अध्याय 52 – सूची (लिस्ट) 2 : समस्‍याएं और `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के वे प्रस्‍ताव जो इन समस्‍याओं को सुलझा देंगे

 

संख्‍या

समस्‍या

कौन सा प्रस्‍तावित प्रारूप/ड्राफ्ट समस्‍या को कम करेगा

गरीबी से जुड़ी समस्‍याएं

1.

गरीबी 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव   प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.(’

4. सम्‍पत्‍ति-कर

5. विरासत-कर

2.

बुजुर्गों/वृद्धों के लिए पेंशन 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.)’

3.

स्‍वच्‍छ पेयजल/पीने के साफ पानी की आपूर्ति/सप्‍लाई की कमी 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. जल पर समान/बराबर भत्‍ता प्रणाली(सिस्टम)

4.

घटिया/उच्‍च लागत (वाली) प्राथमिक(शुरू की) शिक्षा 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – जिला शिक्षा मंत्री

4. प्रजा अधीन – जिला शिक्षा अधिकारी

5.

घटिया/उच्‍च लागत (वाली) उच्‍चतर/उच्च स्‍कूली शिक्षा 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – जिला शिक्षा मंत्री

4. प्रजा अधीन – जिला शिक्षा अधिकारी

6.

स्‍वास्‍थ्‍य – उच्‍च लागत (वाली) और घटिया स्‍तर की कॉलेज शिक्षा 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3 प्रजा अधीन – राष्‍ट्रीय शिक्षा मंत्री

4. प्रजा अधीन – राज्‍य शिक्षा मंत्री

5. प्रजा अधीन – यू.जी.सी. अध्‍यक्ष.(विश्वविद्यालय अनु-दान आयोग/यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन) (बड़े कालेज के लिए विशेष दान अरने वाली समिति)

6. प्रजा अधीन – विश्‍वविद्यालय उप-कुलपति (बड़ा कालेज का उप-राष्ट्रपति)

7. छात्रों को सीधे ही छात्रवृत्‍ति/स्‍कॉलरशिप

7.

एड्स महामारी 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.)’

4. जूरी प्रणाली(सिस्टम)

8.

घटिया/खराब पोषण/खाना-पीना 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.)’

9.

घटिया घर (गृहनिर्माण) 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.)’

4. सम्‍पत्‍ति-कर कानून

5. विरासत-कर

10.

भगवान की सम्‍पत्‍ति की चोरी 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.)’

4. प्रजा अधीन-मुख्यमंत्री

5. प्रजा अधीन-पोलिस कमिश्नर

11.

चोरी की गई भगवान की सम्‍पत्‍ति को चोरी न समझना 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

12.

जनसंख्‍या वृद्धि/विकास 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.)’

क़ानून-व्यवस्था सम्बंधित समस्याएं

13.

चोरी, फिरौती, खुला संगठित अपराध 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.)’

4. प्रजा अधीन – पुलिस आयुक्‍त/कमिश्‍नर

5. प्रजा अधीन – जज

6. जूरी प्रणाली(सिस्टम)

7. (नागरिकों के) बहुमत के मतदान/फैसले द्वारा कैद, फांसी देना

14.

बिहार में अराजकता/कानून नाम की कोई चीज नहीं [उपर की ही तरह/ जैसा उपर दिया गया है]

 

15.

उत्‍तर प्रदेश में अराजकता/कानून नाम की कोई चीज नहीं [उपर की ही तरह/ जैसा उपर दिया गया है]

 

16.

बड़े पैमाने पर नकल [उपर की ही तरह/ जैसा उपर दिया गया है]

 

17.

आतंकवाद 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.)’

4. सेना के लिए सम्‍पत्‍ति-कर

5. सेना के लिए विरासत-कर

6. परमाणु हथियारों का विकास

7. सेना को मजबूत/सुदृढ़ करना

8. (नागरिकों के) बहुमत के मतदान/फैसले द्वारा फांसी देना

महिलाओं, दलितों आदि के खिलाफ अपराध

18.

महिलाओं के खिलाफ छेड-छाड़, बलात्‍कार और अत्याचार जैसे बढ़ते अपराध 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.)’

4. प्रजा अधीन – जिला पुलिस आयुक्‍त/कमिश्‍नर

5. प्रजा अधीन – जज

6. जूरी सुनवाई

7. बलात्‍कार के मामलों/मुकद्दमों में सच्‍चाई सीरम जांच

8. (नागरिकों के) बहुमत के मतदान/फैसले द्वारा कैद, फांसी देना

19.

अकेली औरत पर बढ़ता अत्याचार [उपर की ही तरह/ जैसा उपर दिया गया है]

 

20.

महिलाओं, बच्‍चों के खिलाफ घरेलू हिंसा [उपर की ही तरह/ जैसा उपर दिया गया है]

 

21.

दलितों पर बढ़ता अत्‍याचार [उपर की ही तरह/ जैसा उपर दिया गया है]

 

सिविल (नागरिक) / समाजिक समस्‍या

22.

सामानों और सेवाओं का घटिया स्‍तर / गुणवत्‍ता 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – जज

4. जूरी सुनवाई

23.

अधिक ब्याज लेना ;ऋण/कर्ज न चुकाना [उपर की ही तरह/ जैसा उपर दिया गया है]

 

कानूनी बुनियादी ढ़ाचे से संबंधित समस्‍या

24.

कोर्ट में धीमी गति से सुनवाई, जरूरत से कम कोर्ट होना 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – जज

4. जूरी प्रणाली(सिस्टम)

5. नए 1,00,000 कोर्ट स्‍थापित करना/बनाना

6. जजों की भर्ती/नियुक्‍ति में इंटरवीयू(साक्षात्‍कार) समाप्‍त करना

25.

कानून बनाने की धीमी गति / प्रक्रिया 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

भ्रष्‍टाचार, भाई-भतीजावाद से जुड़ी समस्‍याएं

26.

नागरिक आपूर्ति विभागों (राशन कार्ड प्रणाली(सिस्टम)) में भ्रष्‍टाचार 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों  द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – नागरिक राशन(आपूर्ति) मंत्री

4. प्रजा अधीन – जिला राशन(आपूर्ति) अधिकारी

5. राशन की दुकान बदलने की प्रक्रिया

27

पुलिस का अत्याचार 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों  द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – जिला पुलिस कमिश्नर/आयुक्‍त

4. पुलिसकर्मियों पर जूरी प्रणाली(सिस्टम)

28.

कनिष्‍ठ/निचले स्‍तर के (पुलिस अधीक्षक से नीचे) पुलिस में भ्रष्‍टाचार 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों  द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – जिला पुलिस आयुक्‍त

4. पुलिसकर्मियों पर जूरी प्रणाली(सिस्टम)

29.

राजस्‍व (भू) विभाग(राज्य या शासन को भूमि में से होनेवाली आय) में भ्रष्‍टाचार 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – मुख्‍यमंत्री

4. प्रजा अधीन – राज्‍य भूमि रिकॉर्ड अधिकारी

5. टॉरेन्‍स प्रणाली(सिस्टम) : बिक्री की जरूरी/अनिवार्य रजिस्‍ट्री

6. भूमि रिकॉर्ड नेट पर डालना (मालिक की इजाजत/अनुमति से)

30.

निचली अदालतों के जजों में भ्रष्‍टाचार 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों  द्वारा हस्‍ताक्षर

3. जूरी प्रणाली(सिस्टम)

4. प्रजा अधीन – प्रमुख सेशन जज

5. प्रजा अधीन – चार बड़े/वरिष्‍ठ सेशन जज

6. लिखित परीक्षा द्वारा भर्ती (कोई साक्षात्‍कार/इंटरव्‍यू नहीं)

31.

बड़े/वरिष्‍ठ (जिला पुलिस कमिश्नर अथवा उससे उपर) पुलिसकर्मिंयों में भ्रष्‍टाचार 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों  द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – मुख्‍यमंत्री

4. प्रजा अधीन – गृह मंत्री

5. प्रजा अधीन – जिला पुलिस कमिश्नर/आयुक्‍त

6. प्रजा अधीन – पुलिस महानिरीक्षक(तहकीकात सम्बन्धी उच्च पद का अधिकारी)

7. (नागरिकों के) बहुमत के मतदान द्वारा जेल, फांसी

32.

कनिष्‍ठ/निचले अधिकारियों में भ्रष्‍टाचार 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – (विभिन्‍न बड़े/वरिष्‍ठ/सीनियर अधिकारीगण)

4. कनिष्‍ठ/जूनियर/छोटे अधिकारियों पर जूरी प्रणाली(सिस्टम)

33.

भारतीय रिजर्व बैंक के अधिकारियों/विशेषज्ञों (एक्सपर्ट / कुशल व्यक्ति) में भ्रष्‍टाचार 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों  द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर

4. भारतीय रिजर्व बैंक के स्‍टॉफ पर जूरी प्रणाली(सिस्टम)

5. नागरिकों की रूपया प्रणाली(सिस्टम) : रूपया केवल नागरिकों के अनुमोदन/स्वीकृति से ही छापा जाएगा

6. (नागरिकों के) बहुमत के मतदान द्वारा जेल, फांसी

34.

बैंक के अधिकारियों में भ्रष्‍टाचार 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – भारतीय स्‍टेट बैंक के अध्‍यक्ष

4. सभी राष्ट्रिय बैंकों का भारतीय स्‍टेट बैंक में विलय

5. बैंक स्‍टॉफ/कर्मचारियों पर जूरी प्रणाली(सिस्टम)

35.

राष्ट्रिय धंधे/उद्योगों (पी.एस.यु) के निदेशकों (डाइरेक्टर) / प्रबंधकों में भ्रष्‍टाचार 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – प्रधानमंत्री

4. प्रजा अधीन – मुख्‍य मंत्री

5. प्रजा अधीन – राष्ट्रिय धंधे/उद्योगों (पी.एस.यु) (सार्वजनिक क्षेत्र की उपक्रमों) के (प्रभारी) मंत्री

6. प्रजा अधीन – राष्ट्रिय धंधे/उद्योगों (पी.एस.यु) (सार्वजनिक क्षेत्र) के महत्‍वपूर्ण अध्‍यक्ष जैसे हिन्‍दुस्‍तान पेट्रोलियम निगम लिमिटेड(एच.पी.एन.एल) के अध्‍यक्ष आदि

7. राष्ट्रिय धंधे/उद्योगों (पी.एस.यु) (सार्वजनिक क्षेत्र) के स्‍टॉफ पर जूरी प्रणाली(सिस्टम)

36.

समाचारपत्र मालिकों, टेलिविजन चैनल मालिकों द्वारा ब्‍लैकमेल करना (धमकी द्वारा रुपया लेना) 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – राष्‍ट्रीय समाचारपत्र संपादक

4. प्रजा अधीन – राज्‍य समाचारपत्र संपादक

5. प्रजा अधीन – जिला समाचारपत्र संपादक

6. प्रजा अधीन – दूरदर्शन अध्‍यक्ष

7. प्रजा अधीन – राज्‍य टेलिविजन चैनल अध्‍यक्ष

8. प्रजा अधीन – जिला टेलिविजन चैनल अध्‍यक्ष

9. (नागरिकों के) बहुमत के मतदान द्वारा जेल, फांसी

37.

सांसदों, विधायकों आदि में भ्रष्‍टाचार 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों  द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – सांसद

4. प्रजा अधीन – विधायक

38.

आयकर, उत्‍पाद शुल्‍क, सीमाशुल्क आदि के अधिकारियों द्वारा भ्रष्‍टाचार 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – राष्‍ट्रीय वित्‍त मंत्री

4. प्रजा अधीन – राज्‍य वित्‍त मंत्री

5. प्रजा अधीन – राष्‍ट्रीय प्रत्‍यक्ष-कर(खुला टैक्स) बोर्ड के अध्‍यक्ष

6. प्रजा अधीन – राष्‍ट्रीय अप्रत्‍यक्ष-कर(छुपा हुआ टैक्स) बोर्ड के अध्‍यक्ष

7. कर विभाग के स्‍टॉफ पर जूरी प्रणाली(सिस्टम)

8. उत्‍पादन शुल्‍क/आबकारी घटाना

9. वैट, बिक्री कर, जी.एस.टी., ऑक्‍ट्राय रद्द/समाप्‍त करना

10. सीमा शुल्‍क संग्रहण का 33 प्रतिशत नागरिकों को देना

11. (नागरिकों के) बहुमत के मतदान द्वारा जेल, फांसी

39.

हाई कोर्ट के जजों में भ्रष्‍टाचार 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – हाई कोर्ट के प्रधान जज/मुख्‍य न्‍यायाधीश

4. प्रजा अधीन – हाई कोर्ट के चार बड़े/सीनियर जज

5. केवल वरीयता (सूची) के अनुसार पदोन्‍नति, कोई इंटरवियू/साक्षात्‍कार नहीं

6. हाई कोर्ट में जूरी प्रणाली(सिस्टम)

7. (नागरिकों के) बहुमत के मतदान द्वारा जेल, फांसी

40.

सुप्रीम कोर्ट के जजों में भ्रष्‍टाचार 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्‍टिस/मुख्‍य न्‍यायाधीश

4. प्रजा अधीन – सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्‍ठ/सीनियर जज

5. केवल वरीयता (सूची) के अनुसार पदोन्‍नति, कोई इंटरवियू/साक्षात्‍कार नहीं

6. सुप्रीम कोर्ट में जूरी प्रणाली(सिस्टम)

7. (नागरिकों के) बहुमत के मतदान द्वारा जेल, फांसी

41.

भ्रष्‍टाचार/सांठ-गाँठ (मिली-भगत) के अन्‍य मामले 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – विभिन्‍न विभागों के प्रमुख

4. जूरी प्रणाली(सिस्टम)

42.

पुलिसकर्मियों की अकुशलता (निकम्मा होना) 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – राष्‍ट्रीय गृह मंत्री

4. प्रजा अधीन – राज्‍य गृह मंत्री

5. प्रजा अधीन – केन्‍द्रीय जांच ब्‍यूरो/सी.बी.आई. निदेशक

6. प्रजा अधीन – पुलिस कमिश्नर/आयुक्‍त

7. राष्‍ट्रीय पहचान पत्र प्रणाली(सिस्टम)

8. नागरिकों के अनुमोदन/स्वीकृति से, उनके आपराधिक रिकॉर्ड इंटरनेट पर डाले जाएंगे

9. पुलिसकर्मियों पर जूरी प्रणाली(सिस्टम)

43.

राशन(सिविल आपूर्ति) अधिकारी की अकुशलता (निकम्मा होना) 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – जिला राशन(आपूर्ति) अधिकारी

4. नागरिकों को अपने राशन कार्ड की दुकान बदलने का अधिकार

44.

निचली अदालतों में जजों की अकुशलता (निकम्मा होना) 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों द्वारा हस्‍ताक्षर

3. 1,00,000 नए कोर्ट बनाना/स्‍थापित करना

4. जूरी प्रणाली(सिस्टम)

5. राष्‍ट्रीय पहचान-पत्र प्रणाली(सिस्टम)

6. (जिले के 51 %) नागरिकों के अनुमोदन/स्वीकृति से, उनके आपराधिक रिकॉर्ड इंटरनेट पर डाले जाएंगे

45.

अन्‍य अधिकारियों की अकुशलता (निकम्मा होना) 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों द्वारा हस्‍ताक्षर

3. जूरी प्रणाली(सिस्टम)

46.

सांसद, विधायक, मंत्रियों की अकुशलता (निकम्मा होना) 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – सांसद

4. प्रजा अधीन – विधायक

5. प्रजा अधीन – मंत्री

47.

हाई कोर्ट में जजों की अकुशलता (निकम्मा होना) 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – हाई कोर्ट के प्रधान जज/मुख्‍य न्‍यायाधीश

48.

सुप्रीम कोर्ट में जजों की अकुशलता (निकम्मा होना) 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – सुप्रीम कोर्ट के प्रधान जज/मुख्‍य न्‍यायाधीश

49.

भारतीय रिजर्व बैंक के डाइरेक्टर (निदेशकों) / अधिकारियों की अकुशलता (निकम्मा होना) 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – भारतीय रिजर्व बैंक के अध्‍यक्ष

50.

कनिष्‍ठ / जूनियर  /छोटे स्‍टॉफ की अकुशलता (निकम्मा होना) 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों द्वारा हस्‍ताक्षर

3. जूरी प्रणाली(सिस्टम)

बैंकिग, वित्त में समस्‍याएं

51.

नागरिकों की इजाजत/अनुमति के बिना पैसे/रूपए की सप्लाई में बढौतरी(आपूर्ति में वृद्धि) करना 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – रिजर्व बैंक के अध्‍यक्ष

4. नागरिकों की रूपया प्रणाली(सिस्टम) : रूपया केवल नागरिकों के अनुमोदन/स्वीकृति से ही छापा जाएगा

5. (नागरिकों के) बहुमत के मतदान द्वारा जेल, फांसी

52.

नागरिकों की इजाजत/अनुमति के बिना राष्‍ट्र पर ऋण/कर्ज बढाना 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – वित्त मंत्री

4. प्रजा अधीन – रिजर्व बैंक के अध्‍यक्ष

53.

नागरिकों की इजाजत/अनुमति के बिना सरकार द्वारा गारंटी दिया जाना 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – वित्त मंत्री

4. प्रजा अधीन – रिजर्व बैंक के अध्‍यक्ष

54.

बैंक में अंदर के लोगों को कर्ज जारी करना 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – रिजर्व बैंक के अध्‍यक्ष

4. नागरिकों की रूपया प्रणाली(सिस्टम) : रूपया केवल नागरिकों के अनुमोदन/स्वीकृति से ही छापा जाएगा

55.

स्‍टॉक बाजार में अंदर के लोगों द्वारा व्‍यापार/ट्रेडिंग 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – रिजर्व बैंक के अध्‍यक्ष

4. नागरिकों की रूपया प्रणाली(सिस्टम) : रूपया केवल नागरिकों के अनुमोदन/स्वीकृति से ही छापा जाएगा

 बुनियादी / आधारभूत सुविधाओं से संबंधित समस्‍याएं

56.

कमजोर / घटिया दूरसंचार (टेलीफोन लाइन) 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – संचार मंत्री

4. प्रजा अधीन – ट्राई (टेलीफ़ोन प्रबंध करने वाला)  के अध्‍यक्ष

5. बाहर से माल मंगाने(आयात) पर 300 प्रतिशत सीमा शुल्‍क

57.

घटिया सड़कें, सबसे बेकार / खराब फूटपाथ / रेहड़ी 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – मेयर/महापौर

4. प्रजा अधीन – नगर निगम कमिश्नर

5. नगर इंजिनियरिंग कर्मचारियों/स्‍टॉफ पर जूरी प्रणाली(सिस्टम)

58.

घटिया ट्रैफिक /यातायात प्रणाली (सिस्टम) 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – मेयर/महापौर

4. प्रजा अधीन – नगर निगम कमिश्नर/आयुक्‍त

5. प्रजा अधीन – जिला पुलिस कमिश्नर

6. प्रजा अधीन – नगर बस प्रणाली(सिस्टम) अध्‍यक्ष

7. यातायात/ट्रैफिक पुलिस पर जूरी प्रणाली(सिस्टम)

59.

कमजोर/घटिया  रेलवे 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – रेल मंत्री

4. टिकट के मूल्‍य में वृद्धि (प्रति व्‍यक्‍ति प्रति वर्ष 5 सस्‍ते टिकट)

60.

महंगी टेलिविजन-केबल, डी.टी.एच. सेवाएं 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – संचार मंत्री(संदेश, समाचार आदि तथा आदमी सामान आदि भेजने की क्रिया और साधन;संपर्क)

61.

बिजली : महंगी, अनियमित/बेकार सप्‍लाई 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – राष्‍ट्रीय बिजली/विद्युत मंत्री

4. प्रजा अधीन – राज्‍य बिजली/विद्युत मंत्री

5. प्रजा अधीन – सुप्रीम कोर्ट के जज

6. प्रजा अधीन – हाई कोर्ट के जज

7. प्रजा अधीन – बिजली/विद्युत मंत्री

8. बिजली पर राशन प्रणाली(सिस्टम)

62.

बेकार/घटिया सिंचाई 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – राज्‍य सिंचाई मंत्री

4. जल/पानी पर राशन(समान/बराबर भत्‍ता) प्रणाली(सिस्टम)

63.

गलत नगर योजना 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – मेयर/महापौर

4. प्रजा अधीन – नगर निगम कमिश्नर/आयुक्‍त

पर्यावरण से संबंधित समस्‍याएं

64.

गंदी सड़कें 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – मेयर/महापौर

4. प्रजा अधीन – नगर निगम कमिश्नर/आयुक्‍त

65.

प्रदूषित हवा/वायु 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – अध्‍यक्ष, प्रदूषण रोक/नियंत्रण बोर्ड

4. पर्यावरण इजाजत/अनुमति किसी विकास योजना के लिए कम से कम उन जिलों के 75 % की अनुमोदन/स्वीकृति द्वारा

66.

प्रदूषित जल/पानी 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – अध्‍यक्ष, प्रदूषण रोक/नियंत्रण बोर्ड

4. पर्यावरण इजाजत/अनुमति किसी विकास योजना के लिए कम से कम उन जिलों के 75 % की अनुमोदन/स्वीकृति द्वारा

67.

भूजल का दोहन/घटता जलस्‍तर 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – जल गार्ड(चौकीदार)

4.  वर्षा जल संग्रहण (इकठ्ठा करना)

5. भूजल पर राशन(समान भत्ता) प्रणाली(सिस्टम)

68.

जंगल/वन और वन्‍य जीवों/पशुओं का घटना /कम होना 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – जल गार्ड(चौकीदार)

4. वृक्षारोपण को बढ़ावा देना व स्थायी, प्राकृतिक वन लगाना|

69.

समुद्र में प्रदूषण (तेल रिसाव) 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – प्रदूषण नियंत्रण मंत्री

4.  पर्यावरण इजाजत/अनुमति किसी विकास योजना के लिए कम से कम उन जिलों के 75 % की अनुमोदन/स्वीकृति द्वारा

70.

पर्यावरण संबंधी अन्‍य समस्‍याएं 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – प्रदूषण नियंत्रण मंत्री

4. पर्यावरण इजाजत/अनुमति किसी विकास योजना के लिए कम से कम उन जिलों के 75 % की अनुमोदन/स्वीकृति द्वारा

कर / टैक्स वसूली (कराधान) में समस्‍या

71.

अस्पष्ट(क्लीयर नहीं) टैक्‍स/कर कानून 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – वित्त मंत्री

4. प्रजा अधीन – अध्‍यक्ष, कर/टैक्स बोर्ड(संस्था)

72.

आय-कर की चोरी 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – वित्त मंत्री

4. प्रजा अधीन – अध्‍यक्ष, कर बोर्ड(टैक्स समिति)

5. प्रजा अधीन – सुप्रीम कोर्ट के जज

6. प्रजा अधीन – हाई कोर्ट के जज

7. कर/टैक्स वसूली(कराधन) के मामले/मुकद्दमें में जूरी प्रणाली(सिस्टम)

73.

बिक्री-कर/टैक्स की चोरी 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. बिक्री-कर/टैक्स को रद्द/समाप्‍त करना

74.

उत्पादन शुल्‍क की चोरी 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – वित्त मंत्री

4. प्रजा अधीन – अध्‍यक्ष, उत्‍पादन बोर्ड(समिति)

5. अधिकांश सामानों पर उत्‍पादन शुल्‍क रद्द/समाप्‍त करना

6. अन्‍य सामानों पर उत्‍पादन शुल्‍क घटाना/कम करना

6. प्रजा अधीन – सुप्रीम कोर्ट के जज

6. प्रजा अधीन – हाई कोर्ट के जज

7. उत्‍पादन शुल्‍क (वसूली) के मामले/मुकद्दमें में जूरी प्रणाली(सिस्टम)

75.

संपत्ति-कर/टैक्स की चोरी 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. सम्‍पत्‍ति-कर/टैक्स कानून

4. भूमि(जमीन) रिकॉर्ड के लिए टॉरेन्‍स प्रणाली(सिस्टम)

5. प्रजा अधीन – सुप्रीम कोर्ट के जज

6. प्रजा अधीन – हाई कोर्ट के जज

7. सम्‍पत्‍ति–कर/टैक्स के मामले/मुकद्दमें में जूरी प्रणाली(सिस्टम)

76.

चुंगी टैक्स (ऑक्‍ट्रॉय) की चोरी 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. चुंगी टैक्स(ऑक्‍ट्राय) समाप्‍त करना/हटाना

77.

अन्‍य करों की चोरी 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – वित्त मंत्री

4. प्रजा अधीन – अध्‍यक्ष, कर बोर्ड(टैक्स समीति)

5. प्रजा अधीन – सुप्रीम कोर्ट के जज

6. प्रजा अधीन – हाई कोर्ट के जज

7. कर/टैक्स के मामले/मुकद्दमें में जूरी प्रणाली(सिस्टम)

78.

किसानों पर कर/टैक्‍स न लगाना 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3 किसानों को (कर/टैक्स से) अधिक छूट ,परिवार के प्रति सदस्‍य को 1,00,000 रूपए अधिक छूट ; सभी कर वसूली समान रूप से (वो ही स्लैब रहेंगे)

सरकारी खर्च से संबंधित समस्‍याएं

79.

बढ़ते सरकारी खर्चे 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – मंत्रीगण

4. प्रजा अधीन – विभाग/डिपार्टमेंट अध्यक्ष

5. सभी खर्चों का खुलासा/इसकी घोषणा

6. खर्चों पर जूरी प्रणाली(सिस्टम)

80.

अलाभकारी (नुक्सान उठाने वाली) राष्ट्रिय धंधे/उद्योगों (पी.एस.यु) (सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम) 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – राष्ट्रिय धंधे/उद्योगों (पी.एस.यु) (सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम) के (अगुवाई/नेतृत्‍व करने वाले) मंत्रीगण

4. प्रजा अधीन – राष्ट्रिय धंधे/उद्योगों (पी.एस.यु) (सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम) के अध्‍यक्ष

81.

बढ़ती अलाभकारी (नुक्सान उठाने वाली) सम्‍पत्तियां 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर

4. नागरिकों की रूपया प्रणाली(सिस्टम) : रूपया केवल नागरिकों के अनुमोदन/स्वीकृति से ही छापा जाएगा

बाहरी / वाह्य व्‍यापार से संबंधित / जुड़ी समस्‍याएं

82.

रूपए का अवमूल्‍यन 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर

4. नागरिकों की रूपया प्रणाली(सिस्टम) : रूपया केवल नागरिकों के अनुमोदन/स्वीकृति से ही छापा जाएगा

83.

बढ़ता विदेशी /बाहरी कर्ज 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. भारत सरकार के कर्ज पर निषेध/मनाही

84.

बाहर के देश से माल मंगाना (आयात) और बहार के देश को माल भेजना (निर्यात) में बढ़ता अंतर 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. 300 प्रतिशत सीमा शुल्‍क

4. सीमा शुल्‍क संग्रहण का 33 प्रतिशत नागरिकों को देना

5. ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.)’– श्रमिकों/मजदूरों के लिए स्‍थिर/लगातार मासिक आय

6. मजदूरी (की दर) बढ़ाकर श्रमिकों/मजदूरों के लिए जरूरी/अनिवार्य बचत (खाता)

7. मजदूर को आसानी से रखने और निकालने (हायर-फायर) सम्बन्धी कानून

8. प्रदूषण कानून (के अधिकार) कम करके इसे 1930 के अमेरिका (यू.एस.) के स्‍तर पर लाना

9. सर्वजन भविष्‍य निधि(सर्वजन प्रोविडेंट फंड) योजना

10. मालिक की भविष्‍य निधि (प्रोविडेंट फंड) योजना हटाना/समाप्‍त करना

11. अधिकांश सामानों पर उत्‍पादन शुल्‍क हटाना/समाप्‍त करना

सेना से संबंधित / जुड़ी समस्‍याएं

85.

कमजोर रक्षा सेनाएं 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – प्रधानमंत्री

4. प्रजा अधीन – रक्षा मंत्री

5. ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.)’

6. सम्‍पत्‍ति-कर, विरासत-कर

7. आयकर में सुधार करना

8. 300 प्रतिशत सीमा शुल्‍क

9. सीमा शुल्‍क वसूली(संग्रहण) का 33 प्रतिशत नागरिकों को देना

10. ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.)’– श्रमिकों/मजदूरों के लिए स्‍थिर/लगातार मासिक आय

11. मजदूरी (की दर) बढ़ाकर श्रमिकों/मजदूरों के लिए अनिवार्य बचत (खाता)

12. मजदूर को आसानी से रखने और निकालने (हायर-फायर) सम्बन्धी कानून

13. प्रदूषण कानून (के अधिकार) कम करके इसे 1930 के अमेरिका(यू.एस.) के स्‍तर पर लाना

14. सर्वजन भविष्‍य निधि(सर्वजन प्रोविडेंट फंड) योजना

15. मालिक की भविष्‍य निधि (प्रोविडेंट फंड) योजना हटाना/समाप्‍त करना

16. क्षेत्रीय/जोनल प्रतिबंध/रोक को कम करना

17. 20,00,000 और सैनिकों को काम पर रखना

18. हथियार निर्माण/बनाने के लिए 20,00,000 इंजिनियरों आदि को काम पर रखना

19. कक्षा 8 के बाद सैनिक प्रशिक्षण को जरूरी/अनिवार्य बनाना

86.

सेना में भ्रष्‍टाचार 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – प्रधानमंत्री

4. प्रजा अधीन – रक्षा मंत्री

5. जूरी प्रणाली(सिस्टम)

87.

सैनिकों की नाकाफी / अपर्याप्‍त संख्‍या, सैनिकों को कम वेतन 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – प्रधानमंत्री

4. ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.)’

5. सम्‍पत्‍ति-कर, विरासत-कर

6. आयकर में सुधार करना

7. सैनिकों का वेतन बढ़ाना

8. 20,00,000 और सैनिकों को काम पर रखना

88.

हथियार निर्माण की बुरी हालत/घटिया स्‍तर 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – प्रधानमंत्री

4. प्रजा अधीन – रक्षा मंत्री

5. ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.)’

6. सम्‍पत्‍ति-कर, विरासत-कर

7. आयकर में सुधार करना

8. 300 प्रतिशत सीमा शुल्‍क

9. सीमा शुल्‍क वसूली(संग्रहण) का 33 प्रतिशत नागरिकों को देना

10. ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.)’– श्रमिकों/मजदूरों के लिए स्‍थिर/लगातार मासिक आय

11. मजदूरी (की दर) बढ़ाकर श्रमिकों/मजदूरों के लिए जरूरी/अनिवार्य बचत (खाता)

12. आसानी से मजदूरों को रखने और निकालने (हायर-फायर) सम्बन्धी कानून

13. प्रदूषण कानून (के अधिकार) कम करके इसे 1930 के अमेरिका (यू.एस.) के स्‍तर पर लाना

14. सर्वजन भविष्‍य निधि (सर्वजन प्रोविडेंट फंड) योजना

15. मालिक की भविष्‍य निधि (प्रोविडेंट फंड) योजना हटाना/समाप्‍त करना

16. क्षेत्रीय/जोनल प्रतिबंध को कम करना

17. हथियार निर्माण/बनाने के लिए 20,00,000 इंजिनियरों आदि को काम पर रखना

18. कक्षा 8 के बाद सैनिक प्रशिक्षण को अनिवार्य बनाना

जाति / प्रजाति की समस्‍याएं

89.

जाति (आधारित) आरक्षण में कमी लाना 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. आरक्षण पर आर्थिक विकल्‍प/चुनाव

4. प्रजा अधीन – सुप्रीम कोर्ट के जज

5. प्रजा अधीन – हाई कोर्ट के जज

6. जातिसूचक टिप्‍पणी, अत्याचार पर जूरी प्रणाली(सिस्टम)

90.

जातिवाद के कारण तनाव 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3 ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.)’

4. आरक्षण पर आर्थिक विकल्‍प/चुनाव

5. प्रजा अधीन – सुप्रीम कोर्ट के जज

6. प्रजा अधीन – हाई कोर्ट के जज

7. प्रजा अधीन – जिला पुलिस कमिश्नर

8. जातिसूचक टिप्‍पणी, अत्याचार पर जूरी प्रणाली(सिस्टम)

91.

दलितों का अत्याचार 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – सुप्रीम कोर्ट के जज

4.. प्रजा अधीन – हाई कोर्ट के जज

5. प्रजा अधीन – जिला पुलिस कमिश्नर

6. प्रजा अधीन – दलित अत्याचार रोकने के लिए संगठन(उत्‍पीड़न निवारण आयोग) के अध्‍यक्ष

7.  जातिसूचक टिप्‍पणी, अत्याचार पर जूरी प्रणाली(सिस्टम)

92.

राम जन्‍मभूमि 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. राष्‍ट्रीय हिन्‍दू ट्रस्‍ट(संगठन) को प्‍लॉट (पर कब्‍जा) देने के लिए कानून

93.

हिन्‍दू-मुस्‍लिम तनाव 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – प्रधानमंत्री

4. प्रजा अधीन – मुख्‍यमंत्री

5. प्रजा अधीन – सुप्रीम कोर्ट के प्रधान(मुख्‍य) जज

6. प्रजा अधीन – हाई कोर्ट के प्रधान जज

7. प्रजा अधीन – जिला पुलिस कमिश्नर

8. प्रजा अधीन – दलित अत्याचार रोकने के लिए संगठन(उत्‍पीड़न निवारण आयोग) के अध्‍यक्ष

9.  जातिसूचक टिप्‍पणी, अत्याचार पर जूरी प्रणाली(सिस्टम)

94.

कश्‍मीर में अलगाववादी आन्‍दोलन 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर/साईन

3. प्रजा अधीन – प्रधानमंत्री

4. धारा 370 समाप्‍त करने/हटाने के लिए जम्‍मू-कश्‍मीर के विधायकों को विधान पारित करने के लिए मजबूर करना

5. जम्‍मू-कश्‍मीर का हिमाचल प्रदेश, उत्‍तराखंड़ में मिला देना (विलय करना)

95.

असम में अलगाववादी आन्‍दोलन 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.)’

4. प्रजा अधीन – प्रधानमंत्री

5. राष्‍ट्रीय पहचान पत्र प्रणाली(सिस्टम)

6. बांग्‍लादेशियों की पहचान करके उन्‍हें (देश से) निकाल बाहर करने के लिए रिश्‍तेदारों/संबंधियों (बंधु-बांधव) की रेजिस्ट्री प्रणाली(सिस्टम) का बनाना(निर्माण करना)

96.

मणिपुर, नागालैण्‍ड, त्रिपुरा, मेघालय में अलगाववादी आन्‍दोलन 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.)’

4. प्रजा अधीन – प्रधानमंत्री

5. राष्‍ट्रीय पहचान पत्र प्रणाली(सिस्टम)

6. बांग्‍लादेशियों की पहचान करके उन्‍हें (देश से) निकाल बाहर करने के लिए रिश्‍तेदारों/संबंधियों (बंधु-बांधव) की पंजीकरण प्रणाली(रेजिस्ट्री सिस्टम) का बनाना(निर्माण करना)

97.

बांग्‍लादेश से गैर-हिन्‍दू घुसपैठ 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव    प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – प्रधानमंत्री

4. राष्‍ट्रीय पहचान पत्र प्रणाली(सिस्टम)

5. बांग्‍लादेशियों की पहचान करके उन्‍हें (देश से) निकाल बाहर करने के लिए रिश्‍तेदारों/संबंधियों (बंधु-बांधव) की पंजीकरण प्रणाली(रेजिस्ट्री सिस्टम) का बनाना(निर्माण करना)

98.

बांग्‍लादेश, पाकिस्‍तान, फिजी आदि में हिन्‍दुओं पर अत्‍याचार 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – प्रधानमंत्री

4. बांग्‍लादेश, पाकिस्‍तान आदि में रह रहे हिन्‍दूओं को अगले/आने वाले 10 वर्षों के लिए भारत में प्रवेश का अधिकार देने के लिए कानून बनाना

नागरिक(सिविल) समस्‍याएं

99.

तलाक की धीमी और थकाने वाला प्रक्रियाएं/कार्यवाही 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों द्वारा हस्‍ताक्षर

3. पारिवारिक झगड़े/वाद-विवाद पर जूरी प्रणाली(सिस्टम)

4. महिलाओं के लिए (चाहने पर) त्‍वरित/तुरंत तलाक  की व्‍यवस्‍था

5. डी.वी.ए. रद्द/समाप्‍त करना

6. 498 ए समाप्‍त/रद्द करना

100.

किराया, पट्टा आदि से जुड़े मुकद्दमों पर घीमी कार्यवाही 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों  द्वारा हस्‍ताक्षर

3. किराया से संबंधित सभी समझौते  के बताये हुए/निश्चित मानदण्ड/स्टैण्डर्ड/मानकों वाली रेजिस्ट्री करवाने के लिए कानून (विशिष्ट वस्तुओं के आकार, प्रकार महत्त्व आदि जाँचने का कोई आधिकारिक आदर्श, मानदंड या रूप। (स्टैन्डर्ड))

4. किराया संबंधी झगडों/विवादों पर जूरी प्रणाली(सिस्टम)

101.

अमानवीय/बेदर्द/कठोर स्‍थिति पैदा किए बिना कर्ज वसूली में सुधार 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – प्रधानमंत्री

4. प्रजा अधीन – मुख्‍यमंत्री

5. प्रजा अधीन – सुप्रीम कोर्ट के मुख्‍य जज

6. प्रजा अधीन – हाई कोर्ट के मुख्‍य जज

7. सभी ऋणों/कर्जों का पंजीकरण

8. कर्ज/ऋण पर जूरी प्रणाली(सिस्टम)

9. कर्ज माफियाओं पर जूरी प्रणाली(सिस्टम)

102.

धर्मार्थ संगठन (जरूरतमंद लोगों के लिए  संस्था )

, धार्मिक/गैर-धार्मिक न्‍यास / ट्रस्‍ट का बिगड़ता स्‍वभाव / स्थिति

1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – सुप्रीम कोर्ट के प्रधान(मुख्‍य) जज

4. प्रजा अधीन – हाई कोर्ट के प्रधान जज

5. प्रजा अधीन – चैरिटी कमिश्‍नर/ दान आयुक्‍त

6. धर्मार्थ (संस्‍थाओं) (जरूरतमंद लोगों के लिए  संस्था )

पर जूरी प्रणाली(सिस्टम)

103.

कोआपरेटिव सोसाईटियों (सहायक / सहकारी समितियां) (साझे की पूंजी का कारोबार) का बिगड़ता स्‍वभाव/स्थिति 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव  प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – सुप्रीम कोर्ट के प्रधान(मुख्‍य) जज

4. प्रजा अधीन – हाई कोर्ट के प्रधान जज

5. प्रजा अधीन – कोआपरेटिव/सहकारी सोसाईटियों के रजिस्‍ट्रार/पंजीयक

6. प्रजा अधीन – पुलिस कमिश्‍नर

7. प्रजा अधीन – सहकारी/कोआपरेटिव सोसाईटियों के अध्‍यक्ष, (कोआपरेटिव/सहकारी सोसाईटियों के भीतर)

8. धर्मार्थ (संस्‍थाओं) पर जूरी प्रणाली(सिस्टम)

104.

मजदूर यूनियन/ सरकारी कर्मचारियों की यूनियन आदि की खराब होती स्‍थिति 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – सुप्रीम कोर्ट के प्रधान(मुख्‍य) जज

4. प्रजा अधीन – हाई कोर्ट के प्रधान जज

5. प्रजा अधीन –श्रम/लेबर मंत्री

6. प्रजा अधीन – लेबर कमिश्नर/आयुक्‍त

7. प्रजा अधीन – लेबर कोर्ट/श्रम कोर्ट के जज

8. `नारिकों और सेना के लिए खनिज रोयल्टी (आमदनी)`(एम आर सी एम) – श्रमिकों/मजदूरों के लिए स्थायी आमदनी

9. अधिक वेतन वाले मजदूरों के लिए जरूरी बचत (खाता)

10. आसानी से मजदूर को रखने और निकालने (हायर-फायर) सम्बंधित  श्रमिक/लेबर कानून

11. मजदूरी/श्रम संबंधी विवादों पर जूरी प्रणाली(सिस्टम)

 

 

 

105.

कंपनी मामले के प्रशासन की बिगड़ती हालत 1. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ के लिए आंदोलन

2. ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ पर प्रधानमंत्री व मुख्‍यमंत्रियों        द्वारा हस्‍ताक्षर

3. प्रजा अधीन – सुप्रीम कोर्ट के प्रधान(मुख्‍य) जज

4. प्रजा अधीन – हाई कोर्ट के प्रधान जज

5. प्रजा अधीन – कंपनी मामलों के मंत्री

6. प्रजा अधीन – कंपनियों के रजिस्‍ट्रार/पंजीयक

0227. हर नागरिक का कर्त्तव्य — `जनसेवक को मेसेज-आदेश` प्रचार तरीका

0. पूरे लेख का सारांश

संविधान के उद्देश्यिका (भूमिका) के अनुसार, नागरिकों का संवैधानिक कर्तव्य है अपने जनसेवकों को आदेश देना |

हमें कोई आपत्ति नहीं कि आप कौन से नेता या पार्टी का समर्थन करते हैं या विरोध या विरोध करने का कौन सा तरीका अपनाते हैं | लेकिन, केवल एक लाउड-स्पीकर लगा कर अपने प्रिय नेता या पार्टी की जय-जयकार करने या सोशियल मीडिया पर, ऑनलाइन अपने प्रिय नेता की जय-जयकार करना, आपके प्रिय नेता को इस देश के प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनाने या आपकी प्रिय पार्टी को सत्ता में लाने के लिए अपर्याप्त है | क्यूंकि केवल हमारे सासदों, विधायकों, आदि जनसेवकों के पास अधिकार है कि किसी को प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बना सकते हैं या किसी पार्टी को सत्ता में ला सकते हैं या भारतीय राजपत्र में समाधान-ड्राफ्ट को राजपत्र में छपवा सकते हैं |

और केवल किसी नेता या पार्टी के लिए नारेबाजी करने से ये भी सिद्ध नहीं होता है कि आप वास्तव में उस नेता/पार्टी के समर्थक हैं | यदि आप वास्तव में अपने प्रिय नेता/पार्टी का समर्थन करना चाहते हैं या कोई समाधान-ड्राफ्ट को लागू करवाना चाहते हैं, तो आपको अपने सांसद, विधायक आदि, जनसेवकों को जरुरी मेसेज-आदेश भी देने चाहिए (अपने विरोध/समर्थन के तरीकों के साथ) कि आपके प्रिय नेता को देश का प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनाने के लिए तुरंत प्रस्ताव शुरू करवाएं संसद या विधानसभा में या आपके प्रिय पार्टी को बढ़ावा करे | और भेजे गए मेसेज-आदेश अधिक से अधिक जनता को बताएं फेसबुक वाल-नोट, ब्लॉग, पर्चे, गूगल डोक आदि द्वारा, ताकि जनता को प्रमाण मिले और दूसरों को भी ऐसा करने की प्रेरणा मिले | `जनसेवक को मेसेज-आदेश` भेजने के लिए और भेजे गए मेसेज-आदेश जनता को दिखाने के लिए, आपके समय के केवल 5-10 मिनट ही लगेंगे |

हमारे सासदों, विधायकों, आदि जनसेवकों के पास ही अधिकार है कि भारतीय राजपत्र में समाधान-ड्राफ्ट को छपवाएं, कानून बनाएँ और प्रक्रिया-ड्राफ्ट पर वोट करें | तो, जब तक हम आम-नागरिक अपने जनसेवकों को एक प्रामाणिक रूप से नहीं बताते कि हमें उनसे वास्तव में क्या चाहिए और क्या नहीं, तब तक जनसेवकों और दूसरे नागरिकों को कैसे पता चलेगा ? उदाहरण, यदि आप चाहते हैं कि आपके सांसद, प्रधानमंत्री एफ.डी.आई. (विदेशी प्रत्यक्ष निवेश) के लिए अनुमति नहीं दें, तो उन्हें कैसे पता चलेगा ? क्या आपने अपने सांसद को मेसेज-आदेश भेजा कि वो एफ.डी.आई. के लिए अनुमुती नहीं दे ? यदि नहीं, तो ये आपका दोष है कि आपने अपने सांसद को मेसेज-आदेश नहीं भेजा कि आपको एफ.डी.आई. नहीं चाहिए | इसलिए, अपने जनसेवकों को मेसेज-आदेश भेजना हमको एक जिम्मेदार नागरिक बनाता है |

इस तरह, हमको अपना संवैधानिक कर्तव्य निभाना चाहिए | क्यूँ हमें 5 साल तक इन्तेजार करना चाहिए ?  हम क्यूँ पांच साल के लिए सोयें या 5 साल के लिए रोयें और पांच साल में केवल एक ही दिन जागृत रहें ? ऐसा करना कोई लोकतंत्र नहीं है | और यदि कोई जनसेवक हजारों नागरिकों की नहीं सुनता है, तो कृपया उसकी प्रमाण सहित पोल खोलें और उसको किसी भी दिन बदल सकें ऐसे `जनसेवक को मेसेज-आदेश` का सिस्टम का प्रयोग करें, ना कि हम उस बुरे जनसेवक को 5 साल बर्दाश्त करें |

एक और झूठ जो सुब्रमनियम, मोदी, केजरीवाल और दूसरे नेता, कार्यकर्ताओं और आम-नागरिकों को बोलते हैं – `अपने पसंद के नेता और पार्टी को बहुमत से चुना कर जितवाओ और हम सभी अच्छे कानून बनायेंगे` ये पूरी तरह से असंभव है | क्यों ? मान लीजिए, किसी तरह एक पार्टी को लोकसभा में बहुमत भी मिल जाती है, लेकिन उसको 5-10 साल या ज्यादा चाहिए राज्यसभा में बहुमत पाने के लिए और कानूनों को पारित करने के लिए | यदि ये भी किसी तरह संभव हो गया कि कोई कानून दोनों सदनों में पारित हो गया, तो विदेशी कम्पनियाँ सुप्रीम-कोर्ट में अपने एजेंट जजों द्वारा उस कानून को रद्द करवा सकती हैं | इसीलिए केवल कुछ गिने-चुने लोग ही शक्तिशाली विदेशी कंपनियों का सामना नहीं कर सकते क्योंकि आज विदेशी कंपनियों का अधिकतर मीडिया और न्यायपालिका पर प्रभाव है |

अकेले, बिना किसी समूह में, प्रभावशाली तरीकों का उपयोग करके महीने में 15-20 घंटे काम करने वाले, केवल 2-4 लाख कार्यकर्ता और कुछ करोड़ आम-नागरिक चाहिए देश के लिए अच्छे कानून-प्रक्रियाओं पर जन-आन्दोलन खड़ा करने के लिए और प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री को मजबूर करने के लिए कि वे इन कानून-ड्राफ्ट को भारतीय राजपत्र में डालें | मैं श्रोताओं से विनती करूँगा कि वे अध्ययन करें कि कैसे बदलाव आये थे असली, सफल, कार्यकर्ता-आधारित, जन-अन्दोलान के द्वारा, जैसे भारतीय नौसेना विद्रोह, 1946 , आपातकाल जन-आन्दोलन, 1977 आदि |

हम चिंतित कार्यकर्ता, इस बात का प्रचार करते हैं कि सभी कार्यकर्ताओं को पहले सभी जनसमूहों द्वारा दिए गए कानून-ड्राफ्ट पढ़कर ही फैसला करना चाहिए कि वो देश में कौन सी व्यवस्था चाहते हैं और तब ही कार्यकर्ताओं को अपने संसद, विधायक या प्रधान मंत्री को वो कानून-ड्राफ्ट सरकारी राजपत्र में छपवाने का आदेश देना चाहिए | नागरिक अपने सांसद को मेसेज-आदेश भी भेज सकता है कि संसद में तुरंत प्रस्ताव शुरू किया जाये ताकि उसके प्रिय नेता को प्रधानमंत्री बनाया जाये | फिर, कार्यकर्ताओं को अपने भेजे गए मेसेज-आदेश अपने वाल-नोट, ब्लॉग आदि पर डालना चाहिए (जहाँ पर जनता आसानी से ढूँढ सके और पढ़ सके), ताकि जनता को सबूत मिले और दूसरों भी ऐसा करने की प्रेरणा मिले |

भेजे गए मेसेज-आदेश, डबल नहीं हों या दोहराए नहीं गए हों (मेसेज-आदेश विशिष्ट हों), ये सुनिश्चित करने के लिए, मोबाइल नंबर के हरेक सिम को एक वोटर आई.डी. (पहचान पत्र) के साथ जोड़ा (चिन्हित) जा सकते हैं और बाद में अंगुली के छापों के साथ जोड़ा जा सकता है | जनसेवक का पब्लिक मोबाइल उसके वेबसाइट के साथ जोड़ा जा सकता है ताकि जनता द्वारा भेजे गए सारे मेसेज-आदेश अपने आप जनसेवक के वेबसाइट पर प्रकाशित हों और सभी को दिखें | हर मेसेज-आदेश के साथ भेजने वाले का नाम, उसका पता, मोबाइल नंबर और वोटर आई.डी. होगा | इस तरह, डबल या दोहराए गए मेसेज सॉफ्टवेर द्वारा आसानी से हटाये जा सकते हैं और कोई भी नागरिक आसानी से जनसेवक की वेबसाइट पर प्रकाशित मेसेज-आदेशों की जांच कर सकता है |

जनसेवक का समय नहीं बिगड़े, इसके लिए संक्षिप्त कोड (कूट संकेत) बनाये जा सकते हैं नागरिकों द्वारा या जनसेवकों द्वारा और वे संक्षिप्त कोड जनसेवक की वेबसाइट पर दर्ज किया जायेगा | सॉफ्टवेर समान शोर्ट कोड वाले मेसेज-आदेशों के ऑटोमैटिक समूह बनाएगा (स्वतः वर्गीकरण) | इस प्रकार, जनसेवक को हरेक मेसेज-आदेश पढ़ना नहीं होगा और सभी को जनता की राय प्रामाणिक तरीके से भी पता चलेगी और जनसेवक का समय भी बच जायेगा |

इस प्रक्रिया को पैसों से, गुंडों द्वारा या मीडिया द्वारा प्रभावित नहीं किया जा सके, इसके लिए नागरिकों के पास एक सुरक्षा धारा होगी कि `कोई भी नागरिक अपनी राय कभी भी बदल सकता है और किसी संक्षिप्त कोड के लिए आखरी भेजा गया मेसेज-आदेश ही सिस्टम पर दर्ज होगा` | कोई भी लाखों लोगों को करोड़ों रुपये रोज नहीं दे सकता और ना ही उनको दबाने के लिए हजारों गुंडे हमेशा के लिए रख सकता है |

जिन नागरिकों के पास मोबाइल फोन नहीं हैं, वे पहले से दर्ज संक्षिप्त कोड पर अपनी राय दे सकते हैं, पटवारी (लेखपाल/तलाटी/ग्राम-अधिकारी) के दफ्तर या कोई भी जनसेवक द्वारा उल्लेख किये गए सरकारी दफ्तर जा कर, अपने को वोटर कार्ड, फोटो (महिलाओं के लिए वैकल्पिक) और अंगुली के छाप द्वारा अपनी जांच करवाकर और एक रूपया शुल्क देकर | कृपया इस प्रचार-प्रक्रिया और प्रयोगकर्ता द्वारा भुगतान किये गए सिस्टम की अधिक जानकारी को इस लेख के सैक्शन 2.2 में देखें |

लाखों-करोड़ों आम नागरिकों के सांसद / प्रधानमंत्री को एस-एम-एस द्वारा आदेश दिए जाने पर निम्नलिखित परिणाम होंगे :

(1) इससे मेसेज-आदेश भेजने वाले लोगों की संख्या का एक जांच किये जा सकने वाला (सत्यापनीय) सबूत बनेगा और फिर (2) यह संख्या महात्मा उद्धम सिंह जैसे निडर कार्यकर्ताओं को प्रेरित करेगी के वो प्रधान मंत्री से मिलें और उन्हें राजपत्र (हर महीने या हर सप्ताह छपने वाली सरकारी पत्रिका) में वो कानून डालने को कहें | (3) इससे या तो प्रधान मंत्री जनता के दबाव में आकर वो ड्राफ्ट राजपत्र में छाप देंगे या फिर जनता और महात्मा उद्धम सिंह की विनतियों के कारण वर्त्तमान प्रधानमंत्री या जनता द्वारा लाये गए अगले प्रधान मंत्री उस कानूनी व्यवस्था को सरकारी राजपत्र में छापेंगे |  ज्ञात इतिहास में किसी ने भी अहिंसा-मूर्ति उधम सिंह को कभी भी विरोध नहीं किया था |

और इस तरह, जनता द्वारा पसंद किया गया प्रक्रिया-ड्राफ्ट सरकारी राजपत्र में छाप दी जाएगी या आपके प्रिय नेता प्रधानमंत्री बन जायेंगे |

इस लेख में हमने व्यवस्था परिवर्तन करने के लिए प्रयोग किये गए कुछ तरीकों की तुलना की है और समझाया है कि एस-एम-एस के द्वारा सीधे आदेश देना क्यूँ एक श्रेष्ठ उपाय है दूसरे तरीकों की तुलना में, जैसे धरना-अनशन, पत्र लिखना, नारेबाजी आदि | तथा हमने संभव कारण दिए हैं कि क्यूँ कांग्रेस नेता, अन्ना हजारे, अरविन्द भाई, सुब्रमनियम इत्यादी अपने समर्थकों को एस.एम.एस द्वारा मंत्रियों तथा अन्य जन-सेवकों को मेसेज-आदेश देने से मना कर रहे हैं |

1. आप, जो कि हमारे देश के आम नागरिक हैं, पूर्णतः स्वाधीन और हमारे देश के असली मालिक हैं और यह आपका संवैधानिक कर्त्तव्य है कि आप जनसेवक जैसे प्रधान मंत्री, जज, मुख्य मंत्री, विधान सभा सदस्य इत्यादी को आदेश भेजें |

1.1 हमारे संविधान का प्रियाम्बल / उद्देश्यिका / भूमिका क्या है और किस तरह से वो जनता को सत्ता (स्वाधीनता) देती है, कृपया पढ़ें

प्रियाम्बल या उद्देश्यिका किसी भी दस्तावेज़ का आरंभिक परिचय होता है जिसमें उस दस्तावेज़ का लक्ष्य , उद्देश्य और महत्त्व होता है | कृपया गूगल सर्च पर “भारतीय संविधान की उद्देश्यिका/प्रियाम्बल” ढूँढें | आप पाएंगे कि उसकी शुरुआत ही “हम, भारत के लोग ..” से होती है और इसलिए हम भारत के लोगों का भारत पर संवैधानिक रूप से सम्पूर्ण प्रभुत्व है | संविधान के प्रियाम्बल में लिखा हुआ है कि भारत के नागरिक स्वाधीन/प्रधान हैं और और इस तरह से सशक्त भी हैं कि वो राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, जज तथा बाकि सभी जनसेवक पदों पर बैठे लोगों को आदेश भेज सकते हैं किसी भी ऐसे विषय पर, जिसमें जनता के अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है और शीघ्र हस्तक्षेप की ज़रूरत है | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार हम सभी भारतीय नागरिकों को अपने कर्त्तव्य का पालन करते हुए सभी जनसेवकों जैसे जज, प्रधान मंत्री, सांसद सदस्य, मुख्यमंत्री इत्यादी को आदेश भेजना चाहिए |

1.2 संविधान की उद्देश्यिका और नागरिकों की प्रधानता (प्रभुत्व / सत्ता) का पूरा अर्थ

हम भारत के लोग, भारत को एक [सम्पूर्ण] प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी

पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य] बनाने के लिए, तथा उसके समस्त

नागरिकों को:

सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय,

विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता ,

प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए,

तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता

और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए

दृढ़-संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 इ0 (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हज़ार चेह विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं |

http://en.wikipedia.org/wiki/Preamble_to_the_Constitution_of_India

———————————-उद्देश्यिका समाप्त————————————–

” हम भारत के लोग….. दृढ़-संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 इ0 को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं |” दर्शाता है गणतंत्र में सत्ता हमेशा नागरिक के हाथ में होती है |

यह इस बात पर भी जोर देता है कि भारत का संविधान खुद भारत के लोगों ने अपने लिए बनाया है और यह हमें किसी भी विदेशी ताकत ने नहीं सौंपा |

प्रधानता (प्रभुत्व / सत्ता) का मतलब :  नागरिकों को सर्वोपरी (सबसे मुख्य) अधिकार है कि वो देश के भीतरी तथा बाहरी विषयों में निर्णय लें | कोई भी बहरी शक्ति भारत सरकार या भारत के नागरिकों को आदेश नहीं दे सकता है |

`प्रधानता (स्वाधीनता)` का अर्थ, कहने वाले की मानसिकता और उसकी जनता को गुमराह करने की मंशा पर भी निर्भर है | कुछ कुबुद्धिजीवी जैसे समाचारपत्र लेखक, राजनीती विज्ञान के प्राध्यापक (प्रोफेस्सर) इत्यादी हममें गुलाम-मानसिकता रखना चाहते हैं | इसलिए वो हमें लेख का ऐसा अर्थ बताते हैं जिससे हमें लगे कि हम लोगों को जनसेवकों को जैसे प्रधान मंत्री, उच्च न्यायाधीश, मुख्य मंत्री, विधान-सभा सदस्य इत्यादी को किसी भी साधन द्वारा आदेश देना ज़रूरी नहीं है, जैसे एस.एम.एस., मेल आदि | मगर हम लोग (सच्चे कार्यकर्ता) जो चाहते हैं कि लोग इस गुलाम-मानसिकता का त्याग करें, हम `प्रधानता (स्वाधीनता)` का अर्थ “जन-सेवकों को आदेश देना हमारा कर्त्तव्य है” बताते हैं |

1.3 संविधान की उद्देश्यिका के द्वारा संविधान के अनेकार्थी और अनिश्चित विषयों का स्पष्टीकरण |

भारत के सुप्रीम-कोर्ट ने, केसवानान्दा मुक्कदमे में, पाया कि उद्देश्यिका का इस्तेमाल संविधान के अनेकार्थी और अनिश्चित विषयों के स्पष्टीकरण में हो सकता है जहाँ एक बात के कई अर्थ निकले जा सकते हैं | 1995 में “केन्द्रीय सरकार बनाम भारतीय जीवन बीमा निगम” मुक्कदमे में भी सुप्रीम-कोर्ट ने एक बार फिर माना कि उद्देश्यिका हमारे संविधान का एक अखंड भाग है  |

2. क्या कारण है कि मंत्रियों और बाकी जन-सेवकों जैसे प्रधान मंत्री, प्रधान जज, मुख्य मंत्री, विधान सभा सदस्य इत्यादी को ज़रूरी आदेश भेजना नारेबाज़ी, नेता-पूजन और चुनावों का इंतज़ार करने से ज्यादा अच्छा है ?

2.1 सारांश :

हम, चिंतित कार्यकर्ता, इस बात का प्रचार करते हैं कि सभी कार्यकर्ताओं को पहले सभी जनसमूहों द्वारा दिए गए कानून-ड्राफ्ट (व्यवस्था विधान लेखन) पढ़कर ही फैसला करना चाहिए कि वो देश में कौन सी व्यवस्था चाहते हैं और तब ही कार्यकर्ताओं को अपने सांसद, विधायक या प्रधान मंत्री को वो कानून-ड्राफ्ट सरकारी राजपत्र में छपवाने का आदेश देना चाहिए | फिर, कार्यकर्ताओं को अपने भेजे गए मेसेज-आदेश अपने वाल-नोट, ब्लॉग आदि पर डाले (जहाँ पर जनता आसानी से ढूँढ सके और पढ़ सके), ताकि जनता को सबूत मिले और दूसरों भी ऐसा करने की प्रेरणा मिले |

लाखों-करोड़ों आम नागरिकों के सांसद / प्रधानमंत्री को एस-एम-एस द्वारा आदेश दिए जाने पर निम्नलिखित परिणाम होंगे :

(1) इससे मेसेज-आदेश भेजने वाले लोगों की संख्या का एक जांच किये जा सकने वाला (सत्यापनीय) सबूत बनेगा और फिर (2) यह संख्या महात्मा उद्धम सिंह जैसे निडर कार्यकर्ताओं को प्रेरित करेगी कि वो प्रधान मंत्री से मिलें और उन्हें राजपत्र (हर महीने या हर सप्ताह छपने वाली सरकारी पत्रिका) में वो कानून डालने को कहें | (3) इससे या तो प्रधान मंत्री जनता के दबाव में आकर वो ड्राफ्ट राजपत्र में छाप देंगे या फिर जनता और महात्मा उद्धम सिंह की विनतियों के कारण वर्त्तमान प्रधानमंत्री या जनता द्वारा लाये गए अगले प्रधान मंत्री उस कानूनी व्यवस्था को सरकारी राजपत्र में छापेंगे |

और इस तरह, जनता द्वारा पसंद किया गया प्रक्रिया-ड्राफ्ट सरकारी राजपत्र में छाप दी जाएगी या आपके प्रिय नेता प्रधानमंत्री बन जायेंगे |

इस लेख में हमने व्यवस्था परिवर्तन करने के लिए प्रयोग किये गए कुछ तरीकों की तुलना की है और समझाया है कि एस-एम-एस के द्वारा सीधे आदेश देना क्यूँ एक श्रेष्ठ उपाय है दूसरे तरीकों की तुलना में, जैसे धरना-अनशन, पत्र लिखना, नारेबाजी आदि | तथा हमने संभव कारण दिए हैं कि क्यूँ कांग्रेस नेता, अन्ना हजारे, अरविन्द भाई, सुब्रमनियम इत्यादी अपने समर्थकों को एस.एम.एस द्वारा मंत्रियों तथा अन्य जन-सेवकों को मेसेज-आदेश देने से मना कर रहे हैं |

===========सारांश का अंत===========

2.2 “एस.एम.एस द्वारा आम नागरिकों का जनसेवकों को आदेश” का विस्तार में वर्णन

2.2.1 सबसे पहले कदम जो कार्यकर्ताओं को उठाने होंगे (1-3) | इन 3 कार्यों (कदम) को करने के लिए कुल लगभग 5 मिनट ही लगेंगे |

1. मंत्रियों के मोबाईल फ़ोन के नंबरों की प्राप्ती –

कार्यकर्ताओं को हमारा सुझाव है कि वे भारत के सुप्रीम-कोर्ट प्रधान जज (उच्चतम न्यायाधीश), प्रधान मंत्री और राष्ट्रपति आदि., का नंबर प्राप्त करें और उनको एस. एम.एस द्वारा आदेश भेजना शुरू करें | सभी नागरिकों को सिर्फ सरकारी नंबरों पर ही आदेश भेजना चाहिए क्यूंकि वे ही जनता के पैसों से जनसेवकों (जनता के नौकर) को उपलब्ध हुए हैं |

सांसदों के 80% मोबाइल नंबर लोकसभा वेबसाइट पर उपलब्ध है (http://164.100.47.132/LssNew/Members/statelist.aspx ) | नागरिकों को बाकी के सांसदों के नंबर पाने के लिए, अपने क्षेत्र के सांसद या उनके पार्टी अध्यक्ष या सांसद के पार्टी के अन्य सांसदों को फोन करके या उनको पत्र या ई-मेल द्वारा ये आदेश देना चाहिए कि सांसद अपने पब्लिक फोन को लोकसभा की वेबसाइट पर सार्वजनिक करें | ये आदेश भेजने के बाद, नागरिकों को जनसेवकों को अपने भेजे आदेशों और विंतियों को जनसमूह को बताना चाहिए अपने ब्लॉग, फेसबुक वाल नोट आदि पर डाल कर या पर्चे बाँट कर | इसी तरह, दूसरे जनसेवक जैसे विधायक, जज, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति का भी नंबर लेने के लिए नागरिकों को दबाव डालना चाहिए |
यदि कुछ हजार नागरिक इस प्रकार किसी जनसेवक को अपना पब्लिक मोबाइल सार्वजनिक करने के लिए आदेश/विनती करते हैं और जनसमूह को भी उस जनसेवक को अपने आदेश/विनती के बारे में बताते हैं और यदि वो जनसेवक फिर भी अपना पब्लिक मोबाइल नंबर सार्वजनिक करने से मना करता है, तो वो जनसेवक की पोल खुल जायेगी लाखों लोगों में |

जन-सेवकों की दिनचर्या में विघ्न न डले, इसके लिए उपाय –

अगर यह जनसेवक सोचते हैं कि इतने सारे एस.एम.एस रोज़ सँभालने मुश्किल हैं, तो हमारा सुझाव है कि वे एक अलग मोबाईल नंबर ले लें जो सिर्फ जन-समस्याओं को समर्पित हो | तथा इस नंबर को वे एक सर्वर (कंप्यूटर का एक यन्त्र) के साथ जोड़ दें | इस प्रकार यह रोज़ के एस.एम.एस उनकी दिनचर्या को भंग नहीं करेंगे |

2. अपने जनसेवकों को पहली बार मेसेज-आदेश भेजना = जनसेवक को पहला मेसेज-आदेश

पहला आदेश यह हो सकता है कि प्रधान मंत्री, सुप्रीम-कोर्ट प्रधान जज, मुख्य मंत्री, सांसद, विधायक इत्यादी को जितने भी आदेश उनके सरकारी नंबर पर आते हैं, वे उन्हें अपनी सरकारी वेबसाइट पर तुरंत डाल दें – सभी जन-सेवक जनता के आदेशों के लिए एक सरकारी नंबर रख सकते हैं जिसे वे एक दस टेरा बाईट संग्रह क्षमता वाले कम्प्यूटर से जोड़ सकते हैं | इस प्रकार याचिकाओं का संग्रह अरबों में हो सकता है | तथा सर्वर कई लाखों एस.एम.एस एक मिनट में दर्ज कर सकते हैं |

जनसेवक को पहले मेसेज-आदेश का एक उदाहरण (तिर्च्छे अकसर समझाने के लिए हैं)  –

“मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

(आदेश का विषय नागरिक अपनी जरुरत अनुसार बदल सकते हैं) मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि लोकसभा अध्यक्ष को आदेश दें कि तुरंत प्रस्ताव शुरू करें कि श्री क.ख.ग. (आपके प्रिय नेता) को प्रधानमंत्री बनाया जाये | और मैं आपको उस प्रस्ताव में `हाँ` वोट करने का आदेश देता हूँ |

और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

जनसेवक को पहले मेसेज-आदेश का एक और उदाहरण

“मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

(आदेश का विषय नागरिक अपनी जरुरत अनुसार बदल सकते हैं) मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि प्रधानमंत्री को आदेश दें कि राजपत्र में तुरंत छापें कि कि यदि कोई नागरिक-वोटर चाहे तो वो किसी भी दिन अपने कलेक्टर के दफ्तर जाकर, 20 रुपये प्रति पन्ना देकर, अपनी एफिडेविट स्कैन करवाकर प्रधानमंत्री वेबसाइट पर रखवा सकेगा |

और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

3. भेजे गये मेसेज-आदेशों को नागरिकों को सार्वजनिक करके जनता को दिखाने चाहिए ताकि जनता को सबूत मिले और दूसरों को भी ऐसा करने की प्रेरणा मिले –

केवल सांसद, विधायक आदि को पहला मेसेज-आदेश भेजना पर्याप्त नहीं है जनसेवकों पर दबाव बनाने के लिए | जनसेवकों पर दबाव बनाने के लिए, नागरिकों को जनता को ये प्रमाण देना होगा कि उन्होंने जनसेवक को आदेश भेजे हैं | इसीलिए, नागरिकों को अपने भेजे गए मेसेज-आदेश अपने फेसबुक वाल-नोट, ब्लॉग आदि पर डालना चाहिए (जहाँ जनता आसानी से ढूँढ सके और पढ़ सके) या कोई अन्य सुविधाजनक तरीके जैसे पर्चे आदि द्वारा जनसमूह को बताना चाहिए ताकि जनता को प्रमाण मिले और दूसरे नागरिकों को भी ऐसा करने की प्रेरणा मिले |

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2.2.2 यदि सांसद आदि जनसेवक हजारों सार्वजनिक मेसेज-आदेश, जो सार्वजनिक दिखाए गए हैं, का कोई जवाब नहीं देता, तो जनसेवक की पोल लाखों लोगों में खुल जायेगी

यदि कुछ 200-300 नागरिक जनसेवक को मेसेज-आदेश भेज देते हैं और अपने भेजे गए मेसेज-आदेश सार्वजनिक करके जनसमूह को बताते हैं और जनसेवक कोई जवाब नहीं देता, तो जनसेवक पर पर्याप्त दबाव नहीं होने के कारण कोई भी परिणाम नहीं आएगा | लेकिन, यदि जनसेवक के क्षेत्र के कुछ हजार नागरिक भी ऐसा करते हैं, मतलब कि मेसेज-आदेश भेज कर अपने मेसेज-आदेश जनसमूह को बताते हैं और जनसेवक कोई जवाब नहीं देता, तो जनसेवक की पोल लाखों नागरिकों में खुल जायेगी | फिर, इस प्रक्रिया के कारण, कम से कम जनता को इस जन-विरोधी सांसद, जो हजारों नागरिकों का भी जवाब नहीं देता, से छुटकारा मिल जायेगा |
तो, यदि आपको लगता है कि आपका सांसद जन-विरोधी है, हजारों नागरिकों की बात भी नहीं सुनाता है, तो उस बुरे सांसद को 5 साल बर्दाश्त करने की बजाय, उसकी पोल जनता में खोलनी चाहिए, उसको मेसेज-आदेश भेज कर और उसके जवाब या ख़ामोशी को फेसबुक वाल नोट, ब्लॉग, पर्चे आदि द्वारा जनता को बता कर, ताकि जनता को प्रमाण मिले और दूसरे नागरिकों को भी ऐसा करने की प्रेरणा मिले |

2.2.3. संभव बहाने और आपतियाँ, जो जनसेवक बता सकता है इस सिस्टम को लागू नहीं करने के लिए और आपत्तियों को दूर करने के लिए सरल समाधान-कदम (स्टेप) जो जनसेवक लागू कर सकते हैं –

ये भी सम्भावना है कि जनसेवक जनता के दबाव के कारण जवाब तो देता है, लेकिन वैध या गलत आपतियाँ और कारण देता है, अपने पब्लिक मोबाइल को अपनी वेबसाइट से ना जोड़ने के लिए | और इस तरह जनता के दबाव से बचने का प्रयास करता है, बिना ये सिस्टम को अपनी वेबसाइट पर लागू किये |

आयें देखते हैं कुछ आपत्तियां जो जनसेवक दे सकता है अपने पब्लिक मोबाइल को अपनी वेबसाइट के साथ ना जोड़ने के लिए और इन आपत्तियों को दूर करने के लिए सरल समाधान –

1) जनसेवक की संभव आपत्ति नंबर 1 – एक ही नागरिक-वोटर द्वारा दोहराए गए मेसेज-आदेश और इसका सरल समाधान = मोबाइल नंबर के हरेक सिम को पहचान पत्र (वोटर आई.डी.) के साथ जोड़ना 

संभव आपत्ति
जनसेवक ये कह सकता है कि ” एक नागरिक-मतदाता एक ही मेसेज कई बार भेज सकता है एक सिम से या कई सिम से | नकलों के दोहराव के कारण, सांसद को भेजे गए मेसेज-आदेश जो सांसद के वेबसाइट पर दर्शाये गए हैं, उससे असली जनता की राय का नहीं पता चलता है | इसीलिए, इस तरह के सिस्टम को लागू करने से नागरिक भ्रमित होंगे |

इस आपत्ति को समाप्त करने के लिए सरल समाधान जो लागू किया जा सकता है –

हर मोबाईल नंबर की हरेक सिम को उसके मालिक के ‘मतदाता पहचान पत्र’ और बाद में अंगुली के छाप के साथ चिन्हित करना या जोड़ना जिस से प्रमाणिकता सुनिश्चित हो सके और एक ही नागरिक से एक ही संदेश के दोहराव की समाप्ति सुनिश्चित हो सके

जन-आदेशों की विशिष्टता सुनिश्चित करने के लिए मोबाईल नंबर की हरेक सिम को उसके मालिक के ‘मतदाता पहचान पत्र’ के साथ चिन्हित या जोड़ा जा सकता है | जैसे अगर किसी नागरिक के पास अगर दो मोबाईल नंबर हैं, तो उनमें से सिर्फ एक ही जनसेवकों के कंप्यूटर अथवा मोबाईल में पंजीकृत होगा | और बाकि सभी नंबर सूची से निकाल दिए जायेंगे कंप्यूटर के सॉफ्टवेर द्वारा | इससे एक ‘मतदाता पहचान पत्र-मोबाईल नंबर सूची’ या डाटाबेस तैयार हो जायेगा जिसमें मतदाता का नाम, पता, मोबाइल नंबर और पहचान पत्र संख्या होगा |

मतदाताओं से विनती की जायेगी कि वे अपनी मोबाईल कम्पनी से संपर्क साधें और उन्हें अपना नाम, पता और मतदाता पहचान पत्र संख्या सम्बंधित जनसेवक के ईमेल पर भेजने के लिए कहें और सांसद भी अपने क्षेत्र के मोबाइल सेवा देने वाली कम्पनियों (ऑपरेटर) को कह सकता है कि वे उस क्षेत्र के उनके ग्राहकों के पहचान पत्र (वोटर आई.डी) के साथ उनका मोबाइल का बिल उसको ई-मेल द्वारा भेजें |

ये डाटाबेस बन जाने के बाद, मेसेज-आदेश जो जनसेवक की वेबसाइट पर अपने आप प्रकाशित होंगे, की जांच कोई भी नागरिक आसानी से स्वयं कर सकता है | सॉफ्टवेर की मदद से कंप्यूटर एक ही नागरिक के एक से अधिक नंबरों को सूची से निकाल देगा |

शुरुआत में मान लीजिये 10 प्रतिशत तक गलतियाँ हो भी जायें, मगर यह मंत्रियों की तानाशाही से तो बहुत बेहतर होगा | बाद में, इन गलतियों को भी समाप्त किया जा सकता है, नागरिकों के अंगुली के छाप लेकर और उनको मोबाइल नंबर की हरेक सिम के साथ जोड़ कर |

सभी मतदाताओं के एस-एम-एस उनके मोबाईल नंबर सहित स्थायी रूप से जनता के समक्ष रखे जायेंगे | भेजा गया एस-एम-एस, वेबसाइट पर भेजने वाले के नाम और मतदाता प्रमाण पत्र के साथ आएगा |

2) जनसेवक की संभव आपत्ति नंबर 2 – नागरिकों द्वारा झूठे दावे कि उन्होंने सर्वर को मेसेज-आदेश भेजे हैं और समाधान = फीडबैक मेसेज सिस्टम –

सम्भव आपत्ति –

जनसेवक ये कह सकता है कि “ नागरिक-वोटर जनसेवक को मेसेज-आदेश भेजने के झूठे दावे कर सकते हैं, जबकि सच्चाई में जनसेवक के सर्वर पर कोई भी मेसेज-आदेश नहीं आया | “

इस आपत्ति को समाप्त करने के लिए सरल समाधान जो लागू किया जा सकता है – फीडबैक एस.एम.एस (कन्फर्म करने वाला मेसेज) –

जवाब में सम्बंधित सर्वर एक कन्फर्म करने वाला, एस-एम-एस द्वारा, मतदाता को भेजेगा, जैसे `धन्यवाद, हमें आपका चयन आदेश “विधायक इस्तीफा-हाँ” मिल चुका है` अथवा `धन्यवाद, हमें आपका चयन आदेश “विधायक इस्तीफा-ना” मिल चुका है`| मतदाताओं की संख्या को मद्देनज़र रखते हुए देखा जाये तो अगर कोई नागरिक सौ – दो सौ नकली एस-एम-एस भेज भी देता है, तो अंतिम निर्णय पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ेगा | और अगर कोई हजारों नकली सन्देश भेज देता है, तो वो पुष्टि (कन्फर्म) करने वाला सन्देश और वेबसाइट द्वारा पकड़ा जायेगा |

अब सवाल आता है कि क्या कोई वेबसाइट का दुरुपयोग कर सकता है ? हाँ, पर केवल वेबसाइट का एडमिन (पद्धति प्रबंधक) ही ऐसा कर सकता है | लेकिन अगर ऐसा हुआ, तो वेबसाइट पर हुए बदलाव साफ़ तौर पर पूरी दुनिया के सामने आ जायेंगे और उन्हें अगले ही क्षण, पुराना डाटा वापिस डाला जा सकता है | यह कई तरीकों से हो सकता है | इस तरह कन्फर्म करने वाला सन्देश और वेबसाइट के स्थायी लेख प्रमाण द्वारा यह सिस्टम नकल और जालीपने से सुरक्षित है | और अगर किसी ने 1 प्रतिशत भी जाली सन्देश भेजे, तो वो सबूत के साथ पकड़ा जायेगा |

3) जनसेवक की संभव आपत्ति नंबर 3 – जनसेवक और उसके कर्मचारियों के पास कुछ भी समय नहीं बचेगा यदि ये सिस्टम लागू किया गया तो |

संभव आपत्ति

“ यदि इस सिस्टम को लागू किया जाता है, तो जनसेवक और उसके कर्मचारियों के पास अपना काम करने के लिए कुछ भी समय नहीं होगा क्यूंकि उनका सारा समय उनकी वेबसाइट पर प्राप्त मेसेज पढ़ने और उनके जवाब देने में चला जायेगा |

इस आपत्ति को समाप्त करने के लिए सरल समाधान जो लागू किया जा सकता है – एस-एम-एस के लिए संक्षिप्त कोड (शोर्ट कोड=कूट संकेत) का निर्माण और एक ही विषय के मेसेज के लिए सॉफ्टवेर अपने आप समूह बनाएगा – एक ही संक्षिप्त कोड के लिए, किसी भी सिम से भेजा गया केवल अंतिम मेसेज ही सर्वर पर दर्ज होगा

जनसेवकों को सभी आदेश अलग अलग पढ़ने की आवश्यता नहीं है, आम नागरिक या जनसेवक संक्षिप्त कोड का निर्माण कर सकते हैं जो एस.एम. एस के द्वारा भेजें जाएँ और कंप्यूटर पर उन कोड को अलग अलग श्रणियों में डाला जा सकता है | जैसे “अफज़ल फांसी-हाँ” अथवा ” अफज़ल फांसी-ना “, “प्रधान मंत्री इस्तीफा-हाँ” या “प्रधान मंत्री इस्तीफा-ना” इत्यादी | इससे जन-सेवकों का समय बचेगा |  तथा कलेक्टर के दफ्तर जाकर या जनसेवक के दफ्तर जाकर सौ रुपये और एक एफिडेविट (शपथपत्र) जमा करके एक आम नागरिक नए कोड (शोर्ट कोड=कूट संकेत) को जनसेवक की वेबसाइट पर दर्ज करने की विनती भी कर सकता है |

किसी एक मुद्दे पर संदेशों का ऑटोमैटिक समूह बनाना (स्वतः वर्गीकरण) – एक ही संक्षिप्त कोड के लिए, किसी भी सिम से भेजा गया केवल अंतिम मेसेज ही सर्वर पर दर्ज होगा |

कंप्यूटर अलग-अलग मोबाइल से आये एक ही सन्देश को सॉफ्टवेर द्वारा ऑटोमैटिक तरीके से समूह बना सकता है | यदि कोई मतदाता-नागरिक एक ही मुद्दे पर दो राय प्रस्तुत करने वाले सन्देश भेजता है, तो उनमें से केवल उस नंबर से आखरी भेजा गया सन्देश दर्ज होगा | जैसे यदि वो पहले “अफज़ल को फांसी-हाँ” भेजता है और फिर “अफज़ल को फांसी-ना” तो सिर्फ “अफज़ल को फांसी-ना” वाला आखरी भेजा गया सन्देश दर्ज होगा |

इस प्रकार, संक्षिप्त कोड और एक ही शोर्ट कोड पर भेजे गए मेसेज के ऑटोमैटिक समूह बनाने के कारण, जनसेवकों को सारे मेसेज पढ़ने नहीं पढेंगे और फिर भी उन्हें जनता की राय पता चल जायेगा | इस प्रकार, जनसेवकों का समय बरबाद नहीं होगा और उन्हें और सभी नागरिकों को जनता की राय प्रामाणिक तरीके से पता चलेगी |

और जैसे-जैसे, यह एस-एम-एस द्वारा जनसेवकों को आदेश भेजने का तरीका फैलेगा, यह सिस्टम और अच्छा (विकसित) भी होगा | एक ही व्यक्ति द्वारा दो नंबरों से संदेशों के भेजने को रोकने के लिए सिर्फ मोबाइल नंबर के सिम और मतदाता पहचान पत्र को आपस में जोड़ने की आवश्यकता होगी | इस सुविधा के लिए, मोबाइल कंपनियां एक महीने में पहले 100 एस-एम-एस के लिए 10 पैसे का और फिर अगले 100 एस-एम-एस के लिए 50 पैसे का शुल्क ले सकती हैं |

4) जनसेवक की संभव आपत्ति नंबर 4 – ये प्रक्रिया पैसों से, गुंडों द्वारा या मीडिया द्वारा आसानी से प्रभावित की जा सकती है

संभव आपात्ति –

“ इस प्रक्रिया को पैसों से आसानी से खरीदा जा ससकता है, मतलब कि नागरिकों को कोई अमीर, भ्रष्ट व्यक्ति पैसे देकर खरीद लेगा और उसको फायदा पहुँचाने वाले मेसेज-आदेश करने के लिए कहेगा | इसी तरह, आमिर, प्रभावशाली व्यक्ति इस प्रक्रिया को बिकाऊ मीडिया और गुंडों द्वारा प्रभावित कर सकते हैं ”

इस आपत्ति को समाप्त करने के लिए सरल समाधान जो लागू किया जा सकता है

एक सुरक्षा उपाय जो आम नागरिक उपयोग कर सकते हैं एक मतदाता अपना मेसेज-आदेश कभी भी बदल सकता है; एक नागरिक द्वारा एक संक्षिप्त कोड पर अंतिम भेजा गया मेसेज सर्वर पर दर्ज होगा | इस प्रकार, इस सुरक्षा ऊपाय के कारण नागरिकों की राय पैसे से, गुंडों से और बिकी हुई मीडिया द्वारा प्रभावित नहीं की जा सकेगी | कोई भी राय खरीदने के लिए रोज़-रोज करोड़ों रूपए नहीं खर्च कर सकता और ना ही कोई रोज़ लाखों लोगों पर हजारों गुंडे छोड़ सकता है |

क्यूंकि जनता नागरिकों द्वारा जनसेवक को भेजे गए मेसेज-आदेश को जनसेवक की वेबसाइट पर कभी भी देख सकेगी, नागरिक भेजे गए मेसेज-आदेशों का एक छोटा सैम्पल लेकर जांच कर सकते हैं कि भेजे गए मेसेज आदेश और उन मेसेज को भेजने वाले व्यक्ति असली हैं या नकली | फिर, यदि कोई मीडिया झूठ बोलने का प्रयत्न करता है, तो उसकी पोल तुरंत खुल जायेगी |

5) जनसेवक की संभव आपत्ति नंबर 5 – बहुत लोगों के पास मोबाइल नहीं है और इसीलिए वे `जनसेवक को मेसेज-आदेश` का प्रचार का तरीका का उपयोग नहीं कर पाएंगे

इस आपत्ति को समाप्त करने के लिए सरल समाधान जो लागू किया जा सकता है –

पटवारी (तलाटी, लेखपाल) या जनसेवक द्वारा निश्चित कोई अन्य सरकारी दफ्तरों को आदेश दिया जा सकता है कि उन दफ्तरों पर जाकर, कोई भी नागरिक अपनी हां/ना जनसेवक की वेबसाइट पर पहले से दर्ज संक्षिप्त कोड पर कर सकेगा |

इस प्रकार, जिन नागरिकों के पास मोबाइल नहीं है या उनको मेसेज भेजना नहीं आता है, वे पास के पटवारी के दफ्तर या जनसेवक द्वारा निश्चित अन्य कोई सरकारी दफ्तर जाकर, अपना हाँ/ना दर्ज कर सकते हैं, जनसेवक की वेबसाइट पर पहले से ही दर्ज संक्षिप्त कोड पर, एक रुपये का शुल्क देकर और अपने आपको पहचान पत्र, फोटो (महिलाओं के लिए वैकल्पिक) और अंगुली के छाप द्वारा अपनी पहचान करवाकर | नागरिक-मतदाता बिना कोई शुल्क दिए, अपनी राय किसी भी दिन रद्द भी कर सकते हैं |

इसके अलावा, आजकल प्रयोग किये हुए मोबाइल 500 रुपयों के लगभग बिकते हैं | ऐसे प्रयोग किये हुए मोबाइल को जनसेवक या कोई अमीर व्यक्ति, गरीबों को दान कर सकता है | और गरीबों के लिए, कुछ सरकारी नंबर पर मेसेज भेजना मुफ्त किया जा सकता है |

नोट

नागरिकों द्वारा जनसेवक को (सीधे) ई-मेल, पत्र या फोन का भी उपयोग किया जा सकता है, जब नागरिक के पास, किसी भी कारण, मेसेज-आदेश भेजने की कोई सुविधा ना हो | लेकिन मेसेज-आदेश की तुलना में, ई-मेल, पत्र या फोन द्वारा दिए गए आदेशों को सिद्ध करना काफी कठिन कार्य है | `जनसेवक को मेसेज-आदेश` के प्रचार के तरीके की तुलना में, जनसेवक को ई-मेल, पत्र भेजना या उसको फोन करने के तरीकों में कहीं अधिक नागरिकों की सीधी भागीदारी चाहिए, जनसेवकों पर पर्याप्त दबाव बनाने के लिए कि जनसेवक मजबूर हो जायें नागरिकों के आदेशों को राजपत्र में छाप कर तुरंत लागू करने के लिए |

इस लिए, नागरिकों को हर प्रयास करना चाहिए जनसेवकों पर दबाव डालने के लिए कि जनसेवक वेबसाइट पर अपना पब्लिक मोबाइल बताये और फिर नागरिकों को जनसेवकों को मेसेज-आदेश भेजने चाहिए | यदि नागरिक जनसेवक को पत्र लिख रहे हैं या फोन कर रहे हैं, तो भी नागरिकों के लिए जनसेवकों को मेसेज-आदेश भेजना जरुरी है |

2.3 अन्ना हजारे, अरविन्द केजरीवाल तथा सुब्रमनियम जैसे नेताओं द्वारा सुझाये गए अभियान (प्रचार) के तरीके :

मान लीजिये कि भारतीय राजपत्र में एक प्रक्रिया-ड्राफ्ट छपवाना है | ये ड्राफ्ट अन्ना/केजरीवाल का “जनलोकपाल, बिना राईट टू रिकॉल जनलोकपाल” या हमारा प्रस्तावित “एस-एम-एस द्वारा राईट टू रिकॉल प्रधान मंत्री” या कोई और भी हो सकता है |

फिर, आम आदमी किन तरीकों का प्रयोग करके अपना समर्थन या विरोध दर्ज करा सकता है ताकि उसके विरोध या समर्थन का सबूत हो, जो किसी भी आम-नागरिक द्वारा जांच किया जा सके ?

हमारा सुझाव यह है के आम-नागरिक मंत्रियों अथवा अन्य जनसेवकों को एस-एम-एस के द्वारा आदेश देकर अपना पसंदीदा कानून-ड्राफ्ट (प्रणाली) राजपत्र में छपवा सकता है या संवैधानिक बदलावों के विषयों में, संसद में पारित करवा सकता है |

अन्ना हज़ारे और अरविन्द केजरीवाल और अन्य अधिकतर नेताओं ने ही इस बात का विरोध किया है कि आम आदमी और कार्यकर्ताओं को कानून-ड्राफ्ट पढ़ने की या उनपर निर्णय ले कर प्रधानमंत्री, सांसद, अन्य जनसेवकों को एस-एम-एस द्वारा आदेश देने की ज़रूरत है |

अन्ना हज़ारे, सुब्रमनियम और केजरीवाल ने केवल निम्नलिखित सुझाव प्रस्तावित किये हैं :

1. संवाददाता सम्मलेन बुलवाना – जिसमें नेता सम्मलेन में भाग लें और कार्यकर्ता केवल दर्शक बने रहें |

2. भूख हड़ताल (अनशन) – नेता मंच पर अनशन करें और जनता नारे चिल्लाये |

3. नेता पूजन – कुछ कार्यकर्ता बाकी सभी कार्यकर्ताओं और नागरिकों को संपर्क करें और उनके सामने अपने नेता का गुणगान करते हुए उनको यह झूठा आश्वासन दें कि उनके नेता चुनावों के बाद बिकेंगे नहीं और न ही भ्रष्ट होंगे |

4. नारे बाज़ी – अपने प्रिय नेता और प्रिय पार्टी की जय-जय करना या अपनी प्रिय मांग के लिए नारेबाजी – जमीन पर या ऑनलाइन

5. झंडे फहराना और समूह प्रदर्शन (रैली) करना |

6. मोमबत्तियां जलाना

7. और विशेषकर, अगले चुनावों का इंतज़ार करने को कहते हैं |

8. यदि कोई समाधान लाने के लिए कानून-ड्राफ्ट मांगे, तो उसे कहना के “एक विशेष समिति बनाई गई है ड्राफ्ट्स के लिए”

9. जो नेता कोर्ट के चक्कर लगते हैं लेकिन किसी को भी सजा नहीं दिलवाते और ना ही कोई सकारात्मक परिणाम आता है, उन नेताओं की चमचागिरी करना या उनकी जय-जय कार करना |

इत्यादी…..

ये नेता सरकार से तो हमेशा नागरिक-चार्टर (सरकारी कर्मचारियों के लिए कार्य पूरा करने की एक समय-सीमा (समय निश्चित कार्यक्रम)) की मांग करते हैं, लेकिन कभी भी अपने प्रस्तावों और वायदों के ड्राफ्ट देने की समय-सीमा (एक समय निश्चित कार्यक्रम) कार्यकर्ताओं द्वारा पूछने पर भी, अपनी वेबसाइट पर नहीं डालते |

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2.4 ‘प्रधानमंत्री, सांसद और बाकी जनसेवकों को एस.एम.एस द्वारा आदेश देना’ के क्या फायदे हैं अनशन, नारेबाजी और दूसरे प्रचार के तरीकों की तुलना में ?

1. सबसे पहले, ये हर एक आम नागरिक का संवैधानिक कर्त्तव्य है कि वो सभी जन-सेवकों जैसे प्रधान मंत्री, सुप्रीम-कोर्ट प्रधान जज, मुख्य मंत्री, सांसद, विधायक इत्यादी को ज़रूरी और उचित आदेश (एस.एम.एस, मेल द्वारा) दे |

केवल अपने प्रिय नेता या अपने प्रिय पार्टी या अपने प्रिय मांग के लिए नारेबाजी करना अपर्याप्त है | ऐसा करने से, आपके प्रिय नेता प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री नहीं बन जायेंगे या आपकी प्रिय मांग लागू नहीं होगी | सोशियल साईट पर या रैलियों में नारेबाजी करने का कोई लाभ नहीं है, जब तक आप, एक आम-नागरिक अपने जनसेवकों को प्रामाणिक रूप से आदेश नहीं देते, क्यूंकि केवल सांसद, विधायक आदि जनसेवकों के पास आधिकार हैं कि वे आपके प्रिय नेता को प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बना सकते हैं या आपके प्रिय मुद्दे को राजपत्र में छपवाकर लागू करवा सकते हैं |

2. `जनसेवकों को मेसेज-आदेश` जनसेवकों को आदेश देने का प्रामाणिक तरीका है, जिसमें कुल जन-समर्थन की संख्या सिद्ध करने के लिए किसी भी बिकी हुई मीडिया के समर्थन की ज़रूरत नहीं है | भेजा गया एस.एम.एस आदेश तथा भेजने वाले व्यक्ति, दोनों को साबित किया जा सकता है | मोबाईल नंबर के हरेक सिम को एक मतदाता प्रमाण पत्र के साथ जोड़ने से एक ही व्यक्ति से एक ही आदेशों के दोहराव (द्विरावृति) को जनसेवक की वेबसाइट का सॉफ्टवेर हटा सकता है और सही कुल जन-समर्थन संख्या का पता लगाया जा सकता है |

3. `जनसेवक को मेसेज-आदेश` प्रचार-तरीके में छेड़-छाड़ संभव नहीं है – न तो मीडिया, न पैसा और न ही किसी प्रकार की गुंडागर्दी द्वारा लोगों के समर्थन की संख्या में किसी प्रकार की हेर-फेर की जा सकती है क्योंकि जनता कभी भी सरकारी वेबसाइट पर जाकर सारी जानकारी स्वयं जांच कर सकती है |

4. इस तरीके के प्रयोग करने से नेता, कार्यकर्ता और आम आदमी एक ही स्तर पर आकर खड़े हो जाएँगे | कोई भी किसी से ज्यादा शक्तिशाली नहीं रहेगा |

5. इस तरीके में आम आदमी अपना विरोध एक प्रामाणिक तरीके से कर सकता है , मतलब कि आम आदमी विरोध करेने वालों की संख्या के सबूत और अन्य सबूत देकर विरोध कर सकता है और इसीलिए जनसेवकों पर प्रभावशाली तरीके से दबाव डाल सकता है |

6. यह एक विकेन्द्रित (फैला हुआ, कार्यकर्ता और आम-आदमी आधारित) आन्दोलन होगा जिसे दबाना सरकार की क्षमता के बहार होगा –

– सरकार के लिए एक केन्द्रित (सिमटा हुआ, नेता-आधारित) आन्दोलन को दबाना ज्यादा कठिन नहीं होता जैसे ‘बाबा रामदेव का जनांदोलन’ या ‘अन्ना का आन्दोलन’ जहाँ कोई नेता अनशन को शुरू करने का या समाप्त करने का आदेश या दूसरे आदेश अपने चेले-कार्यकर्ताओं को देता है |

– लेकिन, `जनसेवक को मेसेज-आदेश` के प्रचार-तरीके में हिस्सा लेने वालों की बड़ी संख्या होने के कारण, सरकार के लिए ये संभव नहीं है कि एक विकेन्द्रीयकृत तरीके जैसे `जनसेवक को मेसेज आदेश` को दबाना, बिना दबाने की कोशिश करने वालों की सबूत सहित पोल लाखों के सामने खुले |

7. `जन्सवेक को मेसेज-आदेश` प्रचार-तरीके में सरकार द्वारा किए गए, कोई भी संभव अत्याचार जनसमूह में बंट जाएंगे | और इसीलिए कुछ ही लोगों को भारी नुकसान झेलने की संभावना बहुत कम होगी है, रैली, अनशन, धरना, आदि की तुलना में, इन कारणों से – 

– यदि प्रधान-मंत्री एस.एम.एस भेजनेवाले व्यक्ति को दंडित करने का निर्णय लेता है, तो उसे सभी लोगों को दंडित करना पड़ेगा; जबकि लाठी-चार्ज में कुछ ही दुर्भाग्यपूर्ण लोग बुरी तरह से पीटे जाएंगे और बाकी लोग बच जाएंगे |
– यदि प्रधान-मंत्री एस.एमएस भेजनेवाले को दंडित करने का निर्णय लेता है, तब पहले नेताओं को प्रकोप झेलना पड़ेगा और फिर ही समर्थकों को झेलना पड़ेगा ; जबकि रैलियों में समर्थकों को बुरी तरह से पीटा जाता है और रैली, अनशन में नेता बच जाते हैं !!!

8. “ जनता के एस.एम.एस-आदेश जनसेवकों की लिए ” प्रचार-तरीके का भरोसेमंद रिकोर्ड – एक भरोसे लायक एस.एम.एस का रिकोर्ड दो फोन कोंपनियों के सर्वरों और एस.एम.एस. पाने वाले के पास भी रहेगा  |

9. ये प्रचार-तरीका सस्ता है प्रधानमंत्री / मुख्य मंत्री को एस.एम.एस के द्वारा आदेश भेजना बहुत सस्ता है और प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री / सांसद आदि जनसेवक अपने सार्वजनिक मोबाइल नंबर पर 100 एस.एम.एस हर महीने आम-नागरिक के लिए भेजने को मुफ्त कर सकते हैं | इस तरह ज्यादातर नागरिक कम से कम 100 लोग एस.एम.एस करने में समर्थ हो पाएंगे |

10. ये अपनी राय देने या प्रदर्शन का तरीका अधिकतर जनसंख्या के द्वारा प्रयोग किया जा सकता है ये  70% से अधिक मतदाताओं की जनसंख्या के लिए सस्ता उपाय है अपनी राय देने के लिए (ट्राई के आंकड़ों के अनुसार, देखें – http://en.wikipedia.org/wiki/Telecommunications_statistics_in_India ) ; बाकी लोगों को मुफ्त, सस्ते मोबाइल दिये जा सकते हैं ; सस्ते मोबाइल का दाम 500 रुपयों से कम होता है और उनको कुछ 20 करोड़ लोगों को दिये जाना संभव है | और जिनके पास मोबाइल नहीं है, वे अपने पास के पटवारी (लेखपाल, टालती) दफ्तर या पास के जनसेवक द्वारा निश्चित सरकारी दफ्तर जाकर अपनी हां/ना की राय दे सकते हैं पहले से दर्ज संक्षिप्त कोड पर | जिन लोगों को मेसेज करना नहीं आता, वे लोग जनसेवक को मेसेज भेजने के लिए दूसरे लोगों की मदद ले सकते हैं क्यूंकि मेसेज भेजना कोई रोकिट विज्ञानं नहीं है |

11. स्वतःसमूहिकरण (अपने आप समूह बनाना) यदि आम-नागरिक आदेश देते हैं और प्रधान-मंत्री चाहता है, तब प्रधान-मंत्री लोगों को एस.एम.एस के लिए संक्षिप्त कोड (छोटे अक्षरों) का प्रयोग करने को कह सकता है (जैसे संक्षिप्त कोड “अफजल फांसी हाँ “ या संक्षिप्त कोड “ अफजल फांसी नहीं “ ) और तब प्रधान-मंत्री ऐसे सस्ते तरीके द्वारा, करोड़ों लोगों की राय कुछ मुद्दों पर तो ले ही सकता है, यदि हर मुद्दे पर प्रधानमंत्री नागरिकों की राय नहीं भी ले, तो भी |

जबकि ऐसे तरीके जो अन्ना, अरविंद भाई आदि ने सुझाए हैं –– जैसे कि नारेबाजी, प्रदर्शन करना, मोमबत्ती  जलाना, नेता पूजन और चुनाव जीतने की प्रतीक्षा करना –– इनमें ऐसी कोई भी विशेषताएं नहीं हैं |

2.5. प्रदर्शन करना, मोमबत्ती जलाना, नेता पूजन और चुनाव जीतने की प्रतीक्षा करना, इन सब के भारी दुष्प्रभाव और नुकसान — जनसेवकों को एस.एम.एस के द्वारा आदेश भेजने की तुलना में  

अब, मैं समय-बर्बाद करने वाले नेताओं के कुछ तरीकों की तुलना “आम-नागरिकों द्वारा अपने प्रधानमंत्री और अन्य जनसेवकों को मेसेज-आदेश” के तरीके से करूंगा, ताकि समय-बरबादी करने वाले नेताओं के तरीकों का नागरिकों को होने वाला नुकसान सामने आये |

  1. जमीन पर या सोशियल साईट पर अपने प्रिय नेताओं के लिए नारेबाजी करना या अपने प्रिय मांग के लिए नारेबाजी करना – केवल एक लाउड-स्पीकर लगाकर नारेबाजी करना या सोशियल साईट पर नारेबाजी करना अपने प्रिय नेता के लिए या अपनी प्रिय मांग को पूरा करवाने के लिए अपर्याप्त है ; ऐसे करने से आपका प्रिय नेता कभी भी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री नहीं बनेगा और ना ही आपकी प्रिय मांग कभी लागू होगी |

    केवल नारेबाजी करना बेकार है, जब तक हम, आम-नागरिक अपने जनसेवकों के सामने प्रामाणिक तरीके से, अपनी स्पष्ट मांग प्रक्रिया-ड्राफ्ट के रूप में नहीं रखते और उन्हें अपने प्रस्तावित प्रक्रिया-ड्राफ्ट को तुरंत भारतीय राजपत्र में छपवाने का आदेश नहीं देते | सांसद और विधायक आदि जनसेवकों के पास अधिकार है आपके प्रिय नेता को प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनाने के लिए और उनके पास ये भी अधिकार है कि प्रक्रिया-ड्राफ्ट को भारतीय राजपत्र में छपवाएं ताकि आपकी प्रिय मांग लागू हो सके |

  2. पत्रकारों का सम्मेलन : इस तरीके में, अरविंद भाई आदि लोग बड़े नेता बन जाएंगे और आम आदमी को इसमें कुछ नहीं मिलेगा | क्यूँ ?? क्या भारत में हर आम आदमी पत्रकारों का सम्मेलन बुला सकता है ? जवाब है नहीं | और मान लीजिये, यदि 1 करोड़ भारत के आम आदमी पत्रकारों का सम्मेलन बुला लेते हैं, तब क्या बिकाऊ पत्रकार उनमें से पाँच लाख सम्मेलनों में भी जाएंगे और क्या फिर वो ऐसे सम्मेलनों का वैसे ही प्रसार करेंगे जैसे कि अरविन्द भाई के सम्मेलन का करते हैं ?

    नहीं | बिकाऊ पत्रकार सिर्फ उन सम्मेलनों मे जाते हैं और प्रचार करते हैं, जिनके लिए जिंदल जैसे लोग उन्हें पैसे देते हैं या फिर पत्रकारों के मीडिया-मालिकों को पैसे देते हैं | और हममें से अधिकतर आम आदमी के पास इतना पैसा नहीं है कि हम पत्रकारों को उतना पैसा दे सकें या फिर पत्रकारों के मीडिया के मालिकों को पैसे दे सकें |

  3. अन्ना, अरविंद भाई किसी भी विषय पर अनशन करते हैं | लेकिन, क्या हर आम आदमी अनशन कर सकता है ? मान लीजिये अगर 1 करोड़ नागरिक अनशन करते हैं, तब भी क्या पत्रकार उन सभी अनशनों को समान रूप से प्रचार करेंगे ? नहीं | बिकाऊ पत्रकार सिर्फ उन्हीं अनशनों को दिखाएंगे जिसके लिए उन्हें जिंदल आदि पैसे दे रहे हैं |
  4. क्या हर आम आदमी हर दिन रैली में भाग ले सकता है ? नहीं |
  5. क्या हर आम आदमी सप्ताह में एक बार रैली में भाग ले सकता है ? नहीं |
  6. क्या हर आम आदमी नेता पूजन कर सकता है ? हाँ, वो कर सकता है | पर तब क्या होगा जब वो नेता बिक जाएगा ? उदाहरण, लालू यादव, मुलायम यादव, नितीश कुमार आदि की लोग 1977 तक अंधभक्ति करते थे और ये सभी नेता चुनाव जीतने के 6 महीने के अंदर अंदर बिक गए
  7. क्या हर आम आदमी कोर्ट के चक्कर लगा सकता है या हर आम आदमी जनहित-याचिका दर्ज कर सकता है ? नहीं | केवल वे ही व्यक्ति, जिनके पास जज के साथ अच्छे संपर्क हैं या पैसे वाले हैं, कोर्ट में जनहित-याचिका दर्ज करवा पाते हैं, मतलब जनहित-याचिका ज्यादातर भ्रष्ट जज और उनके रिश्तेदारों द्वारा फिक्स किये जाते हैं ताकि उनके प्रायोजक विदेशी कम्पनियों और बड़ी कम्पनियों को फायदा हो |

पर क्या हर आम आदमी प्रधान-मंत्री को मेसेज द्वारा आदेश दे सकता है ? सहज रूप से, भारत में 70% से अधिक मतदाताओं के पास मोबाइल फोन है और इसलिए वो सभी लोग प्रधान-मंत्री या मुख्य-मंत्री को मेसेज भेज सकते हैं यदि वो भेजना चाहें तो | और शेष के लोग पटवारी (तलाटी, लेखपाल) के दफ्तर या जनसेवक द्वारा निश्चित कोई पास के सरकारी दफ्तर जा सकते हैं पहले से दर्ज संक्षिप्त कोड पर अपनी राय देने के लिए |

  • भारत की 75 करोड़ नागरिक-मतदाताओं में से कम से कम 30-40 करोड़ लोग एस.एम.एस कर सकते हैं जबकि अनशन और पत्रकार सम्मलेन जैसे कार्य कुछ लाख आम आदमी ही कर सकते हैं या फिर कुछ हज़ार उच्च वर्ग के लोग ही कर सकते हैं | और रैली में भाग लेना भारत के अधिकतर नागरिकों के लिए संभव नहीं है क्यूंकी उनके पास रैली के स्थान तक यात्रा करने के लिए पैसा नहीं है और ना ही उनके पास वहाँ तक जाने के लिए घंटो-घंटों का समय है | उसके अलावा क्या होगा अगर बिकाऊ मीडिया उनकी रैली की खबर छापने से माना कर दे या फिर रैली में भाग लेने वाले कार्यकर्ताओं की संख्या झूठी बता दे ?

मेसेज-आदेश लाखों-करोड़ों लोगों द्वारा एक नेता को भेजे जा सकते हैं जेसे कि भ्रष्ट सोनिया गांधी या फिर भ्रष्ट सूप्रीम कोर्ट के जज खरे या फिर भ्रष्ट मनमोहन आदि | पेरन्तु लाखों-करोड़ों लोग इन भ्रष्ट नेताओं को घेर नहीं सकते |

  • एक जमीनी विरोध प्रदर्शन जैसे रैली या नारेबाजी अपना कोई भी स्थायी रिकोर्ड नहीं छोड़ता | नेताओं के एस.एम.एस का रिकोर्ड फोन कोंपनियों द्वारा एक साल तक सुरक्षित रखे जाते हैं और मंत्रियों, जज को आदेश दिया जा सकता है कि उनके पब्लिक मोबाइल और उनके वेबसाइट को जोड़ें ताकि नागरिकों ने उनको जो मेसेज-आदेश उनके पब्लिक मोबाइल पर दिए हैं, वे अपने आप जनसेवक की वेबसाइट पर प्रकाशित हों और भेजे गए मेसेज-आदेशों का रिकोर्ड जनसेवक की वेबसाइट पर सभी को उपलब्ध हो | फिर, उन मेसेज-आदेशों को सभी नागरिक दख सकेंगे और कोई भी नागरिक भेजे गए मेसेज-आदेशों की जांच भी कर सकेगा कि कितने असली हैं और कितने नकली |
  • और जमीनी विरोध-प्रदर्शन बहुत महंगे होते हैं, उनमें सारी जनता की ऊर्जा व्यर्थ हो जाती है और वे सिर्फ छुट्टियों के दिनों मे ही संभव है, नहीं तो भाग लेने वाले व्यक्ति के रोजी-रोटी का नुकसान होता है | यदि मीडिया जमीनी विरोध की खबर न दिखाये, तो फिर जमीनी विरोध-प्रदर्शन का कोई लाभ नहीं होता  जबकि एसएमएस द्वारा आज्ञा भेजना बहुत ही सस्ता मधायम है, हर कोई इसे कर सकता है | जबकि एक मेसेज भेजना सस्ता है तथा भेजे गए मेसेज-आदेश का रिकोर्ड लोग देख भी सकते हैं बिना बिकाऊ मीडिया की दया के |

इस तरह “जनसेवक को मेसेज-आदेश” से समर्थकों की संख्या का सबूत, दूसरे तरीकों की तुलना में, बहुत कम कीमत में और कहीं अधिक प्रभावशाली तरीके से प्राप्त हो सकता है | नारेबाजी और मोमबत्ती जलाने में कार्यकर्ताओं का घंटों-घंटों समय खर्च होगा और उनको आने-जाने (यातायात) के लिए 100 रुपये से 300 रुपये लगेंगे और दूसरे खर्चे भी होंगे | इसके अलावा, यदि `जनसेवकों को मेसेज-आदेश` नहीं भेजे गए, तो अपने प्रिय नेता को प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनाने के लिए केवल नारेबाजी करना बेकार है | क्यूंकि केवल सांसदों के पास किसी व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाने का अधिकार है और केवल विधायकों के पास कीस व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाने का अधिकार है |  

तो कुल मिलाकर, समर्थकों की संख्या सिद्ध करने के लिए जनसेवकों को मेसेज-आदेश भेजना कहीं अधिक प्रभावशाली है | इस प्रचार के तरीके को बिकाऊ मीडिया से भी कोई समर्थन नहीं चाहिए, ये कम खर्चे वाली है | और भी कई सारे लाभ हैं, इस प्रचार-तरीके के अन्य प्रचार तरीकों की तुलना में | 

इस प्रचार-तरीके के विरोध में एक तर्क जो दिया जाता है – “ भारत में बहुत सारे लोगों के पास मोबाइल फोन नहीं है” | देखिये, कितने लोगों के पास समय और पैसा दोनों है रैली में बार-बार जाने के लिए ? निश्चित ही, 70 % से अधिक नागरिक-मतदाता के पास मोबाइल हैं और वे जनसेवकों को मेसेज द्वारा आदेश दे सकते हैं | जबकि उतने लोगों के पास बार-बार रैली में जाने के लिए पैसा और समय नहीं होगा | इसलिए हर तरह से, जनसेवकों को मेसेज भेजकर जन-समर्थन की संख्या सिद्द करना एक जयादा अच्छा तरीका है |
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2.6. बिना स्पष्ट मांगों के विरोध-प्रदर्शन करना व्यर्थ है

बिना स्पष्ट मांगों के विरोध-प्रदर्शन करना व्यर्थ है | यदि सरकारी कर्मचारियों को विस्तृत निर्देश (या ड्राफ्ट) नहीं दिए गए और यदि कोई ऐसा तरीका नहीं बताया गया, जिससे आम-नागरिक सरकारी कर्मचारियों को प्रस्तावित प्रक्रिया का दुरुपयोग करने से रोक सकें, तो फिर ऐसी बिना स्पष्ट मांग के विरोध-प्रदर्शन करने का उल्टा असर पड़ेगा | कैसे ? नेता चुनाव जीतने के बाद, ऐसा कानून नहीं बनाएगा जो आपके मन में था, लेकिन एक कमियों वाला कानून बनाएगा और कहेगा कि ये कानून जनता की मांग के कारण लाया गया है |

उदाहरण, यदि आपने मांग की थी- “मजबूत भ्रष्टाचार विरोधी कानून लाओ ” पर उसका ड्राफ्ट आपने नहीं दिया, तब नेता ऐसा कमियों वाला कानून बना सकते हैं, जो धनी या प्रभावशाली अपराधियों को आपस में सांठ-गाँठ बना कर सजा से बचने का अवसर दे | और आम-नागरिक इस कमियों वाले कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए कुछ नहीं कर सकते हैं |

इसलिए, हर एक सच्चे कार्यकर्ता या देशभक्त को अपने सुझावों के लिए ड्राफ्ट देना चाहिए और अपने नेता को ये अनुरोध करना चाहिए कि ये ड्राफ्ट अपने वेबसाइट या घोषणा-पत्र पर डाले, ताकि विभिन्न सरकारी कर्मचारी उसका सही से पालन कर सकें |

2.7. क्यूँ भ्रष्ट नेता और भ्रष्ट उच्च वर्ग के लोग नारेबाजी करने, मोमबत्ती जलने, नेता को पूजने पर आग्रह करते हैं (उनका गुप्त उद्देश्य क्या है) और वे क्यूँ “आम-नागरिकों द्वारा जनसेवक को मेसेज-आदेश” का विरोध करते हैं — ताकि सच्चे कार्यकर्ता थक जायें, बड़े नेताओं का प्रभाव बना रहे और आज का भ्रष्ट सिस्टम वैसे ही चलता रहे

   एक और झूठ जो सुब्रमनियम, मोदी, केजरीवाल और दूसरे नेता, कार्यकर्ताओं और आम-नागरिकों को बोलते हैं – `अपने पसंद के नेता और पार्टी को बहुमत से चुनकर जितवाओ और वे सभी अच्छे कानून बनायेंगे` ये पूरी तरह से असंभव है | क्यों ? मान लीजिए, किसी तरह एक पार्टी को लोकसभा में बहुमत भी मिल जाती है, लेकिन उसको 5-10 साल या ज्यादा चाहिए राज्यसभा में बहुमत पाने के लिए और कानूनों को पारित करने के लिए | यदि ये भी किसी तरह संभव हो गया कि कोई कानून दोनों सदनों में पारित हो गया, तो विदेशी कम्पनियाँ सुप्रीम-कोर्ट में अपने एजेंट जजों द्वारा उस कानून को रद्द करवा सकती हैं | इसीलिए केवल कुछ गिने-चुने लोग ही शक्तिशाली विदेशी कंपनियों का सामना नहीं कर सकते क्योंकि आज विदेशी कंपनियों का अधिकतर मीडिया और कोर्ट पर प्रभाव है |

अकेले, बिना किसी समूह में, प्रभावशाली तरीकों का उपयोग करके महीने में अच्छे समाधान-ड्राफ्ट के  प्रचार के लिए केवल 15-20 घंटे देने वाले, केवल 2-4 लाख कार्यकर्ता और कुछ करोड़ आम-नागरिक चाहिए देश के लिए अच्छे कानून-प्रक्रियाओं पर जन-आन्दोलन खड़ा करने के लिए और प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री को मजबूर करने के लिए कि वे इन कानून-ड्राफ्ट को भारतीय राजपत्र में डालें | मैं श्रोताओं से विनती करूँगा कि वे अध्ययन करें कि कैसे बदलाव आये थे असली, सफल, कार्यकर्ता-आधारित, जन-अन्दोलान के द्वारा, जैसे भारतीय नौसेना विद्रोह, 1946, आपातकाल जन-आन्दोलन, 1977 आदि | (जिसमें आम-नागरिकों ने इंदिरा को मजबूर किया था राजपत्र में छापने के लिए कि `आपातकाल समाप्त किया जाता है`)

कांग्रेस के शीर्ष नेता, राष्ट्रीय सेवा संघ के शीर्ष के लोग, अन्ना हजारे, अरविन्द केजरीवाल, सुब्रमण्यम स्वामी सभी ने इस प्रस्ताव का बहुत विरोध किया है | इन सभी ने मंत्रियों और बाकी जन-सेवकों को एस.एम.एस., द्वारा आदेश देने से इनकार किया है और अभी तक, स्वयं कभी भी एस-एम-एस द्वारा एक भी कानून-ड्राफ्ट, जो आम आदमी को सत्ता और अधिकार दे, ऐसा ड्राफ्ट छपवाने का आदेश किसी भी मंत्री तथा बाकी जन-सेवकों को नहीं दिया है |

इन सभी नेताओं ने जोर डाला है कि कार्यकर्ता कभी भी प्रधानमंत्री एवं अन्य मंत्रियों को एस-एम-एस द्वारा कोई आदेश न दें और नारेबाजी, समूह प्रदर्शन (रैली), नेता-भक्ति आदि में ही खुद को सीमित रखकर अगले चुनावों का इंतज़ार करें | हमारे विचार से, यदि यह तरीके अकेले किये जायें और जनसेवकों को मेसेज-आदेश नहीं भेजे जायें, तो वे बेकार हैं और समय की बर्बादी हैं | लेकिन हम इन तरीकों का विरोध नहीं करते और न ही किसी कार्यकर्ता से आग्रह करते हैं कि ये सब न करें, केवल इतना कहते हैं कि अपने तरीकों के अलावा 5 मिनट दें अपने जनसेवकों को मेसेज-आदेश भेजने के लिए और भेजे गए मेसेज-आदेशों को अपने फेसबुक वाल नोट, ब्लॉग आदि पर जनता को बताने के लिए |

लेकिन कांग्रेस के शीर्ष के नेता, राष्ट्रीय स्वयंसेवी सेवा संघ के शीर्ष के नेता, अन्ना हज़ारे, अरविन्द केजरीवाल, सुब्रमण्यम स्वामी आदि साफ़ तौर पर अपने कार्यकर्ताओं से कहते हैं कि उन्हें मंत्रियों को एस.एम.एस के द्वारा आदेश नहीं भेजना चाहिए | क्यूँ ? हमें नहीं पता | उन्हीं से पूछिए |

हम कार्यकर्ताओं को नारेबाजी करने या मोमबत्ती जलने को छोड़ने के लिए नहीं कह रहे हैं | लेकिन हम ये विनती कर रहे हैं कि कार्यकर्ता अपने सांसद, जज, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति आदि को आवश्यक मेसेज-आदेश भेजें | लेकिन अजीब बात है कि समय-बरबादी करने वाले नेताओं ने अपने कार्यकर्ताओं को बोला है कि वे जज, प्रधानमंत्री, सांसद, आदि को मेसेज-आदेश ना भेजें !!!

क्यूँ काँग्रेस के शीर्ष के नेता, राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ के शीर्ष के लोग, अन्ना, अरविंद भाई आदि बड़े नेता नारे लगाने या रैली करने पर जोर देते हैं, इसका एक संभव कारण है कि ऐसा करते-करते कार्यकर्ता थक जाएँ, कार्यकर्ता आज के बुरे सिस्टम को सुधारने के लिए कुछ कार्य ना कर पाएं और आज का भ्रष्ट सिस्टम पहले जैसा कायम रहे | दूसरा कारण ये है कि ये समय बर्बाद करने वाले नेता, ऐसा कोई तरीका नहीं चाहते जो कि बिना नेता का हो और जो स्वचालित (स्वतंत्र) हो |

समान्यतः नारे लगाना, मोमबत्ती जलाना आदि कार्यों के लिए एक संगठन कि जरूरत पड़ती है, जबकि मेसेज के द्वारा आदेश भेजना कोई भी अकेले या छोटे समूह में कर सकता है | और यदि मैसेज-आदेश अच्छा है, तो वह बिना नेता के आदेशों के ही, लोगों तक पहुँच जाएगा | इस प्रकार, यदि नागरिक “प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उच्च न्यायधीश आदि को मेसेज के द्वारा आदेश भेजते हैं “, तब नेताओं की राजनीति नहीं चलेगी और सच्चा व्यवस्था-परिवर्तन होगा और सच्चे कार्यकर्ता जीत जायेंगे |

तब, यदि जनसेवकों को मेसेज के द्वारा आदेश भेजना प्रचलित हो जाता है, तो सभी अनशन की दुकान वालों का धंधा चौपट हो जाएगा | इसीलिए, इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि ज्यादातर नेताओं ने “नागरिकों को जनसेवकों को मेसेज-आदेश करना चाहिए” के सुझाव को नज़र-अंदाज़ किया |

ये समय-बरबाद करने वाले नेता, इस बात पर भी ज़ोर देते हैं कि चुनावों का इंतज़ार करो | तब, कार्यकर्ता एक ही बदलाव कर सकते हैं कि संसद में नए व्यक्ति लायें, बिना सिस्टम में कोई भी बदलाव लाये | इस प्रकार, पुराना भ्रष्ट सिस्टम पहले जैसे चलता रहेगा क्यूंकि इसकी कोई गारंटी नहीं है कि इन नए सांसदों में से 80% कल दबेंगे नहीं या बिकेंगे नहीं | और जब ऐसा होता है, कुछ कार्यकर्ता इतने दुखी हो जाते हैं कि वे राजनैतिक सक्रियता (देश की व्यवस्था सुधारने का कार्य) हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ देते हैं |

लेकिन, यदि कार्यकर्ता खुद से “प्रधानमंत्री, सांसद आदि जनसेवकों को मेसेज-आदेश” भेजना शुरू कर देते हैं, तब सभी बड़े नेता जैसे भाजपा, काँग्रेस, आ. आ. पार्टी आदि के बड़े नेताओं का कार्यकर्ताओं पर प्रधानता (वर्चस्व) समाप्त हो जायेगी |

यदि कार्यकर्ता अपने सांसद, प्रधानमंत्री आदि जनसेवकों को स्वयं (खुद) मेसेज-आदेश भेजना शुरू कर देते हैं, तो फिर कोई भी आंदोलन अधिक तेजी से चलेगा लेकिन फिर कांग्रेस-शीर्ष, राष्ट्रिय स्वयं-सेवक संग के शीर्ष के बड़े नेता, अन्ना, अरविन्द भाई आदि का कार्यकर्ताओं में प्रभाव कम हो जायेगा और उनका राजनैतिक मूल्य भी कम होगा और ये नेता समाज के केन्द्र-बिंदु में नहीं रहेंगे | इसके अलावा, यदि आम-नागरिक जनसेवकों को मेसेज-आदेश सीधे भेजना शुरू कर देते हैं, तब ये नेताओं की मुद्दों पर नियंत्रण करने की क्षमता कम हो जायेगी क्यूंकि फिर नागरिक उन मुद्दों पर मेसेज-आदेश भी भेज सकते हैं, जो नेताओं को व्यक्तिगत कारणों से नहीं चाहिए या पसंद ना हों |

इसके अलावा, विदेशी कम्पनियों के मालिक और ईसाई धर्म-प्रचारक, ऐसे समय बरबाद करने वाले नेताओं का प्रचार करने के लिए, बिकाऊ-मीडिया वालों को बहुत अधिक धन दे रहे हैं | विदेशी कम्पनियों के मालिक और ईसाई धर्म-प्रचारक नहीं चाहते कि नागरिक अपने जनसेवकों को मेसेज द्वारा आदेश करें क्यूंकि यदि ऐसा होगा तो, जनसेवक जनहित कार्य करने के लिए मजबूर हो जायेंगे और बहुत सारे जनहित के कार्य विदेशी कम्पनियों के मालिक और ईसाई धर्म-प्रचारकों के भ्रष्ट तरीकों के विरुद्ध जाते हैं |

आजकल ,कार्यकर्ता ये मानते हैं कि बिना बड़े नेता के देश की व्यवस्था में अच्छा बदलाव लाना संभव नहीं है और इसलिए कार्यकर्ता बड़े नेताओं के निर्देशों की प्रतीक्षा करते रहते हैं | इस प्रकार, कार्यकर्ता अपना समय बरबाद करते हैं और आज की भ्रष्ट व्यवस्था कायम रहती है | लेकिन, यदि कार्यकर्ता स्वयं निर्णय लेना शुरू करें कि कौन से प्रक्रिया-ड्राफ्ट देश के आम-नागरिकों के लिए हितकारी हैं और स्वयं इन जनहित के ड्राफ्ट का प्रचार करें, तब बड़े नेता या नेता कार्यकर्ताओं के समय को बर्बाद नहीं कर पाएंगे और फिर उच्च वर्ग के लोगों की इन समय बरबाद करने वाले नेताओं द्वारा भ्रष्ट व्यवस्था को कायम रखने की क्षमता कम हो जायेगी |

2.8. `जनसेवकों को मेसेज-आदेश` के अनुसार किये गए नागरिकों के कार्य संचयी होंगे और एक दूसरों को बढ़ाने वाले होंगे (योगात्मक) जबकि दूसरे प्रचार-तरीकों में किये गए अधिकतर कार्य एक दूसरों को काटते हैं

यदि हम सच्चे कार्यकर्ता सभी कार्यकर्ताओं और नागरिकों को ये आदत डलवा देते हैं, कि वे स्वयं, सीधे अपने जनसेवक जैसे प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक आदि को मेसेज-आदेश भेजते हैं, तब फिर समय बरबाद करने वाले कार्य, जो अन्ना, अरविन्द भाई, सुब्रमनियम, भा.ज.पा., कांग्रेस आदि द्वारा प्रचार किये जाते हैं, का अंत होगा |

और इस प्रचार-तरीके के उपयोग से, कार्यकर्ताओं के कार्य एक दिशा वाले हो जायेंगे और `संचयी` हो जायेंगे, मतलब यदि अलग-अलग लोगों की अलग-अलग मांगें हैं, तो ये प्रचार-तरीके के उपयोग से, उनके मांगों के लिए किये गए कार्य एक दूसरे को काटेंगे नहीं लेकिन कार्य एक दूसरे के प्रभाव को बढ़ाएंगे और एक स्तर पहुँचने के बाद, परिणाम दिखना शुरू हो जायेंगे |

उदाहरण – यदि कुछ नागरिक अपने जनसेवक को कोई कानून रद्द करने के लिए मेसेज-आदेश देते हैं और दूसरे नागरिक उस जनसेवक को वो ही कानून चालू रखने के लिए मेसेज-आदेश भेजते हैं लेकिन दोनों श्रेणियों के नागरिकों ने अपने जनसेवक को अपने पब्लिक मोबाइल को अपने पब्लिक वेबसाइट के साथ जोड़ने के लिए मेसेज-आदेश किया ताकि भेजे गए मेसेज-आदेश अपने आप जनसेवक के वेबसाइट पर प्रकाशित हों और सभी नागरिकों को दिखें और सभी नागरिक प्रामाणिक तरीके से जान सकें कि जनता की राय क्या है |

तो फिर, ये दोनों, आपस में एक दूसरे के विपरीत लगने वाले कार्य, जनता की राय इकठ्ठा करने का एक पारदर्शी और प्रामाणिक तरीका का बढ़ावा कर रहे हैं | तो, `जनसेवक को मेसेज-आदेश` के इस प्रचार-तरीके में नागरिकों द्वारा किये गए कार्य एक दूसरे को काटते नहीं हैं, बलकी एक दूसरे के प्रभाव को बढ़ाते ही हैं | जबकि, दूसरे प्रचार-तरीकों में नागरिकों द्वारा किये गए अधिकतर कार्य एक दूसरे को काटते हैं |

2.9 सभी कार्यकर्ताओं और नागरिकों में अपने जनसेवकों को स्वयं, सीधे मेसेज-आदेश भेजने की आदत डालना और असली व्यवस्था परिवर्तन (सक्रियतावाद) को बढ़ावा देना

हर बार, जब कार्यकर्ताओं का एक समूह किसी समस्या पर बोले, तब हम असली कार्यकर्ता दूसरे कार्यकर्ताओं को कह सकती हैं कि अपने जनसेवकों जैसे प्रधानमंत्री, सांसद आदि को मेसेज-आदेश भेजें  कि उन समस्याओं को कम करने के लिए आवश्यक समाधान-ड्राफ्ट को भारतीय राजपत्र में छपवाएं | और साथ ही उन कार्यकर्ताओं को जनसेवकों को ये भी मेसेज-आदेश करना चाहिए कि जनसेवक अपने पब्लिक फोन पर प्राप्त मेसेज-आदेशों को जनसेवक के वेबसाइट पर डाले |

इसके अलावा, जब भी कोई नागरिक देश की कोई बड़ी समस्या के बारे में बात करे, हम सच्चे कार्यकर्ता, उस समस्या को दूर करने के लिए, भारतीय राजपत्र में छपवाने के लिए समाधान-ड्राफ्ट अपने जनसेवकों को भेज सकते हैं और फिर सभी कार्यकर्ताओं/नागरिकों को कह सकते हैं कि इन समाधान-ड्राफ्ट को समर्थन करने के लिए जनसेवकों को मेसेज-आदेश करें |

संक्षिप्त में, सभी कार्यकर्ता और नागरिक इस प्रकार असल में व्यवस्था परिवर्तन को बढ़ावा दे सकते हैं –

(1) चर्चा करके निर्णय करें कि देश के आम-नागरिकों के लिए कौन से समाधान-ड्राफ्ट की आवश्यकता है –
सच्चे कार्यकर्ताओं को सभी कार्यकर्ताओं और नागरिकों से कहना चाहिए कि वे चर्चा करके निर्णय करें
कि देश के आम-नागरिकों के लिए कौन से प्रक्रिया-ड्राफ्ट हितकारी हैं और फिर –

(2) जनसेवकों को ई-मेल, पत्र, मेसेज आदि द्वारा समाधान-ड्राफ्ट भेजना
सभी कार्यकर्ताओं और नागरिकों   को वे समाधान-ड्राफ्ट, जो उनको लगता है कि देश के आम-नागरिकों के लिए अच्छे हैं, अपने जनसेवकों को ई-मेल, पत्र, मेसेज आदि के द्वारा भेजने चाहिए और फिर –

(3) अपने जनसेवकों को मेसेज-आदेश भेजना कि वे समाधन-ड्राफ्ट को राजपत्र में छपवाएं और जनसेवकों को प्राप्त मेसेज-आदेशों को जनसेवक अपने वेबसाइट पर डालें –
सच्चे कार्यकर्ताओं को सभी कार्यकर्ताओं  और नागरिकों से कहना चाहिए कि अपने जनसेवकों को मेसेज द्वारा आदेश दें कि उनके पसंद का  समाधान-ड्राफ्ट राजपत्र में छपवाएं और अपने जनसेवकों को ये भी मेसेज-आदेश दें कि अपना पब्लिक मोबाइल और पब्लिक वेबसाइट को आपस में जोड़ें, ताकि उनके द्वारा प्राप्त सभी मेसेज-आदेश अपने  आप जनसेवक की वेबसाइट पर प्रकाशित हो जायें और सभी नागरिक उन मेसेज-आदेशों को कभी भी देख सकें और जांच कर सकें

(4) नागरिकों को अपने जनसेवकों को भेजे गए आदेश जनता को दिखाने चाहिए –
नागरिकों को अपने  जनसेवकों को मेसेज, पत्र आदि द्वारा भेजे गए आदेश को अपने फेसबुक वाल, नोट, पर्चे आदि द्वारा  जनता को दिखाने चाहिए, ताकि जनता को प्रमाण मिले और दूसरे नागरिक भी ऐसा करने के लिए  प्रेरित हों |

(5) सभी कार्यकर्ता-नेताओं से कहना कि अपने जनसेवकों को मेसेज-आदेश भेजें कि जनहित के प्रक्रिया-ड्राफ्ट को राजपत्र में छपवाएं और भेजे गए मेसेज-आदेश को जनसेवक अपने वेबसाइट पर दिखाए –
सच्चे कार्यकर्ताओं को सभी कार्यकर्ताओं और नागरिकों से कहना चाहीये कि अपने कार्यकर्ता-नेता को   बोलें कि अपने जनसेवक को मेसेज-आदेश भेजीं कि जनहित के प्रक्रिया-ड्राफ्ट को तुरंत राजपत्र में  छपवाएं और अपने जनसेवको को ये भी आदेश दें कि उनको प्राप्त सभी मेसेज-आदेशों को अपने
वेबसाइट पर प्रकाशित करें |

जब एक संख्या से ज्यादा नागरिकों ने अपने जनसेवक को मेसेज-आदेश किये हैं और अपने भेजे मेसेज-आदेशों को जनता को भी दिखाया है सबूत के तौर पर, तो फिर जनसेवक मजबूर हो जायेगा कोई जवाब देने के लिए या उसकी पोल खुल जायेगी लाखों-करोड़ों के सामने |.

और केवल जनसेवक को मेसेज-आदेश भेजना एक प्रकार का टी.सी.पी. (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली = नागरिकों का अधिकार कि वो किसी भी दिन अपना एफिडेविट, स्कैन करवाकर, प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर रखवा सकें, ताकि नागरिकों की राय दबाई नहीं जा सके, बिना दबाने का प्रयास करने वाली की पोल लाखों-करोड़ों में खुले ; चैप्टर 1, सैक्शन 1.3, www.prajaadhinshasan.blog.com देखें, टी.सी.पी. के ड्राफ्ट के लिए) | कैसे ?

क्यूंकि आम-नागरिक यदि अपने जनसेवक को मेसेज-आदेश भेजते हैं और अपने भेजे गए मेसेज-आदेश जनसमूह को (मतलब, अधिक से अधिक लोगों को) बताते हैं, तो फिर जनता को सबूत मिलेगा और दूसरे नागरिकों को भी ऐसा करने की प्रेरणा मिलेगी | और जब, अपनी-अपनी मांगो को पूरा करवाने के लिए, पर्याप्त संख्या में नागरिक इस प्रामाणिक तरीके से अपना प्रचार करते हैं, तब जनसेवक मजबूर हो जायेंगे अपना पब्लिक मोबाइल और अपनी वेबसाइट को जोड़ने के लिए और जनसेवक मजबूर हो जायेंगे इस `जनसेवक को मेसेज-आदेश` प्रक्रिया को और प्रभावशाली बनाने के लिए कदम उठाने के लिए |

महत्त्व का मुद्दा ये है कि नागरिकों में अपने जनसेवक जैसे प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक आदि को मेसेज–आदेश भेजने की आदत डलवाना | एक बार नागरिकों को ऐसी आदत डल जाये, तो फिर नागरिक अपने आप मांग करेंगे कि उनका मेसेज-आदेश वेबसाइट पर आना चाहिए और समान मेसेज-आदेश के सॉफ्टवेर द्वारा समूह बनने चाहिए |

2.10 कार्यकर्ताओं को सुझाव

हमारी राय में, अनशन, नारेबाजी, रैली करना, मोमबती जलाना, नेता का पूजन करना आदि. सब समय की बरबादी है | लेकिन, फिर भी यदि आपको ये कार्य करने ही हैं, तो कृपया करें | लेकिन, ये कार्य करने के साथ कुछ ऐसा कार्य करें जो वे सभी नागरिक भी कर सकते हों, जिनके पास पैसा या समय नहीं है रैलियों में जाने के लिए, मोमबत्ती जलने के लिए, नेता का पूजन करने आदि के लिए — कृपया अपने जनसेवक को मेसेज-आदेश करें कि वे आपके पसंद के जनहित के समाधान-ड्राफ्ट को भारतीय राजपत्र में छपवाएं या अपने सांसद को मेसेज-आदेश दें कि आपके प्रिय नेता को देश का प्रधानमंत्री बनाने के लिए तुरंत संसद में प्रस्ताव शुरू करवाएं |

केवल इतना कहना पर्याप्त नहीं है कि आप किसी जनहित के ड्राफ्ट का समर्थन करते हैं या किसी नेता का समर्थन करते हैं | कृपया अपने जनसेवक को जरूरी मेसेज-आदेश भेजें और उसके बाद, अपने भेजे गए मेसेज-आदेशों को अपने ब्लॉग, वेबसाइट, फेसबुक वाल नोट, पर्चों आदि तरीकों द्वारा ज्यादा से ज्यादा लोगों को बताएं ताकि जनता को सबूत मिले और दूसरे नागरिकों को भी ऐसा करने की प्रेरणा मिले | यदि आपके पास ब्लॉग नहीं है, तो फिर आप अपने भेजे गए मेसेज-आदेश को righttorecall.rtr@gmail.com पर भी ई-मेल कर सकते हैं, ताकि वो मेसेज-आदेश http://righttorecallmails.blogspot.in/ वाले ब्लॉग पर अपने आप छप जाये और समूह-बद्ध हो जाये |

यदि भेजे गए मेसेज-आदेशों की संख्या करोड़ों में पहुँच जायेगी, तो फिर महात्मा उधम सिंह जैसे वीर पुरुषों को प्रेरणा मिलेगी कि वे प्रधानमंत्री से मिलें और फिर वर्तमान प्रधानमंत्री या अगला प्रधानमंत्री वो जनहित का ड्राफ्ट भारतीय राजपत्र में छ्पवायेगा |

2.11 कुछ अतिरिक्त सुविधाएं जो सांसद आदि जनसेवक गरीबी की रेखा के नीचे नागरिक, जिनके पास मोबाइल नहीं है, उनके लिए अपनी राय जनसेवकों को देने का एक प्रामाणिक और विश्वसनीय तरीका दे सकते हैं

2.11.1 कैसे सांसद एक विश्वसनीय `संक्षिप्त कोड सिस्टम` बना सकता है जिसमें नागरिक स्वयं वे अपने पसंद के संक्षिप्त कोड की अर्जी एफिडेविट पर दे सकते हैं

1. कोई भी नागरिक-मतदाता सांसद के दफ्तर जाकर, एक निश्चित शुल्क देकर, एफिडेविट (जो किसी भी कार्यपालक मैजिस्ट्रेट (एक्सिक्यूटिव मैजिस्ट्रेट) द्वारा प्रमाणित होगा) पर अपना शोर्ट कोड देगा, जो वो नागरिक सांसद की वेबसाइट पर दर्ज करवाना चाहता है | और नागरिकों को एक रसीद दी जायेगी, जिसमें नागरिकों की वोटर आई.डी. संख्या नम्बर और एफिडेविट नंबर होगा |

2. सांसद के कर्मचारी एफिडेविट की जांच कर सकते हैं, ताकि उसमें कुछ मानहानी करने वाले शब्द न हों | सांसद और उसके कर्मचारी, एफिडेविट को स्वीकृत करके सांसद के वेबसाइट पर दर्ज कर सकते हैं या उनको खारिज (अस्वीकृत) कर सकते हैं, वेबसाइट पर कारण बताते हुए | अस्वीकृत एफिडेविट की एक हार्ड कॉपी सांसद के दफ्तर पर, रिकोर्ड के तौर पर रखी जायेगी |

3. सांसद के कर्मचारी एफिडेविट को वेबसाइट पर अपलोड करेंगे और एक संक्षिप्त कोड जारी करेंगे जैसे वोटर#.0001, वोटर#.0002 आदि, जहाँ वोटर# उस मतदाता का वोटर संख्या नंबर है, जिसने ये प्रस्ताव किया है या यदि सांसद यदि उचित समझें तो मतदाता द्वारा अपने एफिडेविट पर मांगे गए संक्षिप्त कोड को भी जारी कर सकता है |

4. सांसद कोई डोमेन नाम खरीद सकता है, जैसे `mpname.com` | सांसद के कर्मचारी, डोमेन पर एफिडेविट को डाल सकते हैं, जैसे mpname.com\tcp\voter#001.htm , mpname.com\tcp\voter#002.htm

5. फिर, दूसरे नागरिक पंजीकृत संक्षिप्त कोड के लिए मेसेज-आदेश भेज सकते हैं जैसे संक्षिप्त कोड वोटर#.0010 हाँ या संक्षिप्त कोड वोटर#.0010 ना आदि आदि | मतलब कि मेसेज-आदेश में पंजीकृत संक्षिप्त कोड के साथ केवल `हाँ` या `ना` जोड़ना है |

2.11.2 सिस्टम जो सांसद आदि जनसेवक गरीब नागरिक, जिनके पास मोबाइल नहीं है, उनके लिए चालू कर सकते हैं ताकि बिना मोबाइल के गरीब भी अपनी राय दे सकें –

1. गरीबी रेखा के नीचे के नागरिक, जिनके पास मोबाइल नहीं है, उनको चुम्बकीय कार्ड (मैग्नेटिक कार्ड) या स्मार्ट कार्ड (लगभग बीस रुपये का) दिया जायेगा डाक द्वारा या सांसद के दफ्तर पर |

2. गरीब, जिनके पास मोबाइल नहीं है, उनको 10 रुपये का एफिडेविट पर अपनी राय लिख कर सांसद के दफ्तर में जमा करनी होगी | सांसद के कर्मचारी नागरिकों का अंगुली का छाप, चुम्बकीय कार्ड, अंगुली के छाप द्वरा उनकी जांच करके, उनके एफिडेविट को तुरंत स्कैन करके सांसद के वेबसाइट पर रखेंगे | मान-हानि के शब्दों वाली एफिडेविट खारिज की जायेगी और खारिज करने का कारण सांसद के वेबसाइट पर दिया जायेगा | अस्वीकृत एफिडेविट की एक हार्ड कॉपी सांसद के दफ्तर में रखी जायेगी |

3. पहले वर्ष में, सांसद की पूंजी के 500 लाख में से, सांसद हरेक गरीब नागरिक-मतदाता, जिसके पास मोबाइल नहीं है, उनपर 50 रुपये प्रति गरीब नागरिक-मतदाता खर्च करेगा (मतलब 20 रुपये चुम्बकीय कार्ड के लिए और 2-3 एफिडेविट हर साल का खर्चा) | इस तरह, सभी नागरिक-मतदाता, पहले वर्ष के बाद, प्रामाणिक तरीके से अपने सांसद को अपने मेसेज-आदेश दे सकते हैं |

4. दूसरे वर्ष से, सांसद उसको प्राप्त सांसद-पूंजी में से आधे पैसे और अन्य दान से प्राप्त पैसे जैसे पार्टी का चंदा, आदि से प्रयोग किये गए (सैकंड हैण्ड) मोबाइल, गरीब, बिना मोबाइल के मतदाताओं को मुफ्त दिया जायेगा |

और शेष का पैसा, सांसद गरीब, बिना मोबाइल के मतदाता को हर वर्ष 2-3 मुफ्त एफिडेविट देने के लिए करेगा |

2.12  कैसे हम टी.सी.पी. , राईट टू रिकॉल-प्रधानमंत्री और दूसरे समाधान-ड्राफ्ट को लागू करवा सकते हैं कार्यकर्ता-आधारित जन-आन्दोलन द्वारा ?

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1. नागरिकों में देश के लिए जरूरी समाधान-ड्राफ्ट के बारे में चर्चा और आम सहमति बनाना  —>

2. जनसमूह में समाधान-ड्राफ्ट का बढ़ावा और मेसेज और मेल द्वारा नेताओं को आदेश भेजना कि वे समाधान-ड्राफ्ट को राजपत्र में छपवाएं —>

3. भेजे गए मेसेज और मेल को अपने फेसबुक वाल नोट, ब्लॉग आदि पर रखना, मतलब ऐसी जगह रखना जहाँ कोई भी आसानी से, कभी भी देख सके, ताकि जनता को प्रमाण मिले और दूसरों को भी ऐसा करने की प्रेरणा मिले —->

4. भेजे गए मेसेज और मेल के सबूतों का नेता पर दबाव और उधम सिंह जैसे वीर का नेताओं पर दबाव —>

5. नेता (प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री) कानूनों को राजपत्र में छापने के लिए मजबूर हो जायेंगे (जैसे इंदिरा मजबूर हो गयी थी १९७७ में छपने के लिए कि `आपातकाल समाप्त किया जाता है` और बहुत सारे अन्य उदाहरण)

3. यदि करोड़ों नागरिक अपने सांसद को मेसेज द्वारा आदेश भेजते हैं, समाधान-ड्राफ्ट को राजपत्र में छपवाने के लिए, तब महात्मा उधम सिंह / भगत सिंह जैसे वीर पुरुषों को प्रेरणा मिलेगी कि वे प्रधानमंत्री से मिलें और फिर करोड़ों लोगों के सबूतों के दबाव और उधम सिंह के दबाव के कारण, वर्त्तमान प्रधानमंत्री या अगले प्रधानमंत्री मबूर हो जायेंगे, नागरिकों के द्वारा मांगे गए समाधान-ड्राफ्ट को राजपत्र में छपवाने के लिए

एक अकसर पूछा गया प्रश्न : मान लीजिए, करोड़ों नागरिकों ने अपने प्रधानमंत्री/सांसद को एक निश्चित कानून-ड्राफ्ट को राजपत्र में छपवाने के लिए मेसेज-आदेश किया | लेकिन हमारे नेताओं की चमड़ी बहुत मोटी है | तो क्या ये मोटी चमड़ी वाले प्रधानमंत्री/सांसद इन मेसेज-आदेशों को मानेंगे ?

उत्तर : यदि करोड़ों नागरिकों ने अपने सांसद/प्रधानमंत्री को किसी निश्चित कानून-ड्राफ्ट को राजपत्र में तुरंत छापने के लिए मजबूर किया, तब फिर वे मेसेज-आदेशों से ही प्रधानमंत्री राजपत्र में वो कानून-ड्राफ्ट छपवाने के लिए मजबूर नहीं होंगे ; लेकिन ये मेसेज-आदेशों से अहिंसा-मूर्ति महात्मा उधम सिंह जैसे वीर पुरुषों को  प्रेरणा मिलेगी कि वे प्रधनमंत्री से मिलें और करोड़ों लोगों द्वार दिए गए सबूत और ये उधम सिंह जैसे वीर मिलकर वर्तमान प्रधानमंत्री (या अगले प्रधानमंत्री) को मजबूर करेंगे कि नागरिकों द्वारा मांग किया गया कानून-ड्राफ्ट को राजपत्र में छपवाएं |

हमें विस्तार से बताने दीजिए |

हमने, कार्यकर्ताओं के लिए, एक नया प्रचार-तरीके का प्रस्ताव किया है और हमारी राय में, ये प्रचार-तरीका नारेबाजी, चरखा गुमाने, मोमबत्ती जलाने और केवल चुनाव लड़ने के तरीकों से कहीं ज्यादा अच्छा है | हम कार्यकर्ताओं से यह अनुरोध करते हैं कि –

  1. कार्यकर्ताओं को पहले ये निश्चय करना चाहिए कि वे कौन से समाधान-ड्राफ्ट को भारतीय राजपत्र में छपवाना चाहते हैं |
  2. फिर, कार्यकर्ताओं को वो समाधान-ड्राफ्ट प्रधानमंत्री, सांसद आदि जनसेवक को पत्र, ई-मेल या प्रधानमंत्री की वैबसाइट के जरिये भेजना है और एक क्रम संख्या (सिरियल नंबर) लेना चाहिए या फिर कार्यकर्ताओं को उसे स्थानीय कलेक्टर के पास जमा करवाना चाहिए और कलेक्टर के दफ्तर से दिनांक और जमा करने का नंबर लेना चाहिए या यदि किसी और कार्यकर्ता ने समाधान-ड्राफ्ट पहले से भेजा है, तो उस से क्रम संख्या लेना चाहिए |
  3. और फिर कार्यकर्ताओं को प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री को एस.एम.एस. द्वारा आदेश देना चाहिए कि वे उस प्रक्रिया-ड्राफ्ट (मसौदे) को राजपत्र में छापें |

    कार्यकर्ताओं को अपना मतदाता संख्या नंबर, तारीख भी एस.एम.एस. में बतानी चाहिए | इसके अलावा, कार्यकर्ता अपने जनसेवकों को मेसेज-आदेश भेज सकते हैं कि संसद में उनके प्रिय नेता को देश का प्रधानमंत्री बनाने के लिए तुरंत प्रस्ताव शुरू करें |

  4. कार्यकर्ताओं को अपने नेता जैसे अरविंद भाई, अन्ना, सुब्रमनियम आदि से सांसद / मुख्यमंत्री / विधायकों को एस.एम.एस. द्वारा आदेश देने के लिए कहना चाहिए | यदि ये बड़े नेता वास्तव में एस.एम.एस. द्वारा प्रधानमंत्री / सांसद आदि जनसेवकों को आदेश भेजते हैं, तो फिर और नागरिकों को राजी करना आसान हो जायेगा कि वे अपने जनसेवकों को अपने आदेश एस.एम.एस करें |
  5. कार्यकर्ताओं को अपने साथी कार्यकर्ताओं को कदम-1 (स्टेप-1) से कदम 4 और कदम-5 भी लाने के लिए कहना चाहिए |

कार्यकर्ता हम से एक वैध सवाल पूछते हैं कि क्यों ये मोटी चमड़ी वाले प्रधानमंत्री \ सांसद एस.एम.एस द्वारा भेजे गए इन आदेशों का पालन करेंगे, भले ही करोड़ों नागरिक इस तरह के एस.एम.एस भेजें ? फिर क्यों हम, कार्यकर्ताओं को प्रधानमंत्री\सांसदों को एस.एम.एस द्वारा आदेश देने के लिए कह रहे हैं ?

देखिये, हमारी ऐसी कोई भी धारणा नहीं है कि प्रधानमंत्री \ सांसद कोई भी समाधान-ड्राफ्ट (मसौदे) को केवल इसीलिए छापेंगे क्योंकि इन्हें करोड़ों नागरिकों के द्वारा एस.एम.एस के माध्यम से आदेश दिया गया है | एस.एम.एस द्वारा करोड़ों आदेश के सबूत और वो भी मीडिया के समर्थन के बिना, अहिन्सा-मूर्ति महात्मा उधम सिंह (या अहिन्सामूर्ति महात्मा भगत सिंह) के जैसे वीरों को विश्वास दिला देंगे कि उन्हें प्रधानमंत्री के साथ मिलना चाहिए, उनसे मुलाकात का समय लेकर या समय लिए बिना (नियुक्ति के साथ या नियुक्ति के बिना) | और वे प्रधानमंत्री को समझाने की कोशिश करेंगे की इस समाधान-ड्राफ्ट  को वह राजपत्र में छपवाए |

और उधम सिंह / भगत सिंह जैसे वीर किसी को समझाने में काफी कुशल होते हैं | वर्त्तमान प्रधानमंत्री या अगले प्रधानमंत्री इनसे निश्चित रूप से सहमत होंगे | आखिरकार, उधम सिंह / भगत सिंह जैसे वीरों ने 1947 में ब्रिटिश सांसदों को ब्रिटिश राजपत्र में `भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम` छपवाने को मजबूर किया था और 1977 में इंदिरा गांधी को भारत के राजपत्र में `आपातकालीन को समाप्त करने` के ड्राफ्ट को छापने के लिए मजबूर किया | उधम सिंह / भगत सिंह (जैसी वीरों) ने ऐसा तब किया जब ये साबित हो गया कि करोड़ों नागरिकों में किसी समाधान-ड्राफ्ट को राजपत्र में छपवाने पर आम-सहमति है

(राजपत्र या सरकारी आदेश मासिक या साप्ताहिक पत्रिका है जो सरकार के द्वारा जारी की जाती है और सभी सरकारी कर्मचारियों को इनमें प्रकाशित कानूनों का पालन करना होता है|) उसी तरह, उधम सिंह / भगत सिंह (जैसी वीर) अभी भी प्रधानमंत्री या अगले प्रधानमंत्री को राजी कर सकते हैं उस ड्राफ्ट को राजपत्र में छापने के लिए, जो जनसमूह की मांग है |

4. ऊधम सिंह का अर्थ

उधम सिंह का अर्थ है उधम सिंह के प्रकृति के व्यक्ति जो वीर, जान का खतरा उठाने के लिए तैयार रहते हैं, राष्ट्र-भक्त, बुद्धिमान होते हैं, अकेले काम करते हैं बिना किसी के निर्देश के | देश में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए वे समय बर्बाद करने वाले और अंत में हिंसा का परिणाम लाने वाले तरीके जैसे अनशन, धरना आदि के तरीके नहीं अपनाते और सबसे अधिक अहिंसात्मक तरीके अपनाते हैं देश में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए | वे जन-समूह के आम-राय के अनुसार काम करते हैं, अधिकारीयों से आम-नागरिकों के लिए अधिकार प्राप्त करने के लिए और इसीलिए उन्हें करोड़ों आम-नागरिकों का समर्थन प्राप्त होता है | उधम सिंह के कुछ उधाहरण हैं-  भगत सिंह, उधम सिंह, नेताजी सुभास चन्द्र बोस, 1946 नौसेना विद्रोह के नौसैनिक, 1977 आपातकाल-विरोधी आन्दोलन के कार्यकर्ता, आदि |

संक्षिप्त में उधम सिंह कोई भी वीर, बुद्धिमान और देशभक्त व्यक्ति हो सकता है | वे एक हो सकता है, या अनेक हो सकते हैं | वो मैं भी हो सकता हूँ या आप भी हो सकते हैं |

अहिंसा मूर्ति उधम सिंह का मतलब है कोई भी आम आदमी जो औसत आम आदमी से इस काम के प्रति ज्यादा समर्पित है |

समर्पण के स्तर होते हैं —

(क) कोई अपने समय का एक सप्ताह में 4 घंटे खर्च करते हैं और कोई एक सप्ताह में 20 घंटे खर्च करते हैं या इससे ज्यादा |

(ख) कोई अपनी आय का 1% खर्च करते हैं, कोई आय का 10% खर्च करते हैं या इससे ज्यादा |

(ग) कोई कुछ भी खतरा नहीं उठाएगा, कोई जेल में कुछ दिनों के लिए खतरा उठाएगा तो कोई अपने जीवन को खतरे में डालेगा |

उधम सिंह जैसा वीर, ऊपर लिखे सभी तीन श्रेणियों में बहुत उच्च श्रेणी के होते हैं |

उधम सिंह जैसा वीर, तभी कार्य कर सकता है जब वह आश्वस्त हो कि बहुमत एक विशिष्ट परिवर्तन चाहता है | बहुमत के सिद्ध इच्छा के अभाव में, उधम सिंह जैसे वीर निष्क्रिय (सोये हुए) रहेंगे |

“ नेता ” केवल नियंत्रण और नाम चाहते हैं ताकि वे इसके द्वारा नाम, पैसा और शक्ति पा सकें |

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तो कुल मिलाकर, हम उस प्रधानमंत्री पर विश्वास करने के लिए नहीं कह रहे हैं, जो भारत के लिए अमेरिकी वायसराय के तरह है | हम आप सब से पूछ रहे हैं कि आप उधम सिंह / भगत सिंह जैसे वीर के पिछले सिद्ध (ट्रैक) रिकॉर्ड को देखो | 1940 के दशक में, नागरिकों की अपील के कारण उधम सिंह / भगत सिंह जैसे वीरों ने अपना काम किया और जिसके कारण, हमें 1947 में आजादी मिली और उधम सिंह जैसे वीरों के कारण, 1977 में आपातकाल समाप्त हो गया | उसी तरह, यदि हम उधम सिंह / भगत सिंह जैसे वीरों को फिर से कार्य करने के लिए अपील करें तो वे निश्चित रूप से फिर से कार्य करेंगे और हमें दूसरी आजादी मिल जायेगी |

1910-1947 में, मोहनभाई गांधी के चलते, स्वतंत्रता दिलाने में देर हुई क्यूंकि उन्होंने नागरिकों को भगत सिंह / उधम सिंह जैसे वीरों का विरोध करने के लिए कहा (उन्होंने उधम सिंह को पागल और भगत सिंह को गुमराह युवक कहा था) और काफी समय चरखा चलाने में, भजन गाने और खादी बेचने आदि में बर्बाद किया | और बिकाऊ ब्रिटिश मीडिया जैसे टाइम्स ऑफ़ इंडिया आदि ने उसे महात्मा के रूप में पेश किया था | लेकिन अधिकांश नागरिकों ने मोहनभाई गाँधी को महात्मा तो दूर, मार्ग-दर्शक (रास्ता दिखाने वाला) भी नहीं समझा | उदाहरण के लिए, 1938 के कांग्रेस के चुनाव सुभाष चन्द्र बोस ने, मोहनभाई गांधी के ना चाहते हुए भी, जीता था |

उसी तरह, आज विदेशी विशिष्ट वर्ग चाहते हैं कि भारतीय कार्यकर्ता केवल मोमबत्ती जलाने में, नारा लगाने में, चुनावों के इंतज़ार में, चुनाव में अपना समय बर्बाद करें | विदेशी उच्च वर्ग के लोग, कभी नहीं चाहते कि भारतीय कार्यकता उधम सिंह / भगत सिंह जैसे वीरों को अपील करें, ताकि ये वीर प्रधानमंत्री को आवश्यक कानून-ड्राफ्ट राजपत्र में प्रकाशित करने के लिए राजी कर सकें |

इसी तरह, यदि करोड़ों नागरिक सुप्रीम कोर्ट के प्रधान जज को किसी जनहित याचिका की प्रक्रिया को तेजी से पूरी करने के लिए कहें, तो शायद सिर्फ उस एस.एम.एस से जनहित याचिका की प्रक्रिया तेजी से पूरी नहीं होगी | लेकिन इन एस.एम.एस. से प्रेरित होकर, उधम सिंह जैसे वीर (अहिंसा मूर्ति उधम सिंह), जनहित याचिका के पक्ष में होंगे और वे अपने तर्क से वर्त्तमान सुप्रीम कोर्ट के प्रधान जज (या अगले सुप्रीम-कोर्ट प्रधान जज) को राजी कर सकेंगे कि वो जनहित याचिका पर जल्दी से काम करें |

जनहित के आन्दोलन का लक्ष्य होना चाहिए कि अहिंसा-मूर्ति उधम सिंह जैसे वीरों को ये बताना कि बहुमत नागरिक व्यवस्था में क्या परिवर्तन चाहते हैं | अंत में, जनहित के कानून इसीलिए नहीं आते क्यूंकि हम 500 पुराने सांसदों को 500 नए सांसदों से बदलते हैं या जनहित के कानून इसीलिए भी नहीं आते क्यूंकि हम 100 दिनों के लिए अनशन करते हैं या हम नारेबाजी करते हैं या रैली (जुलूस) निकालते हैं | व्यवस्था में जनहित के बदलाव तभी आते हैं, जब अहिंसा-मूर्ति उधम सिंह जैसे वीर पुरुषों को प्रामाणिक तरीके से ये पता चल जाये कि नागरिकों के बहुमत को क्या चाहिए | जब अहिंसा-मूर्ति उधम सिंह को स्पष्ट रूप से ये पता चल जाये कि नागरिकों के बहुमत को क्या चाहए, तब वे कानूनों को राजपत्र में छपवाने के लिए प्रधानमंत्री से मिलते हैं |

और कभी-कभी प्रधानमंत्री, उधम सिंह जैसे वीरों से मिलने से पहले ही कानून को राजपत्र में छपवा देते हैं या कभी अगला प्रधानमंत्री उस कानून को राजपत्र में छपवाता है | लेकिन व्यवस्था में परिवर्तन तभी आता है, जब उधम सिंह जैसे वीर पुरुषों को बहुमत जनता की राय के बारे में पता चलता है |

“जनसेवक को मेसेज-आदेश” का मतलब जनसेवकों को प्रामाणिक तरीके से मेसेज भेजना है और उधम सिंह जैसे वीर पुरुषों को आश्वासन देना है कि बहुमत नागरिक क्या चाहते हैं |

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5. “आम जनता द्वारा जनसेवक को मेसेज-आदेश” पर कुछ प्रश्न और उत्तर

प्रश्न 1 – “जनसेवक को मेसेज-आदेश” भेजने से क्या फर्क पड़ेगा ?

उत्तर 1 –

क्योंकि  नागरिकों के द्वारा एस.एम.एस के माध्यम से प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक आदि जनसेवकों को सीधे आदेश भेजा जा रहा है तो नारेबाजी और रैली के तुलना में, इसके बहुत सारे फायदे हैं | सबसे पहले, जनसेवक को मेसेज-आदेश भेजने में सभी मेसेज-आदेश भेजने वालों को एक समान दर्जा मिल रहा है — चाहे वो आम आदमी हो या अरविन्द भाई की तरह का एक बड़ा नेता | जबकि आजकल के प्रदर्शन में, बड़े नेता उभर रहे हैं और आम आदमी को कोई पूछता नहीं है |

दूसरा, जनसेवकों को मेसेज-आदेश भेजने में बिकाऊ मीडिया से कम योगदान की जरूरत है क्योंकि ये रैली नहीं है और कोई भी रैली तभी सफल होती है जब ये बिकाऊ मीडिया उस रैली का प्रचार करता है |

तीसरा, मेसेज-आदेश भेजने से एक प्रामाणिक और जांचा जा सकने वाला सबूत बनता है, जबकि नारे लगाने से ऐसा नहीं हो सकता है  | इसके और भी कई अन्य अधिक फायदे हैं |

प्रश्न 2 – “ जज, प्रधानमंत्री आदि जनसेवकों को मेसेज द्वारा आदेश” प्रचार-तरीका असंभव है | क्यूंकि मुझे लगता है कि कोई भी मोबाइल इतने ज्यादा मेसेज प्राप्त नहीं कर सकता | मेसेज-आदेश भेजने की कुछ तकनीकी सीमा तो होगी | “

उत्तर 2 –

यदि एक सर्वर बनाकर सभी मोबाइल नंबर को उनके वोटर आई.डी के साथ जोड़ दिया जाये तो इसमें क्या असंभव है ? इससे लोगों की पहचान भी सुनिश्चित हो जाएगी और करोड़ों एस.एम.एस भी स्वीकार हो जायेंगे| पहले से ही बहुत जगह आज ऐसी तकनीक का उपयोग होता है | सर्वर प्रति मिनट लाखों एस.एम.एस स्वीकार कर सकते हैं |

प्रधान जज (मुख्य न्यायाधीश) या प्रधानमंत्री एस.एम.एस के माध्यम से नागरिकों से आदेश लेने के लिए एक सार्वजनिक नंबर को नियुक्त सकते हैं और उस नंबर को कंप्यूटर, जिसमें 10 टेरा-बाईट हार्ड डिस्क लगा हो, उसके साथ जोड़ सकते हैं | अब एस.एम.एस प्राप्त करने और रखने की सीमा अरबों में है | यहाँ तक कि जनसेवकों को सभी संदेशों को व्यक्तिगत रूप से देखने की जरूरत भी नहीं है | वे संक्षिप्त कोड बना सकते हैं और नागरिकों को सिर्फ कोड भेजने को कह सकते हैं और कंप्यूटर का उपयोग कर एस.एम.एस के समूह कोड के अनुसार बना सकते हैं |

संक्षिप्त कोड जैसे  “अफजल फांसी हाँ’”, “अफजल फांसी ना”, “प्रधानजज बदलो हाँ”, “प्रधानजज बदलो ना”, “प्रधनमंत्री बदलो हाँ”, “प्रधानमंत्री बदलो नहीं” आदि हो सकता है|

और 100 रुपये शुल्क और एक एफिडेविट (हलफनामे) को सांसद या कलेक्टर के दफ्तर पर जमा करके, एक नागरिक इस प्रणाली में एक नया कोड जोड़ सकते हैं जैसे “अफजल फांसी हाँ” अफजल फांसी ना” |

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फोन कंपनी में एस.एम.एस 3 साल के लिए रिकॉर्ड में रहते हैं | अब यदि, करोड़ों नागरिकों के द्वारा राष्ट्रपति को  “अफजल फांसी हाई” मेसेज-आदेश भेजा जायेगा और यदि ऐसा राष्ट्रपति कोई भी जवाब नहीं देता, तो राष्ट्रपति बदलने और अगले राष्ट्रपति को राजी करने के लिए “तार्किक कदम” उठाने का औचित्य बढ़ जायेगा |

जनसेवक को एस.एम.एस करना सिर्फ एक ई-पोस्टकार्ड भेजने की तरह है |

यदि जनता का बहुमत, सुप्रीम कोर्ट के प्रधान जज “अफजल फांसी हां” भेजें, तो यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के प्रधान-जज पर बंधनकारी तो नहीं है, लेकिन यदि ऐसा हुआ तो सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट प्रधान जज की पोल खुल जायेगी कि इन्होनें जनता के बहुमत की विनती / आदेश को नजरंदाज किया है और फिर उधम सिंह जैसे बहादुर लोग, अपना कार्य करने के लिए प्रेरित होंगे |

कानून के हिसाब से, अब सवाल उठता है कि सही-गलत का निर्णय कौन लेगा — जूरी सदस्य या वर्त्तमान व्यस्था के भ्रष्ट, भाई-भतिजेवाद वाले जज | हम बाद वाले श्रेणी की परवाह नहीं कर रहे हैं | और मुझे नहीं लगता है कि जूरी सदस्यों को कुछ गैर-कानूनी या असंवैधानिक लगेगा कि नागरिक सुप्रीम-कोर्ट के जजों को मेसेज द्वारा आदेश भेजें | ये वैसे ही है, जैसे किसी कंपनी के हिस्सेदार उस कंपनी के अध्यक्ष को मेसेज द्वारा आदेश भेजें |

प्रश्न 3 – क्या होगा यदि सांसदों के पास हजारों मेसेज-आदेश इकठ्ठा हो गए ?

उत्तर 3 –

यदि सांसद के पास हजारों मेसेज-आदेश इकठ्ठा हो गए हैं, तो सांसद निम्नलिखित कदम उठा सकते हैं :

1. सांसद जनता के लिए एक अलग मोबाइल नंबर का प्रयोग कर सकते हैं, जो कि कंप्यूटर से जुड़ा हो | सांसद को भेजा जाने वाला मेसेज-आदेश सांसद की वेबसाइट पर कंप्यूटर प्रकाशित करेगा और जनता को एक फीडबैक एस.एम.एस भी मिल जाएगा | सांसद के कर्मचारी, भेजे जाने वाले एस.एम.एस को पढ़ कर सांसद को एक रिपोर्ट दे सकते हैं |
2. सांसद या नागरिक भी शोर्ट कोड (संक्षिप्त कोड) जैसे “अफजल फांसी हाँ” और “अफजल फांसी ना” बना सकते हैं और अधिकांश नागरिक इस शॉर्टकोड का उपयोग कर सकते हैं और कंप्यूटर अपने आप (स्वतः) इन सब मेसेज-आदेश के संक्षिप्त कोड के अनुसार समूह बना सकता है और सबको पता चल जायेगा कि जनता की राय क्या है |

इस तरह, यह संभव है कि नागरिक अपने सांसद को एस.एम.एस के माध्यम से आवश्यक आदेश भेजकर संवैधानिक कर्तव्य को पूरा किया जा सकता है |

प्रश्न 4 – एक नागरिक कई मेसेज-आदेश भेज सकता है, जिसके लिए नकली व्यक्तिगत जानकारी वाले फर्जी नंबर का भी प्रयोग किया जा सकता है |

उत्तर 4 –

1. किसी सिम की पहचान (विशिष्टता) सुनिश्चित करने के लिए, हर मोबाइल नंबर के सिम को मतदाता पहचान पत्र के साथ जोड़ा जा सकता है | जैसे यदि मेरे पास दो मोबाइल नंबर हैं, तो सिर्फ एक ही को मतदाता पहचान पत्र के साथ जोड़ा जा सकता है और जनसेवक के मोबाइल नंबर से जुड़ा कंप्यूटर मेरे दूसरे मोबाइल से भेजे मेसेज-आदेश को अस्वीकार कर देगा |

2. यदि एक व्यक्ति एक ही मोबाइल का उपयोग करते हुए कई आदेश भेजता है, तो कंप्यूटर उन सब मेसेज-आदेशों को संक्षिप्त कोड के अनुसार समूह में बंटेगा और एक संक्षिप्त कोड के लिए कंप्यूटर केवल उस मोबाइल से भेजे गए अंतिम आदेश को ही गिनेगा | उदाहरण, यदि मैं “पहले “अफजल फांसी हां” भेजता हूँ और फिर बाद में “अफजल फांसी ना” भेजता हूँ, तो कंप्यूटर आखरी भेजे गए मेसेज-आदेश “अफजल फांसी ना” को गिनेगा |

और जैसे-जैसे  “नागरिकों के द्वारा प्रधानमंत्री, सुप्रीम कोर्ट के प्रधान जज, आदि जनसेवकों को मेसेज द्वारा आदेश भेजने” का चलन बढ़ेगा, निश्चित रूप से यह सिस्टम का भी विकास होगा | सबसे पहले, इस सिस्टम में केवल एक चीज की जरूरत है – पहचान सुनिश्चित करने के लिए सारे मोबाइल को मतदाता पहचान पत्र से जोड़ना, ताकि एक व्यक्ति मेसेज-आदेश भेजने के लिए दो या अधिक नंबर का उपयोग न कर सके | और इन मेसेज-आदेश भेजने का शुल्क इस प्रकार रखा जा सकता है – एक महीने में पहले 100 मेसेज-आदेश तक 10 पैसे और बाद के मेसेज-आदेशों के लिए 50 पैसा लिया जा सकता है |

प्रश्न 5 – भारत के सांसदों के मोबाइल नंबर प्राप्त करने का क्या लिंक है ? कृपया एक मेसेज-आदेश का उदाहरण दें |

उत्तर 5 –

कृपया ध्यान दें ये वो लिंक है, जिसमें से आप को भारत के सभी सांसदों का मोबाइल नंबर मिल सकता है और इसका उपयोग आप एस.एम.एस से उन्हें आवश्यक आदेश देकर, अपने मनचाहे जनहित के कानून-ड्राफ्ट को पारित करवाने के लिए प्रयोग कर सकते हैं –

http://164.100.47.132/LssNew/Members/statelist.aspx

विकल्प लिंक – http://www.mediafire.com/?6q9o6ycsy1j93ut

मेसेज-आदेश के उदाहरण –
1) “मैं, क.ख.ग., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका हर नागरिक का कर्त्तव्य है कि वो अपने सांसद, आदि जनसेवकों को जरूरी आदेश भेजे मेसेज द्वारा | इसीलिए मैं, आपको आदेश दे रहा हूँ कानून-अध्यादेश लागू करने के लिए जो नाबालिक की उम्र 18 से 14 कर दे हिंसक बलात्कार और हत्या के लिए | और इसको 1-जनुअरी-2010 से लागू किया जाये ताकि दिल्ली बस मामले में आरोपी को फांसी दी जा सके |
और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपने वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

2) [सांसद के नाम], मैं XXX XXX, मतदाता ___________ [आपके चुनाव-क्षेत्र का नाम] जिसके आप सांसद हैं | संविधान की उद्देश्यिका हर नागरिक का कर्त्तव्य है कि वो अपने सांसद, आदि जनसेवकों को जरूरी आदेश भेजे मेसेज द्वारा | इसीलिए मैं, आपसे विनती करता हूँ कि आप अपनी सुविधा के लिए, एक अलग पब्लिक मोबाइल नंबर रखें, जिसपर एस.एम.एस के माध्यम से नागरिकों का आदेश प्राप्त हो और उस नंबर को संसद भवन की वेबसाइट पर अपने वेब-पेज पर डाल दें | धन्यवाद |

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यदि आपके पास किसी सांसद या व्यक्ति का सार्वजनिक मोबाइल नंबर नहीं है, तो आप उसे पत्र भेजें या फोन करें और उसे अपना पब्लिक मोबाइल नंबर को सार्वजनिक वेबसाइट या ब्लॉग पर डालने को कहें |

प्रश्न 6 – “नागरिकों के `जनसेवकों को मेसेज-आदेश प्रचार-तरीके में, नागरिक क्या करें यदि सांसद, विधायक, आदि जनसेवक अपने पब्लिक मोबाइल को सार्वजनिक नहीं करते, यहाँ तक कि अपना पब्लिक ई-मेल या जनता को अपने लैंड-लाइन नंबर भी नहीं देते हैं ?  उदाहरण, चेन्नई के सांसद ने अपना मोबाइल या ई-मेल को सार्वजनिक नहीं किया है और लैंड-लाइन पर काल करने पर कोई भी फोन नहीं उठता है | तो फिर, क्या हमें राष्ट्रपति या लोकसभा अध्यक्ष को लिखना चाहिए, सांसद के पब्लिक मोबाइल नंबर पाने के लिए ?

आम-नागरिकों के लिए सबसे अच्छा तरीका क्या है अपने सांसद, विधायकों, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, जज आदि को मजबूर करने के लिए कि वे अपना पब्लिक के लिए मोबाइल नंबर को सार्वजनिक करें ? “

उत्तर 6 –

ऐसे मामलों में, आप पार्टी के अध्यक्ष या लोकसभा अध्यक्ष को आदेश भेज सकते हैं मेसेज करके या लैंड-लाइन या पत्र द्वारा कि वो अपने पार्टी के सांसद को आदेश दे कि अपना एक मोबाइल नंबर जनता के लिए इन्टरनेट पर सार्वजनिक करे | इसके अलावा, आप रेजस्त्रिकृत पत्र द्वारा ये आदेश सीधा आपने क्षेत्र के सांसद को भी भेज सकते हैं |

यदि कुछ हजार नागरिक भी ऐसा करते हैं और अपने भेजे गए आदेशों को जनता को बताते हैं, फेसबुक नोट, पर्चे, गूगल डोक, आदि, द्वारा और सांसद कोई भी जवाब नहीं देता है, तब सांसद की पोल लाखों-करोड़ों के सामने खुल जायेगी | नागरिकों को क्यूँ ऐसे निकम्मे सांसद को एक क्षण के लिए भी बर्दाश्त करना चाहिए, जो नागरिकों का जवाब तक नहीं देता ? सभी नागरिक, चाहे वे किसी भी पार्टी के समर्थक हों, उनको ऐसे निकम्मे सांसद की पोल खोलनी चाहिए |

इसके अलावा, आप उसी पार्टी के दूसरे सांसद, जो उस सांसद के पास के क्षेत्र का सांसद है, उसको भी आदेश भेज सकते हैं कि वो आपके आदेश को आपके क्षेत्र के सांसद को दे सके |

उदाहरण – लाल किशन अडवानी ने इन्टरनेट पर अपना मोबाइल नंबर नहीं डाला है | इसीलिए, मैं नागरिकों से विनती कर रहा हूँ कि राजनाथ सिंह, जो अडवाणी के पार्टी का अध्यक्ष है, उसको आदेश दें कि अडवाणी को बोले कि अडवाणी अपना पब्लिक मोबाइल को इन्टरनेट पर डाले |

और अडवानी गांधीनगर का सांसद है, और पास के लोकसभा चुनाव क्षेत्र अहमदाबाद (पश्चिम) और अहमदाबाद (पूर्व) हैं, जिनके सांसद हरिन पाठक और किरीट सिंह सोलंकी हैं, जो दोनों भा.ज.पा. से हैं | इसीलिए, मैं गांधीनगर के नागरिकों से विनती कर रहा हूँ कि अडवाणी के लिए आदेश हरिन भाई या सोलंकी भाई को भेजें और उनसे विनती करें कि वे आदेश अडवाणी तक पहुंचा दें |

ये हरिन भाई और सोलंकी भाई का नैतिक कर्तव्य है कि वे अडवाणी को सार्वजनिक रूप से बोलें कि वे अपना पब्लिक मोबाइल नंबर इन्टरनेट पर डाल दे |

प्रश्न 7 – सांसद और जनसेवकों को मेसेज द्वारा आदेश भेजने के बजाय, हम उनको पत्र क्यों नहीं लिखते जिसमें समर्थकों के हस्ताक्षर होंगे ?

उत्तर 7 –

मेसेज द्वारा आदेश, अपने जनसेवकों को आदेश भेजने के लिए एक प्रामाणिक और सबसे सस्ता तरीका है |
आप पत्र भी भेज सकते हैं अपने जनसेवक को, लेकिन फिर दूसरे नागरिक ये जांच नहीं कर सकते हैं कि भेजे गए पत्र असली हैं और नकल (डुप्लिकेट) नहीं हैं | और फिर, मेसेज भेजने की तुलना में पत्र भेजना अधिक महंगा है और कठिन है, इसीलिए अधिक लोग इस प्रचार-तरीके को नकल करके अपना नहीं सकते हैं |

सांसद आसानी से ये कह सकता है कि उसे कोई भी पत्र नहीं मिला है | लेकिन महत्पूर्ण व्यक्तियों का मेसेज फोन कम्पनियों के रिकोर्ड में रहता है | और मेसेज-आदेश आसानी से दोबारा भी भेजे जा सकते हैं | सांसद ये भी कह सकते हैं कि हस्ताक्षर नकली हैं | लेकिन मोबाइल के सिम कार्ड की नकल करना आसान नहीं है | और एक बार कुछ हजार नागरिक मेसेज-आदेश भेज देते हैं और भेजे गए मेसेज-आदेशों को अपने वाल-नोट, ब्लॉग आदि पर जनता को दिखाते हैं (जहाँ जनता आसानी से ढूँढ सके और पढ़ सके) और फिर भी सांसद कोई जवाब नहीं देता, तो सांसद की लाखों-करोड़ों में पोल खुल जायेगी |

कृपया पत्र भेजने के लिए और समर्थकों के हस्ताक्षर इकठ्ठा करने के लिए लगना वाला समय और पैसे का गणित करें और उसकी तुलना मेसेज-आदेश भेजने के लिए लगने वाला समय और पैसे से करें |

किसी भी प्रचार-तरीके में यदि कम समय और पैसा खर्च होता है, तो अधिक लोग उसकी नकल करके उस तरीके को अपना सकते हैं | आप बताएं कि 75 करोड़ नागरिक-मतदाताओं में से कितने नागरिक एक जगह इकट्ठे हो सकते हैं या पत्र लिख सकते हैं या निजी रूप से अपने सांसद को मिल सकते हैं ? ऐसा कुछ लाख लोग ही कर सकते हैं | और कितने लोग 5-10 मिनट का समय निकाल कर अपने सांसद को मेसेज-आदेश भेज सकते हैं ? ऐसा करोड़ों लोग कर सकते हैं | इसलिए, मैं “जनसेवक को मेसेज-आदेश” के प्रचार-तरीके का समर्थन करता हूँ |

प्रश्न 8 – क्या मतदाता पहचान पत्र पर्याप्त है जांच करने के लिए ? मतदाता पहचान पत्र की आसानी से बड़े स्तर पर नकल की जा सकती है |

उत्तर 8 –

मतदाताओं को अपना मतदाता पहचान पत्र संख्या अपने फोन कंपनी को देना होगा | फोन कंपनी को (मोबाइल नंबर, मतदाता पहचान पत्र संख्या, ग्राहक का नाम, ग्राहक का पता) सांसद को भेजना होगा | सांसद और उसके कर्मचारी, उन (मतदाता पहचान पत्र संख्या, ग्राहक का नाम, ग्राहक का पता) को मतदाता सूची से मिलान करके जांच करेंगे | तो फिर, यदि कोई बड़े स्तर पर मतदाता पहचान पत्रों की नकल करता है, तो फिर उसको पहले बड़े स्तर पर मतदाता-सूची के साथ छेड़-छाड करनी होगी | ये आसान नहीं है | इसके अलावा कुछ समय के बाद, अंगुली के छाप लिए जा सकते हैं, जिससे बड़े स्तर पर नकल करना संभव नहीं होगा, बिना लाखों-करोड़ों में नकल करने का प्रयास करने वाले (जालसाज) की पोल खुले |


प्रश्न
9 –

हमको कैसे पता चलेगा कि अधिकतर लोगों को इस “जनसेवकों को मेसेज-आदेश” के प्रचार-तरीके के बारे में पता है और उन्होंने अपने जनसेवकों को मेसेज द्वारा आदेश भेजा है या नहीं ?

उत्तर 9 –

अंदाज से हम पता लगा सकते हैं कि एक क्षेत्र में कितने लोगों ने अपने जनसेवकों को मेसेज-आदेश किया है | हम क्रम-रहित तरीके से 30 लोगों को चुन सकते हैं | यदि 10 लोग ये कहें कि उन्होंने ऐसा मेसेज नहीं भेजा, तो फिर 33% लोगों ने मेसेज-आदेश किया है अपने जनसेवकों को |

प्रश्न 10 –
बिजली-दर कम करने के लिए और ब्रिजेंदर सिंह को वापस बिजली नियामक बनाने के लिए “ दिल्ली मुख्यमंत्री/दिल्ली विधायकों को मेसेज” अभियान (मुहिम) में और दूसरे “जनसेवक को मेसेज-आदेश” के अभियानों में आम-नागरिक कैसे जांच कर सकते हैं कि भेजे गए मेसेज-आदेश असली नागरिकों के ही हैं ?

उत्तर 10 –

जब तक सांसद भेजे गए मेसेज-आदेशों को अपनी वेबसाइट पर नहीं दिखता, सही तरीके से ये नहीं जांच की जा सकती कि कितने लोगों ने मेसेज-आदेश भेजें हैं | कोई भी आम-नागरिक अपने 100 मित्रों/रिश्तेदारों में से 10 क्रम-रहित तरीके से फोन करके पूछ सकता किस उन्होंने मेसेज-आदेश भेजा है या नहीं | यदि 4 व्यक्ति `हां` बोलते हैं, तो शायद 40% दिल्ली ने मेसेज-आदेश भेजा है |  इस अंदाज करने के तरीके में कमी हो सकती है और ये कानूनी उद्देश्यों के लिए अच्छा नहीं है, लेकिन राजनैतिक उद्देश्यों के लिए पर्याप्त है |

यदि सांसद, उसको प्राप्त मेसेज-आदेशों को अपनी वेबसाइट पर दिखता है, तो फिर एक आम-नागरिक क्रम रहित तरीके से 10 मेसेज-आदेशों को चुन सकता है और उनको फोन करके जांच कर सकता है |

कृपया ध्यान दें कि “जनसेवकों को मेसेज-आदेश” एक प्रचार तरीका है और एक राजनैतिक साधन है, जो अरविन्द भाई आदि नेताओं द्वारा प्रयोग किये गए तरीके से कहीं श्रेष्ट है | अरविन्द भाई ने जो मुहिम का तरीका का प्रयोग किया — “शीला दीक्षित को पत्र लिखो ; लेकिन भारतीय डाक का प्रयोग मत करो पत्र पहुँचाने के लिए ; एक सुपर डाकिया जिसका नाम अरविन्द भाई है, वो पत्रों को शीला दीक्षित तक पहुँचायेगा “ !!! अरविन्द भाई के इस तरीके में, अरविन्द भाई वे पत्र पहुँचायेगा जिनके विषय अरविन्द भाई को पसंद हैं और जिन पत्रों के विषय अरविन्द भाई को पसंद नहीं हैं, उन पत्रों को अरविन्द भाई फाड़ देगा |

प्रश्न 11 – क्या नागरिक-मतदाता को अपने मोबाइल के सिम को वोटर आई.डी.(पहचान पत्र) से जोड़ना जरूरी है ?

उत्तर 11 –

हरेक नागरिक-मतदाता निर्णय करेगा कि उसे अपना मोबाइल नंबर को मतदान पहचान पत्र संख्या (वोटर आई.डी) के साथ जोड़ना है कि नहीं | जब भी मतदाता मेसेज-आदेश भेजेगा, तो उसे सर्वर से एक फीडबैक मेसेज आएगा (पुष्टि का मेसेज) | और यदि उसका मोबाइल नंबर पंजीकृत (रजिस्टर) नहीं है, तो उसको एक फीडबैक मेसेज आएगा कि उसके पूरे विवरण नहीं हैं सर्वर पर |

जिस वेबसाइट पर मेसेज-आदेश प्रकाशित होंगे, उस वेबसाइट पर दो सूची होंगी — `जांच किये हुए नंबरों` की सूची और `बिना जांच किये हुए नंबरों` की सूचि | `जाँच किये हुए नंबर` की सूची में जिन मोबाइल नंबर को मतदाता पहचान पत्र संख्या से जोड़ा गया है, ऐसे मोबाइल नंबर से भेजे गए मेसेज-आदेश होंगे | `बिना जांच किये हुए नंबर` की सूची में वे मेसेज-आदेश होंगे, जो ऐसे मोबाइल नंबर से भेजे गए हैं जो किसी मतदाता पहचान पत्र संख्या से नहीं जोड़े गए हैं |

`बिना जांच किये हुए नंबरों` की सूची, इतनी ज्यादा अव्यवस्थित और भ्रमित करने वाली होगी कि जल्दी ही उसका कुछ भी राजनैतिक मूल्य नहीं रहेगा | इसलिए, सच्चे कार्यकर्ता और मतदाता अपने मतदाता पहचान पत्र द्वारा अपने मोबाइल नंबरों की जांच करवाएंगे |
प्रश्न 12 – उन मेसेज का क्या होगा, जो उन लोगों ने सांसद को भेजा है, जिनका नाम मतदाता सूचि में नहीं है, यानी कि रजिस्ट्रीकृत मतदाता नहीं हैं और उन मेसेज का क्या होगा जो उन मतदाताओं ने सांसद को भेजा है, जिनका चुनाव क्षेत्र सांसद के चुनाव क्षेत्र से भिन्न है ?

उत्तर 12 –

जो व्यक्ति पंजीकृत मतदाता नहीं हैं या 18 साल से कम आयू के हैं, वे अपने लिए अलग श्रेणी की मांग कर सकते हैं “अभी मतदाता नहीं” और जो पंजीकृत मतदाता नहीं हैं, उनके मेसेज उस श्रेणी में डाले जा सकते हैं |

मेसेज, जो सांसद के चुनाव क्षेत्र के मतदाताओं के नहीं हैं, उनको “सांसद के चुनाव क्षेत्र के बहार” मेसेज श्रेणी में रखा जायेगा |

प्रश्न 13 – मैं मेरे पसंदीदा नेता का विरोध नहीं करना चाहता | तो मैं उसे मेसेज द्वारा आदेश भेजना नहीं चाहता |

उत्तर 13 –

आप अपने पसंदीदा नेता का विरोध नहीं कर रहे हैं | यदि आपको लगता है कि वह आम नागरिकों के लिए कुछ अच्छा कर रहा है, तो आप उसे एस.एम.एस / मेल के माध्यम से उसे बधाई दे सकते हैं |

और उसे वेबसाइट, ब्लॉग पर भी डाल सकते हैं और इससे दूसरों को भी ऐसा करने की प्रेरणा मिलेगी | नेता को सुझाव देकर आप उसके पब्लिक में किये गए काम को आगे से और सुधारने में मदद कर सकते हैं | अधिकतर नेता स्वयं जनता से सुझाव मांगते हैं |

लोकतंत्र का यह मतलब नहीं है की आप सिर्फ वोट करें या एक पार्टी या नेता का समर्थन करें और फिर 5 साल के लिए सो जायें | आप सब को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नेता या पार्टी अच्छे से काम कर रहे हैं या नहीं | लोकतंत्र का मतलब है कि आम–नागरिकों को “जनसेवकों को मेसेज-आदेश”, टी.सी.पी., जूरी सिस्टम आदि द्वारा हरेक दिन देश को चलाने के कार्यों में भाग लेना चाहिए |

प्रश्न 14 – “ यदि फोन नंबर को पब्लिक वेबसाइट पर सार्वजनिक दिखाया जायेगा, तो हम कैसे अनचाहे (ऊट-पटांग) फोन और रद्दी मेसेज (स्पैम) आने से रोक सकते हैं ?
क्या आप सोचते हैं हैं कि औरतें इस प्रचार-तरीके का प्रयोग करेंगी, यदि इस तरीके में फोन को पब्लिक वेबसाइट पर सार्वजनिक किया जायेगा ? “

उत्तर 14 –

यदि किसी नंबर को ब्लाक करने (नाकाबंदी) की सुविधा मुफ्त कर दी जाये, तो स्पैम (रद्दी मेसेज) को रोका जा सकता है |

इसके अलावा, जब कीस मोबाइल नंबर को एक निश्चित संख्या के मोबाइल ने ब्लाक कर दिया है, तो फिर कुछ समय के लिए, उस मोबाइल की दूसरे मोबाइल को मेसेज भेजने की सुविधा बंद कर देनी चाहिए | और फिर भी मोबाइल का प्रयोग करने वाला, स्पैम करना (रद्दी मेसेज भेजना) चालू रखता है, तो मेसेज भेजने की सुविधा हमेशा के लिए बंद कर देनी चाहिए |

आज, मतदाता सूची इन्टरनेट पर है, इसीलिए कोई भी महिलाओं का भी पता देख सकता है |

अनचाहे फोन को आने से निम्नलिखित प्रकार से रोका जा सकता है –

1. मान लीजिए `एफ` एक फोन मालिक है

2. `एफ` सीमित बात-चीत का विकल्प चुन सकता है

ऐसे मामले (सीमित बातचीत) में, केवल वे ही व्यक्ति `एफ` को फोन कर सकते हैं, जो `एफ` अपनी सूची में जिनका नाम देता है मोबाइल कंपनी को |

3. यदि `एम` चाहता है कि अपने को `एफ` की सूची में जोड़ा जाये, तो फिर `एम` को “मुझे जोड़ो” का मेसेज भेजना होगा `एफ` को और फिर `एफ` `एम` को जोड़ सकता है या उसको अस्वीकार कर सकता है |

4. जब भी `एम` के सूची में जोड़ने के मेसेज को कोई मोबाइल प्रयोग करने वाला अस्वीकार करता है, तो फिर `एम` के “मुझे जोड़ो” मेसेज भेजने से एक सप्ताह के लिए रोक लगा दी जायेगी |
ये फेसबुक में फ्रेंड-रिक्वेस्ट की व्यवस्था के समान है |

प्रश्न 15 – भारतीय नागरिक-मतदाता अपने प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक आदि को मेसेज द्वारा आदेश दे सकते हैं | लेकिन जो अनिवासी भारतीय हैं, उनके के क्या सीमाएं और अधिकार हैं, जनसेवक को मेसेज भेजने के लिए ? अनिवासी भारतीय कौनसे सांसद, विधायक, मुख्यमंत्री को अपने मेसेज-आदेश भेज सकते हैं ?

उत्तर 15 –

एक अनिवासी भारतीय उस क्षेत्र के सांसद/विधायक को मेसेज-आदेश भेज सकता है, जहाँ उसका भारत में निवास स्थान है |

यदि कोई भारतीय मूल का व्यक्ति है लेकिन भारत का नागरिक नहीं है और मेसेज भेजता है, तो उसे अपने मेसेज में ये स्पष्ट कर देना चाहिए और उसे केवल एक विनती भेजनी चाहिए, आदेश नहीं भेजना चाहिए | वे उस क्षेत्र के विधायक/सांसद को भेज सकता है, जहाँ वो व्यक्ति का मूल स्थान है |

प्रश्न 16 – “ पूरा ड्राफ्ट मेसेज-आदेश में नहीं आ सकता | अब यदि हम स्पष्ट मेसेज-आदेश नहीं भेजेंगे, तो सरकार कमियों वाले कानून बना देगी और कहेगी कि ये कानून जनता की मांग के कारण लाये गए हैं |

यदि हम ड्राफ्ट को पत्र या ई-मेल द्वारा भेजते हैं, तो फिर नेता या सांसद कह सकता है कि उसको कभी भी पत्र/ई-मेल मिला ही नहीं | और यदि हम ड्राफ्ट को इन्टरनेट पर अपलोड करके, उसका लिंक मेसेज-आदेश में डाल देते हैं, तो सरकार अपने प्रभाव का उपयोग करके उस लिंक को हटवा सकती है |

तो फिर, समाधान-ड्राफ्ट की मांग करने के लिए सबसे अच्छा और प्रामाणिक तरीका क्या है ? “

उत्तर 16 –

टी.सी.पी (पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली = आम-नागरिकों का अधिकार कि वे अपनी एफिडेविट को कलेक्टर के दफ्तर जाकर, स्कैन करवाकर प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर रखवा सकेंगे) और उसका दूसरा रूप “जनसेवकों को मेसेज-आदेश”, जिसमें टी.सी.पी. की देखरेख सांसद करता है, जनसमूह सम्बन्धी मुद्दों के लिए है जैसे एम.आर.सी.एम. , राईट टू रिकाल के ड्राफ्ट, जूरी सिस्टम को लाना, आदि और निजी शिकायतों के लिए नहीं है | जनसमूह मुद्दों का मतलब ऐसा कोई प्रस्ताव, जिसको 15 लाख मतदाताओं के चुनाव क्षेत्र में कम से कम 50,000 मतदाता मांग करते हों |

निजी शिकायतों के लिए, हमने जूरी सिस्टम का प्रस्ताव किया है |

अब यदि 50,000 मतदाता किसी ड्राफ्ट को दर्ज करवाना चाहते हैं, तो फिर उन 50,000 लोगों में से किसी न किसी के पास इन्टरनेट आदि होगा या सांसद के दफ्तर जाकर ड्राफ्ट को दर्ज करने का साधन होगा | उसको सांसद के दफ्तर में ड्राफ्ट जमा करवाने पर एक रसीद नंबर भी दिया जा सकता है और वो फिर वो ये नंबर दूसरे नागरिकों को दे सकता है और दूसरे नागरिक भी अपने मेसेज-आदेश भेज सकते हैं, जिसमें ये रसीद नंबर का उल्लेख किया गया हो |

यदि ड्राफ्ट को अमेरिका आदि विदेशी कम्पनियों के सर्वर पर डाला गया हो, तो फिर भारतीय सरकार के लिए, उसको डिलीट करना आसान नहीं होगा | और ड्राफ्ट को इन्टरनेट पर 2-3 जगह पर भी अपलोड किया जा सकता है, इसकी कम सम्भावना है कि सरकार इसको 2-3 जगह से हटा सकेगी बिना उसके पोल खुले | इसके अलावा, यदि सांसद ने इस ड्राफ्ट को अपने सर्वर पर डाला है, तब भी भारतीय सरकार इसको आसानी से नहीं हटा सकती है |

प्रश्न 17 – “यदि कोई यह कहते हुए जनहित-याचिका फाइल करता है कि अंबानी के पास आवश्यकता से ज्यादा सम्पति है और सुप्रीम कोर्ट सभी अतिरिक्त संपत्ति को जब्त करे और गरीबों के बीच वितरित करे, तो स्पष्ट रूप से 50 करोड़ से ज्यादा सहमत होंगे.”

उत्तर 17 –

यह तो आपका 100% निराधार आरोप है | क्या आपके पास कोई सबूत है कि करोड़ों आम-नागरिक किसी भी उच्च वर्ग के व्यक्ति को लूटना चाहते हैं ? अगर ऐसा है, तो फिर सभी आम-नागरिक सी.पी.एम जैसी पार्टी को लोग मतदान क्यूँ नहीं देते, जो इस तरह के एजेंडे को लेकर घूमती है ? लेकिन आम जनता कभी ऐसी रॉबिन हुड की नीतियों का समर्थन नहीं करती है |

हर मजदूर के पास इतना दिमाग तो है कि यदि अम्बानी जैसों को लूट लिया जाता है, तो सभी उच्च वर्ग के व्यक्ति भारत छोड़ कर चले जायेंगे और फिर कारखानों को चलाने और उन्हें नौकरी देने के लिए भी कोई नहीं रहेगा |

प्रश्न 18 – “एस.एम.एस भेजने की ये विधि गैर-सरकारी संगठनों को फायदा करेगी जो जनता की भावनाओं को इकट्ठा करने के लिए काम करते हैं और फिर वे गैर-सरकारी संगठन इस विषय पर अदालत में याचिका दाखिल करते हैं |”

उत्तर 18 –

यह पूरी तरह से गलत है | हर बिकाऊ गैर सरकारी संगठन (हर गैर-सरकारी संस्था बिकाऊ है क्यूंकि वे हर काम के लिए सरकार से पैसे लेते हैं) खुद को लोगों के प्रतिनिधि के रूप में दावा करते हैं | हम आम जनता से बोल रहे हैं कि एस.एम.एस के माध्यम से वे सीधे मुख्यमंत्री, जज और प्रधानमंत्री को आदेश दें | हम अरविंद भाई की तरह किसी भी बिचौलियों का काम नहीं कर रहे हैं, जो समर्थन हासिल करने के बाद बाद, समर्थन का फायदा उठाते हैं | वास्तव में, हमारा लक्ष्य इन सभी गैर सरकारी संगठन और पैसे पर बिकने वाले कार्यकर्ताओं को दूर करने के लिए है | हमारा लक्ष्य नागरिकों के द्वारा एस.एम.एस के माध्यम से, सीधे प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट के प्रधान जज के पास अपनी बात रखने का है |

प्रश्न 19 – केवल मेसेज-आदेश भेजना पर्याप्त है ?

उत्तर 19 –

हम केवल मेसेज-आदेश ही नहीं भेज रहे हैं, लेकिन अखबार में विज्ञापन देने, पर्चे बांटने और चुनाव लड़ने का भी काम कर रहे हैं, ताकि जनहित के प्रक्रिया जैसे टी.सी.पी. आदि के बारे में लोग जानें और नागरिक सांसद, विधायक, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री को सीधे मेसेज आदि द्वारा आदेश भेजें |

हम स्वयंसेवक हैं और हम कोई केंद्रीकृत दान को नहीं लेते हैं | इन कार्यों के लिए, हम अपने कमाए हुए, सरकार को टकस भरने के बाद, बचे हुए पैसों का प्रयोग करते हैं | हमें ऐसा करने वाले अन्य नागरिकों की भी जरूरत है |

चैप्टर-18, www.prajaadhinshasan.blog.com  में हमने समझाया है कि क्यों एक कार्यकर्ता-आधारित आंदोलन के लिए केंद्रीकृत दान लेना एक बुरा विचार है |

प्रश्न 20 –

1) हम जजों को बदलने या उन्हें आदेश नहीं दे सकते क्यूंकि संविधान के अनुसार, जजों को चुना नहीं जा सकता है और न्यायपालिका कोई भी नीति निर्माण नहीं करती है….

2) न्यायपालिका को अपना फैसला जनता के दबाव या जनता की राय के अनुसार नहीं देना चाहिए | जजों को अपना फैसला केवल कानून के अनुसार देना चाहिए |

उत्तर 20 –

1) यह राईट टू रिकॉल-सुप्रीम कोर्ट प्रधान-जज की प्रक्रिया जो सैक्शन 7.3, www.prajaadhinshasan.blog.com में दी गयी है, वो 100% संविधैनिक है | आम नागरिक सुप्रीम-कोर्ट के प्रधान-जज (मुख्य न्यायाधीश) को “अभी इस्तीफा दो” का मेसेज-आदेश भेजने के लिए के भी स्वतंत्र है | यदि प्रधान जज का मानना ​​है कि उसके निजी मोबाइल पर इतने सारे मेसेज आने से परेशानी होगी, तो वह एक अलग नंबर रख सकता है, जहां आम-नागरिक उसे मेसेज-आदेश भेज सकते हैं और हाँ, वह उन्हें पढ़ने के लिए भी स्वतंत्र नहीं है | और मान लीजिए कि 50 करोड़ नागरिक के द्वारा “अभी इस्तीफा दो” का मेसेज-आदेश भेजने पर भी सुप्रीम-कोर्ट प्रधान-जज इस्तीफा देने से मना करते हैं, तो फिर जो होगा, उसकी जिम्मेदारी तो प्रधान-जज की ही होगी |

क्या आप मुझे बता सकते हैं कि सैक्शन 7.3 की कौन सी धारा असंवैधानिक है या जज को मेसेज भेजना , संविधान के कौन से अनुच्छेद का उल्लंघन करता है ? जनसेवक को मेसेज-आदेश भेजना केवल एक ई पोस्टकार्ड जैसा है |

एक बार सैक्शन 7.3 का मसौदा राजपत्र में छप जाये, तो हम नागरिक अपने जजों को बदलने में सक्षम हो जायेंगे | और यदि ये ड्राफ्ट राजपत्र में नहीं भी छपता, तो भी हम, आम-नागरिक जजों को मेसेज-आदेश भेज कर यह ही कार्य कर सकते हैं |

इस प्रक्रिया-ड्राफ्ट “मेसेज द्वारा राईट टू रिकॉल-सुप्रीम कोर्ट प्रधान जज” के लिए कोई संवैधानिक संशोधन की जरूरत नहीं है | यदि 38 करोड़ नागरिक प्रधानमंत्री को इस प्रक्रिया-ड्राफ्ट को राजपत्र में छपवाने का मेसेज द्वारा आदेश देते हैं और सभी 25 सुप्रीम-कोर्ट के जज भी ऐसा करने का अनुमोदन करते हैं, तो प्रधानमंत्री इस प्रक्रिया-ड्राफ्ट को राजपत्र में छपवा सकते हैं |

2) जजों द्वारा दिए गए निर्णय तथ्यों, कानूनों और जजों और विवेक के आधार पर दिया जाता है | और बहुत सी चीज उनके विवेक पर है | जनसेवकों को आवश्यक आदेश देना हम नागरिकों का अधिकार और कर्तव्य दोनों है| उदाहरण के लिए, सुप्रीम कोर्ट के प्रधान-जज के पास जमानत देने के एक-अधिकार हैं | तो ऐसे में, कल वह दिल्ली बस के मामले के आरोपी को जमानत दे सकता है | उदाहरण के लिए, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व प्रधान जज, खरे ने एक स्विस अरबपति, जिसने 3 आठ वर्ष की लड़कियों के साथ बलात्कार किया था और उसे वीडियो टेप भी किया था, उसको जमानत दी थी !! स्विस अरबपति को जमानत मिलने के कारण, वो भारत से भागने में सक्षम हो गया ! तो ऐसे मामलों में, हम आम-नागरिक, मेसेज के माध्यम से आदेश भेज सकते हैं कि स्विस अरबपति को जमानत नहीं मिलनी चाहिए |

तो यदि सुप्रीम-कोर्ट जजों के द्वारा संविधान का उल्लंघन हो रहा है, तो यह हम आम नागरिकों का संवैधानिक कर्तव्य है कि उन जजों को जितनी जल्दी हो सके, उनको बदलें | आम नागरिक एक जज को केवल इसलिए नहीं बदलेंगे कि वह बहुमत नागरिकों को नजरंदाज कर रहा है | आम नागरिक, एक जज को तभी बदलेंगें यदि वो संविधान का उल्लंघन करेगा |

50 करोड़ लोग किसी निर्दोष के लिए फांसी की मांग कर सकते हैं ? और वो भी जाँच किये बिना ? कोई भी देश के नागरिक ऐसा नहीं कर सकते हैं | और निश्चित रूप से, भारत के नागरिक तो ऐसा नहीं कर सकते हैं | ज्यादातर भारतीय नागरिक तो एक चींटी को चोट पहुँचाने से पहले 100 बार सोचते हैं |

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ऐसा कहना कि सुप्रीम-कोर्ट के जज भय के कारण अपना फैसला करेंगे, उनका अपमान करना है | ऐसे तो मैं कह सकता हूँ कि जज रिश्वत लेकर फैसला कर सकते हैं !! यदि जज ईमानदार हैं, तो फिर उनको हटाये जाने और बदले जाने का क्यों डर होगा ?

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अमेरिका में, आम-नागरिकों के पास राज्य के प्रधान जज सहित, जजों पर राईट टू रिकल है |

यह गुलामी की मानसिकता है कि हम न्यायाधीशों को बदल नहीं सकते | इस “गुलामी की मानसिकता” से आप सब निकलिए | हम सब स्वतंत्र नागरिक हैं | एक जज जो संविधान का उल्लंघन कर रहा है, उसे बदलना हम, आम-नागरिकों का संवैधानिक कर्तव्य है |

प्रश्न 21 – कृपया जनसेवकों को मेसेज-आदेश के कुछ उदाहरण दीजिए | मेसेज-आदेश में क्या लिखा जा सकता है ?

उत्तर 21 –

सबसे पहले, आपको स्पष्ट रूप से निर्णय करना चाहिए कि आपको जनसेवकों और सरकार से क्या चाहिए | क्यूंकि यदि आपकी मांग अस्पष्ट है और आप मांग के लिए दबाव डालते हैं, तो फिर सरकार एक कमियों वाला कानून बनाएगी, जो कार्यकर्ता की मांग से बिलकुल अलग होगा | और सरकार कहेगी कि उसने ये कानून जनता की मांग के कारण लागू किया है !!

फिर, कार्यकर्ता को लोकतंत्र, सिस्टम और कानून पर से विश्वास उठ जायेगा और वो सोचता है कि सारे कानूनों के साथ छेड़-छाड किया जा सकता है | इसीलिए, मांग स्पष्ट होनी चाहिए और उसमें जनसेवक के लिए कोई भी छेड़-छाड करने की कोई गुन्जायिश नहीं होनी चाहिए | और उसमें आम-नागरिकों के लिए कुछ अधिकार होने चाहिए, जिनके प्रयोग से वे सरकारी कर्मचारियों को प्रस्तावित प्रक्रिया का दुरुपयोग करने से रोक सकते हैं, जैसे आम-नागरिक भ्रष्ट और निकाम्मे कर्मचारियों को बदल सके, आम-नागरिक उनको सजा दे सके |

हमें सभी कार्यकर्ताओं और नागरिकों से पूछना चाहिए, कि वे जो भी राष्ट्र स्तर का कार्य कर रहे हैं, क्या वे इसका समर्थन करते हैं कि करोड़ों (उदाहरण 30-40 करोड़) नागरिक-मतदाता इसके लिए अपने सांसद आदि जनसेवकों को मेसेज द्वारा आदेश करें ? उदाहरण के लिए, यदि कोई गो-हत्या को रोकने के लिए कार्य कर रहा है, तो हमें उसको पूछना चाहिए कि क्या आप समर्थन करते हैं कि करोड़ों वोटर (उदाहरण 30-40 करोड़) अपने सांसद को मेसेज द्वारा आदेश करें कि वे गो-हत्या रोकने के लिए कदम उठाएंगे ? यदि कार्यकर्ता `हां` बोलता है, तो फिर उसको बोलो कि वो और उसके मित्र अपने सांसदों को मेसेज-आदेश भेजें और भेजे गए मेसेज-आदेश के बारे में जनता को सूचना दें फेसबुक वाल-नोट, ब्लॉग, पर्चे आदि द्वारा |

ये प्रचार-तरीका ये सुनिश्चित करता है कि नागरिक और कार्यकर्ता अपने मनचाहे प्रस्ताव को पारित करने के लिए स्वयं अपने जनसेवकों को आदेश दे सकते हैं, अपना मनचाहा प्रस्ताव भारतीय राजपत्र में छपवाने के लिए उन्हें किसी नेता पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा |

1) अपने प्रिय नेता को तुरंत प्रधानमंत्री बनाना — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि कि तुरंत प्रस्ताव शुरू करें कि श्री क.ख.ग. (आपके प्रिय नेता) को प्रधानमंत्री बनाया जाये | और मैं आपको उस प्रस्ताव में `हाँ` वोट करने का आदेश देता हूँ | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

2) टी.सी.पी. 1 — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि प्रधानमंत्री को आदेश दें कि राजपत्र में तुरंत छपवाएं कि कि यदि कोई नागरिक-वोटर चाहे तो वो किसी भी दिन अपने कलेक्टर के दफ्तर जाकर, 20 रुपये प्रति पन्ना देकर, अपनी एफिडेविट स्कैन करवाकर प्रधानमंत्री वेबसाइट पर रखवा सकेगा | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

3) `सेना और नागरिकों के लिए खनिज आमदनी` — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि तुरंत प्रधानमंत्री को आदेश दें कि भारतीय राजपत्र में छापें कि वित्तीय सचिव खनिज आमदनी, स्पेक्ट्रम आमदनी, सरकारी भूमि का किराया का 67% सीधा देश के सभी नागरिकों के खाते में जमा करे | और बाकी 33% सेना के खाते में जमा करे | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

4) चुनाव यंत्र 1 — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि तुरंत लोकसभा अध्यक्ष को आदेश दें कि तुरंत `नागरिक प्रतिनिधि अधिनियम` में जरुरी बदलाव लाएं ताकि चुनाव यंत्र पर बैन लग जाये और कगाज मतपत्र वापस आ जाये | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

5) चुनाव यंत्र 2 — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि तुरंत चुनाव आयोग कमिश्नर को आदेश दें कि चुनाव आयोग की वेबसाइट पर एक मोबाइल नंबर प्रकाशित करें, ताकि सभी नागरिक उसपर चुनाव आयोग को मेसेज द्वारा जरुरी आदेश दे सके | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

6) सी.आर.पी.एफ के हथियार रखने पर पाबंधी वाले कानून को रद्द करो — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि तुरंत उस कानून को रद्द करवाएं जो कहता है कि श्रीनगर में केवल 3 में से एक सी.आर.पी.एफ का सैनिक ही हथियार रख सकता है और सभी सी.आर.पी.एफ. के सैनिकों को हथियार रखने दिया जाये | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

7) राईट टू रिकॉल-प्रधानमंत्री 1 — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि तुरंत प्रधानमंत्री को आदेश दें कि राजपत्र में छपवाएं कि जो व्यक्ति प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, कलेक्टर उनसे 20,000 रुपये का शुल्क लेकर, उनका नाम प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर दर्ज करें | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

8) राईट टू रिकॉल-प्रधानमंत्री 2 — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि तुरंत प्रधानमंत्री को आदेश दें कि पटवारी (लेखपाल;तलाटी) को आदेश दें कि वे नागरिकों को अनुमति दें कि वे शुल्क देकर अपनी प्रधानमंत्री उम्मीदवारों की पसंद प्रधानमंत्री वेबसाइट पर दर्ज करवा सकें | कलेक्टर ऐसा सिस्टम भी बनाएगा, जिसके द्वारा नागरिक अपनी प्रधानमंत्री उम्मीदवारों की पसंद मेसेज द्वारा भी दर्ज करवा सकते हैं | नागरिक किसी भी दिन अपनी पसंद को रद्द करवा सकता है | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

9) राईट टू रिकॉल-सुप्रीम कोर्ट प्रधान-जज 1 — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि नागरिकों को अनुमति दी जाए कि वे 20,000 रुपयों का जमा-राशि देकर, अपने आपको `राष्ट्रिय स्वीकृत जूरिस्ट` के पद के लिए प्रधानमंत्री वेबसाइट पर पंजीकृत करवा सकें | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें
धन्यवाद |”

10) राईट टू रिकॉल-सुप्रीम कोर्ट प्रधान-जज 2 — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि तुरंत प्रधानमंत्री को आदेश करें कि तलाटी (पटवारी;लेखपाल) को आदेश दें कि नागरिकों को अनुमति दें कि वे शुल्क देकर, प्रधानमंत्री वेबसाइट पर `राष्ट्रिय स्वीकृत जूरिस्ट` के उम्मीदवारों को स्वीकृति दे सकें | और कृपया `राष्ट्रिय सूचना विज्ञान केन्द्र` के अध्यक्ष को आदेश दें कि नागरिक मेसेज द्वारा `राष्ट्रिय स्वीकृत जूरिस्ट` उम्मीदवार को स्वीकृत कर सकें, ऐसा सिस्टम बनाएँ | और नागरिक किसी भी दिन भी अपनी स्वीकृति को रद्द कर सकें | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

11) राईट टू रिकॉल-सुप्रीम कोर्ट प्रधान-जज 3 — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि तुरंत प्रधानमंत्री को आदेश दें कि राजपत्र में छपवाएं कि यदि 40 करोड़ नागरिक किसी व्यक्ति को `राष्ट्रिय स्वीकृत जूरिस्ट` को पसंद करते हैं, तो प्रधानमंत्री सुप्रीम-कोर्ट के प्रधान-जज को आदेश देंगे कि उस `राष्ट्रिय स्वीकृत जूरिस्ट` को नया सुप्रीम-कोर्ट का प्रधान-जज नियुक्त करे | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

12) आरक्षण 1 — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि तुरंत प्रधानमंत्री को आदेश करें कि राजपत्र में छपवाएं कि यदि कोई दलित या अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ी जाती का व्यक्ति, आरक्षण के बदले, आर्थिक विकल्प चाहता है, तो उसको हर वर्ष 600 रुपये मिलेंगे प्रति व्यक्ति | और आरक्षण, उतना प्रतिशत कम होगा, जितने प्रतिशत ने आर्थिक विकल्प का चुनाव किया है | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

13) आरक्षण 2 — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि तुरंत लोकसभा अध्यक्ष के सामने ये कानून-ड्राफ्ट रखें कि दलित, जनजाती, और अन्य पिछड़ी जातियों की उपजाति, जिनको समाज में कम प्रतिनिधित्व प्राप्त है, उनको अधिक कोटे का हिस्सा (सब-कोटा) मिलेगा जब तक उनका समाज में प्रतिनिधित्व दूसरी उप-जातियों के बराबर नहीं हो जाता है | और कृपया इस कानून पर `हां` में वोट करें | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

14) राईट टू रिकॉल-रिसर्व बैंक गवर्नर 1 — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि तुरंत प्रधानमंत्री को आदेश दें कि राजपत्र में छपवाएं कि कलेक्टर उन नागरिकों का नाम जमा-शुल्क लेकर पंजीकृत करेंगे, जो रिसर्व बैंक गवर्नर बनना कहते हैं, और उनके नाम कलेक्टर प्रधानमंत्री वेबसाइट पर डालेंगे | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

15) राईट टू रिकॉल-रिसर्व बैंक गवर्नर 2 — “मैं, ..., वोटर नंबर _____, ________ जिले का रहने वाला, जिसके आप सांसद हो | संविधान की उद्देश्यिका के अनुसार, हर नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है कि वो अपने सांसद को जरूरी आदेश भेज सके मेसेज द्वारा |

मैं अपना ये कर्तव्य निभाने के लिए, आपको आदेश दे रहा हूँ कि तुरंत प्रधानमंत्री को आदेश दें कि पटवारी (लेखपाल) को आदेश दें कि नागरिक शुल्क देकर रिसर्व बैंक गवर्नर उम्मीदवारों पर अपनी पसंद दर्ज करवा सकें प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर | और प्रधानमत्री कलेक्टर को ये भी आदेश दें कि ऐसा सिस्टम बनाएँ, जिससे नागरिक अपनी रिसर्व बैंक गवर्नर उम्मीदवारों की पसंद मेसेज द्वारा दर्ज कर सकें | नागरिक किसी भी दिन अपने पसंद रद्द भी कर सकता है | और कृपया अपने पब्लिक फोन को अपनी वेबसाइट के साथ जोड़ दें ताकि आपको भेजे गए सारे मेसेज जनता को दिखें |
धन्यवाद |”

अध्याय 2 – अमेरिकी पुलिस में भारतीय पोलिस से भ्रष्टाचार कम क्यों है?

अध्याय 2 – अमेरिकी पुलिस में भारतीय पोलिस से भ्रष्टाचार कम क्यों है?

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(2.1) यह बहुत ही रहस्य भरा प्रश्न है पर इसका उत्तर बहुत ही आसान है!!

आपने अमेरिका के अपने रिश्तेदार, मित्रों से यह अवश्य सुना होगा कि अमेरिका  के पुलिस/कोर्ट में भ्रष्टाचार भारत के पुलिस/कोर्ट में भ्रष्‍टाचार से बहुत कम है I भारत के  हरेक अनिवासी भारतीय ने इस

पर पहले ही दिन से ध्यान दिया होगा I उदाहरण के लिए, जब मैं   अमेरिका  में था, उस समय मुझे ट्रैफिक के नियमों का उल्लंघन करने  पर हवलदारों ने 5 बार रोका था। ट्रैफिक के नियमों को तोड़ने के लिए,  हवलदारों ने मुझसे 3 बार अर्थदंड/जुर्माना लिया और 2 बार मुझे क्षमा किया, परन्तु एक बार भी उन्‍होंने संकेत तक नहीं दिया कि घूस लेने  में उनकी थोड़ी भी रूचि है I क्यों ? और यह आपके लिए अवश्‍य ही एक रहस्य होना चाहिए कि अमेरिका में पुलिस/जज भारत की तुलना में इतने कम भ्रष्ट क्यों है ? क्या अमेरिका की पुलिस/न्‍यायाधीश  भारत की पुलिस/जज की तुलना में मुर्ख हैं कि वो अपने नागरिकों से घूस वसूल करने के चालाकी भरे तरीकों के बारे में नहीं सोच सकते ?  नहीं, वे इतने भी मुर्ख नहीं हैं I क्या वे इतने डरपोक हैं कि वे नागरिकों के हाथ न मरोड़ सकें और उनसे घूस ना वसूल सकें? नहीं, वे उतने ही साहसी हैं जितने की भारत की पुलिस है – थोड़े भी कम नहीं I तो क्या अमेरिका के हर पुलिसवाले /जज लालच से परे हैं ? नहींI  किसी भी राष्ट्र में ऐसा नहीं हो सकता की वहाँ के लाखों व्यक्तियों में से कोई भी लालची ना हो I तो क्या अधिक वेतन प्राप्‍त करना ही भ्रष्टाचार इतना कम होने का एकमात्र कारण है ? अच्छा तो मान लें कि हमने भारत में अपने पुलिसवालों/जजों के वेतन इस सप्‍ताह दोगुने कर दिए तो क्या वे हमें अगले सप्ताह से घूस में 10 प्रतिशत की छूट देंगे?  उदाहरण के लिए, वर्ष 2009-2010 में सरकार ने सभी न्यायधीशों के वेतन तीन गुना कर दिए I तो क्या जजों ने अपनी घूस  खोरी में अगले दिन 10 प्रतिशत की भी छूट दी ? मेरा अनुमान है, नहीं I यदि भारत सरकार का कोई कर्मचारी यह सोचता है कि जितना वेतन उसे मिल रहा है उसे दोगुना कर दिया जाना चाहिए और इसके लिए उसे घूस लेने की जरूरत है। तो क्या वह 30 वर्ष के वेतन में आ

ने वाले घूस के बराबर वेतन इकट्ठा करने के बाद घूस लेना बंद कर देगा? नहीं, उनमें से अधिकतर कभी नहीं बंद करेंगेI इस प्रकार, वेतन अवश्‍य ही एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा है, पर भारत और अमेरिका में भ्रष्‍टाचार के स्‍तर में बदलाव लाने हेतु कोई सबसे बड़ा कारक नहीं है। तो और क्या कारण हो सकता है ?

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संस्कृति कारण नहीं है

क्या हमारी संस्कृति इसका कारण है? भारत के बहुत से बुद्धिजीवी (कु-बुद्धिजीवी?) के पास 4 अंकों का बौद्धिक स्तर (IQ) है और वे कहते है कि भारत में पुलिसवाले अधिक भ्रष्ट इसलिए हैं क्योंकि हम जनसाधारण अनपढ़ हैं, जागरूक नहीं हैं, हममें नैतिक सदाचार की कमी है, हमारी राजनीतिक संस्कृति बुरी है आदि I दूसरे शब्दों में, 4 अंकों  के बौद्धिक स्तर (IQ) वाले इन बुद्धिजीवियों के अनुसार, हम नागरिकगण पुलिस / न्यायाधीश के भ्रष्ट होने के जिम्‍मेदार हैं I 4 अंकों  वाले बौद्धिक स्तर (IQ) के बुद्धिजीवियों द्वारा “पीड़ितों पर ही आरोप” लगाने वाले इन तर्कों को मैं सफ़ेद झूठ कहकर अस्वीकार करता हूँ I यह बात उसी तरह चुभनेवाली लगती है जैसे कोई कहे “बलात्कार के लिए औरतें जिम्मेदार हैं” I यह तर्क कि “नागरिकों में जागरूकता नहीं है” या “नागरिकों की सभ्यता बुरी है”  बिलकुल बकवास हैI यहाँ तक कि सबसे ज्‍यादा अशिक्षित व्यक्ति भी यह अच्‍छी तरह जानता है कि भ्रष्टाचार अनैतिक है और यह एक अपराध है I और सभी पुलिसवालों, न्‍यायाधीशों व मंत्रियों को यह अच्‍छी तरह पता है कि भ्रष्टाचार अनैतिक है, गैरकानूनी है। और यहाँ तक की जब अमेरिका में वर्ष 1800 में शिक्षा 5 प्रतिशत से भी कम थी तब भी वहाँ ऐसे भ्रष्‍ट पुलिस,  न्यायाधीश आदि नहीं थे I इस मेरे विचार में कम शिक्षा कोई मुद्दा नहीं है। “नागरिकों में जागरूकता नहीं है” यह 4 अंकों  वाले बौद्धिक स्तर (IQ) के बुद्धिजीवियों द्वारा गढ़ा हुआ बिलकुल बकवास है और यह कहना कि “नागरिकों की सभ्यता बुरी है”  बिलकुल सफ़ेद झूठ हैI तो अमेरिका में भ्रष्टाचार कम होने का असली कारण क्या है?

हम पुलिस दल को मोटे तौर पर दो भागो में विभाजित करते है – कनिष्‍ठ/जूनियर     अधिकारी जैसे हवलदार/दरोग़ा और वरिष्‍ठ/सीनियर  अधिकारी जैसे जिला पुलिस आयुक्‍त/कमिश्‍नर I अमेरिका में हवलदार शायद ही कभी घूस  मांगते है क्योंकि अमेरिका  में जिला पुलिस आयुक्‍त/कमिश्‍नर उनके लिए जाल बिछाते हैं I हवलदार जानता है की 100-500 बार कानून का उल्लंघन करने वाले व्‍यक्‍तियों में से एक व्‍यक्‍ति जिला पुलिस  आयुक्‍त/कमिश्‍नर   का बिछाया हुआ जाल है और यदि वह घूस मांगने का साहस करता है तो वह पकड़ा जा सकता है और उसे कारावास हो सकती हैI उदाहरण के लिए, जब मैं वर्ष 1990 से 1998 तक अमेरिका  में था, उस समय मुझे ट्रैफिक के नियमों का उल्लंघन करने पर हवलदारों ने 5 बार रोका था। ट्रैफिक के नियमों का उल्लंघन करने पर हवलदारों ने मुझसे 3 बार अर्थदंड/जुर्माना लिया और 2 बार मुझे क्षमा किया, परन्तु एक बार भी उन्‍होंने संकेत तक नहीं दिया कि घूस लेने में उनकी थोड़ी भी रूचि है I क्यों?  मुख्य कारण है कि वह जानता है कि 200  में से कोई एक ऐसा यातायात उल्‍लंधनकर्ता आयुक्‍त/कमिश्‍नर   द्वारा बिछाया गया जाल होता है और उसे नहीं पता कि कौन सा उल्‍लंधन जाल है I  इसलिए वह 200 मामलों में से एक में भी घूस नहीं लेता I और अमेरिका में बहुत से नोडल अधिकारी जैसे जिला शिक्षा अधिकारी, जिला लोक मुकदमा/अभियोग चलाने वाला अधिकारी, राज्यपाल आदि, अधिकारियों,  मंत्रियों,  न्यायाधीशों के विरूद्ध जाल बिछाते हैं I समय-समय पर जाल बिछाना सभी कनिष्‍ठ/जूनियर स्टाफ को घूस  लेने से मुक्त रखता है I

इसलिए यह तथ्‍य कि “आयुक्‍त/कमिश्‍नर जाल बिछाते है” इस बात को दर्शाता है कि क्‍यों कनिष्‍ठ/जूनियर स्टाफ भ्रष्टाचार कम करते हैं I लेकिन फिर क्यों अमेरिका  में पुलिस आयुक्‍त/कमिश्‍नर   घूस के प्रचलन को समाप्‍त करने के लिए जाल बिछाते है जबकि भारत में अधिकांश पुलिस आयुक्‍त/कमिश्‍नर हवलदार को घूस  वसूल करने का आदेश देते हैं ?  इस अंतर का कारण क्‍या है? क्यों अमेरिका में भी पुलिस  आयुक्‍त/कमिश्‍नर हवलदारों को घूस वसूल करने का आदेश नहीं देता?  इसका एकमात्र कारण है: अमेरिका में नागरिकों के पास मुख्य जिला पुलिस प्रमुख / डिस्‍ट्रीक्‍ट पुलिस चीफ को निकालने की प्रक्रिया है। (अर्थात राइट टू रिकॉल (भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा हटाने /बदलने की प्रक्रिया ) या प्रजा अधीन राजा) I दूसरे शब्‍दों में, यदि अमेरिका के किसी जिले में नागरिक जिला पुलिस प्रमुख / डिस्‍ट्रीक्‍ट पुलिस चीफ   को निकलना चाहते हैं तो उन्हें डी आई जी  या मुख्यमंत्री या गृह मंत्री के पास जाकर कोई अभियोग/मुकदमा दायर करने की आवश्यकता नहीं है I अमेरिका  के नागरिकों को भी उच्च न्‍यायालयों के न्यायधीशों के पास जाकर कोई बेकार की जनहित याचिका  देने की आवश्यकता नहीं है I अमेरिका  के नागरिकों को बस यह प्रमाणित करने की आवश्‍यक्‍ता है कि जिले के अधिकांश मतदाता पलिस आयुक्‍त/कमिश्‍नर को निकलना चाहते हैं I और यदि एक बार किसी  जिला पुलिस प्रमुख/ डिस्‍ट्रीक्‍ट पुलिस चीफ के विरूद्ध बहुमत प्रमाणित हो जाता है तो उसे निकल दिया जाता है और  किसी भी उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की हिम्मत नहीं है कि वह उसके  निलम्‍बन के निर्णय पर रोक/स्‍टे का कोई आदेश दे सके या उसे निलंबित करने में देरी करेI इसी तरह, यदि अमेरिका के नागरिक मुख्यमंत्री, महापौर/नगर अध्यक्ष, जिला न्यायाधीश,  जिला लोक अभियोक्‍ता/प्रोजिक्‍यूटर , जिला शिक्षा अधिकारी आदि को निकलना चाहें तो उन्हें विधायकों या प्रधानमंत्री या पार्टी के प्रमुख या न्‍यायाधीश के पास जाने की आवश्यक नहीं है – नागरिकों को मात्र उस जिले या राज्य में बहुमत की राय प्रमाणित करने की आवश्‍यकता है I इसलिए पुलिस प्रमुख और नोडल अधिकारी डरते है की यदि ये स्‍टॉफ ज्‍यादा भ्रष्ट हो गए तो नागरिक उन्‍हें निकल सकते हैं I और इसलिए पुलिस  आयुक्‍त/कमिश्‍नर जैसे नोडल अधिकारी जाल बिछाते है और इसीलिए जूनियर स्टाफॅ में भ्रष्टाचार कम है I

अब प्रश्‍न है कि क्या नोडल अधिकारी को इस प्रकार से निकालने की प्रणाली   अर्थात प्रजा अधीन राजा/भ्रष्ट को हटाना/बदलना अमेरिकी अवधारणा/कॉन्‍सेप्‍ट है? क्या यह भारतीय विचारधारा नहीं है, जैसा कि बहुत से प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल – विरोधी बुद्धिजीवी कहते हैं? ऐसा नहीं है। सत्यार्थ प्रकाश का छठा अध्याय है “राज धर्म” I इस अध्याय में स्वामी दयानंद सरस्वती ने बताया है कि नागरिकों अधिकारियों,  मंत्रियों और  न्‍यायाधीशों की शक्ति क्या हैं और उनके दायित्व क्या हैं I छठे अध्याय के पहले ही पृष्ठ में स्वामी दयानंद राज धर्म का बुनियाद स्थापित करते हैं। स्‍वामी दयानन्‍द ने दो शब्द दिए है “प्रजा-अधीन राजा” और इन दो शब्दों में इन्होंने अच्छी राजनीति के ऊपर 10,000 प्रस्तावों का सार  दिया  है और फिर वे इन दो शब्दों का विस्तार करते  हैं, “राजा को प्रजा के अधीन होना चाहिए नहीं तो वह नागरिकों को लूट लेगा और राष्ट्र का विनाश कर देगा” I और उन्होंने ये श्लोक अथर्ववेद से लिए हैं I और भारत के पुलिस कमिश्‍नर, मंत्री, जजों आदि और अमेरिका  के पुलिस कमिश्‍नर, मंत्री, जजों आदि के बीच सरसरी तौर पर तुलना यह दर्शाता है कि हमारे ऋषि मुनि कितने सत्य हैं जिन्होंने अथर्ववेद लिखे हैं और स्‍वामी दयान्द भी I अमेरिका में नागरिकों के पास जिला पुलिस प्रमुख / डिस्‍ट्रीक्‍ट पुलिस चीफ, मुख्य मंत्री  आदि  को निकालने की प्रक्रिया है अर्थात वे सब पदाधिकारी प्रजा अधीन हैं और इसलिए अमेरिका में जिला पुलिस प्रमुख / डिस्‍ट्रीक्‍ट पुलिस चीफ  , न्‍यायाधीश, मुख्यमंत्री आदि नागरिकों को लूटते नहीं बल्कि नागरिकों की सुरक्षा करते हैं  जबकि यहाँ भारत में नागरिक किसी जिला पुलिस प्रमुख/डिस्‍ट्रीक्‍ट पुलिस चीफ  , मुख्यमंत्री आदि को निकाल नहीं सकते अथवा उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकते और इस तरह वे प्रजा अधीन नहीं हैं I और इसलिए हम देखते हैं कि यहां भारत में मंत्री व न्‍यायाधीश जनसाधारण को लूटने में व्यस्त रहते हैं I स्वामी दयानंद का विश्‍लेषण  कितना उचित है –“जैसे माँसाहारी जानवर अन्य जानवरों को खा जाते हैं, उसी प्रकार कोई राजा जो प्रजा अधीन नहीं है, वह नागरिकों को लूट लेगा” I और इसलिए विश्व के सभी चीजों में से सत्यार्थ प्रकाश के यह दो शब्द स्पष्ट करते है कि क्यों अमेरिकी  पुलिस  में भ्रष्टाचार कम है I और मेरे लिए यह बड़ी विडंबना है कि सत्यार्थ प्रकाश के इन दो शब्द के महत्‍व को समझाने के लिए मुझे अमेरिका  का उदाहरण  देना पड़ रहा है I

(2.2) राइट टू रिकॉल ( भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा निकालने / बदलने का अधिकार) और प्रजा अधीन राजा

अब, राइट टू रिकॉल  और “प्रजा अधीन राजा” कैसे सम्बंधित हैं ? राइट टू रिकॉल    का अर्थ होता है- वह प्रणाली(सिस्टम), जिसके द्वारा नागरिक किसी भी अधिकारी/ जज /मंत्री को किसी भी समय निकाल सकते हैं किसी उच्च अधिकारी के पास गए बिना ,केवल बहुमत साबित करने के द्वारा I इस तरह से उच्च अधिकारी आम नागरिकों के प्रति जवाबदार होते हैं क्योंकि अधिकारी नियुक्त करने वाले के प्रति जवाबदार नहीं, नौकरी से जो निकाल सकता है उसके प्रति जवाबदार होते हैं, उन्हीं के अनुसार और उनके लिए काम करते हैं | राइट टू रिकॉल (और  राईट टू रिकाल पर आधारित जूरी प्रणाली) एकमात्र ज्ञात प्रणाली है जो राजा को प्रजा अधीन बनाती है और इस प्रकार मंत्री, अधिकारी, पुलिस, और न्‍यायाधीशों में भ्रष्टाचार कम करती हैI बहुत सारे अन्य संस्‍था आधारित विकल्प प्रस्तावित हुए हैं जैसे पुलिस  बोर्ड, न्‍याय आयोग आदि। पर वे सब बिलकुल असफल साबित हुए हैं I इस तरह की संस्‍थाएं  भ्रष्टाचार को केवल कुछ समय के लिए रोकती हैं, उसे  कम नहीं करतीं I कोई प्रणाली जो राजा को प्रजा से स्वतंत्र (निरंकुश) रखती है वह केवल भ्रष्टाचार को दूसरे हाथों में देती है, उसे कम नहीं  कर सकती I

यदि नागरिक के पास अधिकारियों, न्‍यायाधीशों, मंत्रियों आदि को निकालने का सीधा कोई मार्ग नहीं होगा, और उन्‍हें निकलने के लिए अन्य अधिकारियों , न्‍यायाधीशों ,विधायकों, सांसदों,  मंत्रियों आदि से याचना करना पड़ेगा तो ऐसे में कोई नागरिक अधिकारियों, न्‍यायाधीशों और मंत्रियों पर नियंत्रण करने में असफल होगा I अधिकारी,  मंत्री,  न्‍यायाधीश आदि जीवन भर घूस लेंगे, अनैतिक कार्यों पर समर्थन की मांग करेंगे और नागरिकों पर अवर्णनीय/बहुत ज्यादा अत्याचार करेंगे। और इससे भी बुरा होगा कि वे अपने राष्ट्र को विदेशियों के हाथों बेच देंगेI अधिकारी,  मंत्री,  न्‍यायाधीश  आदि चाहे वे जूनियर हों या सीनियर, आपस में “एक दूसरे को बचाने” वाला सांठगांठ बनाएंगे और इन सांठगांठ का प्रयोग करते हुए वे एक दूसरे को सुरक्षित रखेंगे I इस प्रकार, भ्रष्टाचारियों के लिए कोई दंड नहीं रहेगा और भ्रष्टाचार अनियंत्रित गति से फैलेगाI वे हमेशा “प्रमाण का अभाव” को बहाना बनाएंगे और साथी भ्रष्ट मंत्रियों, अधिकारियों, न्‍यायाधीशों के भ्रष्‍टाचार का समर्थन करेंगेI नागरिकों का सीधा हस्तक्षेप मानव-जाति में ज्ञात एक मात्र प्रणाली है जो इन सांठगांठों से मुक्ति दिला सकती है I

(2.3) प्रजा अधीन राजा / राइट टू रिकॉल आधुनिक अमेरिका में

अमेरिका  में हटाने/रिकॉल  की प्रणाली का प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट प्रत्येक राज्य में और प्रत्‍येक जिले में अलग अलग है I उदाहरण के लिए लगभग 20 राज्यों में नागरिकों के पास राज्यपालों को हटाने/रिकॉल  की प्रणाली है I और अनेक अन्य राज्यों में जिला न्‍यायाधीश और उच्च न्‍यायालय के न्‍यायाधीश को प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का प्रयोग करके हटाने का अधिकार हैI अनेक राज्यों में जब वहां के संविधान के प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट  तैयार हो रहे थे तब राज्यपालों, न्यायधीशों आदि  को  प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल के सहारे हटाने का अधिकार नहीं था परन्तु बाद में नागरिकों ने राज्यपालों, न्‍यायाधीशों आदि को हटाने/रिकॉल  की प्रणाली को जोड़ा I और अनेक राज्‍यों में जनमत संग्रह प्रक्रिया है। और इसलिए अमेरिका के जिन राज्यों में अभी तक हटाने/रिकॉल प्रणाली नहीं है, उन राज्यों के अधिकारी को ज्ञात है की यदि वे अभद्र व्यवहार करेंगे तो नागरिक जनमत संग्रह  प्रणाली का प्रयोग करके हटाने/रिकॉल  प्रणाली लाने और उन्हें निकालने में पूरी तरह से सक्षम हैं जैसे अन्य कई राज्यों के नागरिक करते हैं I दूसरे शब्‍दों में, हटाने/रिकॉल का भय प्रत्येक राज्य और जिला अधिकारियों में है यहां तक कि उन राज्‍यों में भी जहां हटाने/रिकॉल प्रणाली अभी तक नहीं है I

सम्भवतः आपको हटाने/रिकॉल के कुछ वास्‍तविक उदाहरण जानने  में रूचि होगी I एक उदाहरण के लिए, मै अमेरिका  के एक समाचारपत्र Palo Alto Daily की एक खबर का लिंक दे रहा हूँ जो 4 मई 2007 के अंक में छपा था I अध्याय क पूरे लेख के लिए इस  लिंक को देख सकते हैं:-

http://wwwIpaloaltodailynewsIcom/article/2007-5-4-05-04-07-smc-sheriff-recall

शेरिफ मंक के खिलाफ वापस बुलाने के प्रयास शुरू होते हैं

“सान कार्लोस का एक निवासी सान मैत्‍यो शहर के सबसे बड़े कानून प्रवर्तन (लागू कराने वाले) अधिकारी को वापस बुलाने का प्रयास कर रहा है। माइकल स्‍टोजनर ने कहा : बृहस्‍पतिवार को उसने शेरीफ जॉर्ज मंक को वापस बुलाने के लिए सोमवार तक इस आशय की सूचना दर्ज करने की योजना बनाई है। शेरीफ जॉर्ज मंक 19 अप्रैल को लासवेगास में एक गैर कानूनी काम में पकड़ा गया था। 24 अप्रैल को दिए गए बयान में मंक ने कहा: उसने सोचा कि वह एक कानूनी रूप से सही व्‍यवसाय को देख रहा था और उसने किसी कानून को नहीं तोड़ा। लेकिन उसने किसी प्रश्‍न का उत्‍तर देने से मना कर दिया है हालॉंकि स्‍टॉन्‍जर यह मानता है कि शेरीफ को वापस बुलाने के लिए व्‍यापक जनसमर्थन है, किसी शान मात्‍यु काउन्‍टी को वापस बुलाना एक बड़ा आदेश है। चुनाव अधिकारी का प्रवक्‍ता डेविड टॉम ने कहा: देश में दर्ज मतदाताओं के 10 प्रतिशत को  रिकॉल प्रक्रिया शुरू करने के लिए एक आवेदन पर हस्‍ताक्षर करना होगा। यह लगभग 35 हजार लोगों के बराबर है——“

अमेरिका में शेरिफ का अर्थ है जिला पुलिस प्रमुख/डिस्‍ट्रीक्‍ट पुलिस चीफ I इनमें से  सभी नहीं पर 70 से 80% जिला पुलिस प्रमुख/डिस्‍ट्रीक्‍ट पुलिस चीफ अमेरिका में जनसाधारण द्वारा चुने जाते है और बचे हुए को नियुक्त किया जाता है I चाहे चुने हुए हों या नियुक्त,  अमेरिका में इन जिला पुलिस प्रमुखों को निकालने के लिए नागरिकों के पास औपचारिक और अनौपचारिक प्रणाली है I अनेक जिलों में जनसाधारण के पास महापौर, जिला-सरकार के वकील, जिला शिक्षा अधिकारी आदि को हटाने/रिकॉल करने की प्रक्रियाएं हैं I और क्या अमेरिका  में नागरिकों न्यायधीशों को हटाने/रिकॉल की प्रक्रिया से हटा सकते हैं? हां,  अनेक राज्यों में न्यायाधीशों  को हटाने के लिए प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का कानून है I बहुत से मामलों के उदाहरण हैं जिनमें नागरिकों ने न्यायाधीशों को हटाने के लिए प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल  का प्रयोग किया है ( http://www.judgerecall.com/ ) और कृपया यह बर्किली विश्वविद्यालय के वेबसाइट का उदाहरण देखें (http://igs.berkeley.edu/library/htRecall2003.html  जहाँ से आपको कॅलीफोर्निया राज्य में हटाने/रिकॉल करने  की प्रणाली के बारे में जानकारी मिल सकती है I

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कैलिफोर्निया में अधिकारियों, न्‍यायाधीशों को वापस बुलाने के लिए तंत्र

कैलिफोर्निया में अधिकारियों, न्‍यायाधीशों को वापस बुलाने के प्रयास में पहला कदम वापस बुलाने संबंधी याचिकाओं का वितरण है। यह प्रक्रिया वापस-बुलाने-हेतु-आशय का नोटिस की याचिका जो कि उपयुक्‍त कानूनी भाषा में लिखी होती है और 65 मतदाताओं द्वारा हस्‍ताक्षरित होती है, को भरे जाने से शुरू होती है। एक बार यह प्रक्रिया पूरी हो जाती है तो वापस बुलाने संबंधी याचिका शीघ्रता से परिचालित की जा सकती है। राज्‍य स्‍तर के अधिकारियों को वापस बुलाने के लिए याचिकाओं पर उस देश में संबंधित अधिकारी के लिए हुए अंतिम मतदान के एक प्रतिशत की संख्‍या के बराबर मतदाता, जो 5 काउन्‍टियों से हों, सहित उस अधिकारी के लिए पिछले मतदान के मत के 12 प्रतिशत के बराबर संख्‍या में मतदाताओं द्वारा हस्‍ताक्षरित होना चाहिए(हर काउंटी से कम से कम पिछले मतदान के चुनाव के 1% जितनी संख्या होना चाहिए)। राज्‍य विधायकों को वापस बुलाने के लिए याचिकाओं को उस अधिकारी के लिए हुए अंतिम मत के 20 प्रतिशत के बराबर संख्‍या में होना चाहिए। वापस बुलाने के लिए मतपेटी के दो भाग होते हैं

वापस बुलाने के लिए हां अथवा नहीं मतदान और बदले में आने वाले अभ्‍यर्थियों जो नियमित मतदानों में नामांकन प्रक्रिया का उपयोग करके चुने जाते हैं, के नाम —- कैलिफोर्निया में राज्‍य स्‍तरीय अधिकारियों और विधायकों के लिए वापस बुलाने का तंत्र सबसे पहले वर्ष 1911 में संवैधानिक संशोधन के रूप में सामने आया जो वहां के गवर्नर हिराम जॉनसन के प्रगतिवादी प्रशासन द्वारा लागू किए गए सात सुधार उपायों में से एक था। इस संशोधन का सबसे विवादास्‍पद प्रावधान वापस बुलाए जाने वाले राज्‍य अधिकारियों में न्‍यायाधीशों का समावेश और खासकर राज्‍य सर्वोच्‍च न्‍यायालय के र्न्‍यायाधीशों को शामिल करना था। प्रस्‍तावक ने इन संशोधनों का समर्थन सरकार में बेइमानी और भ्रष्‍टाचार से लड़ने के एक और तंत्र के रूप में किया । विपक्ष ने इसे एक ऐसा तंन्‍त्र कहकर इसकी आलोचना की जो अतिवादी और असंतुष्‍ट लोग ईमानदार अधिकारियों को तंग करने और उन्‍हें हटाने के लिए प्रयोग में लायेंगे । वापस बुलाने के प्रयास कैलिफोर्निया में राज्‍य स्‍तरीय चुने गए अधिकारियों और विधायकों के विरूद्ध करने के प्रयास किए गए । विगत 30 वर्षों में सभी राज्‍यपालों को वापस बुलाने के प्रयास का कुछ हद तक सामना करना पड़ा है । वर्ष 2003 में राज्‍यपाल ग्रैन्‍ड डेविस पहले राज्‍य स्‍तरीय अधिकारी बने जिन्‍हें वापस बुलाने संबंधी चुनाव का सामना करना पडा। राज्‍य विधायकों के विंरूद्ध वापस बुलाने के प्रयास मतदान करने के स्‍तर तक पहुंच गए और चार को वाकई वापस बुलाया गया था। सीनेटर मार्शल ब्‍लैक ( आर – शान्‍ता क्‍लाय काउन्‍टी ) को 1913 में वापस बुलाया गया था और इसके बाद वर्ष 1914 में सीनेटर एडवीन ग्रान्‍ट ( डी – शान फ्रानसीसको) और एसेम्‍बली के सदस्‍य पॉल होरचर ( आर- लॉस ऐंजेल्‍स काउन्‍ट) और बोरिस एलेन ( आर – औरेंज काउन्‍ट) को 1995 में वापस बुलाया गया था। कैलिफोर्निया में स्थानीय सरकार के स्‍तर पर वापस बुलाने के कई सफल प्रयास हो चुके हैं । सामान्‍यत: कैलिफोर्निया में वापस बुलाने का सामान्‍य एतिहासिक पृष्‍ठभूमि इस प्रकार है:

Bird, Fredrick L., and Ryan, Frances M. The Recall of Public Officers: a Study of the Operation of the Recall in California. New York: Macmillan, 1930. ; Nolan, Martin F. “The Angry Governor [Hiram Johnson],” California Journal, v. 34, no. 9 (Sept. 2003), p. 12-18.  ;  Spivak, Joshua. Why Did California Adopt the Recall? History News Network, Sept. 15, 2003. ;   “The Recall Amendment,” Transactions of the Commonwealth Club of California, v. 6, no. 3 (July1911),p.153-225.(कृपया पूरा लेख यहां पढ़ें) –

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http://igs.berkeley.edu/library/htRecall2003.html

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भारत में यदि किसी ने केवल पाठ्यपुस्‍तक/टेक्‍सटबुक माफियाओं द्वारा लिखी गई पाठ्यपुस्तक ही पढ़ी हो तो उसके लिए यह विश्‍वास करना असंभव होगा कि इस ग्रह पर ही एक ऐसा राष्ट्र है जहाँ नागरिक उच्च न्‍यायालय के न्यायाधीश तक को बहुमत के मत द्वारा निकाल सकते हैं !! ये जनसाधारण ऐसा कैसे कर सकते हैं ? वे इनके साथ ऐसा करने का साहस भी कैसे कर सकते है? — क्‍योंकि ये न्‍यायाधीश तो भगवन से भी उपर हैं !!  कम से कम 4 अंकों  वाले बुद्धि-स्तर (IQ) के बुद्धिजीवी, जो भारत में न्याय-मूर्ति-पूजक हैं, इस बात की पुष्टि करते हैं I तो क्या यदि हटाने/रिकॉल कानून आता है तो क्या निरक्षरता विनाश  का कारण बनेगा ?  यह हटाने/रिकॉल की प्रणाली(सिस्टम) अमेरिका में वर्ष 1800 से है जब साक्षरता 10 प्रतिशत से भी कम था I तो यह तर्क देना कि- “रिकॉल भारत के लिए सही नहीं है क्योंकि अधिकतर भारतीय अशिक्षित हैं ” -गलत है I

      हटाने/रिकॉल का भय एकमात्र कारण है कि क्‍यों अमेरिका में पुलिस प्रमुख, न्‍यायाधीश           आदि  भारत के पुलिस प्रमुखों , न्‍यायाधीशों आदि की तुलना में बहुत कम भ्रष्ट हैं I कृपया ध्यान दें – अन्य कोई कारण नहीं है I और मैं एक बार फिर दोहराता हूँ – अन्य कोई कारण नहीं है I और सभी गलत तर्कों में से सबसे बेकार तर्क है “राजनीतिक संस्कृति” I “जागरूकता का अभाव” एक और बहुत गलत तर्क है I

      फिर, “अमेरिका की पुलिस में भ्रष्टाचार भारत की पुलिस की तुलना में इतना कम क्यों है” इस प्रश्न का उत्तर अथर्ववेद और स्वामी दयानंद जी के शब्दों में देते हुए कहा जा सकता है कि  इसका कारण है कि अमेरिका में पुलिस प्रमुख प्रजा के अधीन है जबकि भारत में कोई एक भी पुलिस प्रमुख प्रजा के अधीन बिलकुल नहीं है I अथर्ववेद और स्वामी दयानंद सरस्वती जी कहते है कि यदि राजा (राज कर्मचारी जैसे पुलिस प्रमुख) यदि प्रजा के अधीन नहीं है तो वह नागरिकों  को लूट लेगा I जिसे आज हम भारत में हर कहीं देख रहे हैं I अमेरिका  में केवल जिला पुलिस प्रमुख / डिस्‍ट्रीक्‍ट पुलिस चीफ, राज्यपाल, जिला न्यायाधीश, जिला शिक्षा अधिकारी, जिला लोक दंडाधिकारी(District Public Prosecutor), इतना ही नहीं अमेरिका के कुछ राज्यों में उच्च न्‍यायालय के मुख्य न्‍यायाधीश तक प्रजा के अधीन है और इसलिए अमेरिका के ये सरकारी कर्मचारी कम लूट मचाते हैं। और उसी अमेरिका में सीनेटर प्रजा के अधीन नहीं हैं और इसलिए सारे भ्रष्ट है I संघीय अधिकारियों द्वारा नियुक्त किये हुए राष्ट्रपति प्रजा के अधीन नहीं हैं इसलिए वे सारे भ्रष्ट है I तो अथर्ववेद जो कहता है, वह अमेरिका  में बिना किसी अपवाद के लागू किया गया है I और भारत में पटवारी से लेकर उच्‍चतम न्‍यायालय/सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्‍यायाधीश तक कोई भी प्रजा के अधीन नहीं है I और इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि उनमें से लगभग सभी भ्रष्ट हैं I

      और हटाने/रिकॉल का यह भय इतना प्रभावशाली है कि नागरिकों को इसका प्रयोग शायद ही कभी करना पड़ता है – अमेरिका में 0.05 प्रतिशत से भी कम अधिकारी को कभी हटाने/रिकॉल का सामना करना पड़ा है I हटाने/रिकॉल की प्रणाली(सिस्टम) ने यह सुनिश्चित किया है कि अमेरिकी अधिकारी भारतीय अधिकारियों की तुलना में शायद ही कभी केवल एक प्रतिशत तक  भ्रष्‍ट होते हैं और अपेक्षित क्षमता से काम करते हैं। वास्‍तव में, हटाने या रिकॉल की प्रक्रिया पुन:मतदान के दर को कम करती है क्‍योंकि अधिकारी अच्‍छा व्‍यवहार करते हैं और नागरिकों को शायद ही कभी उन्‍हें (हटाने/रिकॉल) हटाने  की आवश्यकता पड़ती है I

अमेरिका  के नागरिकों के पास हटाने/रिकॉल की प्रणाली(सिस्टम) वर्ष 1800 से है I परन्तु भारत के प्रमुख बुद्धिजीवी इस बात पर जोर देते हैं कि भारतवासियों को यह प्रणाली आज वर्ष 2011 में भी नहीं दी जा सकती क्योंकि भारतवासी अमरिकी लोगों की तुलना में घटिया हैं और हम भारतवासियों की राजनैतिक संस्‍कृति, नैतिक मूल्‍य, मानसिकता आदि घटिया है !! इन प्रमुख बुद्धिजीवियों को मेरा उत्तर है “अपने 4 अंकों  के बुद्धि स्तर और अपने सभी ज्ञान के साथ भांड में जाओ” I  मेरा यह विश्‍वास है कि हटाने/रिकॉल की प्रणाली को लाना होगा और यह भारतीय न्‍याय व्‍यवस्‍था, राजनीतिक व्यस्था और प्रशासन से भ्रष्टाचार और भाई-भतीजवाद कम करने का एकमात्र तरीका है I इसलिए मैं भारत के नागरिकों से यह कहता हूँ कि वे प्रधानमंत्री को सरकारी अधिसूचना(आदेश) जारी करने के लिए बाध्य करें जो हमें  प्रधानमंत्री,  उच्‍चतम न्‍यायालय/सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशों, मुख्‍यमंत्रियों,  उच्च न्‍यायालय के न्यायधीशों, मंत्रियों, जिला पुलिस प्रमुख/डिस्‍ट्रीक्‍ट पुलिस चीफ , भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर तथा ऐसे लगभग 200 पदों को बदलने में समर्थ बनाएगा I प्रत्येक पार्टी के ज्‍यादातर सांसदों और लगभग सभी प्रमुख बुद्धिजीवियों ने हटाने/रिकॉल प्रणालियों के मेरे प्रस्ताव का विरोध किया है I और इससे मुझे और आगे बढ़ने की प्रेरणा ही मिली है I

                        अब प्रश्न यह है – हम नागरिकगण भारत में प्रजा अधीन राजा/राइट टू हटाने/रिकॉल   (राइट टू रिकॉल/भ्रष्ट को बदलना/हटाना ) कैसे ला सकते है?  इसके लिए, मैंने जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली कानून के प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट  का प्रस्ताव रखा है जिसकी चर्चा मैंने अध्याय 1 में की है I

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(2.4) भारत में प्रजा अधीन राजा / राइट टू रिकॉल का संक्षिप्त इतिहास


प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का वर्णन अथर्ववेद में है I अथर्ववेद कहता है की सभी नागरिकों की जनसभा राजा को निकाल सकती है। महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने अपनी पुस्‍तक सत्यार्थ प्रकाश के छठे अध्याय में राज धर्म का वर्णन किया है और प्रथम 5 श्लोकों में से एक में वे कहते हैं – राजा को प्रजा के अधीन होना चाहिए अर्थात वह हम आमलोगों पर आश्रित हो I कृपया ध्यान दीजिए –  उन्होंने “अधीन” शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ होता है पूर्णत: आश्रित और अगले ही श्लोक में महर्षि दयानंद जी ने कहते हैं यदि राजा प्रजा के अधीन नहीं है तो वह राजा प्रजा को उसी तरह लूट लेगा जिस तरह एक मांसाहारी जानवर दूसरे जानवरों को खा जाता है। और इस प्रकार वैसा राजा (जो प्रजा के अधीन नहीं) राष्ट्र का विनाश कर देगा I और महर्षि दयानंद जी ने ये दोनों श्लोक वर्षों पहले लिखे गए अथर्ववेद से लिए हैं I और यहाँ राजा में प्रत्येक राज कर्मचारी सम्मिलित है अर्थात उच्‍चतम न्‍यायालय/सुप्रीम कोर्ट के न्‍यायाधीश से लेकर पटवारी तक सरकार के सभी कर्मचारी I  सरकार का प्रत्येक कर्मचारी प्रजा के अधीन होना चाहिए अन्‍यथा वह नागरिकों को लूट लेगा I ऐसा ही वे महात्‍मा कहते हैं जिन्‍होंने अथर्ववेद लिखा और महर्षि दयानंद सरस्वती जी उन महात्‍माओं की बात से सहमत हैं। इस प्रकार प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल भारतीय वेदों के मूल में है और इस प्रकार सारी

भारतीय विचारधाराओं, भारतीय मत, पंत और धर्मों ने अपनी आधारभूत भावना वेदों से ही ली हैं I

       और कृपया ध्यान दीजिए –  दयानंद सरस्‍वती जी संविधान-अधीन राजा के बारे में नहीं कहते। वे प्रजा अधीन राजा/राइट टू हटाने/रिकॉल के बारे में कहते हैं। भारत में, 4 अंकों के स्‍तर के बुद्धिजीवियों ने हमेशा उस बात का विरोध किया जो अथर्ववेद और सत्यार्थ प्रकाश सुझाते हैं I 4 अंकों  वाले स्तर के ये बुद्धिजीवी कहते हैं कि राजा और राज कर्मचारी अर्थात सरकारी कर्मचारियों को प्रजा के अधीन कदापि नहीं होना चाहिए बल्‍कि उन्हें केवल संविधान-अधीन अर्थात किताबों के अधीन जैसे संविधान के अधीन होना चाहिए। संविधान-अधीन राजा अर्थात संविधान-अधीन मंत्री, संविधान-अधीन अधिकारी, संविधान-अधीन पुलिसवाले और संविधान -अधीन न्‍यायाधीश की पूरी संकल्‍पना ही एक छल है क्‍योंकि तथाकथित संविधान  की व्‍याख्‍या को न्‍यायाधीशों, मंत्रियों आदि  द्वारा एक मोम के टुकड़े की तरह तोड़ा-मरोड़ा जा सकता हैI संविधान

की पूरी संकल्‍पना एक राक्षसी विचार है जिसे केवल भ्रम पैदा करने के लिए ही सृजित किया गया है I

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(2.5) पूरे विश्व में  प्रजा अधीन राजा / राइट टू रिकॉल का संक्षिप्त इतिहास

प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का प्रयोग यूनान में वर्ष 500 ईसा-पूर्व में किया गया था I यूनान के लगभग प्रत्येक नगर में यह प्रणाली थी जिससे नागरिक सभा करके राजा को निकल सकते थे I यहाँ तक कि मेसीडोनिया का शक्तिशाली सिकंदर, जिसने यूनान और सिंधू के सभी राजाओं को हराया था, वह भी नागरिकों द्वारा निकाले जाने के दायरे में था !! इस बात का कोई ज्ञात अभिलेख/रिकॉर्ड नहीं है कि क्‍या इस प्रक्रिया/तरीके का प्रयोग कभी किसी राजा को निकालने के लिए किया गया था? – ऐसा इसलिए था कि प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल एक ऐसा भय पैदा करता है जो राजा को सही व्यहार करने के लिए बाध्य करता है, और उसे निकालने के लिए इस कानून का प्रयोग करने की शायद ही कभी होती है।

      अब प्रत्‍येक राष्‍ट्र की तरह यूनानी राष्ट्रों को एक और भी मुद्दे का सामना पड़ा – क्या हो यदि राजा स्वयं अभद्र आचरण ना करे परन्तु उसका कोई कर्मचारी अभद्र व्‍यवहार करे? किसी अधिकारी द्वारा सत्‍ता का दुरूपयोग जैसे छोटे  हरेक मामले पर सभी हजारों नागरिकों की सभा बुलाना बहुत ही महंगा और समय बर्बाद करने वाला काम है। और यदि राजा और वरिष्‍ठ/सीनियर अधिकारियों को, कनिष्‍ठ/जूनियर अधिकारियों को नियंत्रित करने का अधिकार दे दिया जाता है तो जूनियर अधिकारी केवल अपने सीनियर अधिकारियों की बात सुनेंगे, नागरिकों की नहीं I तो प्राचीन यूनान के नागरिकों ने अधिकारियों को नियंत्रित करने के लिए एक अत्‍यधिक कुशल तरीके का प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट बनाया I प्रत्येक बार जब किसी अधिकारी पर अपराध का आरोप लगता था तो यह तय करने के लिए किन्‍हीं 50 नागरिकों को चुना जाता था जो यह निर्णय लेते थे कि क्‍या अधिकारी को निकलना है/दंड देना है I और अनियमित तरीके से चुने गए ये नागरिक सर्वोत्‍तम संभव और कम भाई-भतीजेवाद से प्रभावित, राष्‍ट्र के सभी नागरिकों की इच्‍छा के प्रतिनिधि समझे जाते थे( जो ठीक ही था)। और यदि अधिकारी सीनियर है तो उस मामले में निर्णय देने के लिए बिना अनियमित/क्रम-रहित तरीके से 100 नागरिकों को चुना जाता था और यदि वह और अधिक सीनियर है तो 200, 300, 400 या 500 नागरिकों  को बुलाया जाता था I सबसे बड़ा निर्णायक-मंडल  500 नागरिकों का था I और उसके ऊपर सभी नागरिकों की सभा होती थी I इसी प्रणाली ने पश्चिम में जूरी व्यस्था को जन्‍म दिया, एक ऐसी प्रणाली जिसका अभिलेख/रिकॉर्ड प्राचीन चीन अथवा भारत आदि में कभी नहीं मिला I  काफी हद तक “जूरी की सुनवाई द्वारा अधिकारियों को निकलने का अधिकार” “प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल स्पष्ट बहुमत द्वारा” की ही तरह है (जिसमें स्‍पष्‍ट बहुमत के वोट के द्वारा ऐसा किया (निकला) जाता है)I

बाद में जूरी  व्यस्था का प्रयोग आम नागरिकों पर सुनवाई के लिए भी किया जाने लगाI यूनानवासी यह (ठीक ही) विश्‍वास करते थे की सुनवाई यदि जूरी द्वारा की जाए तो इसमें राजा या नियुक्‍त किए गए जज द्वारा सुनवाई किए जाने की तुलना में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद की सम्भावना कम है और इसलिए यूनान  में महत्वपूर्ण सुनवाई हमेशा जूरी  के निर्णय से तय होती थी I उदाहरण के लिए सुकरात  को फांसी देने के दंड का निर्णय  एथेंस के 500 नागरिकों की जूरी ने दिया था I जूरी-मंडल इस बात पर आस्‍वस्‍त थे कि सुकरात के उपदेश एथेंस से प्रजातंत्र/डेमोक्रेसी को पलटने और अनेक एथेंसवासियों की हत्या करने जैसी उसके अनुयायियों (जैसे क्रिटियस) की कार्रवाईयों के लिए जिम्मेदार है I और इस तथ्‍य ने कि सुकरात  ने प्रजातंत्र/डेमोक्रेसी को पलटने और प्रजातंत्र के अनेक समर्थकों की हत्या करने जैसे अपने अनुयायियों के कार्यों की कभी आलोचना नहीं की,  एथेंसवासियों को सुकरात  के विरूद्ध और अधिक क्रोधित कर दिया। इसके अलावा एथेंसवासियों का यह भी मानना था की यदि कोई नागरिक एथेंस की रक्षा के लिए सेना में शामिल होकर सेवा नहीं करेगा तो उसे नर्क में भगवान दंड देंगे I सुकरात  युवाओं को यह विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहा था कि ये धारणा बकवास हैं और अनेक एथेंसवासी इस बात पर आश्वस्त हो गए कि सुकरात यह सब एथेंस की सेना को कमजोर कहने के लिए कह रहा है I सुकरात को पहले एथेंस छोड़ने के लिए कहा गया,  परन्तु जब सुकरात  ने एथेंस छोड़ने से मना कर दिया तो उसकी सुनवाई 500 एथेंसवासियों की जूरी द्वारा हुई। जूरी-मंडल के लगभग 340 सदस्‍यों ने सुकरात के लिए फांसी का दंड सुनाया और 160 सदस्‍यों  ने अर्थ दंड/जुर्माना लगाने का मत दिया पर फांसी की सजा नहीं सुनाई I सुनवाई के बाद भी, सुकरात   को एथेंस छोड़ने का विकल्प दिया गया परन्तु सुकरात ने नहीं जाने का मन बनाया I उम्र-दराज और थकेहारे सुकरात ने संभवतः स्वाभाविक मृत्यु ,जो कुछ वर्षों में आने वाली थी, की तुलना में फांसी पर चढ़ने में अधिक यश और गौरव समझा I और इस प्रकार 500 जूरी   के निर्णय पर अमल किया गया I  एथेंस और बहुत से यूनानी राष्ट्रों में सभी महत्वपूर्ण निर्णय सीधे नागरिकों  द्वारा दिए गए न की नियुक्‍त किए गए न्‍यायाधीशों द्वाराI

                        रोमवासियों में साधारण लोगों की सभा(Assembly of Plebeians) सर्वशक्‍तिमान थी – और वे सीनेट/राज्‍यसभा से भी अधिक शक्तिशाली थे I सिद्धांत रूप में, साधारण लोगों की सभा के पास कानून लागू करने और यहाँ तक कि राजा को भी हटाने का अधिकार था I लेकिन चूंकि प्रक्रिया- संहिता यह थी कि “साधारण लोगों में से प्रत्येक को एक निश्‍चित स्थान पर आना होगा”, इसलिए सभी के स्‍वयं आने की असंभाव्‍यता/संभावना न होने की स्‍थिति ने साधारण लोगों की सभा को महत्‍वहीन बना दिया I जब जनसँख्या अधिक हो तो “प्रत्येक नागरिकों  का एक निश्‍चित स्थान पर आना” व्‍यवहारिक विकल्प नहीं है। और एक ऐसी व्यस्था अपनानी चाहिए जिसमें प्रत्येक छोटे क्षेत्र के लिए एक बूथ बनाई जाए I लेकिन रोमवासी बूथ व्यवस्‍था के बारे में नहीं सोच सके और न ही रोम के उच्च वर्ग ने बूथ व्यस्था की अनुमति दी और इस प्रकार “साधारण लोगों की सभा” एक (संभारतंत्रीय अव्‍यवहार्य) बूथों की कमी के कारण अव्‍यवहारिक विचार बनकर रह गया I रोमवासियों ने उच्च वर्ग के  लिए जूरी व्यस्था का प्रयोग अवश्‍य किया और जनसाधारण के किसी मामले का निर्णय जज करते थे I परन्तु रोमवासी जजों का चुनाव करते थे जिससे अन्याय कम हुआ करता था I कुल मिलाकर,  रोमवासियों के पास प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल नहीं था, परन्तु न्यायधीशो/जजों के चुनाव ने एक अत्‍यन्‍त सीमित हद तक उन्हें राइट टू रिकॉल प्रदान किया I

                  तथाकथित काले/अंधेर युग में प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल और जूरी  व्यस्था दोनों लुप्त हो गए थे I लगभग वर्ष 700 में, इस्‍लाम के आक्रमणों के कारण, यूरोप में पुजारियों और राजा के पास आम लोगों को बड़ी संख्‍या में अस्‍त्र-शस्‍त्रों से लैस करने के अलावा और कोई उपाय नहीं बचा था। और इसलिए नागरिकों को अधिक से अधिक हथियार प्राप्‍त हुए। हम आम लोगों को हथियार से लैस करना और आम लोगों द्वारा हथियारों का बनाना ही लोकतंत्र की जननी/पैदा करने वाली है। आम लोगों को हथियारलैस बनाने से आम लोग इतने मजबूत हो जाते हैं कि वर्ष 950 में इंग्‍लैण्‍ड के लोगों ने राजा को कोरोनर की जूरी के रूप में जूरी प्रणाली लागू करने पर मजबूर कर दिया जिसमें अनियमित तरीके से चुने गए 12 नागरिक किसी नागरिक की हत्‍या करने के दोषी पुलिसवाले को निकाल सकते थे । बाद में यह कोरोनर जूरी प्रणाली इतना लोकप्रिय हो गया कि नागरिकों को यह विश्‍वास हो गया कि न्‍यायाधीशों/जजों द्वारा की गई सुनवाई की तुलना में जूरी द्वारा की गई कार्रवाई में भाई-भतीजावाद कम होता है। जूरी द्वारा सुनवाई किए जाने की मांग बढ़ती गई और न्‍यायाधीशों द्वारा की गई सुनवाई या तो कम होती गई या उसका अन्‍त ही हो गया और वर्ष 1100 आते आते नागरिकों ने इंग्‍लैण्‍ड के राजा को मैग्‍ना कार्टा पर हस्‍ताक्षर करने के लिए मजबूर कर दिया। इस मैग्‍ना कार्टा में राजा को यह वचन देने पर मजबूर किया गया कि जूरी से अनुमोदन/स्वीकृति लिए बिना वह और उसके अधिकारी नागरिकों को दण्‍ड नहीं देंगे और जूरी के पास अधिकारियों को निकालने/ अर्थ दण्‍ड देने का अधिकार आ गया। इसलिए वर्ष 1200 के आते आते इंग्‍लैण्‍ड में कनिष्‍ठ/जूनियर/छोटे अधिकारियों पर “जूरी प्रणाली से राइट टू रिकॉल” लागू हो चुका था।

अमेरिका वह पहला देश था जहां राइट टू रिकॉल का चलन पूरी तरह से हुआ। मैसाचूसेट्स में पहला पुलिस कमिश्‍नर/शेरिफ का कार्यालय जो स्‍थापित हुआ था,उसमें राईट टू रिकाल था लेकिन यह अत्‍यन्‍त अनौपचारिक रूप से घोषित किया गया था। अमेरिकावासियों द्वारा वर्ष 1770 में इंग्‍लैण्‍डवासियों को निकाल बाहर करने का एक प्रमुख कारण यह था कि ब्रिटिश राजा अमेरिकी कॉलोनियों में जूरी प्रणाली और  राइट टू रिकॉल नहीं चाहते थे। 1770 इस्‍वी में स्‍वतंत्र होने के बाद राज्‍यों और जिलों में औपचारिक कानून लिखा जाना प्रारंभ हुआ। अनेक राज्‍यों ने पुलिस प्रमुखों, स्‍थानीय न्‍यायाधीशों और राज्‍यपालों के लिए राइट टू रिकॉल कानून प्रारंभ किया । लेकिन यह राइट टू रिकॉल संघ स्‍तर(देश स्‍तर पर) पर लागू नहीं किया गया। क्‍यों? उस समय, तथाकथित अमेरिकी संघीय सरकार (केन्‍द्रीय सरकार) को केवल सेना और विभिन्‍न राज्‍यों के बीच के संबंधों को चलाने का काम था और इसलिए अमेरिका की स्‍थापना करने वाले पितामहों ने कभी नहीं सोचा था कि अमेरिकी राष्‍ट्रपति, सीनेटरों और संघीय न्‍यायाधीशों/जजों के हाथों में कभी इतनी शक्‍तियां होंगी । इसलिए किसी ने भी राष्‍ट्रपति, सीनेटरों, संघीय न्‍यायाधीशों/जजों और संघीय अधिकारियों पर राइट टू रिकॉल लागू करने की बात कभी नहीं सोची। यही कारण है कि अमेरिका के ये सभी संघीय अधिकारी पूरी तरह भ्रष्‍ट हैं लेकिन उसी अमेरिका में राइट टू रिकॉल के अधीन आने वाले अधिकारी जैसे पुलिस प्रमुख, राज्‍यपाल, स्‍थानीय न्‍यायाधीश आदि कम भ्रष्‍ट हैं। इसलिए यह कोई संस्‍कृति या राजनीतिक संस्‍कृति या राष्‍ट्रीय चरित्र नहीं है – यह राइट टू रिकॉल का लागू होना या न होना है जो यह निर्णय करता है कि कोई अधिकारी कितना भ्रष्‍ट होगा।

कार्ल मार्क्स और एंजेल्स ने प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का समर्थन किया। कार्ल मार्क्स को फ्रेडरिक एंजेल्स द्वारा दी गई (1991) प्रस्‍तावना फ्रांस में गृहयुद्ध 1871 http://wwwImarxistsIorg/archive/marx/works/1871/civil-war-france/postscriptIhtm में उद्धरण है ––

“बिलकुल प्रारंभ से ही सर्वसाधारण(Commune) इस बात को मानने के लिए बाध्‍य था कि यदि मजदूर वर्ग इस बार सत्‍ता में आ जाता है तो वह पुराने राज्‍यतंत्र के प्रबंधन तरीकों से नहीं चलेगा अर्थात अभी-अभी जीते गए एकमात्र राज्‍य/ सत्‍ता को फिर से नहीं खोने के उपाय के रूप में इस मजदूर वर्ग को – एक ओर उन सभी कुचलने वाले तंत्रों, जो पहले उसके ही खिलाफ प्रयोग में लाए जाते थे – का खात्‍मा करना होगा और दूसरी ओर इसे अपने ही सरकारी अधिकारियों से अपने आप को बचाना होगा। ऐसा उन्‍हें (अधिकारियों को) बिना किसी अपवाद के , किसी भी समय वापस बुलाए जाने के अध्‍यधीन घोषित करके करना होगा। पूर्ववर्ती राज्‍यों के विशिष्ट वे कौन से लक्षण थे ? समाज ने अपने सार्वजनिक हितों की देखभाल के लिए मजदूर के आम विभाजन के जरिए अपना तंत्र सृजित किया था लेकिन इस तंत्र ने, जिसके शीर्ष पर राज्‍य की शक्‍ति थी, समय बीतने के साथ अपने विशेष हितों के अनुपालन में अपने आप को `समाज का नौकर` से रूपांतरित कर `समाज का मालिक` बना दिया। उदाहरण के लिए, इसे न केवल वंशानुगत राजतंत्र में देखा जा सकता है बल्‍कि ऐसा लोकतांत्रिक गणराज्‍य में भी देखा जा सकता है………”

लेनिन और जोसेफ स्‍टॉलिन ने भी राइट टू रिकॉल का समर्थन किया था I जोसेफ स्‍टॉलिन ने वर्ष 1937 में इंग्लॅण्ड,  यूरोप, और अमेरिकी प्रजातंत्र/डेमोक्रेसी (लोकतंत्र) का यह कहकर मजाक उड़ाया था कि इनके यूरोप में रिकॉल की प्रणाली (भ्रष्ट को हटाने की प्रणाली) नहीं है I और स्‍टॉलिन ने यह दावा किया था कि सोवियत का प्रजातंत्र/डेमोक्रेसी श्रेष्ठ है क्‍योंकि सोवियत प्रजातंत्र/डेमोक्रेसी के पास स्थानीय निचली संसद के अधिकारी (डिप्‍टी)  स्तर पर रिकॉल की प्रणाली  है I स्‍टॉलिन  ने वर्ष 1937 में कहा था :

“इसके अलावा, कामरेडों, मैं आपको कुछ सलाह देना चाहूँगा, एक प्रत्‍याशी की उसके मतदाताओं को सलाह। यदि तुम पूंजीवादी देशों का उदाहरण लोगे तो तुम विशेषकर पाओगे कि, और मैं अवश्‍य कहूंगा कि उन देशों में अत्‍यंत विचित्र संबंध प्रतिनिधियों और मतदाताओं के बीच मौजूद है। जब तक चुनाव की कार्रवाई चल रही होती है तबतक प्रतिनिधि मतदाताओं को रिझाते हैं, उनकी खुशामद करते हैं, कृतज्ञता की सौगंध खाते हैं और हर तरह के वायदों का ढेर लगा देते हैं। ऐसा लगता है मानों ये प्रतिनिधि मतदाताओं पर पूरी तरह आश्रित हैं । जैसे ही चुनाव खत्‍म होता है और ये प्रत्‍याशी प्रतिनिधि बन जाते हैं तो संबंधों में पूरी तरह से बदलाव आ जाता है। मतदाताओं पर निर्भर होने की बजाए ये प्रतिनिधि पूरी तरह स्‍वतंत्र हो जाते हैं। अगले चार या पांच वर्षों के लिए, अर्थात अगले चुनाव तक ये प्रतिनिधि जनता से और अपने मतदाताओं से भी स्‍वतंत्र, बिलकुल उनमूक्‍त महसूस करते हैं । वे एक पार्टी/दल से दूसरे पार्टी/दल में जा सकते हैं। सही रास्‍ते से गलत रास्‍ते पर जा सकते हैं। वे यहां तक कि ऐसे  मशीनी तरीकों/साजिशों में लिप्‍त हो जाते हैं जो चटपटे नहीं होते । वे जितनी चाहे उतनी कलाबाजियां खा सकते हैं। वे स्‍वतंत्र जो हैं। क्‍या ऐसे संबंध सामान्‍य माने जा सकते हैं । कामरेडों, नहीं, किसी भी तरह से नहीं।

यह परिस्‍थिति हमारे संविधान द्वारा विचार के लिए ली गई थी। और इसमें एक कानून बनाया गया था कि मतदाताओं को अपने प्रतिनिधियों को उसके पद की अवधि समाप्‍त होने के पहले ही तब वापस बुलाने, राइट टू रिकॉल का अधिकार होगा जब ये प्रतिनिधि तिकड़मबाजी करना शुरू कर दें, यदि वे रास्‍ते से भटक जाएं और यदि वे भूल जाएं कि वे जनता पर, मतदाताओं पर निर्भर हैं ।“

मैं  महाँन स्‍टॉलिन का प्रशंसक हूँ, क्योंकि उसने एक विशाल सेना का निर्माण किया था जिसने वर्ष 1940 में रूस की रक्षा हिटलर से और बाद में वर्ष 2000 में जॉर्ज बुश और टोनी ब्राउन से की थी I परन्तु स्‍टॉलिन का राइट टू रिकॉल प्रणाली  एक पूर्ण परिहास था — किसी भी नागरिक को, जो राइट टू रिकॉल की मांग करता था, को या तो कारावास या यहां तक कि फांसी भी दी जा सकती थी। इसलिए जहां एक ओर स्‍टालिन ने सिद्धांत रूप में राइट टू रिकॉल का समर्थन किया वहीं व्‍यावहारिक रूप में उसने इसका विरोध किया था। साथ ही उसका यह बताना कि पश्‍चिम में राइट टू रिकॉल नहीं है, गलत था।( अलग से: मैं यह दोहराना चाहूँगा कि मैं स्‍टालिन का प्रशंसक हूँ क्‍योंकि उसने एक सेना, हथियार बनाने के कारखाने और परमाणु हथियारों का निर्माण किया जिससे रुस की रक्षा हुई। स्‍टॉलिन के सेना को सुदृढ़ करने का तरीका वह एकमात्र कारण हैं जिसके कारण अमेरिका और इंग्‍लैण्‍ड ने आज भी रुस को एक इराक बनाने का साहस नहीं किया है।)

(2.6) आधुनिक भारत में राइट टू रिकॉल


भारत में एम एन रॉय ने 1946 में लिखी अपनी पुस्‍तक “द क़ानून-ड्राफ्ट कान्‍सटिट्यूशन ऑफ इंडिया” में प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का समर्थन किया। भारत की दो प्रमुख कम्‍यूनिस्‍ट पार्टी/दल सी पी आई और सी पी एम अपने भाषणों में वर्ष 1950 के दशक से ही वापस बुलाने के अधिकार अर्थात प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल की मांग करते आ रहे हैं। और भारत में 960 से भी अधिक पंजीकृत पार्टी/दल हैं जिनमें से तीन सौ से अधिक पार्टी/दल प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का समर्थन करते हैं। जय प्रकाश नारायण 1950 के दशक से ही प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल की मांग करते रहे और 1970 के दशक में उन्‍होंने अपनी मांग तेज कर दी थी। जनता पार्टी के 1977 के चुनाव घोषणापत्र, जिसपर मोरारजी देसाई, अटल बिहारी बाजपेई और लाल कृष्‍ण आडवानी आदि सरीखे नेता चुनाव लड़े, की मुख्‍य मांगों में से एक प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल की मांग थी। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने असंख्य बार प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का समर्थन किया है। और उनके द्वारा इसके लिए समय आने पर कार्रवाई न करना निराशाजनक है। उदाहरण के लिए, 1977 में, बहुत बड़े अंतर से संसद का चुनाव जितने के बाद यदि जय प्रकाश 500,000 युवाओं को संसद को घेरने और तबतक सांसदों से बाहर आने नहीं देने को कहते जबतक कि वे प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल कानून को लागू न कर दें, तो भारत को तीन ही दिनों में प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल कानून मिल गया होता । लेकिन जयप्रकाश ने कभी भी युवाओं से ऐसा आह्वान नहीं किया । वर्ष 2004 में भी जब सी पी आई/सी पी एम के 60 सांसद थे तब भी उन्‍होंने अपने प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट पर मतदान की मांग नहीं की।

और भारतीय सांसदों और उम्‍मीदवारों में से किसी ने भी (मुझे छोड़कर) कभी प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट प्रस्‍तुत नहीं किया। मई 2009 में संसद के चुनाव में 5000 से ज्‍यादा उम्‍मीदवार  थे। लालू यादव जैसे कईयों ने कहा कि वे प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का समर्थन करते हैं। लेकिन मैं एकमात्र उम्‍मीदवार था जिसने उस प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल कानूनों का प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट दिया जिसका मैं समर्थन करता हूँ । सी पी आई और सी पी एम के सांसदों ने उन प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल प्रक्रिया/तरीकेओं के प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट उपलब्‍ध कराने से हमेशा इनकार किया जिनका वे समर्थन करते हैं। जय प्रकाश नारायण ने 25 वर्षों में कभी प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट नहीं दिए और हमेशा प्रारूपों पर चर्चा को टालते रहे। लालू यादव और मुलायम सिंह यादव जैसे जय प्रकाश नारायण के अनुयायी दावा करते हैं कि वे प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का समर्थन करते हैं लेकिन जिन कानूनों का समर्थन करने का वे दावा करते हैं उनके प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट देने से इन्‍होंने मना कर दिया। सोमनाथ चटर्जी पिछले 25 वर्षों से सांसद रहे हैं और 25 वर्षों से इन्‍होंने प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का समर्थन किया है लेकिन जिस प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल कानून का ये समर्थन करते हैं उसका प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट को इन्‍होंने कभी आत्‍मसात नहीं किया। मरे विचार में, ये सभी प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट रहित नेता झूठे, जालसाज, धोखेबाज और ढोंगी हैं।

1990 तक, समाचारपत्रों के स्‍तंभलेखक, पाठ्यपुस्‍तकों के माफिया और मीडिया के मालिकों ने यह तय कर दिया कि समाचार पत्रों और पाठ्यपुस्‍तकों में प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल पर कोई जानकारी बिलकुल ही नहीं है। आज, शायद ही कोई युवा यह जानता है कि प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का मतलब क्‍या है और यहां तक कि राजनीति शास्‍त्र के स्‍नातकोत्‍तर/एमए भी नहीं जानते कि अमेरिका के नागरिकों के पास पुलिस प्रमुख और न्‍यायाधीशों के विरूद्ध प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल है। यहां तक कि जय प्रकाश नारायण के समर्थकों ने भी 1980 के बाद व्‍यवहारिक तौर पर प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल की अनदेखी करना शुरू कर दिया।

भारत में धनवान व्‍यक्‍ति प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल से अत्यंत घृणा करने लगे। अब अधिकांश बुद्धिजीवी धनवान लोगों के ऐजेंट हैं और इसलिए सभी बुद्धिजीवियों ने भी प्रधानमंत्री, मुख्‍य मंत्रियों, न्‍यायाधीशों के विरूद्ध प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का विरोध किया । इस हद तक कि भारत के इन बुद्धिजीवियों ने अपने स्‍तंभों और पाठ्यपुस्‍तकों में इन समाचारों को भी लिखने से इनकार कर दिया है कि अमेरिका के नागरिकों के पास जिला पुलिस प्रमुखों और न्‍यायाधीशों को निकालने की प्रक्रिया/तरीके है। यह सोचकर कि ऐसे न हो कि ये जानकारी से  समाचार पाठक और छात्र प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल के बारे में सोचने लगें । अधिकांश सांसदों, विधायकों, मंत्रियों, सेनानिवृत्‍त न्‍यायाधीशों आदि जिनसे मैं मिला हूँ , उन्‍होंने प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का विरोध किया है और सबसे ज्‍यादा नुकसान किसी और ने नहीं बल्‍कि जय प्रकाश नारायण ने किया है जिन्‍होंने हमेशा स्‍वयं को प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल के समर्थक होने का दिखावा किया लेकिन जब जनता पार्टी के उनके अपने आदमी वर्ष 1977 में सत्ता में थे तब प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट प्रस्‍तावित करने से मना कर दिया ।

जब मैंने भारत में 13 जुलाई 1999 को प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल कानून प्रारूपों/ड्राफ्टों का प्रचार – प्रसार शुरू किया तों मैने पाया कि युवाओं में से लगभग किसी को भी प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल के बारे में कोई जानकारी नहीं थी । यह विशेष रूप से मेरे 8-10 समाचार पत्रों के विज्ञापनों, 100000 पर्चियों (पम्‍फलेटों) के वितरण, 1000000 से भी ज्‍यादा ई-मेल भेजने और इंटरनेट समुदायों में 10 हजार बार लिखने के कारण है कि 13 जुलाई, 2010 तक भारत में लगभग 50 हजार से 1 लाख लोग यह जान पाए कि प्रधान मंत्री, मुख्‍यमंत्रियों, न्‍यायाधीशों के विरूद्ध प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल क्‍या है। इस 50 हजार से 1 लाख लोगों में से कई लोगों ने इस खबर को आगे फैलाना शुरू कर दिया और भारत के 60 वर्षों के इतिहास में मैं पहला और एकमात्र चुनावी उम्‍मीदवार था जिसने प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल कानूनों के प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट का प्रस्‍ताव किया है जिसकी मैं मांग कर रहा हूँ और वायदा करता हूँ । मैं नागरिकों से अनुरोध करता हूँ कि वे उन नेताओं से प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल कानूनों के प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट की मांग करें जो प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का समर्थक होने का दावा करते हैं। इस अनुरोध से बचने या इसकी अनदेखी करना यह साबित कर देगा कि वे वास्‍तव में प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का समर्थन नहीं करते और वे केवल पांचवीं सदी के यूनानी चिकित्‍सक की ही तरह हिपोक्रैटिक हैं।

कुल मिलाकर, समकालीन भारत में अर्थात वर्ष 2010 में मैं उन कुछेक राजनीतिज्ञों में से हूँ जो प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल की जानकारी फैला रहे हैं। यदि मेरा तरीका सही है तो जल्‍दी ही नया आने वाला हरेक राजनीतिज्ञ प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल  का समर्थन करने को बाध्‍य होगा और इससे भारत में प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल  का आना सुनिश्वित होगा।

 

(2.7) भारत में राइट टू रिकॉल / प्रजा अधीन-राजा प्रणाली (सिस्टम) की संवैधानिक वैधता


भारत में बुद्धिजीवी इस बात पर जोर डालते है की राइट टू रिकॉल असंवैधानिक  है !! सातवें अध्याय में मैंने सरकारी अधिसूचना(आदेश) का प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट प्रदान किया है जिसका प्रयोग करके नागरिक सुप्रीम कोर्ट के प्रधान जज(उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश) को बदल सकते हैं I आज तक किसी भी बुद्धिजीवी को प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट पढ़ने और मुझे बताने का समय नहीं मिला कि मेरे प्रस्तावित सरकारी अधिसूचना(आदेश) का कौन सा खण्‍ड संविधान का उल्लंघन करता है !! या ऐसा हो सकता है जो प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट मैंने अपनी वेबसाइट पर दिया है उन्होंने उसे पढ़ा हो पर जो मैंने उन्हें व्यक्तिगत रूप से दिया है या मेल भेजकर दिया है, उन्‍हें उसमें कुछ असंवैधानिक नहीं मिल पाया हो और इसलिए वे दावा कर रहे हैं कि उन्होंने प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट को पढ़ा ही नहीं हैI जो भी हो,
हम नागरिकों ने संविधान लिखा है और हम नागरिक ही निर्णय लेंगे की क्या संवैधानिक है और क्या नहीं I और इसलिए मेरा लिखा प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट संवैधानिक है या नहीं इसका निर्णय भारत के नागरिक लेंगे ना कि भारत के सुप्रीम कोर्ट के जजI

क़ानून संवैधानिक है या नहीं इसका निर्णय करने का भारत में तरीका क्या है?

1)भारतीय सरकार कोई भी क़ानून बना सकती है |

2)यदि कोई क़ानून को असंवैधानिक होने का दावा करता है तो उसे उच्चतम न्यायालय या उच्च नयायालय के न्यायाधीशों को उसे रद्द करने के लिए कहना पड़ेगा |पहले न्यायाधीशों को कोई क़ानून संवैधानिक/असंवैधानिक पर सहमत होते हैं , फिर नागरिकों को निर्णय लेना होगा | यदि नागरिक बहुमत न्यायाधीशों से असहमत होते हैं तो , वे सांसदों से न्यायाधीशों को हटाने के लिए कह सकते हैं और उनके बदले किसी और न्यायाधीश को रखने के लिए कह सकते हैं जो उनके बहुमत के अनुसार निर्णय बदल दे|

`पारदर्शी शिकायत प्रणाली` और  प्रजा अधीन प्रधानमंत्री का हर खंड संविधान के अनुच्छेद भाषण की स्वतंत्रता से आता है

(2.8) क्या आधुनिक अमेरिका में राइट टू रिकॉल / भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा बदलने का अधिकार अथर्ववेद से आया ?


क्या आधुनिक अमेरिका में राइट टू रिकॉल अथर्ववेद से आया ? अमेरिका और यूरोप में प्रजातंत्र/डेमोक्रेसी और राइट टू रिकॉल से जुड़े हुए अधिकतर राजनीतिक विचार तब आए जब अँग्रेज़ों ने भारत में कदम रखा और उन्होंने संस्कृत में लिखे मूलग्रंथों को देखा I और  वर्ष 1757 में इन विचारों में तब तेजी आई जब रोबर्ट क्लाइव ने सिराज-उद्दौला को हरा दिया और कोलकाता और भारत के अन्य शहरों से दस हजार से भी ज्‍यादा संस्कृत की प्राचीन पुस्‍तकों को खरीदकर या उन्‍हें जब्त करके उन्‍हें जहाज में भरकर इंग्लैण्‍ड भेज दिया।  लगभग वर्ष 1758-60 में बहुत सारे पुस्‍तक इंग्‍लैण्‍ड  से अमेरिका भेज दिए गएI और 1760 के दशक की शुरूआत में अमरिका में प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल सामने आया I अब मेरे पास इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि अमेरिका  के राजनीतिक विचारकों ने प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का विचार संस्कृत के ग्रंथो से लियाI पर लागू होने का काल इतना महत्वपूर्ण है कि इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती I

(2.9) राइट टू रिकॉल की मेरी खोज और अथर्ववेद (सत्यार्थ प्रकाश)


मुझे  वर्ष 1987 में IITD  में अपने आर्य समाजी साथी से सत्यार्थ प्रकाश पढ़ने का अवसर मिला जब हमदोनो एक ही कमरे में रहते थे I उस पुस्‍तक का एक श्लोक कि “राजा को प्रजा के अधीन होना चाहिए”  मेरे दिल को छु गया और हमेशा के लिए मेरे ह्रदय में रह गया I पर क्‍योंकि मैं अपनी पढाई और परीक्षा आदि में इतना व्यस्त हो गया कि कुछ वर्षों में मैं  भूल गया कि मैंने इस श्लोक को सत्‍यार्थ प्रकाश में  पढ़ा है Iफिर 1990 में मैं  अमेरिका चला गया और मैंने देखा की पुलिसवाले, कनिष्‍ठ/जूनियर अधिकारी आदि यहां वास्तव में भ्रष्ट नहीं हैं I मैंने इसका कारण ढ़ूंढना शुरू कियाI उन दिनों वहाँ भी कोई इंटरनेट नहीं था, और पता लगाने के लिए मैं 100 से भी अधिक ग्रन्थालय गया और मैने अनेक नगर-बैठकों में हिस्‍सा लिया I लगभग 7 वर्षों के बाद वर्ष 1997 में मुझे इस सच्चाई का पता लगा कि अमेरिका  के नागरिकों के पास किसी भी जिला पुलिस प्रमुख को निकालने की प्रणाली  है और तभी “राजा को प्रजा के अधीन होना चाहिए”  की सूक्‍ति मेरे मन में अचानक आई और तुरंत ही मुझे यह बात समझ आई कि अमेरिका के पुलिस में भ्रष्टाचार इतना कम क्यों है I परन्तु उस समय 1997 में मुझे यह स्मरण नहीं हो रहा था कि मैंने यह वाक्य कहाँ और किस पुस्‍तक में पढ़ा है I वर्ष 2009 में मैं परम पूजनीय बाबा रामदेव जी के भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के साथ जुड़ा और भारत स्वाभिमान के कार्यकर्ताओं को राइट टू रिकॉल का प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट दिखाया I भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के अनेक कार्यकर्ताओं ने कहा कि राइट टू रिकॉल का विचार सत्यार्थ प्रकाश के विचार से पूरी तरह मिलता है I और वर्ष 2010 में मैंने सत्यार्थ प्रकाश एक बार फिर पढ़ी और मुझे याद आया की मैंने यही पुस्‍तक वर्ष 1987 में पढ़ी थी और जो राइट टू रिकॉल के मेरे विचार को आगे बढ़ा रही है I

तो हाँ, सत्यार्थ प्रकाश के छठे अध्याय के पहले पृष्‍ठ में उल्‍लिखित यह वाक्य कि “राजा को प्रजा के अधीन होना चाहिए” बहुत हद तक मुझे इसे समझने और प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल प्रणाली का  प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट  लिखने की प्रेरणा दे रहा है Iv

Imported weapons of India

India has emerged as the largest arms importer in the world. More than 70% of the needs of the Indian armed forces are imported and Indian weapons purchases account for about 9% of the global arms trade. Each time a weapon system is imported, the costs are astronomical and we get trapped into expensive service contracts, ammunition purchase, potential possible arms embargos etc. During the years 2007-2012 contracts for approximately 50 Billion dollars worth of weapons have been signed.

DRDO was established in 1958 to indigenize defense weapon production. Yet after more than 34 years, it has embarrassingly little to show for itself. The CAG reports that 70% of the products that DRDO produces are rejected by the armed forces. Others are delayed for decades. Some of the more notable delays are

# Arjun-Main Battle Tank- 40 year development. End product is 50% overweight and the heart of the system, the fire control system has been developed by Elbit  systems in Israel

# LCA-Tejas- 30 year development. Still in flight tests. Only the control system and airframe are indigenous. All other components including the ejection seat are imported.

# Nag-Anti tank missile- 30 year delay. Failed user trials as late as last month

# Trishul-Anti aircraft missile, abandoned in 2008 after 20 years

# Kaveri engine- 16 year delay with cost escalation of 800%. Still not airworthy . Delays in the engine have compounded delays of the LCA program.

# Even the most basic items such as artillery guns and howitzers have not been produced by DRDO.

# We import even the ammunition for our tanks at exorbitant prices as was pointed out by Retd Gen V.K. Singh

# BEML has been unable to indigenously manufacture a truck and continues to import them from TATRA after 3 decades. Indigenization is confined to replacing tires, bolts & nuts.

# It now appears that India will start importing assault rifles to replace the standard issue INSAS rifle. It is important to remember that assault rifles such as the AK-47 are even assembled in bazaars and road-side shops in Afghanistan. We will probably end up importing even bullets and cartridges next.

# The so called shining examples of DRDO success namely the Agni and Prithvi range of missiles have of late failed a series of user trials. Their low reliability (50% probability of successful strike coupled with hours of pre-launch preparations) causes the very credibility of our nuclear deterrent to be questioned. A recent India today articles highlights these same issues.

# Its premier UAV the Nishant is not aerodynamic, takes hours to deploy and the army has been compelled to accept a dozen.

Despite its unclassified salary budget of over 10,000 Crores  there is very little for DRDO to be proud about, other than instant food packets and portable toilets.

This article will now try to analyze what ails this organization and proceed to highlight the consequences of failure and suggest some remedial action.

Causes for Failure
01. Aiming ridiculously high and failing : A typical missile requirement would state that the user wants a missile that is shorter, lighter, lesser cross-section and has a higher payload than any other missile in its class. This is the equivalent of wanting a bride who is tall and short, fair and dark, fat and thin. Instead of having the courage of conviction to say that the requirements cannot be achieved, DRDO agrees to such requirements and fails miserably.

The latest fancy is to develop reusable missiles, which will return after dropping their payload. No one points out that such technology already exists and is called an aircraft

02. Imprecise project definitions : Some DRDO project documents call for development of indigenous technology in a particular field. After attempting and failing to develop this technology, DRDO surreptitiously orders the components from private companies who in turn may or may not be importing them.

They cleverly exploit the difference between indigenous and in-house.

03. Lack of accountability and peer review : DRDO’s progress in various fronts is judged by Professors from the IIT’s, IISc etc. However these very people receive funds from DRDO for their research. This creates a climate of patronage where no one speaks out. Every milestone is declared a success, but the project fails to deliver.

The head of DRDO serves as the chief scientific advisor to the Government, and has a clear conflict of interest.

04. Overstaffed : DRDO’s colossal employee size overshadows the size of R&D teams in Saab, Boeing, Lockheed, Sukhoi and MIG combined. Even if a few good scientists are present, they get inundated in an ocean of mediocrity. It is worth mentioning that HAL designed her first jet fighter in the 1960’s in just 3 years with the German Engineer Kurt Tank and a team of a dozen Indians. The old adage that a thousand monkeys on a typewriter cannot churn out Shakespeare comes to mind.

05. Lack of Skilled scientists : Most DRDO scientists are recruited through an exam called SET (scientist entrance test). There isn’t even a test for Aerospace. So the Aerospace engineer aspiring to join DRDO would be forced to take a mechanical engineering test where he would be tested on roof trusses and welding joints. Important subjects like fluid mechanics or control theory are not even tested.

06. Inability to attract and retain talent : DRDO pay scales are so low and bureaucratic procedures are such a hassle that even the few Indian scientists who return out of patriotism for their country after having worked in defense R&D labs overseas quit in disgust. Many DRDO labs do not even have internet access for ‘security reasons’. Having intellectually walled themselves in, they have no knowledge of the advances taking part around the world. Considering the state of affairs we would be doing the greatest disservice to our enemies if we were to give them access to the crude ‘technology’ developed by DRDO.

07. No practical experience : When DRDO is asked to design a weapon, the ‘scientists’ assigned to the task have never even seen the weapon up close or in action. There is no program by which they can embed themselves with the army unit, see the weapon in action, understand it and suggest improvements or modifications. As a result the first few designs are amateurish and laughable at best

08. Penny wise and pound foolish : Importing a weapon to take it apart, study it and reverse engineer it like the Chinese would be declared an unjustifiable expense. Despite its massive 10000Cr budget scientists from different labs wouldn’t be trusted to use their own vehicles to attend a meeting. Instead they must book an ‘approved’ taxi days in advance. The taxi would invariably be late and meetings start hours late. Clearly the bureaucracy doesn’t value the time of its scientists.

09. Lack of peer review : Most of the mathematical basis for the ‘research’ conducted is dubious. Worldwide peer reviewed journals are the best way to discuss and criticize research. DRDO has a bunch of in-house journals where the same set of ‘scientists’ publish, review and pat each other on the back.

10. No transmission or dissemination of knowledge : One DRDO lab has no clue as to what the other is trying to do, so they end up trying to solve the same problem over and over again. There have been a few success stories such as the design of the control law for the LCA. But the program has taken so long, that the scientists involved would retire and new scientists recruited for another program would have to relearn everything from scratch. Therefore the next aircraft program would take just as long as the LCA.

Consequences of failure
The government has a vested interest in letting this state of rot continue. DRDO is given a chance to develop various weapon systems, knowing fully well that it will fail after trying for decades.

This is then used to justify imports and the usual coterie of arms dealers make a killing selling obsolete arms to the armed forces at exorbitant prices. The ultimate price is paid by our brave troops who do not have the best weapons at their disposal.

Remedial Action
# Shut down DRDO. If this is not possible, since there are guaranteed jobs for government employees, reduce it’s funding to zero. Stop hiring and let it die a natural death.

# Researches on small arms, grenades, RPG’s etc are best left to the engineering corps of our army who work with these weapons everyday. Task these engineers with replicating and improving armaments that we currently import.

# Judiciously select about a dozen scientists from DRDO who are technically competent. If necessary conduct an exam to test them on the fundamentals of the fields they are specializing in.

# For Large items such as aircraft, we need to pay and get the best engineers from Sukhoi, Lockheed etc so that they may train a dedicated and knowledgeable team of a dozen engineers.

# There should be no place for reservation or any limit on pay to this elite team of engineers. In fact we would be hard pressed to find a dozen such people.

# Encourage the private sector to design and develop weapon systems. They should be allowed to design and manufacture complete weapon systems and line replaceable units. Our private sector needs to stop imagining that R&D consists of BPO’s, call centers and Nanos.

लिंक

1) डाउनलोड लिंक –

http://www.righttorecall.info/301.h.pdf (विस्तृत)

http://www.righttorecall.info/001hl.pdf (संक्षिप्त)

http://www.righttorecall.info/004.h.pdf (प्रश्नोत्तरी)

2) देश की अच्छी / बुरी प्रक्रियाओं पर विस्तृत चर्चा के लिए फोरम –

http://www.forum.righttorecall.info पर रजिस्टर करके पोस्ट करें |

3) फेसबुक ग्रुप –

http://www.facebook.com/groups/rrgindia/

 4) फेसबुक पेज – 

http://www.facebook.com/rightorecall

5) यू-ट्यूब चैनल- 

http://www.youtube.com/user/RightToRecallGroup/featured

6) जनहित प्रक्रियाओं पर प्रश्नोत्तरी का यू-ट्यूब चैनल – 

http://www.youtube.com/user/TCPHindiFAQs

7) मेल जो कार्यकर्ताओं द्वारा नेता, बुद्धिजीवी को भेजे गए और उनसे प्राप्त हुए – 

http://righttorecallmails.blogspot.in/

8) ट्विट्टर – 

https://twitter.com/RightToRecall

 9) लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं पर पोस्टर – 

Congress , BJP and AAP have same stand

 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

(1) प्रजा अधीन राजा और `जनता की आवाज़` पर प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

(2) जूरी सिस्टम पर अक्सर पूछे गए प्रश्न

(3) `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी (आमदनी)` (एम आर सी एम) के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

(4) महंगाई के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

(5) पोलिस ,सेना और देश की सुरक्षा और हथियार रखने और बनने के बारे में अक्सर पूछे गए प्रश्न

(6) और दूसरे विषयों पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

(6) और दूसरे विषयों पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

(1) क्या जजों और अफसरों का वेतन बढ़ाने से भ्रष्टाचार कम हो जायेगा ?

छोटे मामलों में , जज रिश्वत नहीं लेते क्योंकि उसमें पकड़े जाने का खतरा होता है और ज्यादा पैसा भी नहीं मिलता | और बड़े मामलों में, वे लगभग हमेशा रिश्वत लेते हैं | इसका उपाय जूरी सिस्टम, राईट टू रिकाल-जज / प्रजा-अधीन-जज(भ्रष्ट जज को आम-नागरिकों द्वारा बदलने का अधिकार , `जनता की आवाज़ –पारदर्शी शिकायत प्रणाली(सिस्टम)`,बहुमत नागरिकों के स्वीकृति द्वारा कैद , बहुमत नागरिकों के स्वीकृति द्वारा जुर्माना |
मंत्रियों, `आई.ऐ.एस`, पोलिस-कर्मी , जज के पास रिश्वतें लेने के लिए कोई कारण नहीं था | और यदि वेतन 10 गुना भी बढ़ा दिया जाता है , तो भी वे रिश्वतें लेते रहेंगे ,जब तक हम आम-नागरिकों के पास उनको नौकरी से निकालने, सज़ा देने, फांसी देने या जुर्माना करने के अधिकार नहीं हों | केवल वेतन बढ़ाना, `सज़ा रखने` के बदले  काम नहीं कर सकता है |
अमेरिका में, 1950 के दशकों में, सरकारी अफसरों के वेतन, महंगाई के अनुसार नहीं बढ़े | तब अफसरों ने रिश्वतें लेना नहीं शुरू किया, उन्होंने नौकरी छोड़ना शुरू किया | क्योंकि भ्रष्ट को आम-नागरिकों के पास बदलने / सज़ा देने के अधिकार थे, जिससे यदि अफसर रिश्वत लेते , तो उनको जेल जाना पड़ता | और जैसे अफसरों ने नौकरी छोड़ना शुरू किया, नागरिकों ने उनके वेतन बढ़ा दिए और फिर से नौकरी पर आने के लिए मौका दिया | दूसरे शब्दों में, जब भ्रष्टाचार कम हो, तो वेतन आदि, सब अपने-आप बढ़ जाते हैं |

(2) क्या गरीबी भ्रष्टाचार का मुख्य कारण है ?

सरकार के निचले स्तर के कर्मचारी भी आम नागरिकों से , पैसों के अनुसार,अच्छी स्थिति में हैं | और यदि गरीबी भ्रष्टाचार का कारण होता, तो क्या नेता-बाबू-जज-पुलिसवाले रिश्वत लेते , जब उन्होंने कुछ लाख रुपये कमा लिए हैं ? लेकिन हम तो देखते हैं कि रिश्वत लेना तो बढ़ता ही जाता है, घटता नहीं है |

ऐसे कई सरकारी विभाग हैं जहाँ प्रक्रियाएँ / तरीके इतनी अच्छी हैं कि सरकारी कर्मचारी को कोई मौका नहीं मिलता रिश्वत लेने के लिए |  उदाहरण , एक बैंक के क्लर्क को लें | उसे 1-2  दिनों में  चेक पास करना होता है नहीं तो वापस करना होता है | उसके पास कोई फैसला लेने का अधिकार नहीं होता है | इसीलिए वो रिश्वत नहीं लेता और कम पैसों के साथ रहता हैं  राजस्व (सरकार/राज्य की आमदनी) विभाग के मुकाबले , जो सचमुच सालाना एक लाख से दस लाख रुपये बनाते हैं रिश्वत ले कर | अभी दोनों क्लर्क मिलते-जुलते वातावरण/हालात से आते हैं और फिर भी बैंक के क्लर्क को स्थिति से संतोष करना पड़ता है और साधारण / सामान्य जीवन जीना पड़ता है | जबकी राजस्व(सरकार की आमदानी) विभाग के क्लर्क को मौका मिलता है और सज़ा का कोई डर नहीं है , वो भ्रष्टाचार करता है |

और हाँ , शक्ति ऊच स्तर में इतनी केंद्रित है कि हर कोई कैसे भी चाहता है कि वो और उसके रिश्तेदार न्यायतंत्र,नेता और बाबूओं, आदि की उच्च पदों को पा ले |

(3) लोगों को वो ही सरकार मिलती है , जिसके वे लायक होते हैं ?

प्रश्नकर्ता- एक बार ऐसा हुआ, मैंने रेलवे में कुछ सामान की बुक किया .,…

आप ऐसे उदाहरण दे रहे हो, जिसमें खोने के लिए कुछ ज्यादा नहीं है ( दांव बहुत कम है ) | ऐसे उदाहरण दीजिए जहाँ खोने को बहुत कुछ है |
मान लीजिए आप एक फक्ट्री चला रहे हैं , और प्रदुषण रोकने वाला अफसर आता है और रिश्वत देने के लिए कहता है या फिर फैक्ट्री को बंद करने की धमकी देता है | फिर आप क्या करेंगे ??
यदि आप रिश्वत नहीं देते, वो आप की फैक्ट्री बंद कर देगा | आपने जो माल बनने का आर्डर लिया है, वो पूरा नहीं हो पायेगा | कर्मचारियों के वेतन और कर्जे का सूद इकठ्ठा होता जायेगा और कोई आमदनी होगी नहीं | ग्राहक भाग जाएँगे और फिर कभी नहीं आयेंगे यदि आप समय पर माल बना कर देने का वायदा नहीं पूरा कर पाते |
तो फिर, क्या आप रिश्वत ना देने की हिम्मत करेंगे ?

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दूसरे शब्दों में, कृपया उन्हीं स्थिति तक सीमित रहें, जहाँ खोने को बहुत कुछ है | कोई भी व्यक्ति , जिसको खोने के लिए कुछ नहीं है चिल्ला सकता है “ देखो, मैंने बलिदान दे दिया, लिए कोई उसूल नहीं तोड़े “ | तो ये बहुत बड़ी बात नहीं है |

एक तरह से  आप इन मुजरिमों को पोलिस-वालों / जजों के ही एजेंट मान सकते हैं | पोलिस-कर्मी / जज , धंधों से रिश्वत लेना चाहते हैं, लेकिन वे ऐसा नहीं कर सकते क्योनी कई सौ धंधो से रिश्वत लेने से उनकी पोल खुल जायेगी | इसीलिए वे मुजरिमों का प्रायोजन करते हैं, उनको सुरक्षा देते हैं और उनको हफता इकठ्ठा करने के लिए कहते हैं | आपको लगता है कि मुजरिमों ने आपका पैसा लिया है , लेकिन मुजरिम , जो पैसा इकठ्ठा करते हैं, उसका 90% बड़े पोलिस-वालों, विधायक, मंत्री, सांसद, मंत्री,मुख्यमंत्री और जजों को जाता है | और जिन्होंने रिश्वत नहीं दी है, वे संत नहीं हैं | उनमें से बहुत सारे लोग , बेशर्मी से ऐसे कानूनों का समर्थन करते हैं , जो प्रशासन में ऐसी स्थितियां बना देती हैं, जहाँ पर व्यापारी आदि, रिश्वत देने के लिए मजबूर हो जाते हैं |
उदाहरण., ये क़ानून लें, “ जज फैसला देगा और जूरी-सदस्य नहीं |”” बहुत सारे इसमें गर्व महसूस करते हैं कि उन्होंने रिश्वत नहीं दी है, बेशर्मी से ये बुरे क़ानून का समर्थन करते हैं | फिर जज फैसला , उन्हीं आसिल (मुवक्किल) के पक्ष में देते हैं , जो उनके रिश्तेदार / दोस्त की सेवायें लेते हैं | फिर आसिल के पास क्या रास्ता होता है ?
जो बुरे कानूनों का समर्थन करते हैं, उनको रिश्वत देने और लेने वालों के बराबर मानना चाहिए |
क्या लोगों को उनके लायक जज मिलते हैं?
क्या लोगों को उनके लायक `आई.ऐ..एस`(बाबू) या पोलिस-कर्मी मिलते हैं ?
मैं आप इस बात पर ध्यान केंद्रित करूँगा “ वो(नेता-जज-बाबु-पुलिसकर्मी .,आदि) उतने ही भ्रष्ट हैं , जितने शायद आम-नागरिक हैं |”
ये बात झूठी है | हम आम-नागरिक के भ्रष्ट होने की “सम्भावना” नेता, `आई.ऐ.एस`, पोलिस-कर्मी,जज के जितने हो सकती है — लेकिन असल में हम आम-नागरिक उनके जितनी 0.01% भ्रष्टाचार भी नहीं है | कुछ 80% भारतीय 20 रूपए हर दिन से काम कमाते हैं | और बाकी 20% में से ,कुछ 15 % 10,000 रुपये प्रति महीने से कम कमा पाते हैं | केवल ऊपर के 5% ही `आई.ऐ.एस`(बाबू), पुलिसकर्मी, जज या मंत्री जितना पैसा कामते हैं |

तो फिर 80% भारत के लोग भ्रष्ट नहीं हैं | और 15% लोग , केवल थोड़ा भ्रष्ट हैं | और केवल %% हैं , जो बड़े रिश्वतें लेते/देते हैं |

प्रश्नकर्ता- जो आप 5% की बात कर रहे है ,वे व्यापारी, नेता, बाबू हैं ,जो देश की नीतियां बनाते हैं, देश चलाते हैं, जो नौकरी / धन पैदा करते हैं , जो भारत की 9% कुल घरेलु उत्पाद (जी.डी.पी) , विकास दर का कारण हैं |

धन का बड़ा हिस्सा अभी भी खदानों से आता है | और करोड़ों मजदूर भी काम करते हैं, इस 9% विकास बनाने के लिए |

प्रश्नकर्ता- यदि ये 5% लग नहीं होते, तो भारत अभी भी दूसरे देशों से भीख मांग रहा होता | रिलायंस का उदाहरण लीजिए, यदि उन्होंने अपनी विकास भ्रष्टाचार के द्वारा नहीं बधाई होती, तो क्या आज वे होते ?

रिश्वत के कारण, हमारे देश में कम उद्योग है | पश्चिम में कम भ्रष्टाचार है, जिसके कारण वहाँ ज्यादा उद्योग है | और जापान में कहीं कम भ्रष्टाचार है, जिससे वहाँ ज्यादा उद्योग है | भ्रष्टाचार विकास का दर कम कर देता है क्योंकि इससे एक-अधिकार और अवसरों की कमी हो जाती है |

(4)  रिश्वत से अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है |

भाई, कृपया कई देशों के आंकडे इकठ्ठा करो, कोई भी अनुमान लगाने से पहले | जो देश जटिल/पेचीदा इंजीनियरिंग का सामान बनाती है , जैसे स्वीडन , नॉर्वे , फिनलैंड, इंग्लैंड , अमेरिका , जर्मनी,जापान, आदि, वो देश हैं, जहाँ भ्रष्टाचार कम है | इसलिए भ्रष्टाचार से उद्योगों को कम करते हैं, बढ़ते नहीं |

प्रश्नकर्ता- हमारा देश अभी भी विकास कर रहा हैं और इसीलिए हम भ्रष्टाचार को समाप्त करने के तरीके बना रहे हैं |

1800 और 1900 के शताब्दी में जब, पश्चिम और जापान विकास कर रहे थे, तो पोलिस, कोर्ट और बहुत से क्षेत्रों में (लगभग सारी सरकार में,  विदेशी मामले और कुछ हथियारों के ठेकों को छोडकर) , भ्रष्टाचार ना के बराबर थी |
और जब हम भारत को अभी भी विकास कर रहा है, कृपया ध्यान दें कि हमारी विकास दूसरे देशों से मंगाई गयी तकनीक पर निर्भर है | हम असली ,जटिल (उलझा हुआ;मुश्किल) सामान नहीं बना रहे हैं | ये भ्रष्टाचार के वजह से है | भ्रष्टाचार से असली निर्माण रुक जाती है |

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प्रश्नकर्ता- जब हम विकसित हो जाएँगे, तो फिर हमारे पास ज्यादा अच्छे भ्रष्टाचार के खिलाफ क़ानून होंगे |

यदि भ्रष्टाचार ऐसे ही चलती रहेगी , तो ऐसे संभावना है कि हम पूरी तरह टूट जायें और इतने कमजोर हो जायें कि अमेरिका जैसा देश हम को पूरी तरह गुलाम बना ले |

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1500 और 1757 के बीच के सालों की बात करें, तो भारत में भ्रष्टाचार बहुत ज्यादा था और इंग्लैंड में कम था | इसका परिणाम क्या हुआ ? इंग्लैंड में उद्योग बढ़े और तकनीक बढ़ी , जिससे हथियारों में सुधार हुआ | और 1757 तक , इंग्लैंड ने भारत का कुछ हिस्सा कब्ज़ा कर लिया था और 1857 तक , उसने पूरा भारत कब्ज़ा कर लिया था |

प्रश्नकर्ता- आज के समय , भ्रष्टाचार करना बहुत मुश्किल हो रहा है |

वे पद, जहाँ निर्णय करने का अधिकार है, वहाँ भ्रष्टाचार 1991 से ज्यादा है ., उदाहरण- कोर्ट, `आई.ऐ.एस`, पोलिस-कर्मी आदि में | केवल कुछ ही जगहों पर भ्रष्टाचार कम हुई है, जैसे रेलवे टिकेट पाने में, कुछ निचली स्तर के सरकारी लेन-देन , आदि में |

(5) निचली जातियों में धर्म-परिवर्तन क्यों बढ़ रहा है ?

असल में, हिंदू ऊच-जाती के लोगों का एक बड़ा वर्ग दलितों को गरीब और अनपढ़ बने रहना देना चाहता है | कौन उनके घर साफ़ करेगा, उनके कपडे धोएगा,उनके बर्तन साफ़ करेगा, उनकी गटर(नालियां) साफ़ करेगा और उनके बच्चों को नह्लायेगा ? इसीलिए , उनको ये नहीं अच्छा लगता , जब ईसाई धर्म-प्रचारक दलितों को पैसे और अंग्रेजी शिक्षा देते हैं |

और दलितों के पास अपना दिमाग होता है | गरोब से गरीब दलित जिनसे मैं मिला हूँ , अभी तक , समाज के बारे में पूरी जानकारी है , ना कि लाचार और बिना दिमाग के , जैसे कि मीडिया में बताया जाता है | मैं बहुत सारे धर्म-परिवर्तन किये हुए, दलितों से मिला हूँ ,जिन्होंने गीता और बाईबल दोनों पड़ी है , और वे कहते हैं कि उन्होंने धर्म-परिवर्तन का फैसला दोनों को पढ़ने के बाद किया है | और ये फैसला इसके बावजूद किया है, जब उनको पता है कि उनको जाती आधारित (वाला) आरक्षण के फायदे नहीं मिलेंगे , धर्म-परिवर्तन के बाद |

धर्म-परिवर्तन बढ़ रहा है , और इसका कारण एक दूसरा प्रश्न पूछने पर मिल सकता है “ अभी तक अनुसूचित जाती और जनजाति के लोगों ने धर्म-परिवर्तन क्यों नहीं किया ?” देखिये, इसका उत्तर `जाती आधारित (वाला) आरक्षण` है | `जाती वाला आरक्षण` एक शक्तिशाली साधन था , जिसने दलित/जनजाति के मध्य वर्ग, उच्च मध्य वर्ग और ऊच वर्ग को हिंदुओं में रखे रखा | लेकिन जैसे निजीकरण बढ़ता जा रहा है ,`जाती वाला आरक्षण` बेकार होता जा रहा है (क्योंकि प्रायवेट में आरक्षण नहीं होता)| इसीलिए दलित और जनजाति के मध्य वर्ग के लोगों को हिंदू बने रहने के लिए कोई फायदा नजर नहीं आता |

और हर ऊंचे वर्ग का व्यक्ति, जो धर्म-परिवर्तन करता है , अपने साथ 10 मध्य वर्ग के व्यक्तियों को और 1000 गरीबों को अपने साथ ले जाता है (क्योंकि उनका समाज में प्रभाव होता है)| और हर मध्य (बीच का) वर्ग का व्यक्ति, जो धर्म-परिवर्तन करता है, उसके साथ 100 गरीब भी धर्म-परिवर्तन करते हैं | भारत में , ज्यादातर ईसाई धर्म-परिवर्तन वाले, दलित मध्य वर्ग से हैं या उनके माता-पिता दलित मध्य वर्ग से हैं , और बाहर से नहीं आये हैं | (  http://www.stephen-knapp.com/christian_persecution_in_india.htm )

सबसे बड़ा कारण क्यों ये लोग धर्म-परिवर्तन कर रहे हैं — भारत में ऊच वर्गों का फैसला , कि दलितों को गरीब और अनपढ़ रखा जाये , उनको पब्लिक जमीन का किराया और खदानों की आमदनी ना देकर और उनको अंग्रेजी शिक्षा ना देकर | इसलिए दलित और जनजाति ईसाई-धर्म परिवर्तन करने वालों (मिशनरी) के रराफ जाते हैं, जो उनको पैसे देने के लिए तैयार हो जाते हैं ( या कुछ और सुविधाएं जैसे दवा आदि ) और अंग्रेजी शिक्षा भी देते हैं |

बहुत से हिदुत्वादी सोचते हैं कि वे , ये लड़ाई गुंडों द्वारा और मोदी जैसे भ्रष्ट नेता का चुनाव करके कर सकते हैं |

गुंडों की ताकत भ्रष्ट जजों, भ्रष्ट पोलिस-कर्मी और भ्रष्ट विधायकों में होती है | बिना भ्रष्ट जजों, पोलिस-कर्मी और नेताओं के , गुंडे कुछ भी नहीं कर सकते, ईसाई-धर्म परिवर्तन करने वालों को क्या मरेंगे ?

लेकिन इन हिंदुत्वादियों ने ये नहीं सोचा है कि ये भ्रष्ट जज, नेता और पोलिस-कर्मी , इन ईसाई धर्म-प्रचारकों की भी सहायता करेंगे, यदि ये ईसाई धर्म-प्रचारक इनको दुगना पैसा देंगे, और साथी ही ऊपर से राजनैतिक दबाव भी होगा , जो विदेशी कंपनियों द्वारा दिया जायेगा | हिंदुत्वादियों को पता होना चाहिए कि कांग्रेस, सी.पी.एम, भा.ज.पा, आई.ए.एस (बाबू), पोलिस-कर्मी, सीबीआई, सुप्रीम कोर्ट आदि के सबसे ऊपर के अधिकारी, बहुराष्ट्रीय कंपनी के भुगतान रेजिस्टर पर हैं |
और हिंदुत्वादियों को ये भी पता होना चाहिए कि विदेशी कंपनियों ने 1980 से , पूरे विश्व में वैटिकन (ईसाई धर्म-प्रचारक) की मदद की है (उधाहरण., दक्षिण कोरिया में , एक ईसाई को विदेशी कंपनी में एक बौद्ध से जल्दी तरक्की मिलने की संभावना है ) और भारत में विदेशी कम्पनियाँ, अपने भा.जा.प्, कांग्रेस, सी.पी.एम., आई.ऐ.एस. (बाबू) , पुलिसकर्मी, सी.बी.आई.,और सुप्रीम-कोर्ट में अपने संपर्कों का खुशी से प्रयोग करेंगे , वैटिकन और उनके ईसाई धर्म-प्रचारकों कि मदद करने के लिए |

इसीलिए, ये थोड़े समय की ही बात है, कि भ्रष्ट जज, भ्रष्ट बाबू, भ्रष्ट नेता आदि, ईसाई धर्म-प्रचारकों से मिल जाएँगे | और जब वो होगा, तो आधे विश्व हिंदू परिषद के गुंडे भी ईसाई धर्म-प्रचारकों से जुड़ जाएँगे और आधे जेल में होंगे, यदि मर नहीं गए हों तो |

और फिर कुछ हिन्दुत्वादी ये आशा करते हैं कि मोदी जैसे भ्रष्ट नेता उन्हें बचा सकते हैं | देखिये, अडवानी (अभी हज अडवानी) जिन्ना की पूजा करने तक गिर सकता है, उस जिन्ना की जिसने लाखों हिंदुओं की हत्या और करोड़ों हिंदुओं को बाहर निकालने का जिम्मेदार था | उसके नाम के बेटे , मोदी , उसकी जगह ले लेगा , जब ईसाई धर्म प्रचारक, उसके ऊपर दबाव डालेंगे , विदेशी कंपनियों के द्वारा |

अफ़सोस की बात है कि हिन्दुत्वादी अपने कार्य को पूरा करने के लिए , कुछ गुंडे और मोदी जैसे भ्रष्ट नेता ही खोज पाए थे , और कोई ज्यादा अच्छा नहीं खोज सकते |

भारत के ऊच जाती के ऊंचे लोग , आम-नागरिकों को अच्छी शिक्षा देने का खुले-आम विरोध करते हैं और उनकी अंग्रेजी शिक्षा देने के प्रति विरोध बहुत ज्यादा है | वैसे सभी ऊच जाती के ऊंचे लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी स्चूलों में भेजते हैं या कम से कम स्थानीय स्चूलों में ,जो अंग्रेजी को पहली कक्षा से पढाते हैं , फिर भी वे इसपर जोर देते हैं कि हम आम-नागरिकों के बच्चों को अंग्रेजी कक्षा 7 से पहले नहीं सीखनी चाहिए , ताकि हम आम-नागरिकों की अंग्रेजी हमेशा के लिए कमजोर हो | ये इसीलिए ताकि ऊंचे जाती के ऊंचे लोगों के बच्चे आगे बढ़ जायें और हम आम-नागरिकों के बच्चे उनके नौकर की तरह काम करें | `राष्ट्रिय स्वयं सेवी ` और `विश्व हिंदू परिषद` के स्कूल इसीलिए ही आम-नागरिकों के बच्चों को अंग्रेजी नहीं सिखाते |

हम आम-नागरिकों में अंग्रेजी के प्रति खिंचाव/आकर्षण बहुत ज्यादा है | इसीलिए जब ईसाई धर्म-प्रचारक आते हैं, इस मांग और सपलाई के अंतर का फायदा उठाने के लिए | वे कहते हैं “ ईसाई बन जाओ और हम आपके बच्चों को अच्छी अंग्रेजी शिक्षा देंगे |” अभी दलित और जनजाति के लोग वैसे भी उच्च जाती के ऊंचे लोगों से और ऊच जाती के पुलिस-वालों,बाबुओं, जजों,ऊंचे लोगों के अत्याचारों से तंग आ चुके हैं | और फिर जब अच्छी शिक्षा , जब मिलती है, तो वे खुशी से धर्म-परिवर्तन करते हैं |

उच्च-जाती के ऊंचे लोगों को दलितों को अंग्रेजी की शिक्षा पाने से नफरत है, ईसाई धर्म-प्रचारकों से ज्यादा | यदि दलितों और जनजातियों को अंग्रेजी शिक्षा मिलती है, तो वे भी अमेरिका चले जाएँगे और फिर भारत में ज्यादा ताकतवर बन जाएँगे , जब वे अपने कमाए हुए डॉलर भारत भेजेंगे | इससे भविष्य में ,उनके बच्चों के अवसर कम होंगे | इसीलिए वे ईसाई धर्म-प्रचारकों से भी नफरत करते हैं |

अलग : अभी हाल ही में मोदी, जो एक `अन्य पिछड़ी जाती` का है, उसने अंग्रेजी जरूरी / अनिवार्य बनने की कोशिश की थी, गुजरात में सभी बच्चों के लिए , पहली कक्षा से | ज्यादातर गुजरात के बजरंग दल , विश्व हिंदू परिषद और भा.जा.पा के कार्यकर्त्ता, जो `अन्य पिछड़े जातियों` से हैं  , ने मोदी का समर्थन किया | अनुमान लगाएं किसने उसका विरोध किया ? कांग्रेस ने नहीं | सी.पी.एम ने नहीं ( जिसके पास गुजरात में वैसे भी कम नेता हैं ) | `राष्ट्रिय स्वयं सेवा` और भा.जा.पा के वरिष्ट/सीनियर नेता ( जो सभी ऊच-जाती के थे !!), और कुछ गांधीवादियों (वो भी ऊच-जाती के थे !!) ने विरोध किया था |

प्रश्नकर्ता- क्या आप `धोखाधड़ी से धर्म-परिवर्तन को रोकने वाला` क़ानून का समर्थन करते हैं?

देश में पहले से ही ,`भारतीय दण्ड संहिता` में क़ानून हैं जो किसी भी प्रयोजन के लिए बल प्रयोग या झूठ पर प्रतिबन्ध लगाती है, धर्म-परिवर्तन की तो बात ही छोड़ दें | यदि बल प्रयोग या झूठ पर प्रतिबन्ध लगाना है, तो हमें कोई नए क़ानून की जरूरत नहीं है |
उच्च-जाती के ऊंचे लोग ये क़ानून चाहते हैं पैसे और अंग्रेजी शिक्षा के प्रयोग से धर्म-परिवर्तन को रोकने के लिए | उनको मालूम है कि एक बार ईसाई धर्म-प्रचारकों को अंग्रेजी शिक्षा का धर्म-परिवर्तन के लिए प्रयोग करने से रोक दिया जाये , तो ईसाई धर्म-प्रचारक अंग्रेजी सिखाना बंद कर देंगे | येही उच्च-जाती के ऊंचे लोगों को चाहिए —- वे नहीं चाहते की आम-नागरिक अंग्रेजी सीखें |

और, आप धर्म-परिवर्तन के लिए पैसे और अंग्रेजी शिक्षा के उपयोग का विरोध क्यों करते हैं ? हिंदू ऊंचे लोगों की इच्छा कि हम आम-नागरिकों को कमजोर रखा जाये हर तरीके से ( हमें हथियार रखने का अधिकार नहीं देना, हमें अंग्रेजी नहीं सिखाना, हमें क़ानून नहीं पढ़ाना आदि ) भारत को बहुत बड़ा नुकसान होगा |
हिदू मंदिरों को बहुत पैसा देते हैं | अभी मंदिरों के मालिक उस पैसे का प्रयोग हम आम-नागरिकों को हथयार का प्रयोग सिखाने, अंग्रेजी, क़ानून आदि सिखाने के लिए , ताकि हमारा स्तर सुधारे, का विरोध करते हैं |

लगभग सभी नेता अभी विदेशी कंपनियों के और ईसाई धर्म-प्रचारकों के अड्डे (वैटिकन) के एजेंट हैं , जिसमें आपके प्रिय भा.ज.पा. नेता भी आते हैं | अभी हाल ही में, `विश्व हिंदू परिषद` के कार्यकर्ताओं ने डांग, गुजरात में लाल किशन अडवानी को कहा कि वे गृह-मंत्री और विदेश मंत्रालय को चिट्टी लिखे ,कुछ ईसाई धर्म-प्रचारकों को देश से बाहर करने के लिए , जिनके वीसा समाप्त हो गए थे और जो धर्म-प्रचार कर रहे थे | अडवाणी ने मना कर दिया !!
लाल किशन अडवानी चाहते हैं कि विदेशी कम्पनियाँ `तिमेस ऑफ इंडिया` को कहें कि उसका समर्थन करें या उसका विरोध करना कम कर दे , जितना कि संभव है | तप अडवानी एक विदेशी कंपनी का एजेंट बन चुका है और एक तरह से ईसाई धर्म-प्रचारकों का भी एजेंट , क्योंकि विदेशी कंपनियों और ईसाई धर्म-प्रचारकों की आपस में मिली-भगत है |

प्रश्नकर्ता- एक रिपोर्ट के अनुसार , हिंदुओं कि आबादी 2.52 % बढ़ी है और ईसाई जन-संख्या 0.008% कम हुई है 1991 1998 के बीच |

कृपया `क्रिप्टो-ईसाई (क्रिप्टो-क्रिश्चियन)` शब्द पर गूगल करें |
उच्च-जाती द्वारा नियंत्रित कांग्रेस आरक्षण देने के लिए मजबूर थी | निचली जाती के लिए आरक्षण , उच्च-जाती के सुरक्षा के लिए थी (यदि आरक्षण नहीं दिया जाता , तो बड़े स्तर पर धर्म-परिवर्तन हो जाता और ऊच-जातियों के खिलाफ हो जाते  | नक्सल वाले क्षेत्र देखें, वहाँ भी ऐसा कुछ हो रहा है |)

(6) लोकतंत्र छोटे देशों और राज्यों में ज्यादा अच्छा चलता है |

बहुत से लोग देश के छोटे आकार / साइज का मतलब ही लोकतंत्र समझते हैं | इसमें दलील ये दी जाती है  “ देखो,  लोकतंत्र के कारण ही अथेन्स (पूराने समय के यूनान), इतना ताकतवर बन सका कि वो एक बड़े क्षेत्र पर राज कर सका और एक ऐसा प्रभाव छोड़ दिया जिसे हम आज भी याद करते हैं | अथेन्स में 60,000 युवक थे , 60,000 युवती और कुछ एक लाख बच्चे थे | तो आजाद जन-संख्या लगभग दो लाख थी | इतने कम लोगों के पास कुछ 3 लाख गुलाम थे अथेन्स में और अथेन्स के आस-पास के क्षेत्र पर हावी थे जो अथेन्स के आकार और आबादी से 10-20 गुना थे | असल में, जो लोकतंत्र का पालन कर रहे थे, उसने उनको इतना ताकतवर बना दिया कि वे इतने सारे लोगों को गुलाम बना सके और दूसरों पर हावी कर सके |इसीलिए ऐसा कहना कि “ लोकतंत्र केवल छोटे क्षेत्र या जनसंख्या में ही संभव है “ , सही बात ये होगी कि “ लोकतंत्र छोटे जन-संख्या को भी इतना ताकतवर / शक्तिशाली बना देता है कि वो बड़ी जन-संख्या पर हावी हो सकता है |”

जैसे जन-संख्या / आकार बढ़ता है,  हमें तरीका बदलना होता है ताकि बड़ी जनसंख्या भाग ले सके | इतना ही है | इसके अलावा, आकार/जनसंख्या और लोकतंत्र का कोई सम्बन्ध नहीं है |

एक अच्छे तरह से बनाया गया प्रशासन का सिस्टम में, कार्यक्षमता (कार्य-क्षमता की कमी) `क` के अनुपात में नहीं होग लेकिन log (क) के अनुपात में होगा | उर आकार में बढ़ोतरी के साथ साथ तकनीक में भी बहुत सुधार होता है, जिसके द्वारा आम-नागरिक अफसरों की निगरानी कर सकते हैं, यदि ऐसे क़ानून-ड्राफ्ट और तरीके हैं , उन अफसरों की निगरानी करने के लिए | आज की समस्या ऐसे तरीकों की कमी की है, देश के आकार/जन-संख्या की नहीं |

प्रश्नकर्ता-  जितना बड़ा देश का आकार / जनसंख्या , उतना ज्यादा मुश्किल है , नागरिकों का असल में और सीधा भाग लेना, देश के मामलों

में फैसले लेने में , और इसीलिए उतनी ज्यादा जरूरत है प्रतीनिधियों (नेता) और तरीकों की  | लेकिन प्रतिनिधियों (नेता) और तरीकों से और

ज्यादा सम्भावना हो जाती है सिस्टम के भ्रष्ट हो जाने की |

हाँ, तरीकों की ज्यादा जरूरत होती है, लेकिन प्रतिनिधियों की नहीं | उदाहरण., आज की तकनीक आम-नागरिकों को हर साल 100-200 सीधे निर्णय लेने देते हैं , देश के मामलों में | लेकिन कितने निर्णय लिए जाते हैं सीधे , आज ? केवल 3 ५ सालों में ( पार्षद का चुनाव, विधायक का चुनाव, और सांसद का चुनाव) | इसीलिए आम-नागरिकों का अफसरों पर सीधे नियंत्रण/कंट्रोल की कमी , तरीकों की कमी के कारण है, आकार/जनसंख्या के कारण नहीं |

प्रश्नकर्ता- इसीलिए जब भ्रष्टाचार के अवसर होंगे, तो जिनको भ्रष्टाचार से फायदा होगा, वे उन अवसरों का उपयोग करेंगे |

यदि आम-नागरिकों के पास निर्णय लेने वाले अधिकारियों को सजा देने के तरीके होंगे , तो ऐसा नहीं होगा | उदाहरण ., आज भारत में हम आम-नागरिकों के पास सुप्रीम-कोर्ट जज को कैद करने या फिर एक आई.ऐ.एस. (बाबू) या पोलिस-कर्मी को भी कैद करने का कोई अधिकार नहीं है | और ये ही कारण है कि ये अधिकारी खुले-आम रिश्वत लेते हैं | एक बार उन्हें कैद करने, उनकी काले धन को जब्त करने ,आदि का अधिकार हम आम-नागरिकों को मिल जायेगा ,तो 99 % अधिकारी अच्छा बर्ताव करेंगे aur 1% बदल दिए जाएँगे | यहं फिर से, कारण तरीकों की कमी है, आकार / जन-संख्या नहीं |

(7) पढ़े-लिखे और चिंतित नागरिक अच्छे उम्मीदवार और प्रशासन में लोग / नेता क्यों नहीं ला पते ? क्यों हम अटल बिहारी , प्रमोद, येचुरी,

अरुण शौरी , नरेन्द्र मोदी , करात , मनमोहन सिंह, सोनिया गाँधी, चिदंबरम आदि नेताओं के साथ अटके हुए हैं ?

क्यों हम अटल बिहारी वाजपेयी, प्रमोद,येचुरी, अरुण, नरेन्द्रभाई, करात, मनमोहन सिंह ,सोनिया, चिदंबरम आदि के साथ क्यों अटके हुए हैं ?

शिक्षित/पढ़े लिखे लोग इनसे अच्छे विकल्प/लोग पदों पर लाने के लिए केरल ,उत्तर प्रदेश और बाकी भारत में भी असफल/फेल हो गए हैं क्योंकि –

(1) बहुत से चिंतित नागरिक नैतिकता(अच्छा बर्ताव) और राष्ट्रिय चरित्र/चाल-चलन के बकवास में विश्वास करते हैं | वो ये बकवास में विश्वास करते हैं “ कि बर्ताव/व्यवहार को सुधारों और देश सुधर जायेगा”| इसीलिए वे बर्ताव/व्यवहार और चरित्र-निर्माण (अच्छा चाल-चलन बनाना) की बेकार पढ़ाई पर ध्यान देते हैं | इसीलिए वे प्रशासन, कोर्ट आदि में कोई रूचि नहीं लेते जहाँ समस्या है | और उनकी राजनीती में कोई भागीदारी / हिस्सेदारी नहीं है या केवल एक नेता को दूसरे से बदलने तक सीमित है | वे व्यक्ति पूजन से आगे नहीं सोच सकते , चाहे वो मोदी हो, बसु हो , अटल बिहारी हो, या लाल कृष्ण अडवानी हो आदि | इसीलिए वे ये नहीं सोचते कि उनको कोर्ट, प्रशाशन के कानूनों में बदलाव लाने के लिए क्या करना चाहिए | तो नेता बदलते हैं, कोर्ट और प्रशासन की व्यवस्था नहीं बदलती है और गड़बड़ चलती रहती है |

(2) हमारे पाठ्य-पुस्तक लिखने वाले कालेज के प्रोफेस्सर (बढ़ा मास्टर) , उनके प्रायोजक- विशिष्ट वर्ग/ऊंचे लोग को खुश करने के लिए , पाठ्य-पुस्तकों में आम नागरिक-विरोधी कचरा भर दिया है | केवल यही पढ़ने के लिय मिलता हिया “ आम भारतीय जातिवाद है, भावुक हैं ,सांप्रदायिक है ,बदमाश हैं आदि, आदि |” और वे ये छुपाते हैं कि ये बुराईयां भारतीय नेता-बाबु-जज-पोलिस-प्रभंधक-बुद्धिजीवी-ऊंचे/विशिष्ट लोग में भी है और भारतीय भ्रष्ट गठबंधन (नेता-बाबु-जज-पोलिस-प्रभंधक-बुद्धिजीवी-ऊंचे/विशिष्ट लोग ) में दो और बुराइयां हैं जो आम नागरिकों में नहीं है – भाई-भतिजेवाद और गुंडों और दूसरे भ्रष्ट गठबंधन से मिली-भगत | इसीलिए भारत में छात्र/विद्यार्थी , चिंतित नागरिकों समेत, लोकतंत्र (सारे देश के लोगों द्वारा देश के मामलों का फैसला ) के विरोधी हो गए हैं |
इसीलिए वे अल्प लोक-तंत्र (कुछ ही लोगों द्वारा देश के मामलों का फैसला ) समाधानों के समर्थक हो गए हैं और लोकतान्त्रिक समाधानों जैसे `भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा बदलने/सज़ा देने`, पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम),`एक से अधिक लोगों को वोट पसंद अनुसार`,  चुनाव फॉर्म को सरल बनाना, चुनाव जमा राशि बढ़ाना ,आदि का विरोध करते हैं , जो अधिक अच्छे उम्मीदवारों को बढ़ावा देंगे

नेता(उम्मीदवार) वायदा करता है व्यापारियों आदि को कि यदि वो चुनाव जीतता है और सांसद/मंत्री आदि बनता है , तो वो भारत सरकार के तोहफे/उपहारों की बौछार कर देगा , यदि ये आम नागरिकों का जीवन बरबाद कर देता हो तो भी | यहाँ शून्य विचारधारा या व्यक्तिवाद है – ये 100 % सौदेबाजी है या रिश्वतखोरी |

सभी विचार-धाराएं जैसे हिंदुत्व, धर्म-निरपेक्षता (सभी धर्म सामान हैं) ,और सबसे नए- शिक्षा- वाद, 85% बढौतरी-दर का वाद , कुछ नहीं ,केवल इस सौदेबाजी को छुपाने के लिए मुखौटे हैं | और ज्यादातर नेता आजकल केवल दलाल हैं , पूरे दलाल ,लेकिन दलाल भी ज्यादातर ईमानदार होते हैं |

सभी नेता, भारत में या पश्चिम में , का झुकाव रहता है कि उन लोगों को बढ़ावा देने के लिए, जो उसके लिए खतरा नहीं है | इसीलिए, सभी नेता का झुकाव दूसरे नेताओं को काटने का रहता है ताकि दूसरे नेताओं का नाम न हो जाये और उनके लिए खतरा ना बनें | और ये पक्का करते हैं कि केवल उनका “कमजोर” जूनियर/निचला व्यक्ति को ही बढ़ावा मिले | पश्चिम देशों ने ये समस्या को कम कर दिया है एक ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था बनाई है , जहाँ पहले तो , नेता इतना शक्तिशाली ही नहीं होता | उदाहरण- अमेरिका का राष्ट्रपति भारतीय प्रधानमंत्री जितना देश के आंतरिक/भीतर के मामलों में 5% भी शक्ति-शाली नहीं है | और एक अमेरिका का गवर्नर के पास 1% भी  भारतीय मुख्यमंत्री जितने अधिकार नहीं हैं | उदाहरण एक अमेरिका का गवर्नर जिला पोलिस मुखिया का तबादला नहीं कर सकता , जबकि भारतीय मुख्यमंत्री पलक जपकते ये काम कर सकता है | इसीलिए अमेरिका के नेता इस स्थिति में नहीं है कि गुणवान/कुशल जूनियर/निचले लोगों को ऊपर बढ़ने से रोक सकें | लेकिन भारत में , प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के पास प्रशासन में इतने अधिकार है, कि वे पार्टियों में अपने विरोधियों को कुचल सकते हैं और ये पक्का कर सकते है कि केवल कमजोर निचले लोग ही ऊपर आयें और ताकतवर निचले लोगों को कोई ध्यान न मिले |

ऊंचे/विशिष्ट लोगों के आई.ऐ.एस.(बाबू) , पोलिस , कोर्ट और पार्टियों में दखल-अंदाज और पहुँच के कारण , एक अच्छे व्यवहार/बर्ताव वाला व्यक्ति कभी भी आई.ऐ.एस(बाबू), पोलिस, कोर्ट, राजनीति में ऊपर नहीं उठ सकता | `स्वतंत्र-सेनानियों` को छोड़ कर जो 1951 तक पहले ही ऊपर ऊठ चुके थे , कोई भी अच्छे व्यवहार/बर्ताव वाले लोगों को ऊंचे लोगों/विशिष्ट वर्ग से प्रयोजन नहीं मिला 1951 के बाद | और विदेशी कंपनियों/ ईसाई धर्म के कट्टरपंथी लोगों की पहुँच और दखल-अंदाज़ कांग्रेस, भा.जा.पा और दूसरी पार्टियों में, ने इस समस्या को और ज्यादा खराब कर दिया | अभी ,एक सच्चा राष्ट्रवादी/देशभक्त गुणवान व्यक्ति की कोई सम्भावना नहीं है कि वो आई.ऐ.एस (बाबू), पोलिस,कोर्ट और राजनैतिक पार्टियों में तरक्की कर सके |

केवल वे ही राष्ट्रवादी को विदेशी कम्पनियाँ/ईसाई धर्म के कट्टरवादी/रूढ़िवादी बढ़ावा देंगे ,जो बजरंगी किस्म के लोग है, जो गरम मिसाजी हैं ,जिससे देश को नुकसान पहुंचे | यदि कोई राष्ट्रवादी/देशभक्त किसी पार्टी ,आई.ऐ.एस(बाबू) , पोलिस में ठन्डे दिमाग का, दूर की सोच वाला, चुस्त/चतुर है , तो विदेशी कम्पनियाँ/ईसाई धर्म के कट्टरपंथी , ये सुनिश्चित करेंगे कि वो कभी भी ऊपर ना उठे , यानी तरक्की ना करे | तो उसका रास्ता रोक दिया जायेगा | इसीलिए वो पसंद करेगा कि वो इस सरकारी सिस्टम के बाहर काम करे , यानी प्राइवेट में काम करे |

(8) भारत में हालात अभी अच्छे हुए हैं, जैसे के पश्चिम में एक समय हुए थे | अमेरिका में लोक-तंत्र , चुनाव, जूरी द्वारा फैसला 200 सालों

से ज्यादा था, लेकिन वहाँ की औरतों को वोट करने का अधिकार केवल भारत की औरतों से 10-15 साल पहले ही मिला था |

    अमेरिका या इंग्लैंड में औरतों के हालत ज्यादा अच्छे थे, भारत के औरतों की हालात से, उनको वोट मिलने से भी पहले | ऐसे तो स्विजरलैंड में, औरतों को वोट करने का अधिकार भारत में औरतों को वोट करने का अधिकार मिलने से बहुत बाद में मिला था | फिर भी स्विजरलैंड में, औरतों की स्थिति कहीं ज्यादा अच्छी थी |

अंग्रेजों ने चुनाव-प्रक्रिया (तरीका) 1934 में सबसे पहले लायी थी और वो `सार्वजानिक (सभी के लिए ) मताधिकार` के बिना थी | एक कारण ये था कि वो पहली कोशिश थी और दूसरा कारण ये था कि भारत के ऊंचे वर्ग के लोग , पढ़े-लिखे लोग जैसे विकइल और कई कांग्रेस के सदस्य सहित, सार्वजनिक (सभी के लिए ) चुनाव का विरोध करते थे | और कई भारतीय राजाओं ने अपने राज्यों में चुनाव के अधिकार ही नहीं दिए, अंग्रेजों के देने के बाद भी | 1936 में, राजकोट में, जहाँ भारतीय राजा का शाशन चलता था और सीधा अंग्रेज शाशन नहीं करते थे, एक प्रदर्शन किया , चुनावों की मांग करते हुए | राजा ने कैसे  जवाब दिया ? उसने हिंसक तरीके से उनको कुचला | तो इतना तो श्रेय अंग्रेजों को मिलना चाहिए कि उन्होंने चुनाव की प्रक्रिया लाए , सार्वजनिक (सभी के लिए) चुनाव ना भी लायें हो तो भी |
और , अमेरिका के नींव डालने वाले लोगों ने और ऊंचे वर्ग के लोगों ने कभी भी लोकतंत्र का स्तर नहीं कम किया , जो अंग्रेज उनके देश में छोड़ कर गए थे | जबकि भारत के नींव डालने वाले लोग और ऊंचे वर्ग के लोगों ने लोकतंत्र का स्तर कम कर दिया , लोकतंत्र के स्तर से जब अंग्रेज भारत छोड़ कर गए थे | मैं आशा करता हूँ कि ये सच कि भारतीय नेता-बाबू-जज-बुद्धिजीवी-ऊंचे वर्ग के लोग ने 1950 के दशक में जूरी सिस्टम को समाप्त कर दिया , सभी को ये विश्वास दिला देगा कि भारत के नेता-बाबू-जज-बुद्धिजीवी-ऊंचे वर्ग के लोग लोकतंत्र के खिलाफ हैं |  और कोई सबूत / प्रमाण नहीं चाहिए

(9) बुनियादी शिक्षा (बारवीं कक्षा) पास करना जरूरी होना चाहिए चुनाव लाधने के लिए | और ऐसा नियम होना चाहिए कि एक 3 महीने का

बुनियादी क़ानून का पाठ्यक्रम (स्थानीय भाषा में या अंग्रेजी में) में भाग लेना होगा और उसको पास करना होगा उन विधायकों / सांसदों को ,

जिनका कोई भी कानूनी अनुभव नहीं है |

75% से ज्यादा सांसदों ने कालेज पास किया है | और बहुत सारे क़ानून की पढ़ाई भी पढ़े हुए हैं | और एक अनपढ़ व्यक्ति भारत में (या कहीं भी दुनिया में) को बुनियादी क़ानून जैसे `भारतीय दण्ड संहिता` आदि का ज्ञान है | पढ़े-लिखे सांसद उतने ही भ्रष्ट हैं ,जितने कि अनपढ़ | इसलिए शिक्षा आदि उनके क़ानून पारित करने की क्षमता नहीं बढ़ाएगा |

और सांसद का काम है

1) अध्यक्ष के सामने क़ानून-ड्राफ्ट रखना
2) `हां`/`ना` बोलना उस क़ानून-ड्राफ्ट पर जब अध्यक्ष उस पर लोक-सभा में मतदान कराये

सांसद को 1) और 2) ,ये दोनों काम आम-नागरिकों के इच्छा के अनुसार करने होते हैं | ये आम-नागरिकों का काम है कि अपने क्षेत्र के सांसद को क़ानून-ड्राफ्ट बना कर दे | जब तक आम-नागरिक कोई भी क़ानून-ड्राफ्ट , सांसदों को नहीं देते , उनको एक मांसपेशी भी हिलानी की जरुरत नहीं है , मतलब कि कुछ भी करने की जरूरत नहीं है |

(10) “ सिस्टम अच्छा है, लोग ही हैं जो अच्छे नहीं हैं |”

गलत |
भ्रष्ट गठबंधन (नेता-बाबू-जज-पोलिस-नियामक(प्रबंधक)-बुद्धिजीवी-ऊंचे वर्ग के लोग) भ्रष्ट इसीलिए हैं क्योंकि उनको पता है कि हम आम-नागरिक उनको सज़ा नहीं दे सकते , न ही जुर्माना कर सकते हीं, किगना भी वे आम-नागरिकों को लूटें | इसीलिए हमें ये समस्या को दोनों स्तर पर हल करना होगा – लोग और सिस्टम | हमें कुछ बुरे लोग हटाने होंगे और कुछ अच्छे क़ानून (जैसे जूरी सिस्टम , भ्रष्ट को बदलने का नागरिकों का अधिकार ., आदि) लागू करने होंगे , जिससे भ्रष्ट लोगों को जेल डाल सकें |


(11) सेना में तरक्की और चुनाव का तरीका बहुत व्यवस्थित है क्योंकि सभी लोगों को मालूम रहता है कि उसपर नजर रखी जा रही है उनके

सीनियर द्वारा और उनको ये भी मालूम होता कि दूसरा मौका नहीं मिलेगा यदि वे पकड़े गए तो |

सेना कम भ्रष्ट है क्योंकि निचले और बीच के स्तर के अफसर, पब्लिक / जनता से ज्यादा बातचीत, मिलती-जुलती नहीं है , न ही उनके पास नागरिकों के ऊपर कोई अधिकार होता है और उनको मिलने वाले बजट (खर्च करने के लिए पैसा) भी बहुत ज्यादा नहीं होता |

(12) भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को निचले स्तर से शुरू होनी चाहिए

|बकवास |
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को ऊपर से शुरू होना चाहिए | ये रट कि केवल निचले स्तर पर ही ध्यान केंद्रित होना चाहिए, केवल शीर्ष के लोगों के लिए स्वर्ग बनाने के लिए ये रट किया जाता है | “ निचले स्तर पर भ्रष्टाचार पर ध्यान केंद्रित करो” का मायना है कि पटवारी/तलाटी/लेखपाल, तहसीलदार आदि से लड़ना और बाबूओं, पुलिस कर्मी, मंत्रियों, सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट के जजों को शांतिपूर्वक लूटने देना जितना लूटना चाहें|

मेरे विचार से हमें शीर्ष/सबसे उपरी स्तर पर धावा बोलना चाहिए | जब ऐसा होगा , तो नीचे का 99% भ्रष्टाचार गायब हो जायेगा | और फिर , हम बाकी 1% भ्रष्टाचार से भी निपट सकते हैं | लेकिन यदि सुप्रीम-कोर्ट के जज और केन्द्रीय मंत्री , सभी भ्रष्ट हैं, फिर नीचले स्तर पर भ्रष्टाचार कभी भी समाप्त नहीं होगा, कितना भी हम लड़ते रहें, भ्रष्टाचार के खिलाफ |

—–

निचले स्तर का भ्रष्टाचार , इसीलिए बढ़ता है क्योंकि ऊपर के स्तर पर भ्रष्टाचार है | ये सामान्य ज्ञान है कि बाबू यदि भ्रष्ट होता है तो चपरासी के लिए रिश्वत लेना आसान हो जाता है |

और ज्ञान को छोडो, कभी-कभी तो ऊपर के लोग निचले स्टारों को पैसा जमा करने के लिए कहते हैं और उसका हिस्सा उन्हें देने के लिए कहते हैं| और ऊपर के लोग निचले और मध्य स्तर के लोगों को भर्ती करते समय लापरवाही से भाई-भातिजेवाद करता है जिससे सभी को भ्रष्ट होने का कारण मिल जाता है |

उदहारण, क्यों एक निचली अदालत के जज अपनी लालच को छोड़े जब उसे पता है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश `खरे` ने एक सजा पाया हुआ, बच्चों से यौनशोषण करने वाले धनी/पैसे वाला स्विस नागरिक को जमानत कर दे है ? और एक पुलिस इंस्पेक्टर रिश्वत क्यों नहीं ले जबकि उसे गृहमंत्री हर इंस्पेक्टर को उसे पैसे इकट्टा कर के देने का लक्ष्य देता है और उसका तबादला करने की धमकी देता है यदि उतना लक्ष्य पूरा नहीं हुआ तो !!

ये सब हो-हल्ला कि हमें केवल निचले स्तर पर लड़ना है और उपरी स्तर को छोड़ देना चाहिए ये सुनिश्चित/पक्का करता है कि बाबू ,जज और मंत्री और सभी सबसे ऊपर स्तर के लोग रिश्वत इकट्टा कर सकते हैं और आराम से सो सकते हैं जब हम पटवारियों और तहसीलदारों से लड़ने में व्यस्त हों |

प्रश्नकर्ता- आप ने भ्रष्टाचार के लिए जो समाधान बताये हैं जैसे जूरी सिस्टम , वे  पूरे सिस्टम पर काम करते हैं और “ ऊपर से नीचे की ओर “ काम करते हैं |

ये तरीके 100 % `नीचे से ऊपर की ओर` काम करते हैं और मुझे शुद्ध `ऊपर से नीचे की ओर` काम करने वाले तरीकों में कोई विश्वास नहीं है | मेरा तरीका पहले प्रधानमंत्री को `पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम) सरकारी आदेश` पर हस्ताक्षर करने पर मजबूर करना है , जिसके बाद नागरिक कोई भी नागरिक द्वारा , कलेक्टर के दफ्तर में दी गयी अर्जी पर अपनी `हां`/`ना`दर्ज कर सकता है 3 रुपये दे कर और ये सब प्रधानमंत्री के वेबसाइट पर आ जायेगा ताकि लाखो-करोड़ों लोग देख सके और जांच कर सके , कभी भी, कहीं भी |
और सभी प्रस्तावित क़ानून जैसे जूरी सिस्टम , `पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम)` द्वारा , एक प्रस्ताव के रूप में आयेंगे, लोगों के समर्थन और दबाव के द्वारा | इसीलिए कुछ भी `ऊपर से नीचे नहीं है | बाद में नीचे के लोग ,मतलब आम-नागरिकों के पास प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों, सुप्रीम-कोर्ट के जज, आदि को निकालने/बदलने के तरीके होंगे |

(13) हमें भ्रष्टाचार को कम करने के लिए क्या मूल्य/गुण चाहिए ?

कुछ मूल्य वाले प्रश्नों पर विचार करें –

1) पब्लिक (सरकारी) जमीन और प्राकृतिक संसाधन का मालिक कौन है ? और उसमें से किराया और
आमदनी किसको मिलनी चाहिए ?
2) सबसे बड़ा कौन है , आम-नागरिक या सुप्रीम-कोर्ट के जज ?
3) क्या आम-नागरिकों के पास सुप्रीम-कोर्ट के प्रधान-जज को बदलने का अधिकार है ?
और दूसरे प्रश्न भी | दूसरे शब्दों में, मूल्य और राजनीति का सिस्टम ,दोनों एक ही है | भारत में बहुत गडबड़ी है, क्योंकि आम-नागरिकों के पास लोकतान्त्रिक (सारे देश के लोगों द्वारा देश के मामलों का फैसला ) मूल्य नहीं हैं जैसे आम-नागरिक पब्लिक (सरकारी) प्लाट के मालिक हैं, आम-नागरिक सबसे ऊंचे/बड़े हैं और नागरिकों को (भ्रष्ट) सुप्रीम-कोर्ट के प्रधान-जज को निकालने / बदलने का अधिकार होना चाहिए | जबकि भ्रष्ट गठबंधन (नेता-बाबू-जज-पोलिस-नियामक(प्रबंधक)-बुद्धिजीवी-ऊंचे वर्ग के लोग) के पास अल्प-लोक्तंत्र (देश के कुछ ही लोगों द्वारा देश के मामलों का फैसला ) के मूल्य होते हैं जैसे सुप्रीम-कोर्ट के जज ऊंचे/बड़े होते हैं आम-नागरिकों से , आम-नागरिकों को कुछ भी आमदनी और किराया नहीं मिलना चाहिए पब्लिक (सरकारी) प्लाट और खदानों से ., आदि |

(14) ये प्रस्तावित तरीके क्रन्तिकारी और संभव नहीं हैं |

कोई भी प्रस्ताव क्रांतिकारी नहीं है और हर प्रस्ताव , आज के प्रशासन में एक छोटा बदलाव लाता है | उदाहरण., पहले प्रस्ताव पर विचार करें – `पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम)`—(www.righttorecall.info/001.h.pdf)
पहला प्रस्ताव कहता है — हम आम-नागरिकों के अर्जी प्रधानमंत्री के वेबसाइट पर दालों और हम आम-नागरिकों के `हां`/`ना` , उस अर्जी पर , प्रधानमंत्री के वेबसाइट पर दालों | दूसरे शब्दों में , हम आमनागरिकों को प्रधानमंत्री के वेबसाइट पर लिखने की आजादी मिलती है | क्या ये आपको क्रांतिकारी लगता है ? ये जरूर है कि जो लोग ये छोटे विकास वाले बदलावों का विदोध करते हैं, वे अक्सर इन तरीकों को गलत लेबल/नाम देकर , इन्हें क्रांतिकारी कहते हैं, लोगों में गलत राय बनने के लिए |

—-

और यदि किसी को उचित चर्चा चाहिए , तो उसे ऐसे शब्द जो साफ़ (स्पष्ट) नहीं हैं, जिसके कई मतलब हो सकते हैं ,जैसे “संभव (व्यावहारिक) नहीं”. ”संभव (व्यावहारिक)” आदि के प्रयोग से बचना चाहिए | शब्द “ संभव नहीं है “ के कई मतलब हो सकते हैं , जिनका आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है –

1. जिसका अच्छे से चलाना संभव नहीं है
2. भ्रष्ट गठबंधन (नेता-बाबू-जज-पोलिस-नियामक(प्रबंधक)-बुद्धिजीवी-ऊंचे वर्ग के लोग) जोरदार तरह से विरोध करेंगे और मैं इसीलिए ये तरीकों को समर्थन करने से डरता हूँ |
3. मेरे दोस्त और रिश्तेदार को ये पसंद नहीं आएगा यदि मैं इन क़ानून-ड्राफ्ट का समर्थन करता हूँ |
4. आम-नागरिकों को ये प्रस्तावित क़ानून-ड्राफ्ट और तरीके समझ नहीं आएंगे |
और बहुत सारे दूसरे मतलब |
उदाहरण., मेरे मुनीम और वकील दोस्त कहते हैं कि “ बाबुओं और जजों पर आयकर नहीं लगाना संभव नहीं है | ” उनका मताब (2) है | वे ही मुनीम और वकील ये भी कहते हैं कि “ जज के भर्ती के लिए इंटरवियू का विरोध करना व्यवहारिक(संभव) नहीं है | इसमें भी उनका मताब (2) है — वे परिणाम से डरते हैं , जो उनको सामना करना पड़ेगा यदि वे जजों के भर्ती के लिए इंटरवीयू का विरोध करें तो | और यदि कोई कहे “ चलो हम मंगल गृह चले जायें भ्रष्ट नेता-बाबू-जजों से बचने के लिए “ तो मैं कहूँगा कि ये व्यावहारिक नहीं है और मेरा मतलब (1) होगा |

इसीलिए जब आप शब्द “ व्यावहारिक नहीं “ का प्रयूग करते हैं, तो आपका क्या मतलब है ? ऐसे 5-10 मतलब वाले शब्दों से बचना चाहिए |
कृपया ध्यान दें कि भ्रष्ट शब्द के साथ जज और बुद्धिजीवियों का नाम जरूर लें , नेता और बाबूओं के साथ | ये जरूरी है कि हम ये झूठी बात कि `जज और बुद्धिजीवी ईमानदार हैं` को समाप्त करें और इसीलिए ये जरूरी है कि हम उनका नाम भी लें भ्रष्ट नेता और बाबू के साथ |

पहला सरकारी आदेश एक छोटा सा विकास है | इतना आसान और छोटा कि आप के जैसे कई इसकी संभावनाओं को देख भी न पाओ | लेकिन कोई भी अनुभवी नेता, या बुद्धिजीवी इससे होने वाले प्रभाव को  देख सकता है और कितना नुकसान करेगा भ्रष्ट नेता, `आई.ऐ.एस`(बाबू), पोलिस-कर्मी और जजों को , जिसके कारण उन्होंने ये पहली सरकारी आदेश से नफरत की है |

(15) ऐसे बेईमान लोग हैं जो जमीन को कई लोगों को बेच देते हैं और गायब हो जाते हैं | इसका क्या हल है ?

ये भारत में तोर्रेंस जैसे जमीन के रिकोर्ड के लिए सिस्टम के ना होने के कारण है | ये समस्य पूरी दुनिया में थी और ये सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया में रोबर्ट तोरेंस ने 1860 में हल की , एक जमीन के रिकोर्ड का ऐसा सिस्टम बना कर , जिससे जमीन के सौदों में घोटालों / धोखे  की समस्या समाप्त हो गयी और जो बाद में तोरेंस सिस्टम से जाने जाना लगा | ज्यादा जानकारी के लिए ये लिंक देखें-

http://en.wikipedia.org/wiki/Torrens_title

भारतीय नेता-`आई.ऐ.एस`(बाबू) तोरेंस सिस्टम का विरोध करते हैं क्योंकि इस सिस्टम में हरेक `बिक्री के पूर्व के दस्तावेज` जिनको बानाखत कहते हैं और `बिक्री के दस्तावेज` को सरकारी दफ्तर जा कर दर्ज करना होता | आपको मालूम है कि नेता-बाबू-पुलिसकर्मी–जज की मीलों-मीलों जमीन उनके नाम होती है और उसको दर्ज करने से उनके सारी संपत्ति/धन का खुलासा हो जायेगा |

(16) राजनीति में अचे लोग क्यों नहीं आते ?

मतदाता मूर्ख नहीं हैं |
क्योंकि वे उस तरह वोट नहीं करते , जैसे कि आप चाहते हैं कि वे करें, इसका ये मतलब नहीं के वे मूर्ख हैं |

क्योंकि जज भ्रष्ट और भाई-भतिजेवाद (रिश्तेदारों की तरफदारी) वाली है, हिंसक और पैसे वाले मुजरिमों (जैसे हर्षद मेहता) का राज चलता है | और इसीलिए हिंसक और पैसे वाले मुजरिमों ने ये पक्का कर लिया है कि कोई भी ` अच्छे आदमी ` इतने नहीं उठे , उनका इतना नाम नहीं हो कि वे विधायक बन पाएं | इसीलिए केवल मुजरिम या मुजरिमों के समर्थक ही नाम कमा पाते हैं | कुछ लोग हिंसक मुजरिमों का समर्थन करते हैं और कुछ जैसे प्रमोद , मनमोहन सिंह आदि ., पैसे वाले मुजरिमों का समर्थन करते हैं |

यदि हम चाहते हैं कि अच्छे लोग जीते, हम को ये सुनिश्चित करना होगा कि अच्छे लोग सांस ले सकें, जी सकें और बढ़ सकें | और इसके लिए हमें हिंसक और पैसे वाले मुजरिमों को जेल में डालना होगा और हमें भ्रष्ट पुलिसवाले, जज, मंत्रियों आदि, को जेल में डालना होगा | उसके बाद ही अच्छे लोग चुनाव जीत सकते हैं |

जिन देशों ने अपने यहाँ जूरी सिस्टम लागू किया है, वहाँ भ्रष्टाचार कम है और ज्यादा आजादी भी है | (साम्यवादी देश में थोड़ी देर के भ्रष्टाचार कम थी , लेकिन कोई आजादी भी नहीं थी ) ज्यादा आजादी और साथ में ही कम अनुशाशन-हीनता और कम भ्रष्टाचार से ज्यादा विकास हुआ और भ्रष्टाचार कम हुआ | तो, गरीबी से भ्रष्टाचार नहीं होती , बल्कि इसके उल्टा है |

(17) मेरे अनुसार बहुत से कारण हैं भ्रष्टाचार होने के , गरीबी उसका सबसे बड़ा कारण है |

गरीबी भ्रष्टाचार होने का सबसे कम कारण है | क्या पोलिस के अफसर गरीब हैं ? क्या सुप्रीम-कोर्ट के जज गरीब हैं ? और सभी संगठित और योजना के साथ किये गए अपराध , कोर्ट से शुरू होते हैं | संगठित और जोजन से अपराध करने वाला अपराध नहीं करेगा , यदि उसे मालूम हो कि जज या जूरी के सदस्यों द्वारा उसको सज़ा दी जाने की काफी संभावना है | कुछ अपराध को छोड़ कर जो भावुकता के वजह से होते हैं, योजना से किये गए अपराध हमेशा कोर्ट और पुलिसवालों की मुजरिम के साथ मिली-भगत के कारण होते हैं |
उदाहरण., दावूद के सुप्रीम-कोर्ट के जज ,नेता, पुलिसवालों आदि के साथ मिली-भगत थी | इतनी ज्यादा मिली-भगत थी, के वो मोदी और वंजारा , जिन्होंने उसके एजेंट सोहराबुद्दीन को मारा था ,को परेशान करने के लिए भी सुप्रीम-कोर्ट के जजों को रिश्वत दे सका | ये ऐसी मिली-भगत ही हैं जिसने दावूद और उसके आदमियों को निडर मुजरिम बनाया था |उनको मालूम था कि पोलिस , जज आदि उनको छोड़ देंगे चाहे कुछ भी वो करें |

प्रश्नकर्ता- भारत में पुलिसवाले की भी बहुत कम वेतन है, जिससे उनका रिश्वतें लेने के लिए झुकाव होता है |
केवल कांस्टेबल का वेतन कम है | पोलिस-इन्स्पेक्टर और उससे ऊपर का बहुत अच्छा वेतन है, फिर भी वे सभी भ्रष्ट हैं |

(18) क्या झूठ पकड़ने की जाँच (लाई-डिटेक्टर टेस्ट) और नारको जांच , जांच करने वाले अधिकारी के ऊपर बिना राईट टू रिकाल के

प्रक्रियाओं के , भ्रष्टाचार को कम करेगा ?

झूठ पकड़ने की जांच (लाई-डिटेक्टर टेस्ट) और नारको जांच , जांच करने वाले अधिकारों पर बिना राईट टू रिकाल के तरीकों के, भ्रष्टाचार को कम नहीं करेगा क्योंकि जाच करने वाला अधिकारी बिक सकता है और आसान सवाल पूछ सकता है या बेहोश करने वाली दवाई की कम मात्र दे सकता है ताकि व्यक्ति जागा हुआ हो और आसानी से झूठ बोल सके |

(5) पोलिस ,सेना और देश की सुरक्षा और हथियार रखने और बनने के बारे में अक्सर पूछे गए प्रश्न

 

(1) सेना के अफसर को कम वेतन क्यों मिलती है ?

मनमोहन सिंह को वित्त-मंत्री बनने की शर्त , अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई.एम.एफ.) ने पी.वी.नरसिम्हा राव और भारत के ऊंचे वर्ग के लोगों के सामने रखी थी, भारत को कर्ज के मुसीबत से निकालने के लिए | दूसरे शब्दों में, भारत के नागरिकों ने या भारत के सांसदों ने मनमोहन सिंह को वित्त-मंत्री नहीं बनाया था , आई.एम.एफ ने बनाया था | क्योंकि मनमोहन सिंह आई.एम.एफ (अमेरिका) का एजेंट था |
भारतीय सेना के लोग का वेतन बहुत कम है, जबकि अमेरिका में सैनिक को बहुत अच्छा वेतन मिलता है | उदाहरण से , अमेरिका में सैनिक पोलिस वालों से कहीं ज्यादा वेतन मिलता है | भारत में भी ,1990 तक सैनिकों को अच्छा वेतन मिलता था |

भारत में अभी, उनको पुलिसवालों और प्रायवेट में उस स्तर के कुशलता वालों के मुकाबले बहुत कम वेतन मिलता है |
संविधान में ऐसी कोई धारा नहीं है, जो कहती है कि सेना के अफसरों के वेतन , पोलिस के उसी तुलना वाले पद के वेतन के सामान होना चाहिए | ये दिशा-निर्देश बहुत पहले , इंदिरा गाँधी द्वारा बनाया गया था, 1970 के शुरुवाती दशक में जब पोलिस में भ्रष्टाचार इतना ज्यादा नहीं था और सेना में भत्तों का मूल्य (केन्द्रीय विद्यालय, सेना के स्कूल, क्लबों, पेंशन,प्लाट आदि.,) बहुत ज्यादा थी जो भत्ते प्रायवेट में और पोलिस वालों को मिलते हैं, उनके मुकाबले | 1991 तक ये साफ़ हो गया कि सैनिक को कम वेतन मिल रहा है , पुलिसवाले और आई.ऐ.एस.(बाबू) के मुकाबले , अगर सारे भत्ते भी जोड़ दिए जायें |
तो 1991 में, ये दिशा-निर्देश को बदलने का समय हो गया था, जो सैनिकों के वेतन को पोलिस-कर्मियों के वेतन से जोड़ता था | सैनिकों के वेतन पुलिसवालों के बुनियादी वेतन और मानी हुई ऊपरी (अनौपचारिक) आमदनी से जोड़ी जानी चाहिए थी | लेकिन मनमोहन सिंह ने जोर दिया कि सैनिकों को पोलिस-वाले के बुनियादी वेतन से ज्यादा वेतन नहीं मिलना चाहिए और सैनिकों के वेतन बढ़ाने के लिए मन कर दिया | और मनमोहन सिंह कोई मूर्ख नहीं था | उसे मालूम था कि आई.ऐ.एस (बाबू) /पोलिस-कर्मियों के बुनियादी वेतन कोई इतने ज्यादा नहीं है ,जितने रिश्वतें वो लेते हैं उसको देखते हुए |
प्रधानमंत्री और वित्त-मंत्री ने बराबर एक गलत नीति पालन की है , सैनिकों को कम वेतन देने की 20 सालों से | 1-2 सालों से नहीं, 20 सालों से | ये एक बहुत लंबा समय है कोई असल में गलती करने के लिए | उनके इस काम से , अभी सैनिक बहुत हताश हैं  | कम वेतन और बहुत सारे अपमान `टीम्स ऑफ इंडिया` जैसे विदेशी कंपनियों के एजेंट द्वारा , ने एक ज्वालामुखी खड़ा कर दिया है, जो कभी भी फट सकता है |

(4) महंगाई के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

 

प्रश्न 1-महंगाई का असली कारण क्या है ?

    सामान्य तौर पर महंगाई तभी बढ़ती है जब रुपये (एम 3) बनाये जाते हैं लोन,आदि के रूप में और भ्रष्ट अमीरों को दिए जाते हैं, जिससे प्रति नागरिक रुपये की मात्रा बढ जाती है और रुपये की कीमत घाट जाती है और दूसरे चीजों की कीमत बढ जाती है जैसे खाद्य पदार्थ/खाना-पीना, तेल आदि | भारतीय रिसर्व बैंक के आंकडो के अनुसार, प्रति नागरिक रुपये की मात्रा (देश में चलन में कुल नोट,सिक्कों और सभी प्रकार के जमा राशि का कुल जोड़ को कुल नागरिकों की संख्या से भाग किया गया ) 1951 में 65 रुपये प्रति नागरिक थी और आज, 2011 में लगभग 50,000 रुपये है प्रति नागरिक | 

———-
सब चीजों का मूल्य सापेक्ष/तुलनात्मक है और मांग और आपूर्ति/सप्लाई के अनुसार निर्धारित/पक्का होता है | मान लो , केवल एक बाजार है और कुछ नहीं ,आसानी से समझने के लिए | बाजार में , एक बेचनेवाला है जो 10 किलो आलू बेच रहा और एक खरीदार जिसके पास सौ रुपये हैं | मान लो अगली स्थिति में, बेचनेवाले के पास 10 किलो आलू के बजाय 20 किलो आलू हो जाते हैं, तो क्या अब आल का दाम घटेगा कि बढेगा ?

आसान सा अनुमान/अंदाजा – आलू का दाम घटेगा क्योंकि आलू की सप्लाई/आपूर्ति बढ गयी है |

एक और स्थिति में , मान लो बेचने वाले के पास 10 किलो आलू हैं लेकिन अब दो खरीदार हैं और दोनों के पास 100-100 रुपये हैं | अब, आलू का दाम घटेगा या बढेगा ?

आसान सा अंदाजा/अनुमान- आलू का दाम बढेगा क्योंकि रुपयों की सप्लाई बढ गयी है और इसीलिए रुपये की कीमत घटेगी और दूसरे सामान का दाम बढेगा जैसे खाना-पीना, पेट्रोल, गैस, आदि |

असलियत में भी ऐसे ही होता है |

अब हम कुछ प्रश्न लेते हैं –

प्रश्न 2– ये रुपये कौन बनाता है और ये रूपये कहाँ से आते हैं(रुपये=एमदेश में सभी नोट,सिक्के और सभी प्रकार के जमा राशि का जोड़ है ) ?

 

रिसर्व बैंक के पास लाइसेंस है रुपयों को बनाने का और अनुसूचित बैंक(बैंक जिनको रिसर्व बैंक ने लाइसेंस दिया है रुपयों को बनाने का जमा राशि के रूप में ) के पास भी | कोई स्वर्णमान (गोल्ड स्टैण्डर्ड) अभी नहीं है (कि जितना सोना है , उतना ही पैसा बना सकते हैं) , क्योंकि वो कई दशक पहले पूरी दुनिया में रद्द हो गया है | रिसर्व बैंक गवर्नर/राज्यपाल रुपयों को सरकार के कहने पर बनाता है |

केवल रिसर्व-बैंक ही नोट छाप सकती और सिक्के बना सकती है लेकिन अनुसूचित बैंक जैसे स्टेट बैंक, आई.सी.आई.सी.आई., आदि, भी रुपये (एम 3) बना सकते हैं जमा राशि के रूप में | ये रुपयों की सप्लाई/आपूर्ति में बढने से रुपयों का मूल्य/दम कम हो जाता है और ये दूसरे सामान का दाम बड़ा देता है जैसे  खाना-पीना , तेल के दाम,आदि  और सामान्य महंगाई का मुख्य कारण है |

प्रश्न 3– रिसर्व-बैंक और अनुसूचित बैंक रुपये क्यों बनाते हैं ?

 

वे ऐसा अमीर ,भ्रष्ट लोगों के लिए करते हैं | मुझे एक उदाहरण देने दीजिए | मान लीजिए एक अमीर कंपनी है, जिसके रिसर्व बैंक-गवर्नर(राज्यपाल), वित्त मंत्री के साथ सांठ-गाँठ है | वे एक सरकारी बैंक से 1000 करोड़ रुपयों का कर्ज लेते हैं और वापस 200 करोड़ रुपये चूका देते हैं | और क्योंकि उनके सांठ-गाँठ है, वे रिसर्व-गवर्नर, वित्त मंत्री आदि को बोलेंगे कि वे उनको हिस्सा/रिश्वत देंगे और बदले में उनको उनकी कंपनी को दिवालिया/`डूब गयी` घोषित करने दिया जाये |

फिर कंपनी को दिवालिया घोषित कर दिया जाता है | अभी, यदि बैंक ये 800 करोड़ का घाटा लोगों को घोषित कर देता है , तब बैंक भी दिवालिया हो जायेगा(डूब जायेगी) और बैंक के ग्राहक को भी अपनी जमा राशि खोनी पड़ेगी और ग्राहक, जो आम नागरिक-मतदाता हैं, शोर करेंगे और सरकार को जनता का गुस्सा झेलना पड़ेगा | इस स्थिति से बचने के लिए, सरकार रिसर्व बैंक-गवर्नर/अनुसूचित बैंकों को 800 करोड़ रुपये बनाने के लिए कहती है | ये ज्यादा रुपयों की सप्लाई , जब बाजार में आ जाती है, तो रूपए की कीमत घट जाती है और सामान की कीमत बढ जाती है, यानी महंगाई हो जाती है |

प्रश्न 4-प्रति नागरिक रुपये की मात्रा , लगबग 1000 गुना बढ़ी है 1951 से 2011 तक | ये क्या इसीलिए है क्योंकि कुल (सकल) घरेलु उत्पाद (जी.डी.पी; देश के भीतर सभी वस्तुओं और सेवाओं का कुल मूल्य) भी बढ़ी है या क्योंकि रुपये का दाम गिरा है ?

 

सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) 1951 से 2011 तक केवल तीन गुना बढ़ा है, जो रुपये की मात्र का हज़ार गुना बढौतरी के लिए जिम्मेदार नहीं हो सकती |
रूपया डालर और अन्य मुद्राओं के मुकाबले केवल 25-30 गुना ही गिरा है , जो रुपये मात्रा की हज़ार गुना बढौतरी के लिए जिम्मेदार नहीं हो सकता है |
प्रश्न 5-महंगाई व्यापारियों द्वारा सामान की जमाखोरी से या निर्यात/`देश से बाहर भेजना` से होती है क्योंकि इससे सामान की कमी होती है और सट्टा बाजार या कम पैदावार से भी महंगाई हो सकती है |

 

ये सभी स्थानीय कारण हैं और ये सामान्य, व्यापक स्तर से कीमतें नहीं बढाते हैं| सामान की जमाखोरी से सामान की कमी आती है लेकिन कोई भी हमेशा के लिए सामान को जमा नहीं कर सकता और बाजार में सामान को छोड़ने पर , कीमतें कम होंगी और सामान्य कीमतों के बढने में कीमतें केवल एक ही दिशा में, ऊपर की ओर जाती हैं और कीमतें एक बार जब बढ़ जाती हैं तो कभी भी गिरती नहीं हैं |

ऐसे ही कीमतों का उतार-चढ़ाव का रुख/झुकाव देखा जा सकता है, खाने-पीनी की चीजों और दूसरे सामानों के सट्टे में |

और सभी चीजों देश से बाहर नहीं भेजी जाती, इसीलिए सामान का देश से बाहर भेजना कीमतों की ऊपर की ओर का सामान्य झुकाव के लिए जिम्मेदार नहीं हो सकता |

प्रश्न 6– ये कीमतों का बढना=महंगाई सभी नागरिक, गरीब और अमीर,सांठ-गाँठ के साथ और बिना कोई सांठ-गाँठ के , दोनों को एक समान असर करती है ?

 

नहीं | जो लोग गरीब हैं, बिना किसी सांठ-गाँठ/संपर्क के , वे और गरीब हो जाते हैं जब सामान के दाम बढ जाते हैं | और अमीर, विशिष्ट वर्ग के लोग सरकार के साथ मिली-भगत बना लेते हैं और रुपयों को बनवा लेते हैं मुफ्त में !! इस तरह, अमीर, सांठ-गाँठ/संपर्क वाले लोग गरीब, बिना कोई राजनैतिक या उच्च संपर्क के, आम लोगों को लूट रहे हैं !!

प्रश्न 7- पेट्रोल की कीमतें सरकार की साजिश के कारण हुआ है | क्यों पेट्रोल की कीमतें अभी तक नहीं बढ़ी थीं ?

पेट्रोल की कीमतें , दूसरे चीजों की तरह कुल रुपये की मात्रा पर निर्भर करती है और मांग और सपलाई के अनुसार निर्धारित होती हैं | क्योंकि प्रति नागरिक रुपये की मात्र बढ़ गयी है, रुपये की कीमत कम हो गयी और पेट्रोल के दाम बढ़ गए हैं | केवल फर्क ये है कि पेट्रोल का दम कुछ हद तक , कृत्रिम(बनावटी) रूप से नियंत्रित/कंट्रोल/शाशन होते हैं , लेकिन एक सीमा के बाद, सरकार को पेट्रोल के दाम बढ़ाना पड़ता है, जो वैसे भी बढ़ता , यदि पेट्रोल का दाम शाशित/नियंत्रित नहीं होता | इसीलिए , 80% कारण क्यों पेट्रोल के दाम बढ़े हैं, गैर-कानूनी रुपयों का बनाना भ्रष्ट अमीरों के लिए , सरकार , रिसर्व बैंक और सरकारी बैंकों द्वारा |

प्रश्न 8- महंगाई, मतलब सामान्य कीमतों का बढ़ना , पेट्रोल के दाम बढ़ने और ढुलाई / परिवहन के कीमतों के कारण है ?
पेट्रोल का दाम और ढुलाई / परिवहन का दाम , किसी भी चीज के दाम का केवल 2-5%  हिस्सा है | उदाहरण से , चावल का दाम , रु. 20 प्रति किलो था कुछ पांच साल पहले, जिसमें ढुलाई का हिस्सा रु.1 था | यदि पेट्रोल का दाम डेढ़ गुना बढ़ा , फिर यदि चावल की कीमत केवल पेट्रोल की कीमत बढ़ने से  , बढ़ी तो चावल की कीमत ज्यादा से जयादा रु. 21 होती, लेकिन अभी असल में चावल की कीमत रु. 40  प्रति किलो है |

प्रश्न 9– इसका कोई उपाय है ?

 

बिलकुल है|

इसके दो उपाय हैं- पहला कि रिसर्व बैंक के गवर्नर को निकालने/बदलने का अधिकार आम नागरिकों हो होना चाहिए यानी राईट टू रिकाल-रिसर्व बैंक गवर्नर |इसका ड्राफ्ट निचे विवरण में दिए गए लिंक में से डाउनलोड करके देख सकते हैं |

दूसरा उपाय है कि नए रुपये बनने के लिए कम से कम 51 % नागरिक स्वकृति दें | इसके लिए हमें तीन लाइन क़ानून या जनता की आवाज़ को प्रधानमंत्री को हस्ताक्षर करने के लिए कहना होगा | इसका भी लिंक विवरण में देखें |

ये सन्देश कि महंगाई का असल कारण क्या है और इसका समाधान क्या है ,घर-घर तक पहुंचाएं और देश को समृद्ध बनाएँ|

धन्यवाद|
प्रश्न 10-क्या आरोही / प्रगामी (प्रोग्रेसिव) टैक्स (जो टैक्स का प्रतिशत आय या संपत्ति बढ़ने पर में बढ़ जाता है), संवैधानिक (संविधान के अनुसार) है ?

प्रोग्रेस्सिव / आरोही टैक्स समानता को नहीं तोड़ता है | ये टैक्स पोलिस, सेना आदि को लिए है, नागरिकों के धन-संपत्ति के रक्षा के लिए | अभी सुरक्षा का खर्चा , संपत्ति जिसकी सुरक्षा करना है बढ़ जाती है , प्रतिशत रूप में बहुत ज्यादा बढ़ जाती है | जैसे एक करोड़ के सोना की सुरक्षा करने की कीमत मान लें हर साल एक लाख है, तो 2 करोड़ के सोना की सुरक्षा की कीमत 2 लाख से ज्यादा होगी | इसीलिए प्रोग्रेस्सिव / आरोही टैक्स संवैधानिक है |
दो तरह के तुलनात्मक क़ानून,जहाँ सेज़ है और जहाँ सेज़ नहीं है , ऐसा है जैसा “ एक ही देश के अंदर दो देश हों “, वो क्या समानता नहीं तोड़ता है ? इसमें आपकी और सुप्रीम-कोर्ट की संविधान के बारे में क्या समझ है ? अधिकतर सेज़ के मालिकों ने सुप्रीम-कोर्ट के जजों के बेटों को अपने कंपनी में अच्छे पदों पर रखा है और उन्हें करोड़ों रुपये वेतन देते हैं |  लेकिन जैसे हम 105 करोड़ आम-नागरिक संविधान का अर्थ लगाते हैं, सेज़ संविधान की बताई हुई समानता भंग करता है |

प्रश्न 11- यदि बैंक 100 % `केन्द्रीय रिसर्व अनुपात` (सी.आर.आरके खातों को अनुमति / इजाजत दे देते हैं जिसमें कम ब्याज होता है ), `जमाकर्ताओं के लिए बीमा` का प्रबंध बंद करके ,  तो  बैंक की रूचि क्या होगी ऐसे जमा राशि लेने के लिए ये कैसे अलग होगा नकद या सोना किसी लोककर खाते में जमा रखने से ?

`जमाकर्ताओं के लिए बीमा` का प्रबंध से बैंक लापरवाह हो गए हैं और लोन देना शुरू कर दिया है बिना कोई कारण के , और इसने बहुत अस्थिरता पैदा कर दी है | इसीलिए `जमाकर्ताओं के लिए बीमा` का प्रबंध को बंद कर देना चाहिए और जमाकर्ता को 100% `केन्द्रीय रिसर्व अनुपात (सी.आर.आर.) का चुनाव देना चाहिए और उसे कहना चाहिए कि यदि उसे ब्याज चाहिए, तो उसे अपना पैसे के लिए खतरा उठाना पड़ेगा और एक अच्छा बैंक खोजना पड़ेगा | मूल पूंजी और ब्याज का अमीर भ्रष्ट द्वारा , ना लौटाना और खुद खा जाना, कुछ ही महीनों में कम हो जायेगा |
100 % केन्द्रीय रिसर्व अनुपात खातों में ब्याज कम होगा | ये सोना जमा कर के, किसी लोककर खाते में रखने से अच्छा है, क्योंकि –
1. जमा-राशि को एक खाते से दूसरे खाते ले जाना समभाव है (राशि स्तानान्तरण) |
2. उस राशि के चोरी के लिए बीमा होगा |

इस तरह के खाते में कम ब्याज होगा, लेकिन बहुत सारे लोग, फिर भी  इसका प्रयोग करेंगे | 100 % `केन्द्रीय रिसर्व अनुपात` के खातों की सरकार द्वारा बीमा होगा | ज्यादा ब्याज देने वाले खाते केवल प्रायवेट / निजी बैंकों में ही खोले जा सकेंगे और इन खातों का सरकार द्वारा बीमा नहीं किया जायेगा |  और हर पासबुक, चेक आदि पर पर साफ़ चेतावनी दी जायेगी कि “ भारत सरकार और नागरिकों को कुछ भी नहीं देना होगा यदि ,ये बैंक दिवालिया हो जाता है और ये बैंक कभी भी दिवालिया हो सकता है |” ये ऐसा ही है , जैसा कि सिगरेट के डब्बे पर लिखा होता है “ सिगरेट पीना आप को मार सकता है |” और येही सच्चाई है कि बैंक दिवालिया हो जाते हैं और इसीलिए ये सच्चाई हर पासबुक पर लिखी होनी चाहिए |
ये जमाकर्ताओं को बचा सकता है या नहीं भी बचा सकता है | वैसे भी, लोग चेतावनी के बावजूद भी , सिगरेट पीते है और कैंसर से मरते हैं | लेकिन ये हम आम-नागरों का आर्थिक बोझ जरूर कम करेगा — हमें जमाकर्ताओं को बचाना नहीं पड़ेगा , जब कोई बैंक दिवालिया होगा | और ये जिम्मेदारी , जमाकर्ता पर डालता है—उसे बोला गया था कि बैंक दिवालिया हो सकता है |

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प्रश्न 12- हर बार जब कोई भारत में डॉलर या कोई वेदिशी मुद्रा बैंक के खाते में जमा करता है , तो रिसर्व बैंक नए रुपये बानती है | इसको रोकने का क्या उपाय है ?  

 

हमें ये सिस्टम इस तरह बदलने की जरूरत है : जब एक व्यक्ति एक हज़ार डॉलर जमा करता है, उसके खाते में एक हज़ार डॉलर जमा दिखेगा ,जब तक वो उसे साफ़ रूप से उसे रुपयों में नहीं बदलता है | और उसको डॉलर को रुपयों को बदलने के लिए , किसी प्रायवेट/निजी कंपनी को डॉलर देने होंगे चेक द्वारा और कंपनी उसे रुपये देगी | इस तरह कोई भी रुपये नहीं बनाये जाएँगे , जब डॉलर देश में आयेंगे | भारत सरकार केवल सेना और सरकार की जरूरतों के लिए डॉलर खरीदेगी | दूसरे देशों से पेट्रोल और दूसरी चीजें मंगाने के लिए जो डॉलर चाहिए, वो निजी साधनों से लाना होगा | और डॉलर में आमदनी के लिए टैक्स में छूट नहीं होगी और डॉलरों में खर्चे (मतलब बाहर से सामन मंगाने के लिए) , आमदनी से टैक्स के गणित के लिए घटाई नहीं जायेगी | और इसके अलावा, हमें 100-300 % सीमा-शुल्क लगाना चाहिए, तो केवल डॉलरों में देना होगा | और हमें ये सब क़ानून आम-नागरिकों की `हाँ` द्वारा ही लागू करने चाहिए | हमें ये क़ानून सांसदों को रिश्वत दे कर और संसद में पास करवाने द्वारा नहीं लाना चाहिए |
प्रश्न 13- मुद्रा के लिए सोना होने के क्या फायदे और नुकसान हैं ?


    कब कोई ईकाई/वस्तु , रूपया हो या डॉलर या सोना , भारत में “मुद्रा” बन सकती है ?
जब सभी भारतीय नागरिकों को उसकी जरूरत हो और लगबग हर कोई को लगे कि वो वस्तु उसे भविष्य में सामान खारीदने की क्षमता दे | और यदि एक वस्तू सभी लोगों की जरूरतें पूरी नहीं कर सकती, तब अनेक मुद्राएं होंगी ,उदाहरण से ,आज भारत में , रूपया प्रधान मुद्रा है, लेकिन वे सोना, चांदी, डॉलर आदि भी प्रयोग करते हैं , संपत्ति जमा करने के लिए और सीमित रूप में लेन-देन करने के लिए | अभी हर नागरिक को सेना,पोलिस और कोर्ट की जरूरत है – सीधे या बिना सीधे (अप्रत्यक्ष) रूप से , और इन सेवाओं के लिए पैसा टैक्स से आता है – उत्पादन टैक्स, आय-टैक्स आदि | अभी यदि, भारतीय सरकार यदि टैक्स डॉलरों में मांगने लगे, तो डॉलर का महत्त्व बढ़ जायेगा और यदि सरकार टैक्स रुपयों में देने के लिए कहती है, तो रुपये का महत्त्व बढ़ जायेगा | लेकिन यदि सेना, पोलिस और कोर्ट खुद का महत्त्व कम हो जाता है और वे कमजोर हो जाते हैं, तब रुपयों की मांग कम हो जायेगी और सोना/डॉलरों की मांग बढ़ जायेगी |

अभी, केवल एक ही फायदा है सोना का रुपये का मुद्रा के रूप में, कि अमीर, ऊंचे लोग उसकी मात्र नहीं बढ़ा सकते ,मनमाने तरीके से | लेकिन ये ही काम तो एक क़ानून लाने से भी आ जायेगा कि रिसर्व बैंक का प्रधान रुपयों की मात्रा नहीं बढ़ा सकता , बिना आम-नागरिकों के बहुमत से सीधे अनुमति लिए | इसलिए “नागरिक का रुपया प्रणाली(सिस्टम)” जो मैंने प्रस्तावित किया है, उसका सोना की रूप में मुद्रा होने का ये फायदा है, कि ऊंचे लोग मनमाने तरीके से बढ़ा नहीं सकते | और , `नागरिकों के रुपया प्रणाली(सिस्टम)` में नए बनाये गए रुपये केवल सेना ,पोलिस और कोर्ट के लिए खर्च किये जाएँगे | इसीलिए `वर्त्तमान रुपया प्रणाली(सिस्टम)` के कमियाँ ,जिसमें ऊंचे लोग , नए बनाये हुए रुपयों को अपनी जेब में डाल सकते हैं रिसर्व बैंक और अन्य अनुसूचित बैंकों द्वारा, समाप्त हॉट जाएँगी |
लेकिन सोना का एक नुकसान है कि नागरिक मुद्रा की मात्रा बढ़ा नहीं सकते , यदि बढ़ाना भी चाहें तो | जबकि `नागरिकों के रूपया प्रणाली(सिस्टम) में , नागरिक रुपयों की मात्रा बढ़ा सकते हैं | और सोना की एक और बड़ी कमी है , कि कोई भी दुश्मन सोना चुरा कर ले जा सकता है, जबकि रुपये में ये कमी नहीं है | शत्रु देश को रुपये लेकर जाने से कोई फायदा नहीं है, क्योंकि उसे रुपये भारत लाना होगा, कोई भी दामी चीज पाने के लिए | और एक बार रूपया 100 % इलेक्ट्रोनिक हो जाता है , और सारे लेन-देन नागरिकों की आई.डी. से जोड़े जाते हैं , तो रुपयों की चोरी और काले धन के लेन-देन भी बहुत कम हो जाती है , जो टैक्स की वसूली बढ़ाएगा और सेना, पोलिस और कोर्ट को सुधारेगा | ये सोने के साथ नहीं किया जा सकता है | यदि सोना मुद्रा बनाई जाती है , तो बिना दस्तावेजों के अर्थव्यवस्था बढ़ेगी |
और एक सोना , मुद्रा के रूप में, की कमी है कि ये मुश्किल होग जायेगा भारत सरकार के लिए अमेरिका , चीन आदि के साथ युद्ध लड़ने के लिए | यदि अमेरिका, चीन आदि के साथ युद्ध होता है, तो भारत सरकार को बहुत मुद्रा की जरूरत होगी सामान खरीदने के लिए, सैनिकों को वेतन देने के लिए, नागरिकों को सेवाएं के लिए भुगतान करने के लिए , आदि | अब यदि सोना एक अकेली मुद्रा है, तो भारत सरकार को सोना प्राप्त करना होगा | सोने को छुपाया जा सकता है और भारत से बाहर भी भेजा जा सकता है | तो ऊंचे लोग सोना को छुपा सकते हैं या अपना सारा सोना स्विस बैंकों को भेज सकते हैं, और फिर भारत सरकार को कुछ भी सोना प्राप्त नहीं होगा | फिर भारत सरकार के पास कोई भी मुद्रा नहीं होगी और अमेरिका, चीन आदि के खिलाफ युद्ध हार जायेगा | इसीलिए सोना मुद्रा के रूप में बहुत बुरा है , यदि अमेरिका, चीन ,आदि के विरुद्ध युद्ध होता है  तो | अब मैं ये मान रहा हूँ कि भारत को कई युद्ध लड़ने होंगे अमेरिका , चीन , सौदी-अरब , पाकिस्तान , बंगलादेश आदि के साथ और इसीलिए मैं सोने का विरोध करता हूँ |

प्रश्न 14- कौन सा ज्यादा बुरा है, आर्थिक सहायता (सब्सिडी) या टैक्स की छूट देश के अर्थ(आर्थिक)-व्यवस्था के लिए ?  
दोनों, आर्थिक सहायता और टैक्स में छूट देश के अर्थ-व्यवस्था के लिए बुरी हैं .लेकिन आर्थिक सहायता ज्यादा बुरी है |
जब भारत सरकार कहती है : “ उद्योग `क` से पैसा कमाओ , और सामान्य 35% टैक्स के बदले , कम टैक्स दो “, तो उद्योग-मालिक
क) उद्योग `क` में ज्यादा पैसा लगाएंगे
या
ख) गलत दिखा सकता है कि आमदनी `क` से आ रही है, ना कि दूसरे साधनों से | ये एक तरह का आय का गलत वर्गीकरण (गलत समूह में डालना) है |
इसमें , व्यक्ति को कम से कम कुछ काम करना होगा उद्योग `क` में कुछ आमदनी पाने के लिए या कोई और उद्योग से से जहाँ से वो पैसा उद्योग `क` में डालेगा |

लेकिन जब भारत सरकार कहती है “ उद्योग `क` शुर करो और भारत सर्कार `म` रुपये आर्थिक सहायता देगी, तब नेता-बाबू-जज-ऊंचे लोग आदि केवल कागज़ पर उद्योग `क` शुरू करेंगे और सभी आर्थिक सहायता खा जाएँगे | इसीलिए भारत सरकार को पैसे भी खोना पड़ता है और कोई उद्योग/धंधा का कोई काम भी नहीं होता है |
दूसरे शब्दों में, टैक्स की छूट में, भारत सरकार को पैसे तो खोने पड़ते हैं, लेकिन कोई उद्योग का कुछ काम होता है ,जिससे समाज को फायदा होता है | जबकि आर्थिक सहायता में, नेता-बाबू-जज-बुद्धिजीवी-ऊंचे लोग सारी आर्थिक सहायता खा जाते हैं और कोई (समाज के लिए) कोई काम भी नहीं होता है |
अभी मैं दोनों के खिलाफ हूँ लेकिन आर्थिक सहायता के खिलाफ ज्यादा हूँ , ऊपर लिखे कारण से |

लेकिन ज्यादातर बुद्धिजीवी, जो अपने आप को आर्थिक-सहायता के विरोधी बताते हैं, असल में उस आर्थिक सहायता के समर्थक हैं , जो अमीरों को मिलती है , उदाहरण., अधिकतर बुद्धिजीवी रसोई-गैस पर आर्थिक सहायता के विरोधी हैं लेकिन जमीन/नकद आर्थिक सहायता जो जे.एन.यू., आई.एम.ऐ. आदि उच्च सरकारी विश्विद्यालयों को मिलती है , क्योंकि ये आर्थिक सहायता ज्यादातर ऊंचे लोगों के बच्चों को जाती है | चिंतित नागरिकों को पता होना चाहिए , इन बुद्धिजीवियों के द्वारा कुछ , चुनिन्दा (चुने गए) आर्थिक सहायता का अनुचित, विरोध के बारे में |

 

(3) `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी (आमदनी)` (एम आर सी एम) के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

(3) `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी (आमदनी)` (एम आर सी एम) के बारे में अक्सर पूछे जाने

वाले प्रश्न

 

(1) कैसे `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी(आमदनी) (एम.आर.सी.एम) से गरीबी घट जाती है |

आई.आई.एम.ऐ. , जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों की पब्लिक जमीन और अन्य पब्लिक जमीन (जिसे भारत सरकार की भूमि भी बोला जाता है ), से किराया मिलने से गरीबी कम होगी और आम-नागरिकों कक्षा दसवी तक शिक्षा मिलेगी | सबसे बड़ा कारण क्यों आम-नागरिक पढ़ाई छोड़ देते हैं , गरीबी है और गरीबी में कमी से आम-नागरिकों का पढ़ाई छोड़ना कम हो जाएगा

कितने प्रतिशत आई.आई.एम के विद्यार्थी झुग्गी-झोपड़ियों से आते हैं? 1% से कम | और कितने आई.आई.एम.ऐ. में पढ़ने वालों के घरों में पानी नहीं आता है ? शायद 5% से कम | इसीलिए ऐसा कहना कि “आई.आई.एम.ऐ. आम-नागरिकों के लिए शिक्षा दे रहा है ”, ऐसा कहना सही नहीं है |

(2) `आई.आई.इम.ऐके प्लाट पर किराये के बारे में

 

क्या आप सुझाव दे रहे हैं कि हम भूख से मरते , आम-नागरिकों को `आई.आई.एम.ऐ`, `जेएनयू` आदि की पब्लिक जमीन को मुफ्त में जमीन उपयोग करने देना चाहिए? क्यों ये दरिया-दिल्ली और खैरात ,एक ऐसे कॉलेज के लिए जो  वैसे तो पूंजीवाद और समाजवाद का खुला समर्थन करता है ? यदि `आई.ई.एम.ऐ` इतना किराया नहीं दे सकती, तो उसे ऐसी जगह चले जाना चाहिए , जहाँ जमीन सस्ती है या कम जमीन से काम चलाना चाहिए | आई.आई.एम.ऐ. से हर साल 200 एम.बी.ऐ. की पढ़ाई पूरी कर लेते हैं | इस काम के लिए 10 एकड़ की जरुरत है, उनको 100 एकड़ की जरुरत हैं है | और यदि उन्हें 100 एकड़ चाहिए , तो उनको किराया देना ही होगा — मैं मुफ्त की रोटी में विश्वास नहीं करता हूँ | और आई.आई.एम.ऐ से पढ़ाई पूरी कर बाहर आये छात्र , हर साल रु. 15 लाख से 50 लाख बनाते हैं , और मेरी शुभ-कामनाएं की वे और ज्यादा कमाएँ | लेकिन वे कोई भूख से मरते लोग नहीं हैं , जिनको आर्थिक सहायता चाहिए | मैं गरीब किए खाने, दवाई, शिक्षा के लिए आर्थिक सहह्यता का समर्थन करता हूँ — मैं अमीरों के लिए आर्थिक सहायता को पसंद नहीं करता हूँ और विरोध करता हूँ |

क्या आप जानते हैं कि कई देशों ने , जिनके पास प्रति नागरिक ज्यादा लोहा है, ने लोहे की खुदाई बंद कर दिया है और उसके बदले भारत और ब्राजील से लोहा मंगाते हैं ?

हम को ,कच्चा लोहे (लोहे का अयस्क) को सारा देश से बाहर भेजना बंद कर देना चाहिए | और कच्चे लोहे (लोहे के अयस्क) से सारी आमदनी , सीधे आम-नागरिकों और सेना को जानी चाहिए |

कृपया भा.ज.पा, सी.पी.एम., और कांग्रेस के बेईमान लोगों को समर्थन न करें जो ,जो खानों में से सारी आमदनी को खुद खा जाते हैं , आम-नागरिकों और सेना को सीधे देने के बजाय |

(3) बेल्लारी से कच्चा लोहा चीन को भेजा गया था , 60 डॉलर की कीमत के आपस , 2002 में भी | ये एक रिपोर्टर का कहना कि वो 100 रुपये प्रति टन के हिसाब से बिका था, इससे , उसके अज्ञानता या जानकारी की कमी का पता चलता है |

 

100 रुपये परे टन खुदाई की लागत है | इस कीमत पर निचले स्तर का ठेकेदार , बड़े ठेकेदार को बेचता है | आपको पता है की खानों का धंधा कैसे चलता है — जो लोग नेता, बाबुओं, जजों को रिश्वत देते है और उनके साथ मिली-भगत बना लेते हैं, उनको ही सरकार से खानों में खुदाई का ठेका मिलता है | बहुत सारे ऐसे लोग खानों की साईट (स्थान) जाते भी नहीं हैं और एकमुश्त (मुग्गम) आगे का ठेका , किसी छोटे ठेकेदार को दे देते हैं, जो फिर खानों पर काम करते हैं | इन छोटे ठेकेदारों को 100 रुपये प्रति टन मिलते हैं |
खदान / खान में से कच्चा लोहा निकालने का खर्चा आज के समय, `सेल` और `टाटा स्टील` के जो खुद के उपयोग के लिए है , 250 से 350  रुपये प्रति टन के बीच में है , जबकि कच्चे लोहे का बाजार का दाम 2000 रुपये प्रति टन है | ये लिंक देखें-http://www.thehindubusinessline.in/2005/12/26/stories/2005122602490100.htm

तो इस तरह खनन(खानों में से खुदाई) के धंधे में एक बहुत, बहुत बड़ा मुनाफा होता है | और ये मुनाफा भ्रष्ट ऊंचे लोगों के जेबों में जाता है (जो गुंडों को भाड़े पर रखते हैं ) और नेता, बाबू , जज, आदि जिनके अक्सर पार्टनर / हिस्सेदार  होते हैं | ये सब गडबडी इसीलिए है क्योंकि `पढ़े-लिखे` लोग खानों से आई आमदनी सीधे आम नागरिकों को देने का विरोध करते हैं |
मैं केवल बुनयादी लागत की बात कर रहा हूँ , इसमें टैक्स, सरकार को दी जाने वाली रोयल्टी(आमदनी), नेता, जज आदि को दी जाने वाली रिश्वत  और गुंडों को हफता की गिनती नहीं कर रहा हूँ | 250 रूपए प्रति टन ,`सेल` कंपनी देती है , छोटे ठेकेदारों को , और `सेल` की आदत है कि चालान को बढ़-चढ़ कर लगाने की | इसीलिए यदि `सेल` कंपनी 250 रुपये देती है , तो असली जमीनी लागत 100 रुपयों से ज्यादा नहीं होगी | ये तो एक सामान्य ज्ञान है और इसके लिए हमें गूगल(इंटनेट) पर ढूँढने की जरूरत नहीं है |
——
आई.आई.टी. और दूसरे भारत सरकार के इंजीनियरिंग के कालेजों को सेना का हिस्सा बनाना चाहिए |
जो इन कालेजों में पढेंगे, उनको सेना में अपनी सेवा 10-11 सालों के लिए देने होगी, उनकी पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद | जो आई.आई.टी के विभाग सेना में लिए उपयोगी नहीं हैं, उनको आई.आई.टी. कालेजों में से निकाल देना चाहिए |
सभी कालेजों को दी जाने वाली आर्थिक सहायता बंद कर देनी चाहिए , सिवाय वो कालेज जो सेना और चिकित्सा से सम्बंधित हैं | उदाहरण., आई.आई.एम.ऐ को दी जाने वाली आर्थिक सहायता बंद कर देनी चाहिए और उनको दिए गए प्लाट पर किराया लगाना चाहिए जो सीधे जनता को जायेगा |

(4) खानों में से खनिज को निकालने की लागत और फायदे और सरकार को दी जाने वाली रोयल्टी (आमदनी) कितनी हैं ?

 

प्राकृतिक गैस लीजिए |
अंतर-राष्ट्रिय दाम 280 डॉलर प्रति हज़ार घन मीटर है , जून 2008 के समय में | खदान में से निकालने का दाम 20 डॉलर प्रति हज़ार घन मीटर है |(`एम.आर.सी.एम` के लिए खनिज के दाम शुरू में `राष्ट्रिय भूमि किराया अधिकारी` तय करेगा और फिर बाद में बोली (बाजार) द्वारा तय होंगे )
अगर कहें कि भारतीय गैस निकालने वाली कम्पनियाँ यदि प्राकृतिक गैस को अंतर-राष्ट्रिय दामों पर बेचती हैं, और मुनाफा हम भारतीय नागरिकों को मिलता है |
उत्पादन = 2780 करोड़ घन मीटर
मुनाफा = 260 डॉलर प्रति हज़ार घन मीटर, जून 2008 के कीमतें लें तो = 0.26 डॉलर प्रति घन मीटर
कुल मुनाफा ,डॉलर में = 2780 करोड़ x 0.26 डॉलर = 723 करोड़ डॉलर
एक डॉलर में रुपये = 45
मुनाफा रुपयों में = 32,535 करोड़ रुपये
जन-संख्या , करोड़ों में = 110 करोड़
राशि प्रति नागरिक प्रति साल = करीबन 300 रूपए प्रति आम-नागरिक प्रति साल

दूसरे शब्दों में, हर भारतीय को 300 रूपए प्रति साल मिलेंगे, यदि प्राकृतिक गैस की रोयल्टी (आमदनी) हम भारतीय आम-नागरिकों को जाए तो |

दूसरे शब्दों में, खदानों के ठेकेदार बहुत बड़ा मुनाफा बनाते हैं, और जरूरी नहीं है कि सारा अपने पास रख पाते हों | उनको इसका हिस्सा मंत्रियों, जजों , बाबूओं, पोलिस-कर्मियों आदि को देना पड़ सकता है | लेकिन वो कैसे सुनिश्चित करते हैं कि उनकी कम बोलियां जीत जाती हैं ? कोई जादू नहीं है —- जरा आप पोरबंदर, गुजरात के जिला कलेक्टर के दफ्तर जाएँ , खनन(खानों की खुदाई) के लिसेंस के लिए, आपको स्थानीय गुंडे मिनटों में गायब कर देंगे !! दूसरे शब्दों में, गुंडों का प्रयोग कर के , बोली को दर्ज करने वाले लोग कम से कम रखे जाते हैं , ताकि कम से कम बोली आयें ,और खनन करने वाले ठेकेदार बहुत बड़ा मुनाफा कमाएँ |
लेकिन स्थानीय खनन करने वाला ठेकेदार, जो स्थानीय गुंडे रखता है, एक छोटा प्यादा है, पूरे खेल में | गुंडों को पोलिस-कर्मियों और स्थानीय जजों से सुरक्षा की जरूरत होती है , और पोलिस-कर्मी इन गुंडों को तभी सुरक्षा दे सकते हैं, जब गृह-मंत्री और मुख्य-मंत्री इन को स्वीकृति दें और स्थानीय जज इन गुंडों को तभी सुरक्षा देंगे , यदि हाई-कोर्ट स्वीकृति दें | यदि खदानों की खुदाई का मुनाफा बहुत बड़ा है, जैसे बेलारी की लोहे के खदान, तब पैसे की कड़ी , सुप्रीम-कोर्ट के जजों और प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मंत्री और सी.बी.आई. तक जाती है |(क्योंकि सुप्रीम-कोर्ट के जजों ,प्रधान-मंत्री , केन्द्रीय मंत्री आदि को ज्यादा पैसे में ही रूचि होती है )

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अंतिम परिणाम बहुत खराब होता है— क्योंकि खनिज/खदान रोयल्टी (आमदनी) बहुत कम हैं , सरकार की आमदनी भी बहुत ही कम है |और इसीलिए भारत सरकार को `वैट` जैसे टैक्स लगाने पड़ते हैं , जो छोटे व्यापारियों को बरबाद कर देते हैं और आम-नागरिकों को बरबाद करते हैं , क्योंकि `वैट` प्रतिगामी(रिग्रेस्सिव) है | और आमदनी में कमी से कोर्ट बनाने, पोलिस और सेना के लिए पैसे में भी कमी हो जाती है |
(5) खदान माफिया / गैंग क्या है और इसमें कौन-कौन होते हैं ?

http://www.cpiml.org/liberation/year_2005/february/mahendra_Singh_Murder.htm

ऊपर दिया लेख का लिंक बताता है कि खनन की गैंग कितनी गहरी है |

भारत में बहुत खदान की गैंग है –
1. बेलारी की लोहे की खदानों की गैंग
2. झारखण्ड की कोयला गैंग
3. चूना-पत्थर गैंग, कर्णाटक ,तमिलनाडु में
4. ग्रेनाईट-पत्थर गैंग, कर्णाटक ,तमिलनाडु में

5. कोटा-पत्थर , संगमरमर(मार्बल) का माफिया , राजस्थान में (सोहराबुद्दीन इसी माफिया के वजह से मारा
गया था)
6. चन्दन का माफिया , तमिल-नाडू में
7. हाथी-दांत का माफिया
8. अलुमुनियम माफिया , उड़ीसा में

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ऐसे करीब 50-70 माफिया(गैंग) हैं, भारत में | खदानों की माफिया , जमीन की माफिया से बड़ी है आमदनी के अनुसार | ज्यादातर माफिया राज्य या जिले स्तर पर है , लेकिन सभी सुरक्षा के लिए सीधे (प्रत्यक्ष) या किसी के द्वारा (अप्रत्यक्ष) पैसा केन्द्रीय मंत्रियों, प्रधान-मंत्री, सुप्रीम-कोर्ट के जज और बड़ी पार्टियों के अध्यक्ष को पैसे देते हैं | कुछ विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, ज्यादातर मुख्या-मंत्री, केंत्रिय मंत्री, पार्टियों के अध्यक्ष, सांसद , आई.ऐ.एस. (बाबू) और पोलिस-कर्मी इन खदान-माफिया का हिस्सा हैं |
खदान माफिया भारत में एक बड़ा धंधा है | कोई आश्चर्य नहीं कि कितने युवक आई.ऐ.एस(बाबू), आई.पी.एस (पोलिस-कर्मी) बनना चाहते हैं | और कोई आश्चर्य नहीं कि युवक भा.जा.पा., कांग्रेस, सी.पी.एम. आदि पार्टियों से जुड़ते हैं, विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री बनने के लिए | कोई भी राजनैतिक पार्टी इन माफिया को खतम नहीं करना चाहती | भा.जा.पा., कांग्रेस, सी.पी.एम., आदि का घोषणा-पत्र इन खदान माफिया के समस्या की बात तक नहीं करता , ना ही कोई समाधान का प्रस्ताव करता है |

मुख्य खनिज जैसे कच्चा तेल, कोयला, कच्चा लोहा आदि सभी केन्द्र के अधीन हैं | और क्योंकि ये केंद्र और राज्य के सांझे / समवर्ती लिस्ट में है, केंद्र का आदेश , राज्य के आदेश से ज्यादा भारी / हावी होता है | और, केंद्र का आई.ऐ. एस (बाबू), आई.पी.एस(पोलिस-कर्मियों) पर बहुत प्रभाव होता है, जब आई.ऐ.एस., आई.पी.एस. राज्य सरकार के नीचे भी आते हैं, तो भी | मैं ये नकार नहीं रहा कि राज्य सरकार के पास अधिकार हैं —उनके पास हैं | लेकिन केंद्र और राज्य के अधिकार 65:35 के अनुपात में हैं या इससे भी ज्यादा , केन्द्र के पक्ष में | ये जुखी कारण था कि क्यों शिबू सोरेन को ज्यादा रूचि थी, केन्द्र में कोयला मंत्री बनने में , ना कि झारखण्ड का मुख्यमंत्री बनने में | क्योंकि कोयला मंत्री के पास कोयला के खदानों के ज्यादा अधिकार हैं, मुख्यमंत्री से | लेकिन कोयला माफिया , जिसमें उच्च-जाती के ऊंचे लोगों का ज्यादा प्रभाव है , ने उसको रोक दिया क्योंकि शिभु सोरेन , आदिवासियों के ऊंचे लोगों (आम-नागरिक नहीं) को समर्थन करता है  |

हम खदानों से निकले कच्चे माल(अयस्क) की कुल बिक्री के दाम को 4 भागों में बांटते हैं –
1. लागत- मजदूरी , बिजली , ढुलाई आदि
2. रोयल्टी(आमदनी), टैक्स (मतलब वो पैसा जो भारत सरकार को जाता है )
3. खदानों के ठेकेदारों का मुनाफा
4. मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, प्रधानमंत्री, विधायक, सांसद, आई.ऐ.एस(बाबू), पोलिस-कर्मी, हाई-कोर्ट जज, सुप्रीम-कोर्ट के  जज को मिलता है
आज (3) और (4) बहुत बहुत ज्यादा है क्योंकि (2) कम है | यदि (2) को बढ़ाया जाये, तब (3) और (4) कम हो जायेगा | लेकिन बुद्धिजीवी, जो ऊंचे/विशिष्ट लोगों के एजेंट हैं, सभी तरीकों से (2) बढ़े ,ऐसा विरोध करते हैं |
यदि रोयल्टी(आमदनी) बढ़ती है, तो रिश्वतें कम होंगी | उदाहरण., यदि कुल लागत 1000 रूपए प्रति तन् है और बिक्री का दाम 5000 रुपये प्रति टन है, तो ज्यादा से ज्याद संभव रोयल्टी (आमदनी) 4000 रुपये प्रति टन है | अब यदि कोई रोयल्टी(आमदनी) की बोली 4000 रुपये लगाता है, तो बाबू, पोलिस-कर्मी, जज और मंत्रियों को जो रिश्वत मिलेगी , वो शून्य ओगी | और यदि कोई खदान का ठेकेदार ,बोली 100 रूपए लगता है, और जीत जाता है, तो उसको 3900 रूपए प्रति टन का मुनाफा होगा और इसीलिए वो बड़ी-बड़ी रिश्वतें दे सकता है | लेकिन 100 रुपये की बोली तभी जीत सकती है,  यदि जो ज्यादा बोलियां लगाने वाले हैं, उनको बुरी तरह से मारा-पीटा जाये और उनको बोली लगाने से रोका जाये | इसीलिए , भारत के सभी मंत्री और सांसद ( भा.जा.पा., सी.पी.एम के भी) खदानों के जिलों में गुंडों को बढ़ावा देते हैं | और ये गुंडे विकास को भी रोकते हैं और ये ही मुख्य कारण है कि खादानों वाले जिलों में कम विकास होता है |

(6) `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी(आमदनी) (एम.आर.सी.एम)` ,ये क़ानून-ड्राफ्ट कहता है कि ये गरीबों के लिए आमदनी पैदा करेगा और उनके खातों में हर महीने, सीधे पैसे देगा |
पहले तो, गरीबों को काम चाहिए, पैसा नहीं | आप उन्हें पैसा दे सकते हैं, उनको खिलाने के लिए कुछ एक-आध दिन के लिए, उसके बाद क्या ? जब खनिज समाप्त हो जाएँगे , उसके बाद क्या ?

गरीबों को दोनों पैसे और काम चाहिए | `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी(आमदनी) (एम.आर.सी.एम) रोजगार कम नहीं करता है | असल में, एम.आर.सी.एम ( और प्रस्तावित संपत्ति-टैक्स ) जमीन की जमाखोरी कम करके जमीन का दम कम करेगा और इस तरह रोजगार बढायेगा | `एम.आर.सी.एम` गरीबों को पैसे देता है , बिना नागरिकों से टैक्स लिए , और इस तरह सामान की मांग को बढायेगा और रोजगार बढायेगा | `एम.आर.सी.एम.` की आमदनी में सभी बैंडविड्थ से रोयल्टी(आमदनी) भी होगी , जो हमेशा के लिए होगी |

और खनिज तो 200 साल से ज्यादा चलने की आशा है | और, `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी(आमदनी) (एम.आर.सी.एम)`में पब्लिक(सार्वजनिक) के प्लाट पर किराये भी शामिल होंगे और वे हमेशा के लिए होंगे | इसीलिए `एम.आर.सी.एम` गरीबों को पैसा आने वाले दशकों तक देगा | `एम.आर.सी.एम` गरीबी को महीनो में कम कर देता है — जिसको करने के लिए , रोजगार बढ़ाने वाली योजनाओं को सालों लग जाते हैं | और ये केवल 2 लाख बैंक के क्लर्क के साथ लागू किया जा सकता है |

शुरू में, `सेना और नागरिक के लिए खनिज रोयल्टी(आमदनी) (एम.आर.ससी.एम)`के लिए हर परिवार के लिए एक खाता खाता खुलेगा, परिवार के मुखिया के नाम |  भारत में 26 करोड़ परिवार है और 95% के पास राशन कार्ड हैं | जिनके पास बैंक के खाते हैं, उनको नए खाते नहीं चाहिए होंगे | मान लीजिए 25 करोड़ परिवारों के मुखिया के पास बैंक या पोस्ट-ऑफिस के खाते नहीं हैं | राशन कार्ड का नंबर और तहसील कोड का इस्तेमाल करके एक पोस्ट-ऑफिस या स्थानीय स्टेट बैंक के ब्रांच/शाखा या अन्य निर्धारित स्थानीय बैंक के शाखा में एक खाता खोला जायेगा |  बाद में हर पैसा पाने वाले , परिवार के सदस्य का अलग खाता होगा |
अभी हर एक स्टेट बैंक या अन्य निर्धारित बैंक के ब्रांच / शाखा या पोस्ट-ऑफिस में , क्लर्क को परिवार के मुखिया का राशन कार्ड नंबर, फोटो, और अंगुली का छाप लेना होगा | यदि एक क्लर्क एक दिन में 50 खाते खोल सकता है, 25 करोड़ खाते खोलने के लिए 25 करोड़ / 50 = 50 लाख देहाड़ी चाहिए | आज के समय में सरकारी बैंकों में , 6 लाख क्लर्क हैं | तो , यदि 2 लाख क्लर्क इस काम पर लगा दिए जाते हैं, तो वो एक महीने में सारे खाते खोल सकते हैं | अब शुरू में , कुछ गलतियाँ हो सकती हैं, लेकिन अंगुली की छाप से सारी गलतियाँ दूर की जा सकती हैं | यदि कोई व्यक्ति दो बार अपने अंगुली के छाप देगा, तो मशीन कुछ ही दिन में उसको पकड़ लेगी |

(7)  मैं फिर से कहता हूँ कि आप पब्लिक / जनता को कसे बताएँगे `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी(आमदनी) (एम.आर.सी.एम) और अन्य विषयों के बारे में | और यदि आप ने बता दिया , तो वो आपसे कैसे सहमत होंगे ?  मान लीजिए ,कि वे आप से सहमत हो गए, तो पटवारी, कलेक्टर का दफ्तर उनके मत इकठ्ठा करेंगे | क्या (कलेक्टर,पटवारी) को ये ही काम होगा, दूसरा कोई काम नहीं होगा ?इस समय , आप के पास 200 अलग-अलग एफिडेविट हैं, क्या ये संभव है कि उन सब पर मत पाना और दर्ज करवाना ?

मैं 200 एफिडेविट जमा करूँगा कलेक्टर के दफ्तर में | उसके लिए कुछ 500 पन्ने लगेंगे | उसके लिए शुल्क / फी 500 x 20 रुपये = 10,000 रुपये होगी | क्लर्क 500 पन्नों को 2-3 दिनों में स्कैन करके कंप्यूटर में डाल देगा | इसीलिए 10,000 रुपयों से सभी लागत बड़े आराम से पूरी हो जाती है | यहाँ `असंभव` क्या है ? और नागरिक निर्णय करेंगे कि उनको कौन सी एफिडेविट का समर्थन करना है पटवारी/लेखपाल के दफ्तर जाकर | और जब भी उनको समर्थन करना होगा, तो उनको रु. 3 देना होगा | पटवारी का एक क्लर्क दिन में 200 `हा` या `ना` डाल सकते हैं | तो  उसकी एक दिन की वसूली रु.600 होगी और महीने की वसूली 15,000 होगी (यदि महीने में 25 काम-काज के दिन मानें)| इससे उस क्लर्क का रु. 8000 का वेतन, बड़े आराम से पूरा होगा | इस तरह कंप्यूटर, कमरा, आदि का खर्चा भी 5-6 महीनों में निकल आएगा |

यदि 75 करोड़ नागरिक 200 एफिडेविट पर `हा` दर्ज करवाने का निर्णय करते हैं, तो मैं सभी `राईट टू रिकाल` के एफिडेविट को एक एफिडेविट में बना सकता हूँ | ऐसे ही, मैं सभी जूरी वाले एफिडेविट के एक एफिडेविट बना दूँगा | इस तरह सभी 200  एफिडेविट को इकठ्ठा करके मैं 5-8 एफिडेविट बना दूँगा | और 75 करोड़ नागरिकों को हाँ` दर्ज नहीं करना होगा, 50 करोड़ या कम ही काफी होंगे, ये सरकारी आदेश / क़ानून लाने के लिए | तो फिर यदि 50 करोड़ नागरिकों को 8 `हां` दर्ज करना है, और यदि एक क्लर्क एक दिन में 200 `हाँ`दर्ज कर सकता है, तो हमें (400 करोड़ / 200) , मतलब 2 करोड़ क्लर्क की दहाड़ी से कम चाहिए | इसीलिए , इस कार्य को एक लाख क्लर्क 200 दिनों में कर सकते हैं | दूसरे शब्दों में, ये कार्य 6 महीनों में पूरा हो जायेगा |
रु. 3 का शुल्क / फीस जो पटवारी के क्लर्क इकठ्ठा करेंगे, उससे उनके वेतन दिए जाएँगे |

यदि नागरिक `हाँ`-`ना` दर्ज करते हैं कि नहीं, एफिडेविट पर निर्भर करता है | उदाहरण से, यदि आप को `सेना और नागरिक के लिए खनिज रोयल्टी(आमदनी) (एम.आर.सी.एम) किस कारण से नापसंद है ,तो आप को जर्रूरत नहीं है `हाँ` दर्ज करने के लिए | लेकिन ऐसे 50 करोड़ लोग हैं , जिनको एक दिन का 20 रुपयों से भी कम मिलता है | उनको 100% नैतिक और कानूनी , हर व्यक्ति के लिए महीने का 400-500 रुपये मिलना पसंद आएगा और वे `एम.आर.सी.एम` का समर्थन करेंगे |

(8) यदि `जे.एन.यू.` कालेज को 60 करोड़ जमीन का किराया देना है, तो उसको उतना पैसा बनाना होगा- वो कहाँ से इतना पैसा लाएगा ? ज्यादा संभावना ये ही है, कि वो अपनी फीस बढ़ाएगा—फिर आम-नागरिकों का क्या होगा ?

 

`जे.एन.यू.` कालेज का प्लाट का दाम कम से कम 16, 000 करोड़ है , यदि कम से कम 40,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर का जमीन का रेट/दर लें तो | तो किराया 480 करोड़ रूपये प्रति साल होगा | और यदि हम ज्यादा रेट लेते हैं, तो थोड़ा ज्यादा मिलेगा | तो हर आम-नागरिक को अंदाज से रु. 5 हर साल मिलेगा `जे.एन.यू.` कालेज के किराये से |
कृपया मुझे समझाएं —आम-नागरिक को कैसे नुकसान होगा ? पहले, `जे.एन.यु.` कालेज के छात्र के कितने % ,आप को लगता है कि `आम-नागरिक` हैं ? भारत में केवल 12% लोग, 18-30 साल के बीच में , कालेज जा पाते हैं | और `जे.एन.यू.` कालेज में जाने के लिए अच्छी अंग्रेजी आनी चाहिए , जो इस 12% में से ,आधे के पास नहीं है | ज्यादातर `जे.एन.यू.` के छात्र शहरों से आते है, जहां कुछ ५०% लोग झुग्गी-झोपडियों में रहते हैं | `कितने `जे.एन.यु` कालेज के छात्र झुग्गी-झोपड़ियों में पले-बढ़े हुए है ? शायद 1% भी नहीं |
रु. 5 जो आम-नागरिकों को मिलेगा `जे.एन.यू` प्लाट में और 800 या ज्यादा रुपये जो सरे खदानों और पब्लिक प्लाट से मिलेगा , आम-नागरिकों को अपनी बुनियादी (प्राथमिक) शिक्षा को सुधारने की ताकत देगा | तो हवाई-अड्डों, `आई.आई.एम.ऐ`, `जे.एन.यू` आदि कालेजों को बिना किराए का(मुफ्त) प्लाट देकर , आप आम-नागरिकों की शिक्षा को बरबाद कर रहे हैं, उनकी मदद नहीं कर रहे |

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जमीन पर किराया केवल `आई.आई.एम.ऐ` और `जे.एन.यू` पर ही नहीं होगा | इसके अलावा सभी पब्लिक (सरकारी) प्लाट पर होगा सिवाय उस संस्था के जो आम-नागरिकों के द्वारा छूट प्राप्त हो , जनमत-संग्रह या जूरी-मंडल सदस्यों द्वारा |
यदि पूरी बात करें –
क) हवाई-अड्डों को जमीन किराया हम आम-नागरिकों को देना होगा
ख) सभी कालेजों , जिनको पब्लिक के जमीन के प्लाट मिले हैं, को हम आम-नागरीकों को जमीन किराया देना होगा (सिवाय उनके जिनका सेना से सम्बन्ध है )
ग) क्रिकेट के मैदान, जिनको पब्लिक(सरकारी) जमीन मिली है, को जमीन का किराया देना होगा
घ) सभी अन्य खेल के मैदानों को भी जमीन का किराया देना होगा
च) ज्यादातर सरकारी विभाग और मंत्रालय जैसे पर्यटन, उपभोक्ता मामले और सार्वजनिक वितरण,मानव
संस्सधन विकास,सूचना और प्रसार ,सूचना और तकनीकी ,ग्रामीण विकास , लघु उद्योग एवं कृषि और

ग्रामीण उद्योग, सामाजिक न्याय और अधिकारिता,वस्त्र, शहरी विकास और गरीबी उपशमन, युवा मामले
और खेल, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एन.एच.आर.सी), योजना आयोग
छ) जजों को 10,000 से 30,000 रुपये प्रति महीना ,मकान किराया भत्ता(राशन) मिलेगा या एक 4 बेडरूम-हाल-रसोई का फ्लैट मिलेगा और बंगलों के साथ प्लाट को किराए पर दिया जायेगा | ऐसे ही ज्यादातर आई.ऐ.एस (बाबू), सांसदों और मंत्रियों के लिए | प्रधानमन्त्री, मुख्यमंत्री और कुछ दस एक मंत्रियों को छोड़ कर , किसी को भी 4 बेडरूम-हॉल-रसोई से ज्यादा नहीं मिलेगा |
ज) राष्ट्रपति का पद हटा दिया जायेगा और पूरा राष्ट्रपति के घर का प्लाट बिल्डरों को किराये पर दिया जायेगा|

जो प्लाट निजी व्यक्तियों के हैं या कंपनियों या ट्रस्ट के हैं, या राज्य सरकार या शहर या जिले के मालिकी के है, उनसे किराया नहीं लिया जायेगा | सेना, कोर्ट, जेल,रेलवे, बस-स्टैंड, सरकारी स्कूल कक्षा 12 तक और  टैक्स वसूली दफ्तरों के प्लाट को किराया देना नहीं होगा |

(9) आप सभी भारत के नागरिकों को `सेना और नागरिक के लिए रोयल्टी(आमदनी) (एम.आर.सी.एम) के पैसे बाँटने का काम कैसे करवाना चाहते हैं ? आप पैसे प्राप्त करने वाले नागरिक की जांच कैसे करेंगे कि व्यक्ति सही है कि नहीं ?

पैसे हर आम-नागरिक के खाते में , स्थानीय पोस्ट ऑफिस या स्थानीय स्टेट बैंक शाखा में जमा होंगे | यदि हर आम-नागरिक महीने में 2 बार पैसे निकालता है , और हमारे पास 114 करोड़ नागरिक हैं, तो एक महीने में 228 करोड़ बार पैसे निकाले जाएँगे | ये पैसे का निकालना केवल 100-100 रुपये के नोटों में हो सकते हैं | इसीलिए क्लर्क का काम आसान होगा ,उसे केवल 100-100 के रुपयों के नोट रखने और देने होंगे | अभी के समय ,एक क्लर्क एक दिन में 200 चेक के लिए नकद दे सकता है या 5000 चेक एक महीने में , के लिए नकद दे सकता है | इस तरह 228 करोड़ लेन-देन के लिए हमें 228 करोड़ / 5000 , 5 लाख क्लर्क से कम की जरूरत है | ये लेन-देन की ऊपरी सीमा है, क्योंकि बहुत ऐसे लोग होंगे जो केवल महीने में एक ही बार पैसे निकालेंगे | केवल बड़े / बुजुर्ग ही पैसे निकालेंगे , इसीलिए आम-नागरिकों की संख्या जो पैसे निकालेंगे असल में 80 करोड़ होगी और 114 करोड़ नहीं | यदि हम 120करोड़ लेन-देन , हर महीना का आंकड़ा लेते हैं, तो हमें 2.5 लाख से कम क्लर्क चाहिए | अभी के समय , स्टेट बैंक के पास 3.5 लाख क्लर्क हैं | इस तरह , एम.आर.सी .एम का पैसा 114 करोड़ नागरिकों को देना बड़ी आसानी से हो सकता है | और जैसे समय के साथ, `ऐ.टी.एम` आदि के साथ , ये और भी आसान हो जायेगा |

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भारत में लगभग 3 से 5 करोड़ वैध युवा नागरिक हैं, जिनके पास कोई भी पहचान-पत्र नहीं है | पहले चरण में, उनको केवल तहसीलदार के दफ्तर जाना है और अपने अंगुली के छाप देकर, उनका नाम बताना है | तहसीलदार उनकी फोटो लेगा और उनका पहचान–पत्र बनाएगा |
बाद में (4 महीनों के अंदर) अतिरिक्त जानकरी ली जायेगी जैसे माता-पिता के नाम, बहन-भाई के नाम, बच्चों के नाम और उन सबके पहचान पत्र के संख्या नंबर क्या है |

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बाकी युवा नागरिकों के पास पहचान पत्र हैं, वे कोई भी पहचान-पत्र का प्रयोग कर सकते हैं | जब एक व्यक्ति `एम.आर.सी.एम.` दो बार लेने आयेगा, तो सिस्टम उसके अँगुलियों के छाप से पकड़ लेगा और उसे सजा होगी |

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आप “व्यक्ती के जांच “ के समस्या के बारे में बात कर रहे हैं ? आज के समय, हमारे पास बहुत ही खराब सिस्टम है, व्यक्ति के जांच के लिए और इसीलिए कुछ जाली व्यक्ति तो आ पाएंगे | लेकिन 5 % से कम | ये `नरेगा` या `आई.आई.इम.ऐ.` के लिए आर्थिक सहायता या `जे.एन.यु.` के लिए आर्थिक सहायता या हवाई-अड्डों के लिए आर्थिक सहायता से अच्छा है, जहाँ 80% जाली व्यक्ति होते हैं | इस तरह यदि , `एम.आर.सी.एम` यदि आज शुरू होता है, तो कम से कम 95% पैसा हम ,आम-नागरिकों को जायेगा , केवल 5% जाली व्यक्तियों को जायेगा | और जैसे समय बीतेगा, ये और कम किया जा सकता है, `राष्ट्रिय पहचान-पत्र` सिस्टम  लागू करवा कर |

(10) किस आधार पर हम `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी(आमदनी) (एम.आर.सी.एम) भारत के सभी  आम-नागरिकों को हर महीने देंगे ? क्या ये मुफ्त / फ़ोकट का पैसा है या संपत्ति का बदली / तबादला / हस्तांतरण / ट्रान्सफर  है या ये पैसा टैक्स द्वारा इकट्ठी की जायेगी ? ये प्रस्ताव , उस प्रस्ताव से कैसे अलाग है , जिसमें टैक्स की छुट देने की बात हो , ताकि आम-नागरिकों के पैसे खर्च करने की ताकत बढ़ाई जा सके ?

ये मुफ्त / फ़ोकट  का पैसा नहीं है | ये पैसा खदानों की आमदनी और पब्लिक (भारत सरकार) की जमीन के किराये से आएगी | और जैसा आप को पता है, भारत सरकार के ये प्लाट जैसे आई.आई.एम.ऐ. प्लाट, दिल्ली हवाई-अड्डा प्लाट आदि, हम आम-नागरिकों के हैं | तो हम आम-नागरिक को इन प्लाट से किराया और खदानों से आमदनी क्यों नहीं मिलना चाहिए ? `आई.आई.एम.ऐ` का प्लाट 100 एकड़ है और कम से कम 40,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर भी जमीन का दम लगाया जाये, तो जमीन का दम 2000 करोधई और किराया यदि हर साल , इसका 3% लिया जाये , तो हर साल , 60 करोड़ रुपये या 60 पैसे प्रति नागरिक हर साल बनता है |
और दिल्ली हवाई-अड्डा 2000 एकड़ है और कम से कम एक लाख प्रति वर्ग मीटर के रेट से, उसकी जमीन का दाम 2 लाख करोड़ है | और उसपर 3% सालाना किराया के हिसाब से , 6000 करोड़ रुपये या 60 रुपये प्रति नागरिक हर साल होता है |  भारत सरकार के पास पूरे देश में ऐसे हज़ारों प्लाट हैं | इन प्लाट में से किराया से , हम आम-नागरिकों के लिए काफी पैसा मिल सकता है | ये मुफ्त का पैसा नहीं है | ये किराया है उन प्लाट से जिसके हम 120 करोड़ आम-नागरिक मालिक हैं और आमदनी है उन खदानों से, जिसके हम मालिक हैं |

ये संपत्ति का तबादला या टैक्स में छूट नहीं है | `आई.आई.एम.ऐ` प्लाट, `जे.एम.यू` के प्लाट , हवाई-अड्डे के प्लाट आदि से किराया वसूली संपत्ति का तबादला नहीं है | हम भारत के 120 करोड़ आम-नागरिक, उस जमीन के बराबर के मालिक हैं | अभी तक, ये प्लाट ऊंचे लोग द्वारा इस्तेमाल किये गए , फ़ोकट में | अभी हम `प्रजा अधीन-राजा` समूह के लोग इस फ़ोकट-पण को समाप्त करना चाहते हैं |
टैक्स की छूट से केवल ऊंचे /वशिष्ट लोगों को फायदा होता है, हम आम-नागरिकों को नहीं | मैं ऊंचे/विशिष्ट लोगों को टैक्स लगा कर आम-नागरिकों को देने के खिलाफ हूँ | मैंने जो संपत्ति-टैक्स, आय-कर, और विरासत-टैक्स का जो प्रस्ताव किया है, वो केवल सेना, कोर्ट, पोलिस, `राष्ट्रिय पहचान-पत्र सिस्टम` बानाने, सभी आम-नागरिकों को हथियार-प्रयोग की शिक्षा देने के लिए ही है | ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है ऊंचे/विशिष्ट लोगों पर टैक्स लगाने के लिए , ताकि आम-नागरिकों को पैसा दिया जा सके | लेकिन यदि हमारे बजट में घाटा है, तो कोई टैक्स की छुट नहीं होनी चाहिए | ऐसी स्थिति में सम्पाती-टैक्स और विरासत-टैक्स को बढ़ाना चाहिए बजट के घाटे को शून्य करने के लिए |

यदि सरकार ये जमीन पर किराये और खदानों की आमदनी का पैसा अपने पास रखती है और पैसा खर्च करती है , तो भ्रष्टाचार की समस्या आएगी | और जैसे आप को मालूम है, 100 में से 99 आई.ऐ.एस.(बाबू). पोलिस-कर्मी, जज, मंत्री, पूरी तरह भ्रष्ट हैं | तो जब सरकार पैसा इकठ्ठा करती है , तो नेता-बाबू-जज-पोलिस-प्रबंधक(नियामक)-बुद्धिजीवी-ऊंचे लोग अमीर होते हैं और हम आम-नागरिक भूखे मरते हैं | मैं सेना ,कोर्ट, पोलिस, परमाणु हथियार आदि पर सरकार द्वारा खर्चा करने का समर्थन करता हूँ, लेकिन ये सभी आम-नागरिकों के हित में है, कि खदानों की रोयल्टी(आमदनी) और पुबिक जमीन का किराया सीधे 120 करोड़ आम-नागरिकों को जाये |
पब्लिक जमीन पर किराया कोई टैक्स नहीं है | 2% निजी/प्रायवेट जमीन के दाम पर टैक्स का प्रस्ताव मैंने सेना, कोर्ट ,पोलिस आदि को चलाने के लिए किया है | और ये टैक्स का पैसा आम-नागरिकों को नहीं जाएगा | लेकिन पब्लिक जमीन से किराया , जैसे `आई.आई.एम.ऐ` का प्लाट, दिल्ली हवाई-अड्डे का प्लाट आदि का 33% सेनाके लिए जायेगा और 67% हम आम-नागरिकों को जायेगा |

(11)  आप ने दिल्ली हवाई-अड्डे से किराये की बात की है, लेकिन कृपया ये बताएं कि ये किराया कौन देगा ? हवाई जहाज-कंपनी (एयरलाइन) ? लेकिन हवाई जहाज-कम्पनी (एयरलाइन) इस किराये को यात्रियों के ऊपर डाल देगा , हवाई-जहाज का किराया बढ़ा कर और यात्री फिर हवाई जहाज से उड़ना बंद कर देंगे ऊंचे किरायों के वजह से |

दिल्ली हवाई-अड्डा का विचार कीजिये | वो हर साल 2 करोड़ यात्रियों की सेवा करता है | उसके प्लाट का किराया , 6000  करोड़ हर साल आ सकता है , यदि कम से कम बाजार का दाम लगाया जाये- एक लाख रुपये प्रति वर्त्ग मीटर | इस तरह ये किराया हर यात्री के लिए 3000 रुपये होगा | एक ऊंचे / विशिष्ट वर्ग के व्यक्ति का विचार करें जो दिल्ली हवाई-अड्डे का प्रयोग साल में 20 बार करता है | उस पर जमीन का किराया न लगा कर, उसकी अमीरी 6 लाख से बढ़ जायेगी | और भारत का हर आम-नागरिक को हर साल 60 रुपयों का घाटा होगा क्योंकि उसको दिल्ली हवाई-अड्डे के जमीन से किराया नहीं मिला , जो जमीन में उसकी हिस्सेदारी है | तो क्या आप ये कह रहे हैं कि ऊंचे/विशिष्ट वर्ग के लोगों को किराए देने में छूट होनी चाहिए और हम आम-नागरिकों को भूखे मारना चाहिए ?

अभी एक यात्री जो दिल्ली हवाई-अड्डा आता है, एक होटल में रहेगा जो कम से कम 5000 रूपए एक दिन का लेगी | क्या वो होटल को किराया नहीं देता है ? उसी तरह , उसे हवाई-अड्डे का प्लाट इस्तेमाल करने के लिए किराया देना चाहिए | माफ कीजिये ,कोई फ़ोकट-पन्ना या समाजवाद नहीं |

(12) करोड़ों आम-नागरिकों को कैसे पता चलेगा कि `सेना और नागेरिकों के लिए खनिज रोयल्टी (आमदनी) (एम.आर.सी.एम)` का एफिडेविट दर्ज कर दिया गया ?
    मैं पहले एक असली घटना बताऊंगा | 2002 के साल में, भारत सरकार ने एक योजना बनाई थी कि हर बुजुर्ग नागरिक , जिसकी आमदनी 5 लाख हर साल स कम है , को 200 रुपये हर महीना मिलेगी | (ये पेंशन पोस्टल आर्डर द्वारा पहुंचाई जाती हैं ,उनके घरों तक और एक एफिडेविट चाहिए आमदनी के घोषणा के लिए ; गलत एफिडेविट के लिए, छे महीनों की सज़ा है ; इसीलिए बहुत कम भ्रष्टाचार की संभावनाएं हैं ) | भारत सरकार ने कोई भी टी.वी , समाचार-पत्र या रेडियो, कही भी इसका प्रचार नहीं दिया था | फिर भी, 9-10 महीनों के छोटे से समय में, हर बुजर्ग नागरिक जो पात्र / योग्य था , इस योजना में दर्ज हो गया था | फिर बात कैसे फैली ? जब कोई चीज किसी के सीधे , खुद के फायदे की होते है , और समझने और करने के लिए सरल होती है, तो बात बिजली के करंट के तरह फैलती है |
एक बार नागरिक प्रधानमंत्री को मजबूर कर देते हैं ` जनता की आवाज़-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम)` को भारतीय राजपत्र में डालने के लिए, और एक बार `सी और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी (आमदनी) (एम.आर.सी.एम)` कि एफिडेविट दर्ज कर दी जाती है—क्योंकि `एम.आर.सी.एम` आम-नागरिकों के सीधे, खुद के हित में है, तो `एम.आर.सी.एम` एफिडेविट की बात बिजली के करंट जितने तेज फैलेगी | नागरिक का काम सिर्फ इतना है — उसे पटवारी /लेखपाल के दफ्तर जाना होगा 10-15 मिनट के लिए और उसे 3 रुपये देना होगा (गरीब के लिए एक रूपया) | और क्योंकि `एम.आर.सी.एम` उसके सीधे, खुद के फायदे की बात है ,तो वो अपना सारे रिश्तेदार, दोस्त, पड़ोसियों को उसके बारे में बताएगा | इस तरह `एम.आर.सी.एम` के एफिडेविट की बात करोड़ों नागरिकों तक कुछ ही दिनों तक पहुँच जायेगी |

आज, मीडिया (समाचार-पत्र, टी.वी, रेडियो, पाठ्यपुस्तक आदि)  ऐसी जानकारी देते हैं जो जाँची नहीं जा सकती हैं और इसीलिए भरोसे वाली नहीं होती है | लेकिन `जनता की आवाज़` ऐसी जानकारी देगा , जो हर नागरिक द्वारा खुद जाँची जा सके , कभी भी | इसलिए जब कुछ लाख लोग भी `एम.आर.सी.एम` का समर्थन करेंगे, `जनता की आवाज़-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)` द्वारा, तो देश के दूसरे लोगों को इसके बारे में पता चल जायेग कि कुछ है जो लोग सही मायने में समर्थन कर रहे हैं , कुछ जो देश के हित में है | फिर, `एम.आर.सी.एम` आग की तरह फैलेगा |

प्रश्नकर्ता- हम ऐसी स्तिथि कैसे संभालेंगे जब मिलते-जुलते कई एफिडेविट फाइल किये जायेंगे ? उदाहरण- यदि `सेना और खनिज आमदनी` ड्राफ्ट हम या कोई दर्ज करता है, नेता अपना अलग इस ड्राफ्ट का रूपांतरण दर्ज कर सकते हैं और भ्रम पैदा कर सकते हैं और `प्रजा अधीन राजा समूह` के ड्राफ्ट के बारे में झूठा प्रचार कर सकते हैं, `बिकी हुई मीडिया` के सहायता से | ऐसी स्तिथि में लोगों का मत बिखर जायेगा और ड्राफ्ट के लिए दबाव कमजोर हो जायेगा | एक ड्राफ्ट कहेगा कि केवल पब्लिक भूमि का किराया ही जनता और सेना को जाना चाहिए और दूसरा मिलता-जुलता ड्राफ्ट ये कह सकता है कि निजी जमीन भी जनता में बांटनी चाहिए, सेना को कुछ भी किराया नहीं जाना चाहिए क्योंकि इससे आम-नागरिकों को ज्यादा पैसा मिलेगा |     

 

ऊतर –

`सेना और नागरिकों के लिए खनिज आमदनी (एम.आर.सी.एम)`-1 : कुल आमदनी की 66% नागरिकों के लिए बांटी जाये, सेना के लिए 33%,  निजी जमीन पर कोई भी किराया नहीं लिया जायेगा |

`एम.आर.सी.एम`-: कुल आमदनी 100% नागरिकों के लिए बांटी जाये, सेना के लिए 0% और निजी भूमि पर भी किया लिया जाये |

अब नागरिक दोनों पर अपनी `हां` दर्ज कर सकता है | या मानें कि केवल `एम.आर.सी.एम`-2 पर `हाँ` दर्ज करते हैं | लेकिन दोनों ही परिस्थितियों में `विदेशी लोबियों` को भारी नुकसान होगा, और उनकी मीडिया को खरीदने की क्षमता कमजोर होगी | राईट टू रिकाल-दूरदर्शन अध्यक्ष और पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली आने से `बिकी हुई मीडिया` ना के बराबर हो जायेगी |

और कार्यकर्ताओं कोक सेना का महत्त्व भी समझाया जा सकता है | इसीलिए बाद में, 33% सेना को आमदनी ड्राफ्ट में जोड़ी जा सकती है |
`निजी भूमि पर किराया` वाले ड्राफ्ट के बहुत कम समर्थक होंगे | कार्यकर्ता बेवकूफ नहीं हैं | वे देखेंगे कि यदि निजी भूमि-मालिक को भूमि पर किराया देने के लिए कहा जाता है, तो वो उनकी भूमि छिन जाने के बराबर है | ये संभव है कि ऐसा ड्राफ्ट जबरन लाया जाये लेकिन यदि ऐसा किया जाता है, तो समर्थ निजी-भूमि मालिक वाले व्यक्ति जैसे डॉक्टर, इंजिनीर, आदि सभी अमेरिका भाग जायेंगे | फिर नागरिकों की सेवा कौन करेगा ? बाबू ? समाज-सेव्वक ? कार्यकर्ता ? नेता ?

दूसरे शब्दों में, कार्यकर्ताओं को तब तक बेवकूफ बनाया जा सकता है, जब तक उनके हाथ ड्राफ्ट नहीं आ जाता | लेकिन `पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली` बहुत ज्यादा ड्राफ्ट-केंद्रित है | इसीलिए ड्राफ्ट कार्यकर्ताओं से छिपाया नहीं जा सकता | इसीलिए बुरे ड्राफ्ट की बुराई सामने आएगी |

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`बिकी हुई मीडिया` शक्तिशाली है, लेकिन उसकी सीमाएं भी देखें | `बिकी हुई मीडिया` आपको ये नहीं विश्वास दिलवा सकती कि 2 +2 = 5 है | दूसरे शब्दों में, ठोस तथ्यों के सामने, `बिकी हुई मीडिया` विफल हो जाती है | ज्यादा से ज्यादा `बिकी हुई मीडिया` तथ्यों को दबा सकती है |
और `बिकी हुई मीडिया` की कमजोरी देखने के लिए, ध्यान दीजिए इस तथ्य पर — अन्ना और अरविन्द केजरीवाल दोनों को मजबूर होना पड़ा , राईट टू रिकाल को दिखावटी समर्थन करने के लिए | उनकी इच्छा थी कि `राईट टू रिकाल` का मुद्दा ही नहीं उठे |  लेकिन कुछ ही गिने चुने `राईट टू रिकाल` के प्रचारकों ने अन्ना-अरविन्द के कई सौ कार्यकर्ताओं को `राईट टू रिकाल` का ड्राफ्ट बताया और फिर और फैला | और `बिकी हुई (पेड) मीडिया` के पूरी प्रयासों के बावजूद कि राईट टू रिकाल को दबाया जाये ; अन्ना-अरविन्द के बिना ड्राफ्ट के `राईट टू रिकाल` के झूठे समर्थन और सुब्रमनियम स्वामी और अन्य राईट टू रिकाल के विरोधियों का पूरा प्रचार करने के बावजूद — राईट टू रिकाल के ड्राफ्ट ने अब तक इतना विकास किया है |
और ये सब हुआ , बिना `पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली` और बिना राईट टू रिकाल-दूरदर्शन अध्यक्ष के | लेकिन पारदर्शी शिकयत / प्रस्ताव प्रणाली के लागू होते, `बिका हुआ मीडिया` मुकाबला नहीं कर पायेगा |

मूल बात ये है कि कार्यकर्ताओं को आम-नागरिकों को ड्राफ्ट बताना चाहिए और उन्हें झूठा, बिना ड्राफ्ट का समर्थन पर विश्वास नहीं करने के लिए कहना चाहिए |