की सूची में जोड़ा जाये, तो फिर `एम` को “मुझे जोड़ो” का मेसेज भेजना होगा `एफ` को और फिर `एफ` `एम` को जोड़ सकता है या उसको अस्वीकार कर सकता है |

4. जब भी `एम` के सूची में जोड़ने के मेसेज को कोई मोबाइल प्रयोग करने वाला अस्वीकार करता है, तो फिर `एम` के “मुझे जोड़ो” मेसेज भेजने से एक सप्ताह के लिए रोक लगा दी जायेगी |
ये फेसबुक में फ्रेंड-रिक्वेस्ट की व्यवस्था के समान है |

प्रश्न 15 – भारतीय नागरिक-मतदाता अपने प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक आदि को मेसेज द्वारा आदेश दे सकते हैं | लेकिन जो अनिवासी भारतीय हैं, उनके के क्या सीमाएं और अधिकार हैं, जनसेवक को मेसेज भेजने के लिए ? अनिवासी भारतीय कौनसे सांसद, विधायक, मुख्यमंत्री को अपने मेसेज-आदेश भेज सकते हैं ?

उत्तर 15 –

एक अनिवासी भारतीय उस क्षेत्र के सांसद/विधायक को मेसेज-आदेश भेज सकता है, जहाँ उसका भारत में निवास स्थान है |

यदि कोई भारतीय मूल का व्यक्ति है लेकिन भारत का नागरिक नहीं है और मेसेज भेजता है, तो उसे अपने मेसेज में ये स्पष्ट कर देना चाहिए और उसे केवल एक विनती भेजनी चाहिए, आदेश नहीं भेजना चाहिए | वे उस क्षेत्र के विधायक/सांसद को भेज सकता है, जहाँ वो व्यक्ति का मूल स्थान है |

प्रश्न 16 – “ पूरा ड्राफ्ट मेसेज-आदेश में नहीं आ सकता | अब यदि हम स्पष्ट मेसेज-आदेश नहीं भेजेंगे, तो सरकार कमियों वाले कानून बना देगी और कहेगी कि ये कानून जनता की मांग के कारण लाये गए हैं |

यदि हम ड्राफ्ट को पत्र या ई-मेल द्वारा भेजते हैं, तो फिर नेता या सांसद कह सकता है कि उसको कभी भी पत्र/ई-मेल मिला ही नहीं | और यदि हम ड्राफ्ट को इन्टरनेट पर अपलोड करके, उसका लिंक मेसेज-आदेश में डाल देते हैं, तो सरकार अपने प्रभाव का उपयोग करके उस लिंक को हटवा सकती है |

तो फिर, समाधान-ड्राफ्ट की मांग करने के लिए सबसे अच्छा और प्रामाणिक तरीका क्या है ? “

उत्तर 16 –

टी.सी.पी (पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली = आम-नागरिकों का अधिकार कि वे अपनी एफिडेविट को कलेक्टर के दफ्तर जाकर, स्कैन करवाकर प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर रखवा सकेंगे) और उसका दूसरा रूप “जनसेवकों को मेसेज-आदेश”, जिसमें टी.सी.पी. की देखरेख सांसद करता है, जनसमूह सम्बन्धी मुद्दों के लिए है जैसे एम.आर.सी.एम. , राईट टू रिकाल के ड्राफ्ट, जूरी सिस्टम को लाना, आदि और निजी शिकायतों के लिए नहीं है | जनसमूह मुद्दों का मतलब ऐसा कोई प्रस्ताव, जिसको 15 लाख मतदाताओं के चुनाव क्षेत्र में कम से कम 50,000 मतदाता मांग करते हों |

निजी शिकायतों के लिए, हमने जूरी सिस्टम का प्रस्ताव किया है |

अब यदि 50,000 मतदाता किसी ड्राफ्ट को दर्ज करवाना चाहते हैं, तो फिर उन 50,000 लोगों में से किसी न किसी के पास इन्टरनेट आदि होगा या सांसद के दफ्तर जाकर ड्राफ्ट को दर्ज करने का साधन होगा | उसको सांसद के दफ्तर में ड्राफ्ट जमा करवाने पर एक रसीद नंबर भी दिया जा सकता है और वो फिर वो ये नंबर दूसरे नागरिकों को दे सकता है और दूसरे नागरिक भी अपने मेसेज-आदेश भेज सकते हैं, जिसमें ये रसीद नंबर का उल्लेख किया गया हो |

यदि ड्राफ्ट को अमेरिका आदि विदेशी कम्पनियों के सर्वर पर डाला गया हो, तो फिर भारतीय सरकार के लिए, उसको डिलीट करना आसान नहीं होगा | और ड्राफ्ट को इन्टरनेट पर 2-3 जगह पर भी अपलोड किया जा सकता है, इसकी कम सम्भावना है कि सरकार इसको 2-3 जगह से हटा सकेगी बिना उसके पोल खुले | इसके अलावा, यदि सांसद ने इस ड्राफ्ट को अपने सर्वर पर डाला है, तब भी भारतीय सरकार इसको आसानी से नहीं हटा सकती है |

प्रश्न 17 – “यदि कोई यह कहते हुए जनहित-याचिका फाइल करता है कि अंबानी के पास आवश्यकता से ज्यादा सम्पति है और सुप्रीम कोर्ट सभी अतिरिक्त संपत्ति को जब्त करे और गरीबों के बीच वितरित करे, तो स्पष्ट रूप से 50 करोड़ से ज्यादा सहमत होंगे.”

उत्तर 17 –

यह तो आपका 100% निराधार आरोप है | क्या आपके पास कोई सबूत है कि करोड़ों आम-नागरिक किसी भी उच्च वर्ग के व्यक्ति को लूटना चाहते हैं ? अगर ऐसा है, तो फिर सभी आम-नागरिक सी.पी.एम जैसी पार्टी को लोग मतदान क्यूँ नहीं देते, जो इस तरह के एजेंडे को लेकर घूमती है ? लेकिन आम जनता कभी ऐसी रॉबिन हुड की नीतियों का समर्थन नहीं करती है |

हर मजदूर के पास इतना दिमाग तो है कि यदि अम्बानी जैसों को लूट लिया जाता है, तो सभी उच्च वर्ग के व्यक्ति भारत छोड़ कर चले जायेंगे और फिर कारखानों को चलाने और उन्हें नौकरी देने के लिए भी कोई नहीं रहेगा |

प्रश्न 18 – “एस.एम.एस भेजने की ये विधि गैर-सरकारी संगठनों को फायदा करेगी जो जनता की भावनाओं को इकट्ठा करने के लिए काम करते हैं और फिर वे गैर-सरकारी संगठन इस विषय पर अदालत में याचिका दाखिल करते हैं |”

उत्तर 18 –

यह पूरी तरह से गलत है | हर बिकाऊ गैर सरकारी संगठन (हर गैर-सरकारी संस्था बिकाऊ है क्यूंकि वे हर काम के लिए सरकार से पैसे लेते हैं) खुद को लोगों के प्रतिनिधि के रूप में दावा करते हैं | हम आम जनता से बोल रहे हैं कि एस.एम.एस के माध्यम से वे सीधे मुख्यमंत्री, जज और प्रधानमंत्री को आदेश दें | हम अरविंद भाई की तरह किसी भी बिचौलियों का काम नहीं कर रहे हैं, जो समर्थन हासिल करने के बाद बाद, समर्थन का फायदा उठाते हैं | वास्तव में, हमारा लक्ष्य इन सभी गैर सरकारी संगठन और पैसे पर बिकने वाले कार्यकर्ताओं को दूर करने के लिए है | हमारा लक्ष्य नागरिकों के द्वारा एस.एम.एस के माध्यम से, सीधे प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट के प्रधान जज के पास अपनी बात रखने का है |

प्रश्न 19 – केवल मेसेज-आदेश भेजना पर्याप्त है ?

उत्तर 19 –

हम केवल मेसेज-आदेश ही नहीं भेज रहे हैं, लेकिन अखबार में विज्ञापन देने, पर्चे बांटने और चुनाव लड़ने का भी काम कर रहे हैं, ताकि जनहित के प्रक्रिया जैसे टी.सी.पी. आदि के बारे में लोग जानें और नागरिक सांसद, विधायक, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री को सीधे मेसेज आदि द्वारा आदेश भेजें |

हम स्वयंसेवक हैं और हम कोई केंद्रीकृत दान को नहीं लेते हैं | इन कार्यों के लिए, हम अपने कमाए हुए, सरकार को टकस भरने के बाद, बचे हुए पैसों का प्रयोग करते हैं | हमें ऐसा करने वाले अन्य नागरिकों की भी जरूरत है |

चैप्टर-18, www.prajaadhinshasan.blog.com  में हमने समझाया है कि क्यों एक कार्यकर्ता-आधारित आंदोलन के लिए केंद्रीकृत दान लेना एक बुरा विचार है |

प्रश्न 20 –

1) हम जजों को बदलने या उन्हें आदेश नहीं दे सकते क्यूंकि संविधान के अनुसार, जजों को चुना नहीं जा सकता है और न्यायपालिका कोई भी नीति निर्माण नहीं करती है….

2) न्यायपालिका को अपना फैसला जनता के दबाव या जनता की राय के अनुसार नहीं देना चाहिए | जजों को अपना फैसला केवल कानून के अनुसार देना चाहिए |

उत्तर 20 –

1) यह राईट टू रिकॉल-सुप्रीम कोर्ट प्रधान-जज की प्रक्रिया जो सैक्शन 7.3, www.prajaadhinshasan.blog.com में दी गयी है, वो 100% संविधैनिक है | आम नागरिक सुप्रीम-कोर्ट के प्रधान-जज (मुख्य न्यायाधीश) को “अभी इस्तीफा दो” का मेसेज-आदेश भेजने के लिए के भी स्वतंत्र है | यदि प्रधान जज का मानना ​​है कि उसके निजी मोबाइल पर इतने सारे मेसेज आने से परेशानी होगी, तो वह एक अलग नंबर रख सकता है, जहां आम-नागरिक उसे मेसेज-आदेश भेज सकते हैं और हाँ, वह उन्हें पढ़ने के लिए भी स्वतंत्र नहीं है | और मान लीजिए कि 50 करोड़ नागरिक के द्वारा “अभी इस्तीफा दो” का मेसेज-आदेश भेजने पर भी सुप्रीम-कोर्ट प्रधान-जज इस्तीफा देने से मना करते हैं, तो फिर जो होगा, उसकी जिम्मेदारी तो प्रधान-जज की ही होगी |

क्या आप मुझे बता सकते हैं कि सैक्शन 7.3 की कौन सी धारा असंवैधानिक है या जज को मेसेज भेजना , संविधान के कौन से अनुच्छेद का उल्लंघन करता है ? जनसेवक को मेसेज-आदेश भेजना केवल एक ई पोस्टकार्ड जैसा है |

एक बार सैक्शन 7.3 का मसौदा राजपत्र में छप जाये, तो हम नागरिक अपने जजों को बदलने में सक्षम हो जायेंगे | और यदि ये ड्राफ्ट राजपत्र में नहीं भी छपता, तो भी हम, आम-नागरिक जजों को मेसेज-आदेश भेज कर यह ही कार्य कर सकते हैं |

इस प्रक्रिया-ड्राफ्ट “मेसेज द्वारा राईट टू रिकॉल-सुप्रीम कोर्ट प्रधान जज” के लिए कोई संवैधानिक संशोधन की जरूरत नहीं है | यदि 38 करोड़ नागरिक प्रधानमंत्री को इस प्रक्रिया-ड्राफ्ट को राजपत्र में छपवाने का मेसेज द्वारा आदेश देते हैं और सभी 25 सुप्रीम-कोर्ट के जज भी ऐसा करने का अनुमोदन करते हैं, तो प्रधानमंत्री इस प्रक्रिया-ड्राफ्ट को राजपत्र में छपवा सकते हैं |

2) जजों द्वारा दिए गए निर्णय तथ्यों, कानूनों और जजों और विवेक के आधार पर दिया जाता है | और बहुत सी चीज उनके विवेक पर है | जनसेवकों को आवश्यक आदेश देना हम नागरिकों का अधिकार और कर्तव्य दोनों है| उदाहरण के लिए, सुप्रीम कोर्ट के प्रधान-जज के पास जमानत देने के एक-अधिकार हैं | तो ऐसे में, कल वह दिल्ली बस के मामले के आरोपी को जमानत दे सकता है | उदाहरण के लिए, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व प्रधान जज, खरे ने एक स्विस अरबपति, जिसने 3 आठ वर्ष की लड़कियों के साथ बलात्कार किया था और उसे वीडियो टेप भी किया था, उसको जमानत दी थी !! स्विस अरबपति को जमानत मिलने के कारण, वो भारत से भागने में सक्षम हो गया ! तो ऐसे मामलों में, हम आम-नागरिक, मेसेज के माध्यम से आदेश भेज सकते हैं कि स्विस अरबपति को जमानत नहीं मिलनी चाहिए |

तो यदि सुप्रीम-कोर्ट जजों के द्वारा संविधान का उल्लंघन हो रहा है, तो यह हम आम नागरिकों का संवैधानिक कर्तव्य है कि उन जजों को जितनी जल्दी हो सके, उनको बदलें | आम नागरिक एक जज को केवल इसलिए नहीं बदलेंगे कि वह बहुमत नागरिकों को नजरंदाज कर रहा है | आम नागरिक, एक जज को तभी बदलेंगें यदि वो संविधान का उल्लंघन करेगा |

50 करोड़ लोग किसी निर्दोष के लिए फांसी की मांग कर सकते हैं ? और वो भी जाँच किये बिना ? कोई भी देश के नागरिक ऐसा नहीं कर सकते हैं | और निश्चित रूप से, भारत के नागरिक तो ऐसा नहीं कर सकते हैं | ज्यादातर भारतीय नागरिक तो एक चींटी को चोट पहुँचाने से पहले 100 बार सोचते हैं |

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ऐसा कहना कि सुप्रीम-कोर्ट के जज भय के कारण अपना फैसला करेंगे, उनका अपमान करना है | ऐसे तो मैं कह सकता हूँ कि जज रिश्वत लेकर फैसला कर सकते हैं !! यदि जज ईमानदार हैं, तो फिर उनको हटाये जाने और बदले जाने का क्यों डर होगा ?

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अमेरिका में, आम-नागरिकों के पास राज्य के प्रधान जज सहित, जजों पर राईट टू रिकल है |

यह गुलामी की मानसिकता है कि हम न्यायाधीशों को बदल नहीं सकते | इस “गुलामी की मानसिकता” से आप सब निकलिए | हम सब स्वतंत्र नागरिक हैं | एक जज जो संविधान का उल्लंघन कर रहा है, उसे बदलना हम, आम-नागरिकों का संवैधानिक कर्तव्य है |

प्रश्न 21 – कृपया जनसेवकों को मेसेज-आदेश के कुछ उदाहरण दीजिए | मेसेज-आदेश में क्या लिखा जा सकता है ?

उत्तर 21 –

सबसे पहले, आपको स्पष्ट रूप से निर्णय करना चाहिए कि आपको जनसेवकों और सरकार से क्या चाहिए | क्यूंकि यदि आपकी मांग अस्पष्ट है और आप मांग के लिए दबाव डालते हैं, तो फिर सरकार एक कमियों वाला कानून बनाएगी, जो कार्यकर्ता की मांग से बिलकुल अलग होगा | और सरकार कहेगी कि उसने ये कानून जनता की मांग के कारण लागू किया है !!

फिर, कार्यकर्ता को लोकतंत्र, सिस्टम और कानून पर से विश्वास उठ जायेगा और वो सोचता है कि सारे कानूनों के साथ छेड़-छाड किया जा सकता है | इसीलिए, मांग स्पष्ट होनी चाहिए और उसमें जनसेवक के लिए कोई भी छेड़-छाड करने की कोई गुन्जायिश नहीं होनी चाहिए | और उसमें आम-नागरिकों के लिए कुछ अधिकार होने चाहिए, जिनके प्रयोग से वे सरकारी कर्मचारियों को प्रस्तावित प्रक्रिया का दुरुपयोग करने से रोक सकते हैं, जैसे आम-नागरिक भ्रष्ट और निकाम्मे कर्मचारियों को बदल सके, आम-नागरिक उनको सजा दे सके |

हमें सभी कार्यकर्ताओं और नागरिकों से पूछना चाहिए, कि वे जो भी राष्ट्र स्तर का कार्य कर रहे हैं, क्या वे इसका समर्थन करते हैं कि करोड़ों (उदाहरण 30-40 करोड़) नागरिक-मतदाता इसके लिए अपने सांसद आदि जनसेवकों को मेसेज द्वारा आदेश करें ? उदाहरण के लिए, यदि कोई गो-हत्या को रोकने के लिए कार्य कर रहा है, तो हमें उसको पूछना चाहिए कि क्या आप समर्थन करते हैं कि करोड़ों वोटर (उदाहरण 30-40 करोड़) अपने सांसद को मेसेज द्वारा आदेश करें कि वे गो-हत्या रोकने के लिए कदम उठाएंगे ? यदि कार्यकर्ता `हां` बोलता है, तो फिर उसको बोलो कि वो और उसके मित्र अपने सांसदों को मेसेज-आदेश भेजें और भेजे गए मेसेज-आदेश के बारे में जनता को सूचना दें फेसबुक वाल-नोट, ब्लॉग, पर्चे आदि द्वारा |

ये प्रचार-तरीका ये सुनिश्चित करता है कि नागरिक और कार्यकर्ता अपने मनचाहे प्रस्ताव को पारित करने के लिए स्वयं अपने जनसेवकों को आदेश दे सकते हैं, अपना मनचाहा प्रस्ताव भारतीय राजपत्र में छपवाने के लिए उन्हें किसी नेता पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा |

1) अपने प्रिय नेता को तुरंत प्रधानमंत्री बनाना — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि कि तुरंत प्रस्ताव शुरू करें कि श्री क.ख.ग. (आपके प्रिय नेता) को प्रधानमंत्री बनाया जाये | और मैं आपको उस प्रस्ताव में `हाँ` वोट करने का आदेश देता हूँ | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

2) टी.सी.पी. 1 — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि प्रधानमंत्री को आदेश दें कि राजपत्र में तुरंत छपवाएं कि कि यदि कोई नागरिक-वोटर चाहे तो वो किसी भी दिन अपने कलेक्टर के दफ्तर जाकर, 20 रुपये प्रति पन्ना देकर, अपनी एफिडेविट स्कैन करवाकर प्रधानमंत्री वेबसाइट पर रखवा सकेगा | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

3) `सेना और नागरिकों के लिए खनिज आमदनी` — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि तुरंत प्रधानमंत्री को आदेश दें कि भारतीय राजपत्र में छापें कि वित्तीय सचिव खनिज आमदनी, स्पेक्ट्रम आमदनी, सरकारी भूमि का किराया का 67% सीधा देश के सभी नागरिकों के खाते में जमा करे | और बाकी 33% सेना के खाते में जमा करे | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

4) चुनाव यंत्र 1 — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि तुरंत लोकसभा अध्यक्ष को आदेश दें कि तुरंत `नागरिक प्रतिनिधि अधिनियम` में जरुरी बदलाव लाएं ताकि चुनाव यंत्र पर बैन लग जाये और कगाज मतपत्र वापस आ जाये | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

5) चुनाव यंत्र 2 — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि तुरंत चुनाव आयोग कमिश्नर को आदेश दें कि चुनाव आयोग की वेबसाइट पर एक मोबाइल नंबर प्रकाशित करें, ताकि सभी नागरिक उसपर चुनाव आयोग को मेसेज द्वारा जरुरी आदेश दे सके | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

6) सी.आर.पी.एफ के हथियार रखने पर पाबंधी वाले कानून को रद्द करो — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि तुरंत उस कानून को रद्द करवाएं जो कहता है कि श्रीनगर में केवल 3 में से एक सी.आर.पी.एफ का सैनिक ही हथियार रख सकता है और सभी सी.आर.पी.एफ. के सैनिकों को हथियार रखने दिया जाये | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

7) राईट टू रिकॉल-प्रधानमंत्री 1 — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि तुरंत प्रधानमंत्री को आदेश दें कि राजपत्र में छपवाएं कि जो व्यक्ति प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, कलेक्टर उनसे 20,000 रुपये का शुल्क लेकर, उनका नाम प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर दर्ज करें | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

8) राईट टू रिकॉल-प्रधानमंत्री 2 — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि तुरंत प्रधानमंत्री को आदेश दें कि पटवारी (लेखपाल;तलाटी) को आदेश दें कि वे नागरिकों को अनुमति दें कि वे शुल्क देकर अपनी प्रधानमंत्री उम्मीदवारों की पसंद प्रधानमंत्री वेबसाइट पर दर्ज करवा सकें | कलेक्टर ऐसा सिस्टम भी बनाएगा, जिसके द्वारा नागरिक अपनी प्रधानमंत्री उम्मीदवारों की पसंद मेसेज द्वारा भी दर्ज करवा सकते हैं | नागरिक किसी भी दिन अपनी पसंद को रद्द करवा सकता है | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

9) राईट टू रिकॉल-सुप्रीम कोर्ट प्रधान-जज 1 — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि नागरिकों को अनुमति दी जाए कि वे 20,000 रुपयों का जमा-राशि देकर, अपने आपको `राष्ट्रिय स्वीकृत जूरिस्ट` के पद के लिए प्रधानमंत्री वेबसाइट पर पंजीकृत करवा सकें | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें
धन्यवाद |”

10) राईट टू रिकॉल-सुप्रीम कोर्ट प्रधान-जज 2 — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि तुरंत प्रधानमंत्री को आदेश करें कि तलाटी (पटवारी;लेखपाल) को आदेश दें कि नागरिकों को अनुमति दें कि वे शुल्क देकर, प्रधानमंत्री वेबसाइट पर `राष्ट्रिय स्वीकृत जूरिस्ट` के उम्मीदवारों को स्वीकृति दे सकें | और कृपया `राष्ट्रिय सूचना विज्ञान केन्द्र` के अध्यक्ष को आदेश दें कि नागरिक मेसेज द्वारा `राष्ट्रिय स्वीकृत जूरिस्ट` उम्मीदवार को स्वीकृत कर सकें, ऐसा सिस्टम बनाएँ | और नागरिक किसी भी दिन भी अपनी स्वीकृति को रद्द कर सकें | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

11) राईट टू रिकॉल-सुप्रीम कोर्ट प्रधान-जज 3 — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि तुरंत प्रधानमंत्री को आदेश दें कि राजपत्र में छपवाएं कि यदि 40 करोड़ नागरिक किसी व्यक्ति को `राष्ट्रिय स्वीकृत जूरिस्ट` को पसंद करते हैं, तो प्रधानमंत्री सुप्रीम-कोर्ट के प्रधान-जज को आदेश देंगे कि उस `राष्ट्रिय स्वीकृत जूरिस्ट` को नया सुप्रीम-कोर्ट का प्रधान-जज नियुक्त करे | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

12) आरक्षण 1 — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि तुरंत प्रधानमंत्री को आदेश करें कि राजपत्र में छपवाएं कि यदि कोई दलित या अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ी जाती का व्यक्ति, आरक्षण के बदले, आर्थिक विकल्प चाहता है, तो उसको हर वर्ष 600 रुपये मिलेंगे प्रति व्यक्ति | और आरक्षण, उतना प्रतिशत कम होगा, जितने प्रतिशत ने आर्थिक विकल्प का चुनाव किया है | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

13) आरक्षण 2 — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि तुरंत लोकसभा अध्यक्ष के सामने ये कानून-ड्राफ्ट रखें कि दलित, जनजाती, और अन्य पिछड़ी जातियों की उपजाति, जिनको समाज में कम प्रतिनिधित्व प्राप्त है, उनको अधिक कोटे का हिस्सा (सब-कोटा) मिलेगा जब तक उनका समाज में प्रतिनिधित्व दूसरी उप-जातियों के बराबर नहीं हो जाता है | और कृपया इस कानून पर `हां` में वोट करें | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

14) राईट टू रिकॉल-रिसर्व बैंक गवर्नर 1 — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि तुरंत प्रधानमंत्री को आदेश दें कि राजपत्र में छपवाएं कि कलेक्टर उन नागरिकों का नाम जमा-शुल्क लेकर पंजीकृत करेंगे, जो रिसर्व बैंक गवर्नर बनना कहते हैं, और उनके नाम कलेक्टर प्रधानमंत्री वेबसाइट पर डालेंगे | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

15) राईट टू रिकॉल-रिसर्व बैंक गवर्नर 2 — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि तुरंत प्रधानमंत्री को आदेश दें कि पटवारी (लेखपाल) को आदेश दें कि नागरिक शुल्क देकर रिसर्व बैंक गवर्नर उम्मीदवारों पर अपनी पसंद दर्ज करवा सकें प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर | और प्रधानमत्री कलेक्टर को ये भी आदेश दें कि ऐसा सिस्टम बनाएँ, जिससे नागरिक अपनी रिसर्व बैंक गवर्नर उम्मीदवारों की पसंद मेसेज द्वारा दर्ज कर सकें | नागरिक किसी भी दिन अपने पसंद रद्द भी कर सकता है | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

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