अध्याय 2 – अमेरिकी पुलिस में भारतीय पोलिस से भ्रष्टाचार कम क्यों है?

अध्याय 2 – अमेरिकी पुलिस में भारतीय पोलिस से भ्रष्टाचार कम क्यों है?

110811satish

(2.1) यह बहुत ही रहस्य भरा प्रश्न है पर इसका उत्तर बहुत ही आसान है!!

आपने अमेरिका के अपने रिश्तेदार, मित्रों से यह अवश्य सुना होगा कि अमेरिका  के पुलिस/कोर्ट में भ्रष्टाचार भारत के पुलिस/कोर्ट में भ्रष्‍टाचार से बहुत कम है I भारत के  हरेक अनिवासी भारतीय ने इस

पर पहले ही दिन से ध्यान दिया होगा I उदाहरण के लिए, जब मैं   अमेरिका  में था, उस समय मुझे ट्रैफिक के नियमों का उल्लंघन करने  पर हवलदारों ने 5 बार रोका था। ट्रैफिक के नियमों को तोड़ने के लिए,  हवलदारों ने मुझसे 3 बार अर्थदंड/जुर्माना लिया और 2 बार मुझे क्षमा किया, परन्तु एक बार भी उन्‍होंने संकेत तक नहीं दिया कि घूस लेने  में उनकी थोड़ी भी रूचि है I क्यों ? और यह आपके लिए अवश्‍य ही एक रहस्य होना चाहिए कि अमेरिका में पुलिस/जज भारत की तुलना में इतने कम भ्रष्ट क्यों है ? क्या अमेरिका की पुलिस/न्‍यायाधीश  भारत की पुलिस/जज की तुलना में मुर्ख हैं कि वो अपने नागरिकों से घूस वसूल करने के चालाकी भरे तरीकों के बारे में नहीं सोच सकते ?  नहीं, वे इतने भी मुर्ख नहीं हैं I क्या वे इतने डरपोक हैं कि वे नागरिकों के हाथ न मरोड़ सकें और उनसे घूस ना वसूल सकें? नहीं, वे उतने ही साहसी हैं जितने की भारत की पुलिस है – थोड़े भी कम नहीं I तो क्या अमेरिका के हर पुलिसवाले /जज लालच से परे हैं ? नहींI  किसी भी राष्ट्र में ऐसा नहीं हो सकता की वहाँ के लाखों व्यक्तियों में से कोई भी लालची ना हो I तो क्या अधिक वेतन प्राप्‍त करना ही भ्रष्टाचार इतना कम होने का एकमात्र कारण है ? अच्छा तो मान लें कि हमने भारत में अपने पुलिसवालों/जजों के वेतन इस सप्‍ताह दोगुने कर दिए तो क्या वे हमें अगले सप्ताह से घूस में 10 प्रतिशत की छूट देंगे?  उदाहरण के लिए, वर्ष 2009-2010 में सरकार ने सभी न्यायधीशों के वेतन तीन गुना कर दिए I तो क्या जजों ने अपनी घूस  खोरी में अगले दिन 10 प्रतिशत की भी छूट दी ? मेरा अनुमान है, नहीं I यदि भारत सरकार का कोई कर्मचारी यह सोचता है कि जितना वेतन उसे मिल रहा है उसे दोगुना कर दिया जाना चाहिए और इसके लिए उसे घूस लेने की जरूरत है। तो क्या वह 30 वर्ष के वेतन में आ

ने वाले घूस के बराबर वेतन इकट्ठा करने के बाद घूस लेना बंद कर देगा? नहीं, उनमें से अधिकतर कभी नहीं बंद करेंगेI इस प्रकार, वेतन अवश्‍य ही एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा है, पर भारत और अमेरिका में भ्रष्‍टाचार के स्‍तर में बदलाव लाने हेतु कोई सबसे बड़ा कारक नहीं है। तो और क्या कारण हो सकता है ?

royalty-free-retro-police-officer-over-an-american-flag-background-by-patrimonio-4770

संस्कृति कारण नहीं है

क्या हमारी संस्कृति इसका कारण है? भारत के बहुत से बुद्धिजीवी (कु-बुद्धिजीवी?) के पास 4 अंकों का बौद्धिक स्तर (IQ) है और वे कहते है कि भारत में पुलिसवाले अधिक भ्रष्ट इसलिए हैं क्योंकि हम जनसाधारण अनपढ़ हैं, जागरूक नहीं हैं, हममें नैतिक सदाचार की कमी है, हमारी राजनीतिक संस्कृति बुरी है आदि I दूसरे शब्दों में, 4 अंकों  के बौद्धिक स्तर (IQ) वाले इन बुद्धिजीवियों के अनुसार, हम नागरिकगण पुलिस / न्यायाधीश के भ्रष्ट होने के जिम्‍मेदार हैं I 4 अंकों  वाले बौद्धिक स्तर (IQ) के बुद्धिजीवियों द्वारा “पीड़ितों पर ही आरोप” लगाने वाले इन तर्कों को मैं सफ़ेद झूठ कहकर अस्वीकार करता हूँ I यह बात उसी तरह चुभनेवाली लगती है जैसे कोई कहे “बलात्कार के लिए औरतें जिम्मेदार हैं” I यह तर्क कि “नागरिकों में जागरूकता नहीं है” या “नागरिकों की सभ्यता बुरी है”  बिलकुल बकवास हैI यहाँ तक कि सबसे ज्‍यादा अशिक्षित व्यक्ति भी यह अच्‍छी तरह जानता है कि भ्रष्टाचार अनैतिक है और यह एक अपराध है I और सभी पुलिसवालों, न्‍यायाधीशों व मंत्रियों को यह अच्‍छी तरह पता है कि भ्रष्टाचार अनैतिक है, गैरकानूनी है। और यहाँ तक की जब अमेरिका में वर्ष 1800 में शिक्षा 5 प्रतिशत से भी कम थी तब भी वहाँ ऐसे भ्रष्‍ट पुलिस,  न्यायाधीश आदि नहीं थे I इस मेरे विचार में कम शिक्षा कोई मुद्दा नहीं है। “नागरिकों में जागरूकता नहीं है” यह 4 अंकों  वाले बौद्धिक स्तर (IQ) के बुद्धिजीवियों द्वारा गढ़ा हुआ बिलकुल बकवास है और यह कहना कि “नागरिकों की सभ्यता बुरी है”  बिलकुल सफ़ेद झूठ हैI तो अमेरिका में भ्रष्टाचार कम होने का असली कारण क्या है?

हम पुलिस दल को मोटे तौर पर दो भागो में विभाजित करते है – कनिष्‍ठ/जूनियर     अधिकारी जैसे हवलदार/दरोग़ा और वरिष्‍ठ/सीनियर  अधिकारी जैसे जिला पुलिस आयुक्‍त/कमिश्‍नर I अमेरिका में हवलदार शायद ही कभी घूस  मांगते है क्योंकि अमेरिका  में जिला पुलिस आयुक्‍त/कमिश्‍नर उनके लिए जाल बिछाते हैं I हवलदार जानता है की 100-500 बार कानून का उल्लंघन करने वाले व्‍यक्‍तियों में से एक व्‍यक्‍ति जिला पुलिस  आयुक्‍त/कमिश्‍नर   का बिछाया हुआ जाल है और यदि वह घूस मांगने का साहस करता है तो वह पकड़ा जा सकता है और उसे कारावास हो सकती हैI उदाहरण के लिए, जब मैं वर्ष 1990 से 1998 तक अमेरिका  में था, उस समय मुझे ट्रैफिक के नियमों का उल्लंघन करने पर हवलदारों ने 5 बार रोका था। ट्रैफिक के नियमों का उल्लंघन करने पर हवलदारों ने मुझसे 3 बार अर्थदंड/जुर्माना लिया और 2 बार मुझे क्षमा किया, परन्तु एक बार भी उन्‍होंने संकेत तक नहीं दिया कि घूस लेने में उनकी थोड़ी भी रूचि है I क्यों?  मुख्य कारण है कि वह जानता है कि 200  में से कोई एक ऐसा यातायात उल्‍लंधनकर्ता आयुक्‍त/कमिश्‍नर   द्वारा बिछाया गया जाल होता है और उसे नहीं पता कि कौन सा उल्‍लंधन जाल है I  इसलिए वह 200 मामलों में से एक में भी घूस नहीं लेता I और अमेरिका में बहुत से नोडल अधिकारी जैसे जिला शिक्षा अधिकारी, जिला लोक मुकदमा/अभियोग चलाने वाला अधिकारी, राज्यपाल आदि, अधिकारियों,  मंत्रियों,  न्यायाधीशों के विरूद्ध जाल बिछाते हैं I समय-समय पर जाल बिछाना सभी कनिष्‍ठ/जूनियर स्टाफ को घूस  लेने से मुक्त रखता है I

इसलिए यह तथ्‍य कि “आयुक्‍त/कमिश्‍नर जाल बिछाते है” इस बात को दर्शाता है कि क्‍यों कनिष्‍ठ/जूनियर स्टाफ भ्रष्टाचार कम करते हैं I लेकिन फिर क्यों अमेरिका  में पुलिस आयुक्‍त/कमिश्‍नर   घूस के प्रचलन को समाप्‍त करने के लिए जाल बिछाते है जबकि भारत में अधिकांश पुलिस आयुक्‍त/कमिश्‍नर हवलदार को घूस  वसूल करने का आदेश देते हैं ?  इस अंतर का कारण क्‍या है? क्यों अमेरिका में भी पुलिस  आयुक्‍त/कमिश्‍नर हवलदारों को घूस वसूल करने का आदेश नहीं देता?  इसका एकमात्र कारण है: अमेरिका में नागरिकों के पास मुख्य जिला पुलिस प्रमुख / डिस्‍ट्रीक्‍ट पुलिस चीफ को निकालने की प्रक्रिया है। (अर्थात राइट टू रिकॉल (भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा हटाने /बदलने की प्रक्रिया ) या प्रजा अधीन राजा) I दूसरे शब्‍दों में, यदि अमेरिका के किसी जिले में नागरिक जिला पुलिस प्रमुख / डिस्‍ट्रीक्‍ट पुलिस चीफ   को निकलना चाहते हैं तो उन्हें डी आई जी  या मुख्यमंत्री या गृह मंत्री के पास जाकर कोई अभियोग/मुकदमा दायर करने की आवश्यकता नहीं है I अमेरिका  के नागरिकों को भी उच्च न्‍यायालयों के न्यायधीशों के पास जाकर कोई बेकार की जनहित याचिका  देने की आवश्यकता नहीं है I अमेरिका  के नागरिकों को बस यह प्रमाणित करने की आवश्‍यक्‍ता है कि जिले के अधिकांश मतदाता पलिस आयुक्‍त/कमिश्‍नर को निकलना चाहते हैं I और यदि एक बार किसी  जिला पुलिस प्रमुख/ डिस्‍ट्रीक्‍ट पुलिस चीफ के विरूद्ध बहुमत प्रमाणित हो जाता है तो उसे निकल दिया जाता है और  किसी भी उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की हिम्मत नहीं है कि वह उसके  निलम्‍बन के निर्णय पर रोक/स्‍टे का कोई आदेश दे सके या उसे निलंबित करने में देरी करेI इसी तरह, यदि अमेरिका के नागरिक मुख्यमंत्री, महापौर/नगर अध्यक्ष, जिला न्यायाधीश,  जिला लोक अभियोक्‍ता/प्रोजिक्‍यूटर , जिला शिक्षा अधिकारी आदि को निकलना चाहें तो उन्हें विधायकों या प्रधानमंत्री या पार्टी के प्रमुख या न्‍यायाधीश के पास जाने की आवश्यक नहीं है – नागरिकों को मात्र उस जिले या राज्य में बहुमत की राय प्रमाणित करने की आवश्‍यकता है I इसलिए पुलिस प्रमुख और नोडल अधिकारी डरते है की यदि ये स्‍टॉफ ज्‍यादा भ्रष्ट हो गए तो नागरिक उन्‍हें निकल सकते हैं I और इसलिए पुलिस  आयुक्‍त/कमिश्‍नर जैसे नोडल अधिकारी जाल बिछाते है और इसीलिए जूनियर स्टाफॅ में भ्रष्टाचार कम है I

अब प्रश्‍न है कि क्या नोडल अधिकारी को इस प्रकार से निकालने की प्रणाली   अर्थात प्रजा अधीन राजा/भ्रष्ट को हटाना/बदलना अमेरिकी अवधारणा/कॉन्‍सेप्‍ट है? क्या यह भारतीय विचारधारा नहीं है, जैसा कि बहुत से प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल – विरोधी बुद्धिजीवी कहते हैं? ऐसा नहीं है। सत्यार्थ प्रकाश का छठा अध्याय है “राज धर्म” I इस अध्याय में स्वामी दयानंद सरस्वती ने बताया है कि नागरिकों अधिकारियों,  मंत्रियों और  न्‍यायाधीशों की शक्ति क्या हैं और उनके दायित्व क्या हैं I छठे अध्याय के पहले ही पृष्ठ में स्वामी दयानंद राज धर्म का बुनियाद स्थापित करते हैं। स्‍वामी दयानन्‍द ने दो शब्द दिए है “प्रजा-अधीन राजा” और इन दो शब्दों में इन्होंने अच्छी राजनीति के ऊपर 10,000 प्रस्तावों का सार  दिया  है और फिर वे इन दो शब्दों का विस्तार करते  हैं, “राजा को प्रजा के अधीन होना चाहिए नहीं तो वह नागरिकों को लूट लेगा और राष्ट्र का विनाश कर देगा” I और उन्होंने ये श्लोक अथर्ववेद से लिए हैं I और भारत के पुलिस कमिश्‍नर, मंत्री, जजों आदि और अमेरिका  के पुलिस कमिश्‍नर, मंत्री, जजों आदि के बीच सरसरी तौर पर तुलना यह दर्शाता है कि हमारे ऋषि मुनि कितने सत्य हैं जिन्होंने अथर्ववेद लिखे हैं और स्‍वामी दयान्द भी I अमेरिका में नागरिकों के पास जिला पुलिस प्रमुख / डिस्‍ट्रीक्‍ट पुलिस चीफ, मुख्य मंत्री  आदि  को निकालने की प्रक्रिया है अर्थात वे सब पदाधिकारी प्रजा अधीन हैं और इसलिए अमेरिका में जिला पुलिस प्रमुख / डिस्‍ट्रीक्‍ट पुलिस चीफ  , न्‍यायाधीश, मुख्यमंत्री आदि नागरिकों को लूटते नहीं बल्कि नागरिकों की सुरक्षा करते हैं  जबकि यहाँ भारत में नागरिक किसी जिला पुलिस प्रमुख/डिस्‍ट्रीक्‍ट पुलिस चीफ  , मुख्यमंत्री आदि को निकाल नहीं सकते अथवा उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकते और इस तरह वे प्रजा अधीन नहीं हैं I और इसलिए हम देखते हैं कि यहां भारत में मंत्री व न्‍यायाधीश जनसाधारण को लूटने में व्यस्त रहते हैं I स्वामी दयानंद का विश्‍लेषण  कितना उचित है –“जैसे माँसाहारी जानवर अन्य जानवरों को खा जाते हैं, उसी प्रकार कोई राजा जो प्रजा अधीन नहीं है, वह नागरिकों को लूट लेगा” I और इसलिए विश्व के सभी चीजों में से सत्यार्थ प्रकाश के यह दो शब्द स्पष्ट करते है कि क्यों अमेरिकी  पुलिस  में भ्रष्टाचार कम है I और मेरे लिए यह बड़ी विडंबना है कि सत्यार्थ प्रकाश के इन दो शब्द के महत्‍व को समझाने के लिए मुझे अमेरिका  का उदाहरण  देना पड़ रहा है I

(2.2) राइट टू रिकॉल ( भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा निकालने / बदलने का अधिकार) और प्रजा अधीन राजा

अब, राइट टू रिकॉल  और “प्रजा अधीन राजा” कैसे सम्बंधित हैं ? राइट टू रिकॉल    का अर्थ होता है- वह प्रणाली(सिस्टम), जिसके द्वारा नागरिक किसी भी अधिकारी/ जज /मंत्री को किसी भी समय निकाल सकते हैं किसी उच्च अधिकारी के पास गए बिना ,केवल बहुमत साबित करने के द्वारा I इस तरह से उच्च अधिकारी आम नागरिकों के प्रति जवाबदार होते हैं क्योंकि अधिकारी नियुक्त करने वाले के प्रति जवाबदार नहीं, नौकरी से जो निकाल सकता है उसके प्रति जवाबदार होते हैं, उन्हीं के अनुसार और उनके लिए काम करते हैं | राइट टू रिकॉल (और  राईट टू रिकाल पर आधारित जूरी प्रणाली) एकमात्र ज्ञात प्रणाली है जो राजा को प्रजा अधीन बनाती है और इस प्रकार मंत्री, अधिकारी, पुलिस, और न्‍यायाधीशों में भ्रष्टाचार कम करती हैI बहुत सारे अन्य संस्‍था आधारित विकल्प प्रस्तावित हुए हैं जैसे पुलिस  बोर्ड, न्‍याय आयोग आदि। पर वे सब बिलकुल असफल साबित हुए हैं I इस तरह की संस्‍थाएं  भ्रष्टाचार को केवल कुछ समय के लिए रोकती हैं, उसे  कम नहीं करतीं I कोई प्रणाली जो राजा को प्रजा से स्वतंत्र (निरंकुश) रखती है वह केवल भ्रष्टाचार को दूसरे हाथों में देती है, उसे कम नहीं  कर सकती I

यदि नागरिक के पास अधिकारियों, न्‍यायाधीशों, मंत्रियों आदि को निकालने का सीधा कोई मार्ग नहीं होगा, और उन्‍हें निकलने के लिए अन्य अधिकारियों , न्‍यायाधीशों ,विधायकों, सांसदों,  मंत्रियों आदि से याचना करना पड़ेगा तो ऐसे में कोई नागरिक अधिकारियों, न्‍यायाधीशों और मंत्रियों पर नियंत्रण करने में असफल होगा I अधिकारी,  मंत्री,  न्‍यायाधीश आदि जीवन भर घूस लेंगे, अनैतिक कार्यों पर समर्थन की मांग करेंगे और नागरिकों पर अवर्णनीय/बहुत ज्यादा अत्याचार करेंगे। और इससे भी बुरा होगा कि वे अपने राष्ट्र को विदेशियों के हाथों बेच देंगेI अधिकारी,  मंत्री,  न्‍यायाधीश  आदि चाहे वे जूनियर हों या सीनियर, आपस में “एक दूसरे को बचाने” वाला सांठगांठ बनाएंगे और इन सांठगांठ का प्रयोग करते हुए वे एक दूसरे को सुरक्षित रखेंगे I इस प्रकार, भ्रष्टाचारियों के लिए कोई दंड नहीं रहेगा और भ्रष्टाचार अनियंत्रित गति से फैलेगाI वे हमेशा “प्रमाण का अभाव” को बहाना बनाएंगे और साथी भ्रष्ट मंत्रियों, अधिकारियों, न्‍यायाधीशों के भ्रष्‍टाचार का समर्थन करेंगेI नागरिकों का सीधा हस्तक्षेप मानव-जाति में ज्ञात एक मात्र प्रणाली है जो इन सांठगांठों से मुक्ति दिला सकती है I

(2.3) प्रजा अधीन राजा / राइट टू रिकॉल आधुनिक अमेरिका में

अमेरिका  में हटाने/रिकॉल  की प्रणाली का प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट प्रत्येक राज्य में और प्रत्‍येक जिले में अलग अलग है I उदाहरण के लिए लगभग 20 राज्यों में नागरिकों के पास राज्यपालों को हटाने/रिकॉल  की प्रणाली है I और अनेक अन्य राज्यों में जिला न्‍यायाधीश और उच्च न्‍यायालय के न्‍यायाधीश को प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का प्रयोग करके हटाने का अधिकार हैI अनेक राज्यों में जब वहां के संविधान के प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट  तैयार हो रहे थे तब राज्यपालों, न्यायधीशों आदि  को  प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल के सहारे हटाने का अधिकार नहीं था परन्तु बाद में नागरिकों ने राज्यपालों, न्‍यायाधीशों आदि को हटाने/रिकॉल  की प्रणाली को जोड़ा I और अनेक राज्‍यों में जनमत संग्रह प्रक्रिया है। और इसलिए अमेरिका के जिन राज्यों में अभी तक हटाने/रिकॉल प्रणाली नहीं है, उन राज्यों के अधिकारी को ज्ञात है की यदि वे अभद्र व्यवहार करेंगे तो नागरिक जनमत संग्रह  प्रणाली का प्रयोग करके हटाने/रिकॉल  प्रणाली लाने और उन्हें निकालने में पूरी तरह से सक्षम हैं जैसे अन्य कई राज्यों के नागरिक करते हैं I दूसरे शब्‍दों में, हटाने/रिकॉल का भय प्रत्येक राज्य और जिला अधिकारियों में है यहां तक कि उन राज्‍यों में भी जहां हटाने/रिकॉल प्रणाली अभी तक नहीं है I

सम्भवतः आपको हटाने/रिकॉल के कुछ वास्‍तविक उदाहरण जानने  में रूचि होगी I एक उदाहरण के लिए, मै अमेरिका  के एक समाचारपत्र Palo Alto Daily की एक खबर का लिंक दे रहा हूँ जो 4 मई 2007 के अंक में छपा था I अध्याय क पूरे लेख के लिए इस  लिंक को देख सकते हैं:-

http://wwwIpaloaltodailynewsIcom/article/2007-5-4-05-04-07-smc-sheriff-recall

शेरिफ मंक के खिलाफ वापस बुलाने के प्रयास शुरू होते हैं

“सान कार्लोस का एक निवासी सान मैत्‍यो शहर के सबसे बड़े कानून प्रवर्तन (लागू कराने वाले) अधिकारी को वापस बुलाने का प्रयास कर रहा है। माइकल स्‍टोजनर ने कहा : बृहस्‍पतिवार को उसने शेरीफ जॉर्ज मंक को वापस बुलाने के लिए सोमवार तक इस आशय की सूचना दर्ज करने की योजना बनाई है। शेरीफ जॉर्ज मंक 19 अप्रैल को लासवेगास में एक गैर कानूनी काम में पकड़ा गया था। 24 अप्रैल को दिए गए बयान में मंक ने कहा: उसने सोचा कि वह एक कानूनी रूप से सही व्‍यवसाय को देख रहा था और उसने किसी कानून को नहीं तोड़ा। लेकिन उसने किसी प्रश्‍न का उत्‍तर देने से मना कर दिया है हालॉंकि स्‍टॉन्‍जर यह मानता है कि शेरीफ को वापस बुलाने के लिए व्‍यापक जनसमर्थन है, किसी शान मात्‍यु काउन्‍टी को वापस बुलाना एक बड़ा आदेश है। चुनाव अधिकारी का प्रवक्‍ता डेविड टॉम ने कहा: देश में दर्ज मतदाताओं के 10 प्रतिशत को  रिकॉल प्रक्रिया शुरू करने के लिए एक आवेदन पर हस्‍ताक्षर करना होगा। यह लगभग 35 हजार लोगों के बराबर है——“

अमेरिका में शेरिफ का अर्थ है जिला पुलिस प्रमुख/डिस्‍ट्रीक्‍ट पुलिस चीफ I इनमें से  सभी नहीं पर 70 से 80% जिला पुलिस प्रमुख/डिस्‍ट्रीक्‍ट पुलिस चीफ अमेरिका में जनसाधारण द्वारा चुने जाते है और बचे हुए को नियुक्त किया जाता है I चाहे चुने हुए हों या नियुक्त,  अमेरिका में इन जिला पुलिस प्रमुखों को निकालने के लिए नागरिकों के पास औपचारिक और अनौपचारिक प्रणाली है I अनेक जिलों में जनसाधारण के पास महापौर, जिला-सरकार के वकील, जिला शिक्षा अधिकारी आदि को हटाने/रिकॉल करने की प्रक्रियाएं हैं I और क्या अमेरिका  में नागरिकों न्यायधीशों को हटाने/रिकॉल की प्रक्रिया से हटा सकते हैं? हां,  अनेक राज्यों में न्यायाधीशों  को हटाने के लिए प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का कानून है I बहुत से मामलों के उदाहरण हैं जिनमें नागरिकों ने न्यायाधीशों को हटाने के लिए प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल  का प्रयोग किया है ( http://www.judgerecall.com/ ) और कृपया यह बर्किली विश्वविद्यालय के वेबसाइट का उदाहरण देखें (http://igs.berkeley.edu/library/htRecall2003.html  जहाँ से आपको कॅलीफोर्निया राज्य में हटाने/रिकॉल करने  की प्रणाली के बारे में जानकारी मिल सकती है I

ll

कैलिफोर्निया में अधिकारियों, न्‍यायाधीशों को वापस बुलाने के लिए तंत्र

कैलिफोर्निया में अधिकारियों, न्‍यायाधीशों को वापस बुलाने के प्रयास में पहला कदम वापस बुलाने संबंधी याचिकाओं का वितरण है। यह प्रक्रिया वापस-बुलाने-हेतु-आशय का नोटिस की याचिका जो कि उपयुक्‍त कानूनी भाषा में लिखी होती है और 65 मतदाताओं द्वारा हस्‍ताक्षरित होती है, को भरे जाने से शुरू होती है। एक बार यह प्रक्रिया पूरी हो जाती है तो वापस बुलाने संबंधी याचिका शीघ्रता से परिचालित की जा सकती है। राज्‍य स्‍तर के अधिकारियों को वापस बुलाने के लिए याचिकाओं पर उस देश में संबंधित अधिकारी के लिए हुए अंतिम मतदान के एक प्रतिशत की संख्‍या के बराबर मतदाता, जो 5 काउन्‍टियों से हों, सहित उस अधिकारी के लिए पिछले मतदान के मत के 12 प्रतिशत के बराबर संख्‍या में मतदाताओं द्वारा हस्‍ताक्षरित होना चाहिए(हर काउंटी से कम से कम पिछले मतदान के चुनाव के 1% जितनी संख्या होना चाहिए)। राज्‍य विधायकों को वापस बुलाने के लिए याचिकाओं को उस अधिकारी के लिए हुए अंतिम मत के 20 प्रतिशत के बराबर संख्‍या में होना चाहिए। वापस बुलाने के लिए मतपेटी के दो भाग होते हैं

वापस बुलाने के लिए हां अथवा नहीं मतदान और बदले में आने वाले अभ्‍यर्थियों जो नियमित मतदानों में नामांकन प्रक्रिया का उपयोग करके चुने जाते हैं, के नाम —- कैलिफोर्निया में राज्‍य स्‍तरीय अधिकारियों और विधायकों के लिए वापस बुलाने का तंत्र सबसे पहले वर्ष 1911 में संवैधानिक संशोधन के रूप में सामने आया जो वहां के गवर्नर हिराम जॉनसन के प्रगतिवादी प्रशासन द्वारा लागू किए गए सात सुधार उपायों में से एक था। इस संशोधन का सबसे विवादास्‍पद प्रावधान वापस बुलाए जाने वाले राज्‍य अधिकारियों में न्‍यायाधीशों का समावेश और खासकर राज्‍य सर्वोच्‍च न्‍यायालय के र्न्‍यायाधीशों को शामिल करना था। प्रस्‍तावक ने इन संशोधनों का समर्थन सरकार में बेइमानी और भ्रष्‍टाचार से लड़ने के एक और तंत्र के रूप में किया । विपक्ष ने इसे एक ऐसा तंन्‍त्र कहकर इसकी आलोचना की जो अतिवादी और असंतुष्‍ट लोग ईमानदार अधिकारियों को तंग करने और उन्‍हें हटाने के लिए प्रयोग में लायेंगे । वापस बुलाने के प्रयास कैलिफोर्निया में राज्‍य स्‍तरीय चुने गए अधिकारियों और विधायकों के विरूद्ध करने के प्रयास किए गए । विगत 30 वर्षों में सभी राज्‍यपालों को वापस बुलाने के प्रयास का कुछ हद तक सामना करना पड़ा है । वर्ष 2003 में राज्‍यपाल ग्रैन्‍ड डेविस पहले राज्‍य स्‍तरीय अधिकारी बने जिन्‍हें वापस बुलाने संबंधी चुनाव का सामना करना पडा। राज्‍य विधायकों के विंरूद्ध वापस बुलाने के प्रयास मतदान करने के स्‍तर तक पहुंच गए और चार को वाकई वापस बुलाया गया था। सीनेटर मार्शल ब्‍लैक ( आर – शान्‍ता क्‍लाय काउन्‍टी ) को 1913 में वापस बुलाया गया था और इसके बाद वर्ष 1914 में सीनेटर एडवीन ग्रान्‍ट ( डी – शान फ्रानसीसको) और एसेम्‍बली के सदस्‍य पॉल होरचर ( आर- लॉस ऐंजेल्‍स काउन्‍ट) और बोरिस एलेन ( आर – औरेंज काउन्‍ट) को 1995 में वापस बुलाया गया था। कैलिफोर्निया में स्थानीय सरकार के स्‍तर पर वापस बुलाने के कई सफल प्रयास हो चुके हैं । सामान्‍यत: कैलिफोर्निया में वापस बुलाने का सामान्‍य एतिहासिक पृष्‍ठभूमि इस प्रकार है:

Bird, Fredrick L., and Ryan, Frances M. The Recall of Public Officers: a Study of the Operation of the Recall in California. New York: Macmillan, 1930. ; Nolan, Martin F. “The Angry Governor [Hiram Johnson],” California Journal, v. 34, no. 9 (Sept. 2003), p. 12-18.  ;  Spivak, Joshua. Why Did California Adopt the Recall? History News Network, Sept. 15, 2003. ;   “The Recall Amendment,” Transactions of the Commonwealth Club of California, v. 6, no. 3 (July1911),p.153-225.(कृपया पूरा लेख यहां पढ़ें) –

railway-police-with-dog-squad-checking-railway-48196

http://igs.berkeley.edu/library/htRecall2003.html

===========================================================

भारत में यदि किसी ने केवल पाठ्यपुस्‍तक/टेक्‍सटबुक माफियाओं द्वारा लिखी गई पाठ्यपुस्तक ही पढ़ी हो तो उसके लिए यह विश्‍वास करना असंभव होगा कि इस ग्रह पर ही एक ऐसा राष्ट्र है जहाँ नागरिक उच्च न्‍यायालय के न्यायाधीश तक को बहुमत के मत द्वारा निकाल सकते हैं !! ये जनसाधारण ऐसा कैसे कर सकते हैं ? वे इनके साथ ऐसा करने का साहस भी कैसे कर सकते है? — क्‍योंकि ये न्‍यायाधीश तो भगवन से भी उपर हैं !!  कम से कम 4 अंकों  वाले बुद्धि-स्तर (IQ) के बुद्धिजीवी, जो भारत में न्याय-मूर्ति-पूजक हैं, इस बात की पुष्टि करते हैं I तो क्या यदि हटाने/रिकॉल कानून आता है तो क्या निरक्षरता विनाश  का कारण बनेगा ?  यह हटाने/रिकॉल की प्रणाली(सिस्टम) अमेरिका में वर्ष 1800 से है जब साक्षरता 10 प्रतिशत से भी कम था I तो यह तर्क देना कि- “रिकॉल भारत के लिए सही नहीं है क्योंकि अधिकतर भारतीय अशिक्षित हैं ” -गलत है I

      हटाने/रिकॉल का भय एकमात्र कारण है कि क्‍यों अमेरिका में पुलिस प्रमुख, न्‍यायाधीश           आदि  भारत के पुलिस प्रमुखों , न्‍यायाधीशों आदि की तुलना में बहुत कम भ्रष्ट हैं I कृपया ध्यान दें – अन्य कोई कारण नहीं है I और मैं एक बार फिर दोहराता हूँ – अन्य कोई कारण नहीं है I और सभी गलत तर्कों में से सबसे बेकार तर्क है “राजनीतिक संस्कृति” I “जागरूकता का अभाव” एक और बहुत गलत तर्क है I

      फिर, “अमेरिका की पुलिस में भ्रष्टाचार भारत की पुलिस की तुलना में इतना कम क्यों है” इस प्रश्न का उत्तर अथर्ववेद और स्वामी दयानंद जी के शब्दों में देते हुए कहा जा सकता है कि  इसका कारण है कि अमेरिका में पुलिस प्रमुख प्रजा के अधीन है जबकि भारत में कोई एक भी पुलिस प्रमुख प्रजा के अधीन बिलकुल नहीं है I अथर्ववेद और स्वामी दयानंद सरस्वती जी कहते है कि यदि राजा (राज कर्मचारी जैसे पुलिस प्रमुख) यदि प्रजा के अधीन नहीं है तो वह नागरिकों  को लूट लेगा I जिसे आज हम भारत में हर कहीं देख रहे हैं I अमेरिका  में केवल जिला पुलिस प्रमुख / डिस्‍ट्रीक्‍ट पुलिस चीफ, राज्यपाल, जिला न्यायाधीश, जिला शिक्षा अधिकारी, जिला लोक दंडाधिकारी(District Public Prosecutor), इतना ही नहीं अमेरिका के कुछ राज्यों में उच्च न्‍यायालय के मुख्य न्‍यायाधीश तक प्रजा के अधीन है और इसलिए अमेरिका के ये सरकारी कर्मचारी कम लूट मचाते हैं। और उसी अमेरिका में सीनेटर प्रजा के अधीन नहीं हैं और इसलिए सारे भ्रष्ट है I संघीय अधिकारियों द्वारा नियुक्त किये हुए राष्ट्रपति प्रजा के अधीन नहीं हैं इसलिए वे सारे भ्रष्ट है I तो अथर्ववेद जो कहता है, वह अमेरिका  में बिना किसी अपवाद के लागू किया गया है I और भारत में पटवारी से लेकर उच्‍चतम न्‍यायालय/सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्‍यायाधीश तक कोई भी प्रजा के अधीन नहीं है I और इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि उनमें से लगभग सभी भ्रष्ट हैं I

      और हटाने/रिकॉल का यह भय इतना प्रभावशाली है कि नागरिकों को इसका प्रयोग शायद ही कभी करना पड़ता है – अमेरिका में 0.05 प्रतिशत से भी कम अधिकारी को कभी हटाने/रिकॉल का सामना करना पड़ा है I हटाने/रिकॉल की प्रणाली(सिस्टम) ने यह सुनिश्चित किया है कि अमेरिकी अधिकारी भारतीय अधिकारियों की तुलना में शायद ही कभी केवल एक प्रतिशत तक  भ्रष्‍ट होते हैं और अपेक्षित क्षमता से काम करते हैं। वास्‍तव में, हटाने या रिकॉल की प्रक्रिया पुन:मतदान के दर को कम करती है क्‍योंकि अधिकारी अच्‍छा व्‍यवहार करते हैं और नागरिकों को शायद ही कभी उन्‍हें (हटाने/रिकॉल) हटाने  की आवश्यकता पड़ती है I

अमेरिका  के नागरिकों के पास हटाने/रिकॉल की प्रणाली(सिस्टम) वर्ष 1800 से है I परन्तु भारत के प्रमुख बुद्धिजीवी इस बात पर जोर देते हैं कि भारतवासियों को यह प्रणाली आज वर्ष 2011 में भी नहीं दी जा सकती क्योंकि भारतवासी अमरिकी लोगों की तुलना में घटिया हैं और हम भारतवासियों की राजनैतिक संस्‍कृति, नैतिक मूल्‍य, मानसिकता आदि घटिया है !! इन प्रमुख बुद्धिजीवियों को मेरा उत्तर है “अपने 4 अंकों  के बुद्धि स्तर और अपने सभी ज्ञान के साथ भांड में जाओ” I  मेरा यह विश्‍वास है कि हटाने/रिकॉल की प्रणाली को लाना होगा और यह भारतीय न्‍याय व्‍यवस्‍था, राजनीतिक व्यस्था और प्रशासन से भ्रष्टाचार और भाई-भतीजवाद कम करने का एकमात्र तरीका है I इसलिए मैं भारत के नागरिकों से यह कहता हूँ कि वे प्रधानमंत्री को सरकारी अधिसूचना(आदेश) जारी करने के लिए बाध्य करें जो हमें  प्रधानमंत्री,  उच्‍चतम न्‍यायालय/सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशों, मुख्‍यमंत्रियों,  उच्च न्‍यायालय के न्यायधीशों, मंत्रियों, जिला पुलिस प्रमुख/डिस्‍ट्रीक्‍ट पुलिस चीफ , भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर तथा ऐसे लगभग 200 पदों को बदलने में समर्थ बनाएगा I प्रत्येक पार्टी के ज्‍यादातर सांसदों और लगभग सभी प्रमुख बुद्धिजीवियों ने हटाने/रिकॉल प्रणालियों के मेरे प्रस्ताव का विरोध किया है I और इससे मुझे और आगे बढ़ने की प्रेरणा ही मिली है I

                        अब प्रश्न यह है – हम नागरिकगण भारत में प्रजा अधीन राजा/राइट टू हटाने/रिकॉल   (राइट टू रिकॉल/भ्रष्ट को बदलना/हटाना ) कैसे ला सकते है?  इसके लिए, मैंने जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली कानून के प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट  का प्रस्ताव रखा है जिसकी चर्चा मैंने अध्याय 1 में की है I

police stn  3-shot-lambert

(2.4) भारत में प्रजा अधीन राजा / राइट टू रिकॉल का संक्षिप्त इतिहास


प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का वर्णन अथर्ववेद में है I अथर्ववेद कहता है की सभी नागरिकों की जनसभा राजा को निकाल सकती है। महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने अपनी पुस्‍तक सत्यार्थ प्रकाश के छठे अध्याय में राज धर्म का वर्णन किया है और प्रथम 5 श्लोकों में से एक में वे कहते हैं – राजा को प्रजा के अधीन होना चाहिए अर्थात वह हम आमलोगों पर आश्रित हो I कृपया ध्यान दीजिए –  उन्होंने “अधीन” शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ होता है पूर्णत: आश्रित और अगले ही श्लोक में महर्षि दयानंद जी ने कहते हैं यदि राजा प्रजा के अधीन नहीं है तो वह राजा प्रजा को उसी तरह लूट लेगा जिस तरह एक मांसाहारी जानवर दूसरे जानवरों को खा जाता है। और इस प्रकार वैसा राजा (जो प्रजा के अधीन नहीं) राष्ट्र का विनाश कर देगा I और महर्षि दयानंद जी ने ये दोनों श्लोक वर्षों पहले लिखे गए अथर्ववेद से लिए हैं I और यहाँ राजा में प्रत्येक राज कर्मचारी सम्मिलित है अर्थात उच्‍चतम न्‍यायालय/सुप्रीम कोर्ट के न्‍यायाधीश से लेकर पटवारी तक सरकार के सभी कर्मचारी I  सरकार का प्रत्येक कर्मचारी प्रजा के अधीन होना चाहिए अन्‍यथा वह नागरिकों को लूट लेगा I ऐसा ही वे महात्‍मा कहते हैं जिन्‍होंने अथर्ववेद लिखा और महर्षि दयानंद सरस्वती जी उन महात्‍माओं की बात से सहमत हैं। इस प्रकार प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल भारतीय वेदों के मूल में है और इस प्रकार सारी

भारतीय विचारधाराओं, भारतीय मत, पंत और धर्मों ने अपनी आधारभूत भावना वेदों से ही ली हैं I

       और कृपया ध्यान दीजिए –  दयानंद सरस्‍वती जी संविधान-अधीन राजा के बारे में नहीं कहते। वे प्रजा अधीन राजा/राइट टू हटाने/रिकॉल के बारे में कहते हैं। भारत में, 4 अंकों के स्‍तर के बुद्धिजीवियों ने हमेशा उस बात का विरोध किया जो अथर्ववेद और सत्यार्थ प्रकाश सुझाते हैं I 4 अंकों  वाले स्तर के ये बुद्धिजीवी कहते हैं कि राजा और राज कर्मचारी अर्थात सरकारी कर्मचारियों को प्रजा के अधीन कदापि नहीं होना चाहिए बल्‍कि उन्हें केवल संविधान-अधीन अर्थात किताबों के अधीन जैसे संविधान के अधीन होना चाहिए। संविधान-अधीन राजा अर्थात संविधान-अधीन मंत्री, संविधान-अधीन अधिकारी, संविधान-अधीन पुलिसवाले और संविधान -अधीन न्‍यायाधीश की पूरी संकल्‍पना ही एक छल है क्‍योंकि तथाकथित संविधान  की व्‍याख्‍या को न्‍यायाधीशों, मंत्रियों आदि  द्वारा एक मोम के टुकड़े की तरह तोड़ा-मरोड़ा जा सकता हैI संविधान

की पूरी संकल्‍पना एक राक्षसी विचार है जिसे केवल भ्रम पैदा करने के लिए ही सृजित किया गया है I

1

(2.5) पूरे विश्व में  प्रजा अधीन राजा / राइट टू रिकॉल का संक्षिप्त इतिहास

प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का प्रयोग यूनान में वर्ष 500 ईसा-पूर्व में किया गया था I यूनान के लगभग प्रत्येक नगर में यह प्रणाली थी जिससे नागरिक सभा करके राजा को निकल सकते थे I यहाँ तक कि मेसीडोनिया का शक्तिशाली सिकंदर, जिसने यूनान और सिंधू के सभी राजाओं को हराया था, वह भी नागरिकों द्वारा निकाले जाने के दायरे में था !! इस बात का कोई ज्ञात अभिलेख/रिकॉर्ड नहीं है कि क्‍या इस प्रक्रिया/तरीके का प्रयोग कभी किसी राजा को निकालने के लिए किया गया था? – ऐसा इसलिए था कि प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल एक ऐसा भय पैदा करता है जो राजा को सही व्यहार करने के लिए बाध्य करता है, और उसे निकालने के लिए इस कानून का प्रयोग करने की शायद ही कभी होती है।

      अब प्रत्‍येक राष्‍ट्र की तरह यूनानी राष्ट्रों को एक और भी मुद्दे का सामना पड़ा – क्या हो यदि राजा स्वयं अभद्र आचरण ना करे परन्तु उसका कोई कर्मचारी अभद्र व्‍यवहार करे? किसी अधिकारी द्वारा सत्‍ता का दुरूपयोग जैसे छोटे  हरेक मामले पर सभी हजारों नागरिकों की सभा बुलाना बहुत ही महंगा और समय बर्बाद करने वाला काम है। और यदि राजा और वरिष्‍ठ/सीनियर अधिकारियों को, कनिष्‍ठ/जूनियर अधिकारियों को नियंत्रित करने का अधिकार दे दिया जाता है तो जूनियर अधिकारी केवल अपने सीनियर अधिकारियों की बात सुनेंगे, नागरिकों की नहीं I तो प्राचीन यूनान के नागरिकों ने अधिकारियों को नियंत्रित करने के लिए एक अत्‍यधिक कुशल तरीके का प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट बनाया I प्रत्येक बार जब किसी अधिकारी पर अपराध का आरोप लगता था तो यह तय करने के लिए किन्‍हीं 50 नागरिकों को चुना जाता था जो यह निर्णय लेते थे कि क्‍या अधिकारी को निकलना है/दंड देना है I और अनियमित तरीके से चुने गए ये नागरिक सर्वोत्‍तम संभव और कम भाई-भतीजेवाद से प्रभावित, राष्‍ट्र के सभी नागरिकों की इच्‍छा के प्रतिनिधि समझे जाते थे( जो ठीक ही था)। और यदि अधिकारी सीनियर है तो उस मामले में निर्णय देने के लिए बिना अनियमित/क्रम-रहित तरीके से 100 नागरिकों को चुना जाता था और यदि वह और अधिक सीनियर है तो 200, 300, 400 या 500 नागरिकों  को बुलाया जाता था I सबसे बड़ा निर्णायक-मंडल  500 नागरिकों का था I और उसके ऊपर सभी नागरिकों की सभा होती थी I इसी प्रणाली ने पश्चिम में जूरी व्यस्था को जन्‍म दिया, एक ऐसी प्रणाली जिसका अभिलेख/रिकॉर्ड प्राचीन चीन अथवा भारत आदि में कभी नहीं मिला I  काफी हद तक “जूरी की सुनवाई द्वारा अधिकारियों को निकलने का अधिकार” “प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल स्पष्ट बहुमत द्वारा” की ही तरह है (जिसमें स्‍पष्‍ट बहुमत के वोट के द्वारा ऐसा किया (निकला) जाता है)I

बाद में जूरी  व्यस्था का प्रयोग आम नागरिकों पर सुनवाई के लिए भी किया जाने लगाI यूनानवासी यह (ठीक ही) विश्‍वास करते थे की सुनवाई यदि जूरी द्वारा की जाए तो इसमें राजा या नियुक्‍त किए गए जज द्वारा सुनवाई किए जाने की तुलना में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद की सम्भावना कम है और इसलिए यूनान  में महत्वपूर्ण सुनवाई हमेशा जूरी  के निर्णय से तय होती थी I उदाहरण के लिए सुकरात  को फांसी देने के दंड का निर्णय  एथेंस के 500 नागरिकों की जूरी ने दिया था I जूरी-मंडल इस बात पर आस्‍वस्‍त थे कि सुकरात के उपदेश एथेंस से प्रजातंत्र/डेमोक्रेसी को पलटने और अनेक एथेंसवासियों की हत्या करने जैसी उसके अनुयायियों (जैसे क्रिटियस) की कार्रवाईयों के लिए जिम्मेदार है I और इस तथ्‍य ने कि सुकरात  ने प्रजातंत्र/डेमोक्रेसी को पलटने और प्रजातंत्र के अनेक समर्थकों की हत्या करने जैसे अपने अनुयायियों के कार्यों की कभी आलोचना नहीं की,  एथेंसवासियों को सुकरात  के विरूद्ध और अधिक क्रोधित कर दिया। इसके अलावा एथेंसवासियों का यह भी मानना था की यदि कोई नागरिक एथेंस की रक्षा के लिए सेना में शामिल होकर सेवा नहीं करेगा तो उसे नर्क में भगवान दंड देंगे I सुकरात  युवाओं को यह विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहा था कि ये धारणा बकवास हैं और अनेक एथेंसवासी इस बात पर आश्वस्त हो गए कि सुकरात यह सब एथेंस की सेना को कमजोर कहने के लिए कह रहा है I सुकरात को पहले एथेंस छोड़ने के लिए कहा गया,  परन्तु जब सुकरात  ने एथेंस छोड़ने से मना कर दिया तो उसकी सुनवाई 500 एथेंसवासियों की जूरी द्वारा हुई। जूरी-मंडल के लगभग 340 सदस्‍यों ने सुकरात के लिए फांसी का दंड सुनाया और 160 सदस्‍यों  ने अर्थ दंड/जुर्माना लगाने का मत दिया पर फांसी की सजा नहीं सुनाई I सुनवाई के बाद भी, सुकरात   को एथेंस छोड़ने का विकल्प दिया गया परन्तु सुकरात ने नहीं जाने का मन बनाया I उम्र-दराज और थकेहारे सुकरात ने संभवतः स्वाभाविक मृत्यु ,जो कुछ वर्षों में आने वाली थी, की तुलना में फांसी पर चढ़ने में अधिक यश और गौरव समझा I और इस प्रकार 500 जूरी   के निर्णय पर अमल किया गया I  एथेंस और बहुत से यूनानी राष्ट्रों में सभी महत्वपूर्ण निर्णय सीधे नागरिकों  द्वारा दिए गए न की नियुक्‍त किए गए न्‍यायाधीशों द्वाराI

                        रोमवासियों में साधारण लोगों की सभा(Assembly of Plebeians) सर्वशक्‍तिमान थी – और वे सीनेट/राज्‍यसभा से भी अधिक शक्तिशाली थे I सिद्धांत रूप में, साधारण लोगों की सभा के पास कानून लागू करने और यहाँ तक कि राजा को भी हटाने का अधिकार था I लेकिन चूंकि प्रक्रिया- संहिता यह थी कि “साधारण लोगों में से प्रत्येक को एक निश्‍चित स्थान पर आना होगा”, इसलिए सभी के स्‍वयं आने की असंभाव्‍यता/संभावना न होने की स्‍थिति ने साधारण लोगों की सभा को महत्‍वहीन बना दिया I जब जनसँख्या अधिक हो तो “प्रत्येक नागरिकों  का एक निश्‍चित स्थान पर आना” व्‍यवहारिक विकल्प नहीं है। और एक ऐसी व्यस्था अपनानी चाहिए जिसमें प्रत्येक छोटे क्षेत्र के लिए एक बूथ बनाई जाए I लेकिन रोमवासी बूथ व्यवस्‍था के बारे में नहीं सोच सके और न ही रोम के उच्च वर्ग ने बूथ व्यस्था की अनुमति दी और इस प्रकार “साधारण लोगों की सभा” एक (संभारतंत्रीय अव्‍यवहार्य) बूथों की कमी के कारण अव्‍यवहारिक विचार बनकर रह गया I रोमवासियों ने उच्च वर्ग के  लिए जूरी व्यस्था का प्रयोग अवश्‍य किया और जनसाधारण के किसी मामले का निर्णय जज करते थे I परन्तु रोमवासी जजों का चुनाव करते थे जिससे अन्याय कम हुआ करता था I कुल मिलाकर,  रोमवासियों के पास प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल नहीं था, परन्तु न्यायधीशो/जजों के चुनाव ने एक अत्‍यन्‍त सीमित हद तक उन्हें राइट टू रिकॉल प्रदान किया I

                  तथाकथित काले/अंधेर युग में प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल और जूरी  व्यस्था दोनों लुप्त हो गए थे I लगभग वर्ष 700 में, इस्‍लाम के आक्रमणों के कारण, यूरोप में पुजारियों और राजा के पास आम लोगों को बड़ी संख्‍या में अस्‍त्र-शस्‍त्रों से लैस करने के अलावा और कोई उपाय नहीं बचा था। और इसलिए नागरिकों को अधिक से अधिक हथियार प्राप्‍त हुए। हम आम लोगों को हथियार से लैस करना और आम लोगों द्वारा हथियारों का बनाना ही लोकतंत्र की जननी/पैदा करने वाली है। आम लोगों को हथियारलैस बनाने से आम लोग इतने मजबूत हो जाते हैं कि वर्ष 950 में इंग्‍लैण्‍ड के लोगों ने राजा को कोरोनर की जूरी के रूप में जूरी प्रणाली लागू करने पर मजबूर कर दिया जिसमें अनियमित तरीके से चुने गए 12 नागरिक किसी नागरिक की हत्‍या करने के दोषी पुलिसवाले को निकाल सकते थे । बाद में यह कोरोनर जूरी प्रणाली इतना लोकप्रिय हो गया कि नागरिकों को यह विश्‍वास हो गया कि न्‍यायाधीशों/जजों द्वारा की गई सुनवाई की तुलना में जूरी द्वारा की गई कार्रवाई में भाई-भतीजावाद कम होता है। जूरी द्वारा सुनवाई किए जाने की मांग बढ़ती गई और न्‍यायाधीशों द्वारा की गई सुनवाई या तो कम होती गई या उसका अन्‍त ही हो गया और वर्ष 1100 आते आते नागरिकों ने इंग्‍लैण्‍ड के राजा को मैग्‍ना कार्टा पर हस्‍ताक्षर करने के लिए मजबूर कर दिया। इस मैग्‍ना कार्टा में राजा को यह वचन देने पर मजबूर किया गया कि जूरी से अनुमोदन/स्वीकृति लिए बिना वह और उसके अधिकारी नागरिकों को दण्‍ड नहीं देंगे और जूरी के पास अधिकारियों को निकालने/ अर्थ दण्‍ड देने का अधिकार आ गया। इसलिए वर्ष 1200 के आते आते इंग्‍लैण्‍ड में कनिष्‍ठ/जूनियर/छोटे अधिकारियों पर “जूरी प्रणाली से राइट टू रिकॉल” लागू हो चुका था।

अमेरिका वह पहला देश था जहां राइट टू रिकॉल का चलन पूरी तरह से हुआ। मैसाचूसेट्स में पहला पुलिस कमिश्‍नर/शेरिफ का कार्यालय जो स्‍थापित हुआ था,उसमें राईट टू रिकाल था लेकिन यह अत्‍यन्‍त अनौपचारिक रूप से घोषित किया गया था। अमेरिकावासियों द्वारा वर्ष 1770 में इंग्‍लैण्‍डवासियों को निकाल बाहर करने का एक प्रमुख कारण यह था कि ब्रिटिश राजा अमेरिकी कॉलोनियों में जूरी प्रणाली और  राइट टू रिकॉल नहीं चाहते थे। 1770 इस्‍वी में स्‍वतंत्र होने के बाद राज्‍यों और जिलों में औपचारिक कानून लिखा जाना प्रारंभ हुआ। अनेक राज्‍यों ने पुलिस प्रमुखों, स्‍थानीय न्‍यायाधीशों और राज्‍यपालों के लिए राइट टू रिकॉल कानून प्रारंभ किया । लेकिन यह राइट टू रिकॉल संघ स्‍तर(देश स्‍तर पर) पर लागू नहीं किया गया। क्‍यों? उस समय, तथाकथित अमेरिकी संघीय सरकार (केन्‍द्रीय सरकार) को केवल सेना और विभिन्‍न राज्‍यों के बीच के संबंधों को चलाने का काम था और इसलिए अमेरिका की स्‍थापना करने वाले पितामहों ने कभी नहीं सोचा था कि अमेरिकी राष्‍ट्रपति, सीनेटरों और संघीय न्‍यायाधीशों/जजों के हाथों में कभी इतनी शक्‍तियां होंगी । इसलिए किसी ने भी राष्‍ट्रपति, सीनेटरों, संघीय न्‍यायाधीशों/जजों और संघीय अधिकारियों पर राइट टू रिकॉल लागू करने की बात कभी नहीं सोची। यही कारण है कि अमेरिका के ये सभी संघीय अधिकारी पूरी तरह भ्रष्‍ट हैं लेकिन उसी अमेरिका में राइट टू रिकॉल के अधीन आने वाले अधिकारी जैसे पुलिस प्रमुख, राज्‍यपाल, स्‍थानीय न्‍यायाधीश आदि कम भ्रष्‍ट हैं। इसलिए यह कोई संस्‍कृति या राजनीतिक संस्‍कृति या राष्‍ट्रीय चरित्र नहीं है – यह राइट टू रिकॉल का लागू होना या न होना है जो यह निर्णय करता है कि कोई अधिकारी कितना भ्रष्‍ट होगा।

कार्ल मार्क्स और एंजेल्स ने प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का समर्थन किया। कार्ल मार्क्स को फ्रेडरिक एंजेल्स द्वारा दी गई (1991) प्रस्‍तावना फ्रांस में गृहयुद्ध 1871 http://wwwImarxistsIorg/archive/marx/works/1871/civil-war-france/postscriptIhtm में उद्धरण है ––

“बिलकुल प्रारंभ से ही सर्वसाधारण(Commune) इस बात को मानने के लिए बाध्‍य था कि यदि मजदूर वर्ग इस बार सत्‍ता में आ जाता है तो वह पुराने राज्‍यतंत्र के प्रबंधन तरीकों से नहीं चलेगा अर्थात अभी-अभी जीते गए एकमात्र राज्‍य/ सत्‍ता को फिर से नहीं खोने के उपाय के रूप में इस मजदूर वर्ग को – एक ओर उन सभी कुचलने वाले तंत्रों, जो पहले उसके ही खिलाफ प्रयोग में लाए जाते थे – का खात्‍मा करना होगा और दूसरी ओर इसे अपने ही सरकारी अधिकारियों से अपने आप को बचाना होगा। ऐसा उन्‍हें (अधिकारियों को) बिना किसी अपवाद के , किसी भी समय वापस बुलाए जाने के अध्‍यधीन घोषित करके करना होगा। पूर्ववर्ती राज्‍यों के विशिष्ट वे कौन से लक्षण थे ? समाज ने अपने सार्वजनिक हितों की देखभाल के लिए मजदूर के आम विभाजन के जरिए अपना तंत्र सृजित किया था लेकिन इस तंत्र ने, जिसके शीर्ष पर राज्‍य की शक्‍ति थी, समय बीतने के साथ अपने विशेष हितों के अनुपालन में अपने आप को `समाज का नौकर` से रूपांतरित कर `समाज का मालिक` बना दिया। उदाहरण के लिए, इसे न केवल वंशानुगत राजतंत्र में देखा जा सकता है बल्‍कि ऐसा लोकतांत्रिक गणराज्‍य में भी देखा जा सकता है………”

लेनिन और जोसेफ स्‍टॉलिन ने भी राइट टू रिकॉल का समर्थन किया था I जोसेफ स्‍टॉलिन ने वर्ष 1937 में इंग्लॅण्ड,  यूरोप, और अमेरिकी प्रजातंत्र/डेमोक्रेसी (लोकतंत्र) का यह कहकर मजाक उड़ाया था कि इनके यूरोप में रिकॉल की प्रणाली (भ्रष्ट को हटाने की प्रणाली) नहीं है I और स्‍टॉलिन ने यह दावा किया था कि सोवियत का प्रजातंत्र/डेमोक्रेसी श्रेष्ठ है क्‍योंकि सोवियत प्रजातंत्र/डेमोक्रेसी के पास स्थानीय निचली संसद के अधिकारी (डिप्‍टी)  स्तर पर रिकॉल की प्रणाली  है I स्‍टॉलिन  ने वर्ष 1937 में कहा था :

“इसके अलावा, कामरेडों, मैं आपको कुछ सलाह देना चाहूँगा, एक प्रत्‍याशी की उसके मतदाताओं को सलाह। यदि तुम पूंजीवादी देशों का उदाहरण लोगे तो तुम विशेषकर पाओगे कि, और मैं अवश्‍य कहूंगा कि उन देशों में अत्‍यंत विचित्र संबंध प्रतिनिधियों और मतदाताओं के बीच मौजूद है। जब तक चुनाव की कार्रवाई चल रही होती है तबतक प्रतिनिधि मतदाताओं को रिझाते हैं, उनकी खुशामद करते हैं, कृतज्ञता की सौगंध खाते हैं और हर तरह के वायदों का ढेर लगा देते हैं। ऐसा लगता है मानों ये प्रतिनिधि मतदाताओं पर पूरी तरह आश्रित हैं । जैसे ही चुनाव खत्‍म होता है और ये प्रत्‍याशी प्रतिनिधि बन जाते हैं तो संबंधों में पूरी तरह से बदलाव आ जाता है। मतदाताओं पर निर्भर होने की बजाए ये प्रतिनिधि पूरी तरह स्‍वतंत्र हो जाते हैं। अगले चार या पांच वर्षों के लिए, अर्थात अगले चुनाव तक ये प्रतिनिधि जनता से और अपने मतदाताओं से भी स्‍वतंत्र, बिलकुल उनमूक्‍त महसूस करते हैं । वे एक पार्टी/दल से दूसरे पार्टी/दल में जा सकते हैं। सही रास्‍ते से गलत रास्‍ते पर जा सकते हैं। वे यहां तक कि ऐसे  मशीनी तरीकों/साजिशों में लिप्‍त हो जाते हैं जो चटपटे नहीं होते । वे जितनी चाहे उतनी कलाबाजियां खा सकते हैं। वे स्‍वतंत्र जो हैं। क्‍या ऐसे संबंध सामान्‍य माने जा सकते हैं । कामरेडों, नहीं, किसी भी तरह से नहीं।

यह परिस्‍थिति हमारे संविधान द्वारा विचार के लिए ली गई थी। और इसमें एक कानून बनाया गया था कि मतदाताओं को अपने प्रतिनिधियों को उसके पद की अवधि समाप्‍त होने के पहले ही तब वापस बुलाने, राइट टू रिकॉल का अधिकार होगा जब ये प्रतिनिधि तिकड़मबाजी करना शुरू कर दें, यदि वे रास्‍ते से भटक जाएं और यदि वे भूल जाएं कि वे जनता पर, मतदाताओं पर निर्भर हैं ।“

मैं  महाँन स्‍टॉलिन का प्रशंसक हूँ, क्योंकि उसने एक विशाल सेना का निर्माण किया था जिसने वर्ष 1940 में रूस की रक्षा हिटलर से और बाद में वर्ष 2000 में जॉर्ज बुश और टोनी ब्राउन से की थी I परन्तु स्‍टॉलिन का राइट टू रिकॉल प्रणाली  एक पूर्ण परिहास था — किसी भी नागरिक को, जो राइट टू रिकॉल की मांग करता था, को या तो कारावास या यहां तक कि फांसी भी दी जा सकती थी। इसलिए जहां एक ओर स्‍टालिन ने सिद्धांत रूप में राइट टू रिकॉल का समर्थन किया वहीं व्‍यावहारिक रूप में उसने इसका विरोध किया था। साथ ही उसका यह बताना कि पश्‍चिम में राइट टू रिकॉल नहीं है, गलत था।( अलग से: मैं यह दोहराना चाहूँगा कि मैं स्‍टालिन का प्रशंसक हूँ क्‍योंकि उसने एक सेना, हथियार बनाने के कारखाने और परमाणु हथियारों का निर्माण किया जिससे रुस की रक्षा हुई। स्‍टॉलिन के सेना को सुदृढ़ करने का तरीका वह एकमात्र कारण हैं जिसके कारण अमेरिका और इंग्‍लैण्‍ड ने आज भी रुस को एक इराक बनाने का साहस नहीं किया है।)

(2.6) आधुनिक भारत में राइट टू रिकॉल


भारत में एम एन रॉय ने 1946 में लिखी अपनी पुस्‍तक “द क़ानून-ड्राफ्ट कान्‍सटिट्यूशन ऑफ इंडिया” में प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का समर्थन किया। भारत की दो प्रमुख कम्‍यूनिस्‍ट पार्टी/दल सी पी आई और सी पी एम अपने भाषणों में वर्ष 1950 के दशक से ही वापस बुलाने के अधिकार अर्थात प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल की मांग करते आ रहे हैं। और भारत में 960 से भी अधिक पंजीकृत पार्टी/दल हैं जिनमें से तीन सौ से अधिक पार्टी/दल प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का समर्थन करते हैं। जय प्रकाश नारायण 1950 के दशक से ही प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल की मांग करते रहे और 1970 के दशक में उन्‍होंने अपनी मांग तेज कर दी थी। जनता पार्टी के 1977 के चुनाव घोषणापत्र, जिसपर मोरारजी देसाई, अटल बिहारी बाजपेई और लाल कृष्‍ण आडवानी आदि सरीखे नेता चुनाव लड़े, की मुख्‍य मांगों में से एक प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल की मांग थी। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने असंख्य बार प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का समर्थन किया है। और उनके द्वारा इसके लिए समय आने पर कार्रवाई न करना निराशाजनक है। उदाहरण के लिए, 1977 में, बहुत बड़े अंतर से संसद का चुनाव जितने के बाद यदि जय प्रकाश 500,000 युवाओं को संसद को घेरने और तबतक सांसदों से बाहर आने नहीं देने को कहते जबतक कि वे प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल कानून को लागू न कर दें, तो भारत को तीन ही दिनों में प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल कानून मिल गया होता । लेकिन जयप्रकाश ने कभी भी युवाओं से ऐसा आह्वान नहीं किया । वर्ष 2004 में भी जब सी पी आई/सी पी एम के 60 सांसद थे तब भी उन्‍होंने अपने प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट पर मतदान की मांग नहीं की।

और भारतीय सांसदों और उम्‍मीदवारों में से किसी ने भी (मुझे छोड़कर) कभी प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट प्रस्‍तुत नहीं किया। मई 2009 में संसद के चुनाव में 5000 से ज्‍यादा उम्‍मीदवार  थे। लालू यादव जैसे कईयों ने कहा कि वे प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का समर्थन करते हैं। लेकिन मैं एकमात्र उम्‍मीदवार था जिसने उस प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल कानूनों का प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट दिया जिसका मैं समर्थन करता हूँ । सी पी आई और सी पी एम के सांसदों ने उन प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल प्रक्रिया/तरीकेओं के प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट उपलब्‍ध कराने से हमेशा इनकार किया जिनका वे समर्थन करते हैं। जय प्रकाश नारायण ने 25 वर्षों में कभी प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट नहीं दिए और हमेशा प्रारूपों पर चर्चा को टालते रहे। लालू यादव और मुलायम सिंह यादव जैसे जय प्रकाश नारायण के अनुयायी दावा करते हैं कि वे प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का समर्थन करते हैं लेकिन जिन कानूनों का समर्थन करने का वे दावा करते हैं उनके प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट देने से इन्‍होंने मना कर दिया। सोमनाथ चटर्जी पिछले 25 वर्षों से सांसद रहे हैं और 25 वर्षों से इन्‍होंने प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का समर्थन किया है लेकिन जिस प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल कानून का ये समर्थन करते हैं उसका प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट को इन्‍होंने कभी आत्‍मसात नहीं किया। मरे विचार में, ये सभी प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट रहित नेता झूठे, जालसाज, धोखेबाज और ढोंगी हैं।

1990 तक, समाचारपत्रों के स्‍तंभलेखक, पाठ्यपुस्‍तकों के माफिया और मीडिया के मालिकों ने यह तय कर दिया कि समाचार पत्रों और पाठ्यपुस्‍तकों में प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल पर कोई जानकारी बिलकुल ही नहीं है। आज, शायद ही कोई युवा यह जानता है कि प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का मतलब क्‍या है और यहां तक कि राजनीति शास्‍त्र के स्‍नातकोत्‍तर/एमए भी नहीं जानते कि अमेरिका के नागरिकों के पास पुलिस प्रमुख और न्‍यायाधीशों के विरूद्ध प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल है। यहां तक कि जय प्रकाश नारायण के समर्थकों ने भी 1980 के बाद व्‍यवहारिक तौर पर प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल की अनदेखी करना शुरू कर दिया।

भारत में धनवान व्‍यक्‍ति प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल से अत्यंत घृणा करने लगे। अब अधिकांश बुद्धिजीवी धनवान लोगों के ऐजेंट हैं और इसलिए सभी बुद्धिजीवियों ने भी प्रधानमंत्री, मुख्‍य मंत्रियों, न्‍यायाधीशों के विरूद्ध प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का विरोध किया । इस हद तक कि भारत के इन बुद्धिजीवियों ने अपने स्‍तंभों और पाठ्यपुस्‍तकों में इन समाचारों को भी लिखने से इनकार कर दिया है कि अमेरिका के नागरिकों के पास जिला पुलिस प्रमुखों और न्‍यायाधीशों को निकालने की प्रक्रिया/तरीके है। यह सोचकर कि ऐसे न हो कि ये जानकारी से  समाचार पाठक और छात्र प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल के बारे में सोचने लगें । अधिकांश सांसदों, विधायकों, मंत्रियों, सेनानिवृत्‍त न्‍यायाधीशों आदि जिनसे मैं मिला हूँ , उन्‍होंने प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का विरोध किया है और सबसे ज्‍यादा नुकसान किसी और ने नहीं बल्‍कि जय प्रकाश नारायण ने किया है जिन्‍होंने हमेशा स्‍वयं को प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल के समर्थक होने का दिखावा किया लेकिन जब जनता पार्टी के उनके अपने आदमी वर्ष 1977 में सत्ता में थे तब प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट प्रस्‍तावित करने से मना कर दिया ।

जब मैंने भारत में 13 जुलाई 1999 को प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल कानून प्रारूपों/ड्राफ्टों का प्रचार – प्रसार शुरू किया तों मैने पाया कि युवाओं में से लगभग किसी को भी प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल के बारे में कोई जानकारी नहीं थी । यह विशेष रूप से मेरे 8-10 समाचार पत्रों के विज्ञापनों, 100000 पर्चियों (पम्‍फलेटों) के वितरण, 1000000 से भी ज्‍यादा ई-मेल भेजने और इंटरनेट समुदायों में 10 हजार बार लिखने के कारण है कि 13 जुलाई, 2010 तक भारत में लगभग 50 हजार से 1 लाख लोग यह जान पाए कि प्रधान मंत्री, मुख्‍यमंत्रियों, न्‍यायाधीशों के विरूद्ध प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल क्‍या है। इस 50 हजार से 1 लाख लोगों में से कई लोगों ने इस खबर को आगे फैलाना शुरू कर दिया और भारत के 60 वर्षों के इतिहास में मैं पहला और एकमात्र चुनावी उम्‍मीदवार था जिसने प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल कानूनों के प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट का प्रस्‍ताव किया है जिसकी मैं मांग कर रहा हूँ और वायदा करता हूँ । मैं नागरिकों से अनुरोध करता हूँ कि वे उन नेताओं से प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल कानूनों के प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट की मांग करें जो प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का समर्थक होने का दावा करते हैं। इस अनुरोध से बचने या इसकी अनदेखी करना यह साबित कर देगा कि वे वास्‍तव में प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का समर्थन नहीं करते और वे केवल पांचवीं सदी के यूनानी चिकित्‍सक की ही तरह हिपोक्रैटिक हैं।

कुल मिलाकर, समकालीन भारत में अर्थात वर्ष 2010 में मैं उन कुछेक राजनीतिज्ञों में से हूँ जो प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल की जानकारी फैला रहे हैं। यदि मेरा तरीका सही है तो जल्‍दी ही नया आने वाला हरेक राजनीतिज्ञ प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल  का समर्थन करने को बाध्‍य होगा और इससे भारत में प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल  का आना सुनिश्वित होगा।

 

(2.7) भारत में राइट टू रिकॉल / प्रजा अधीन-राजा प्रणाली (सिस्टम) की संवैधानिक वैधता


भारत में बुद्धिजीवी इस बात पर जोर डालते है की राइट टू रिकॉल असंवैधानिक  है !! सातवें अध्याय में मैंने सरकारी अधिसूचना(आदेश) का प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट प्रदान किया है जिसका प्रयोग करके नागरिक सुप्रीम कोर्ट के प्रधान जज(उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश) को बदल सकते हैं I आज तक किसी भी बुद्धिजीवी को प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट पढ़ने और मुझे बताने का समय नहीं मिला कि मेरे प्रस्तावित सरकारी अधिसूचना(आदेश) का कौन सा खण्‍ड संविधान का उल्लंघन करता है !! या ऐसा हो सकता है जो प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट मैंने अपनी वेबसाइट पर दिया है उन्होंने उसे पढ़ा हो पर जो मैंने उन्हें व्यक्तिगत रूप से दिया है या मेल भेजकर दिया है, उन्‍हें उसमें कुछ असंवैधानिक नहीं मिल पाया हो और इसलिए वे दावा कर रहे हैं कि उन्होंने प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट को पढ़ा ही नहीं हैI जो भी हो,
हम नागरिकों ने संविधान लिखा है और हम नागरिक ही निर्णय लेंगे की क्या संवैधानिक है और क्या नहीं I और इसलिए मेरा लिखा प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट संवैधानिक है या नहीं इसका निर्णय भारत के नागरिक लेंगे ना कि भारत के सुप्रीम कोर्ट के जजI

क़ानून संवैधानिक है या नहीं इसका निर्णय करने का भारत में तरीका क्या है?

1)भारतीय सरकार कोई भी क़ानून बना सकती है |

2)यदि कोई क़ानून को असंवैधानिक होने का दावा करता है तो उसे उच्चतम न्यायालय या उच्च नयायालय के न्यायाधीशों को उसे रद्द करने के लिए कहना पड़ेगा |पहले न्यायाधीशों को कोई क़ानून संवैधानिक/असंवैधानिक पर सहमत होते हैं , फिर नागरिकों को निर्णय लेना होगा | यदि नागरिक बहुमत न्यायाधीशों से असहमत होते हैं तो , वे सांसदों से न्यायाधीशों को हटाने के लिए कह सकते हैं और उनके बदले किसी और न्यायाधीश को रखने के लिए कह सकते हैं जो उनके बहुमत के अनुसार निर्णय बदल दे|

`पारदर्शी शिकायत प्रणाली` और  प्रजा अधीन प्रधानमंत्री का हर खंड संविधान के अनुच्छेद भाषण की स्वतंत्रता से आता है

(2.8) क्या आधुनिक अमेरिका में राइट टू रिकॉल / भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा बदलने का अधिकार अथर्ववेद से आया ?


क्या आधुनिक अमेरिका में राइट टू रिकॉल अथर्ववेद से आया ? अमेरिका और यूरोप में प्रजातंत्र/डेमोक्रेसी और राइट टू रिकॉल से जुड़े हुए अधिकतर राजनीतिक विचार तब आए जब अँग्रेज़ों ने भारत में कदम रखा और उन्होंने संस्कृत में लिखे मूलग्रंथों को देखा I और  वर्ष 1757 में इन विचारों में तब तेजी आई जब रोबर्ट क्लाइव ने सिराज-उद्दौला को हरा दिया और कोलकाता और भारत के अन्य शहरों से दस हजार से भी ज्‍यादा संस्कृत की प्राचीन पुस्‍तकों को खरीदकर या उन्‍हें जब्त करके उन्‍हें जहाज में भरकर इंग्लैण्‍ड भेज दिया।  लगभग वर्ष 1758-60 में बहुत सारे पुस्‍तक इंग्‍लैण्‍ड  से अमेरिका भेज दिए गएI और 1760 के दशक की शुरूआत में अमरिका में प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल सामने आया I अब मेरे पास इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि अमेरिका  के राजनीतिक विचारकों ने प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का विचार संस्कृत के ग्रंथो से लियाI पर लागू होने का काल इतना महत्वपूर्ण है कि इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती I

(2.9) राइट टू रिकॉल की मेरी खोज और अथर्ववेद (सत्यार्थ प्रकाश)


मुझे  वर्ष 1987 में IITD  में अपने आर्य समाजी साथी से सत्यार्थ प्रकाश पढ़ने का अवसर मिला जब हमदोनो एक ही कमरे में रहते थे I उस पुस्‍तक का एक श्लोक कि “राजा को प्रजा के अधीन होना चाहिए”  मेरे दिल को छु गया और हमेशा के लिए मेरे ह्रदय में रह गया I पर क्‍योंकि मैं अपनी पढाई और परीक्षा आदि में इतना व्यस्त हो गया कि कुछ वर्षों में मैं  भूल गया कि मैंने इस श्लोक को सत्‍यार्थ प्रकाश में  पढ़ा है Iफिर 1990 में मैं  अमेरिका चला गया और मैंने देखा की पुलिसवाले, कनिष्‍ठ/जूनियर अधिकारी आदि यहां वास्तव में भ्रष्ट नहीं हैं I मैंने इसका कारण ढ़ूंढना शुरू कियाI उन दिनों वहाँ भी कोई इंटरनेट नहीं था, और पता लगाने के लिए मैं 100 से भी अधिक ग्रन्थालय गया और मैने अनेक नगर-बैठकों में हिस्‍सा लिया I लगभग 7 वर्षों के बाद वर्ष 1997 में मुझे इस सच्चाई का पता लगा कि अमेरिका  के नागरिकों के पास किसी भी जिला पुलिस प्रमुख को निकालने की प्रणाली  है और तभी “राजा को प्रजा के अधीन होना चाहिए”  की सूक्‍ति मेरे मन में अचानक आई और तुरंत ही मुझे यह बात समझ आई कि अमेरिका के पुलिस में भ्रष्टाचार इतना कम क्यों है I परन्तु उस समय 1997 में मुझे यह स्मरण नहीं हो रहा था कि मैंने यह वाक्य कहाँ और किस पुस्‍तक में पढ़ा है I वर्ष 2009 में मैं परम पूजनीय बाबा रामदेव जी के भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के साथ जुड़ा और भारत स्वाभिमान के कार्यकर्ताओं को राइट टू रिकॉल का प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट दिखाया I भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के अनेक कार्यकर्ताओं ने कहा कि राइट टू रिकॉल का विचार सत्यार्थ प्रकाश के विचार से पूरी तरह मिलता है I और वर्ष 2010 में मैंने सत्यार्थ प्रकाश एक बार फिर पढ़ी और मुझे याद आया की मैंने यही पुस्‍तक वर्ष 1987 में पढ़ी थी और जो राइट टू रिकॉल के मेरे विचार को आगे बढ़ा रही है I

तो हाँ, सत्यार्थ प्रकाश के छठे अध्याय के पहले पृष्‍ठ में उल्‍लिखित यह वाक्य कि “राजा को प्रजा के अधीन होना चाहिए” बहुत हद तक मुझे इसे समझने और प्रजा-अधीन राजा/राइट टू रिकॉल प्रणाली का  प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट  लिखने की प्रेरणा दे रहा है Iv

Imported weapons of India

India has emerged as the largest arms importer in the world. More than 70% of the needs of the Indian armed forces are imported and Indian weapons purchases account for about 9% of the global arms trade. Each time a weapon system is imported, the costs are astronomical and we get trapped into expensive service contracts, ammunition purchase, potential possible arms embargos etc. During the years 2007-2012 contracts for approximately 50 Billion dollars worth of weapons have been signed.

DRDO was established in 1958 to indigenize defense weapon production. Yet after more than 34 years, it has embarrassingly little to show for itself. The CAG reports that 70% of the products that DRDO produces are rejected by the armed forces. Others are delayed for decades. Some of the more notable delays are

# Arjun-Main Battle Tank- 40 year development. End product is 50% overweight and the heart of the system, the fire control system has been developed by Elbit  systems in Israel

# LCA-Tejas- 30 year development. Still in flight tests. Only the control system and airframe are indigenous. All other components including the ejection seat are imported.

# Nag-Anti tank missile- 30 year delay. Failed user trials as late as last month

# Trishul-Anti aircraft missile, abandoned in 2008 after 20 years

# Kaveri engine- 16 year delay with cost escalation of 800%. Still not airworthy . Delays in the engine have compounded delays of the LCA program.

# Even the most basic items such as artillery guns and howitzers have not been produced by DRDO.

# We import even the ammunition for our tanks at exorbitant prices as was pointed out by Retd Gen V.K. Singh

# BEML has been unable to indigenously manufacture a truck and continues to import them from TATRA after 3 decades. Indigenization is confined to replacing tires, bolts & nuts.

# It now appears that India will start importing assault rifles to replace the standard issue INSAS rifle. It is important to remember that assault rifles such as the AK-47 are even assembled in bazaars and road-side shops in Afghanistan. We will probably end up importing even bullets and cartridges next.

# The so called shining examples of DRDO success namely the Agni and Prithvi range of missiles have of late failed a series of user trials. Their low reliability (50% probability of successful strike coupled with hours of pre-launch preparations) causes the very credibility of our nuclear deterrent to be questioned. A recent India today articles highlights these same issues.

# Its premier UAV the Nishant is not aerodynamic, takes hours to deploy and the army has been compelled to accept a dozen.

Despite its unclassified salary budget of over 10,000 Crores  there is very little for DRDO to be proud about, other than instant food packets and portable toilets.

This article will now try to analyze what ails this organization and proceed to highlight the consequences of failure and suggest some remedial action.

Causes for Failure
01. Aiming ridiculously high and failing : A typical missile requirement would state that the user wants a missile that is shorter, lighter, lesser cross-section and has a higher payload than any other missile in its class. This is the equivalent of wanting a bride who is tall and short, fair and dark, fat and thin. Instead of having the courage of conviction to say that the requirements cannot be achieved, DRDO agrees to such requirements and fails miserably.

The latest fancy is to develop reusable missiles, which will return after dropping their payload. No one points out that such technology already exists and is called an aircraft

02. Imprecise project definitions : Some DRDO project documents call for development of indigenous technology in a particular field. After attempting and failing to develop this technology, DRDO surreptitiously orders the components from private companies who in turn may or may not be importing them.

They cleverly exploit the difference between indigenous and in-house.

03. Lack of accountability and peer review : DRDO’s progress in various fronts is judged by Professors from the IIT’s, IISc etc. However these very people receive funds from DRDO for their research. This creates a climate of patronage where no one speaks out. Every milestone is declared a success, but the project fails to deliver.

The head of DRDO serves as the chief scientific advisor to the Government, and has a clear conflict of interest.

04. Overstaffed : DRDO’s colossal employee size overshadows the size of R&D teams in Saab, Boeing, Lockheed, Sukhoi and MIG combined. Even if a few good scientists are present, they get inundated in an ocean of mediocrity. It is worth mentioning that HAL designed her first jet fighter in the 1960’s in just 3 years with the German Engineer Kurt Tank and a team of a dozen Indians. The old adage that a thousand monkeys on a typewriter cannot churn out Shakespeare comes to mind.

05. Lack of Skilled scientists : Most DRDO scientists are recruited through an exam called SET (scientist entrance test). There isn’t even a test for Aerospace. So the Aerospace engineer aspiring to join DRDO would be forced to take a mechanical engineering test where he would be tested on roof trusses and welding joints. Important subjects like fluid mechanics or control theory are not even tested.

06. Inability to attract and retain talent : DRDO pay scales are so low and bureaucratic procedures are such a hassle that even the few Indian scientists who return out of patriotism for their country after having worked in defense R&D labs overseas quit in disgust. Many DRDO labs do not even have internet access for ‘security reasons’. Having intellectually walled themselves in, they have no knowledge of the advances taking part around the world. Considering the state of affairs we would be doing the greatest disservice to our enemies if we were to give them access to the crude ‘technology’ developed by DRDO.

07. No practical experience : When DRDO is asked to design a weapon, the ‘scientists’ assigned to the task have never even seen the weapon up close or in action. There is no program by which they can embed themselves with the army unit, see the weapon in action, understand it and suggest improvements or modifications. As a result the first few designs are amateurish and laughable at best

08. Penny wise and pound foolish : Importing a weapon to take it apart, study it and reverse engineer it like the Chinese would be declared an unjustifiable expense. Despite its massive 10000Cr budget scientists from different labs wouldn’t be trusted to use their own vehicles to attend a meeting. Instead they must book an ‘approved’ taxi days in advance. The taxi would invariably be late and meetings start hours late. Clearly the bureaucracy doesn’t value the time of its scientists.

09. Lack of peer review : Most of the mathematical basis for the ‘research’ conducted is dubious. Worldwide peer reviewed journals are the best way to discuss and criticize research. DRDO has a bunch of in-house journals where the same set of ‘scientists’ publish, review and pat each other on the back.

10. No transmission or dissemination of knowledge : One DRDO lab has no clue as to what the other is trying to do, so they end up trying to solve the same problem over and over again. There have been a few success stories such as the design of the control law for the LCA. But the program has taken so long, that the scientists involved would retire and new scientists recruited for another program would have to relearn everything from scratch. Therefore the next aircraft program would take just as long as the LCA.

Consequences of failure
The government has a vested interest in letting this state of rot continue. DRDO is given a chance to develop various weapon systems, knowing fully well that it will fail after trying for decades.

This is then used to justify imports and the usual coterie of arms dealers make a killing selling obsolete arms to the armed forces at exorbitant prices. The ultimate price is paid by our brave troops who do not have the best weapons at their disposal.

Remedial Action
# Shut down DRDO. If this is not possible, since there are guaranteed jobs for government employees, reduce it’s funding to zero. Stop hiring and let it die a natural death.

# Researches on small arms, grenades, RPG’s etc are best left to the engineering corps of our army who work with these weapons everyday. Task these engineers with replicating and improving armaments that we currently import.

# Judiciously select about a dozen scientists from DRDO who are technically competent. If necessary conduct an exam to test them on the fundamentals of the fields they are specializing in.

# For Large items such as aircraft, we need to pay and get the best engineers from Sukhoi, Lockheed etc so that they may train a dedicated and knowledgeable team of a dozen engineers.

# There should be no place for reservation or any limit on pay to this elite team of engineers. In fact we would be hard pressed to find a dozen such people.

# Encourage the private sector to design and develop weapon systems. They should be allowed to design and manufacture complete weapon systems and line replaceable units. Our private sector needs to stop imagining that R&D consists of BPO’s, call centers and Nanos.

अध्याय 3

`जनता  की आवाज-पारदर्शी  शिकायत /प्रस्ताव  

  प्रणाली  (सिस्टम)`

(3.1) `जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)` में बाद में जोड़े गए अंश जो इसे सुरक्षित बनाते हैं

आगे चलकर, इस प्रस्ताीव में निम्न्लिखित विशेषताएं/अच्छा्इयां जोड़ी जाएंगी जिसके गुण फर्जी मतदान को कम करने और इस तर्क का जवाब देने के लिए काम आएंगे कि इसमें फर्जी

मतदान होगा और इसलिए इस प्रक्रिया/तरीके को कभी अस्तिेत्वफ में नहीं आने देना चाहिए—

2. पटवारी का कम्यूु टर एक कैमरे से जुड़ा होगा ताकि वह नागरिकों की तस्वी र और फिंगर-प्रिन्टु को स्कैून कर ले और इसे स्टोार करके हां-नहीं रसीद पर डाल दे। इस प्रकार यदि कोई1. नागरिकों की अंगुलियों के निशान (फिंगर प्रिंट्स) कम्प्यूेटर में होंगे ताकि कम्प् ‍यूटर अंगुलियों के निशान का उपयोग मतदान करने वाले मतदाता की पहचान के लिए कर सके।

व्याक्तिू बहुत से हां-नहीं दर्ज करेगा तो उसकी पहचान करना और उसे गिरफ्तार करना संभव हो जाएगा।

3. नागरिक को एक पासबुक दिया जाएगा जिसमें उसके द्वारा दर्ज किए गए सभी हां-नहीं की सूची होगी । इसलिए यदि कोई अन्य व्यक्तिग फर्जी रूप से स्वऔयं को वह नागरिक बताकर हां-

नहीं दर्ज करता है तो उस नागरि-मतदाता को पता चल जाएगा।

4. प्रत्येंक नागरिक को हर महीने एक विवरण-पत्र मिलेगा जिसमें उसके द्वारा पिछले छह महीने में दर्ज किए गए हां-नहीं की सूची होगी । इसलिए यदि किसी फर्जी व्यरक्तिक ने हां-नहीं दर्ज

कराया है तो विवरण से असली मतदाता नागरिक को इसका पता चल जाएगा।

5. यदि कोई नागरिक चाहे तो वह अपना मोबाइल फोन नम्बदर दर्ज करा सकता है और जब भी वह हां-नहीं दर्ज करेगा, उसे एक एसएमएस प्राप्तक होगा । इस तरह, यदि कोई ढोंगी व्यक्तिा

उसका छद्म रूप बनाकर हां-नहीं दर्ज कराता है तो उस नागरिक को इस बारे में तुरंत पता चल जाएगा।

6. यदि नागरिक चाहे तो वह अपना ई-मेल पता दर्ज करा सकता है और जब भी वह हां-नहीं दर्ज करेगा , उसे ईमेल संदेश प्राप्तह होगा। इस तरह यदि कोई ढोंगी व्यक्तिु छद्म रूप से उसका वेश

बनाकर हां-नहीं दर्ज कराता है तो उस नागरिक को इस बारे में तुरंत पता चल जाएगा।

ये सब कार्य हां-नहीं दर्ज कराने के कार्य को बैंकिग से भी ज्यािदा सुरक्षित बना देंगे। इन सुरक्षा उपायों से फर्जी मतदाता पांचवे अथवा छठे प्रयास तक पकड़ लिया जाएगा। और इससे फर्जी

मतदान की संख्याद में कमी आ जाएगी। अब “हां-नहीं का एक प्रतिशत फर्जी हो सकता है और इसलिए सभी 72 करोड़ मतदाताओं को हां-नहीं दर्ज करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए”,

यह एक ओछा तर्क होगा।

2

protestpetitions_web

(3.2) क्याक नागरिक हजारों बार केवल हां-नहीं ही दर्ज करवाते रहेंगे?

जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली – सरकारी अधिसूचना(आदेश) के लिए प्रत्येक शपथपत्र अथवा प्रत्येतक प्रस्ता वित

कानून पर हां-नहीं दर्ज कराने की जरूरत नहीं है और नागरिकों से ऐसी आशा भी नहीं की जाती है और न ही इसका मतलब है कि सांसद, विधायक कोई और कानून नहीं बना सकते – वे ऐसा कर

सकते हैं जैसा कि वे अभी करते हैं। जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली – सरकारी अधिसूचना(आदेश) का अर्थ केवल यह है

कि यदि कोई नागरिक किसी कानून के संबंध में सरकारी वेबसाइट पर हां-नहीं दर्ज कराना चाहता है तो सरकार उसका रास्ताश नहीं रोकेगी और सरकार उसकी हां-नहीं सरकारी वेबसाइट पर दर्ज

कर लेगी । अपने सभी लोग यहां के हजारों कानूनों में से सभी कानूनों पर हां-नहीं दर्ज नहीं करेंगे। लेकिन कुछ प्रतिशत लोग लगभग 100-200 कानूनों पर हां-नहीं दर्ज कर सकते हैं और कुछ

प्रतिशत लोग डी.वी.ए ,498 ए आदि कानूनों के लिए काफी उंचे जा सकते हैं । यह कुछ प्रतिशत हां अथवा नहीं उस कानून के पक्ष में अथवा विपक्ष में एक शक्तिसशाली आन्दोरलन तैयार कर

सकता है। जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली – सरकारी अधिसूचना(आदेश) केवल एक अतिरिक्तर राय का सृजन करता है

। नागरिकगण अधिकांश कानूनों के लिए विधायकों, सांसदों पर निर्भर हो सकता है और किन्हींह कानूनों को रद्द करने की मांग कर सकता है लेकिन कई बार ऐसा होता है जब सांसद विधायक

सूनने से मना कर देते हैं उदाहरण के लिए नागरिकों की बहुमत चाहती है कि 498 ए और डी वी ए रद्द हो जाए लेकिन सांसद, विधायक इस कानून पर अड़े हैं क्यो कि यह कानून पुलिसवालों को

बहुत घूस/रिश्व त दिलवाता है और विधायकों, सांसदों को आई पी एस अधिकारियों के जरिए इन घूसों में हिस्सा मिलता है। इसी प्रकार लगभग सभी आम लोगों की ही तरह मैं भी इस बात से

सहमत हूँ कि जजों, प्रोफेसरों, पुलिसवालों और छात्रों के भारतीय प्रबंधन संस्थाोन में भर्तियों के दौरान साक्षात्का र/इंटरवू पर रोक होनी चाहिए। लेकिन सभी सांसद, विधायक और बुद्धिजीवी

वैसे कानून पर अड़ जाते हैं जो साक्षात्कारर को बढ़ावा देते हैं । वे लोग साक्षात्का रों का समर्थन करते हैं क्योंकि यह उन्हेंा घूस/रिश्व त वसूल करने में मदद करता है, उनके संबंधियों को भर्ती में

फायदा पहुंचाता है और मेधावी लेकिन “वैचारिक असुविधाजनक “ वाले लोगों को निकाल बाहर करता है। यही वह समय होता है जब यदि नागरिकों के पास कानूनों पर हां-नहीं दर्ज कराने की

प्रक्रिया/तरीके का विकल्पर होता है तो वे इसका प्रयोग करने में समर्थ होते हैं ।

(3.3) क्योंह प्रमुख बुद्धिजीवी इस `जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) – सरकारी

          अधिसूचना  (आदेश) की मांग का विरोध करते हैं?

जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली सरकारी अधिसूचना(आदेश) की इस मांग के लिए हजारों-करोड़ों रूपए की जरूरत नहीं और न ही इसके लिए हजारो स्टााफॅ को काम पर लगाने या हजारों भवन अथवा सड़क की जरूरत है। और नागरिकों द्वारा बताए हुए हमारे संविधान के अनुसार मुख्यअ मंत्री को इस परिवर्तन को लाने के लिए विधायकों के अनुमोदन/स्वीकृति की भी जरूरत नहीं पड़ती । तो भी सभी दलों के सांसद और सभी प्रमुख बुद्धिजीवी इस प्रस्ताेवित सरकारी अधिसूचना(आदेश) के दुश्मलन हैं। सभी दलों के नेताओं ने इस प्रस्तााव से घृणा किया और और उनके मुख्यदमंत्रियों और प्रधानमंत्री ने इस सरकारी अधिसूचना(आदेश) पर हस्ताकक्षर करने की हमारी मांग पूरी न करने की कसम खाई हुई है। भारत के सभी प्रमुख बुद्धिजीवियों ने इस प्रस्तातव का विरोध किया है और प्रधानमंत्री एवं मुख्य मंत्रियों से इस जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली सरकारी अधिसूचना(आदेश) पर हस्ताणक्षर न करने को कहा है । आखिर क्योंय? परिवर्तन की प्रक्रिया तब मूर्त रूप लेती है जब करोड़ों नागरिक बदलाव चाहते हैं और रोके से नहीं रूकते जब इन सभी करोड़ों नागरिकों को पता होता है कि करोड़ो साथी नागरिक उनके साथ हैं। मैं अपने इस वाक्ये को दोहराता हूँ क्योंककि ये वाक्यै उन सभी बड़े बदलाव का आधार— है जिन्हेंस नागरिकों ने पिछले 3000 वर्षों में लाया है।

“यह बदलाव की प्रक्रिया तब होती है जब करोड़ों नागरिक सहमत हो जाते हैं और उन करोड़ों नागरिकों को यह पता होता है कि साथी करोड़ों नागरिक उनके साथ सहमत हो गए हैं ”

करोड़ों नागरिक का यह जानना कि करोड़ों साथी नागरिक क्या चाहते है, यही राजनीतिक अंकगणित का शून्य है। ये बुद्धिजीवी और पत्रकार हमेशा हरेक आम लोगों को सन्देश देने की कोशिश करते रहते हैं कि वह अकेला है और बाकी करोड़ों आम आदमी जागरूक नहीं हैं और सो रहे है । यह जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली न केवल लोगों को किसी प्रस्ताववित बदलाव के लिए हां/ना दर्ज करने को अधिकार देता है बल्कि यदि करोड़ों लोग बदलाव लाने पर सहमत हो गए हैं, तो उन सबको पता चल जाता है कि करोड़ों अन्यक लोग भी बदलाव चाहते हैं। यह मीडिया मालिकों को यह अफवाह फैलाने का मौका नहीं देता कि लोग परवाह नहीं करते। जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली मीडिया मालिकों की करोड़ों नागरिकों की प्राथमिकताओं की छवि को तोड़ मरोड़कर पेश करने की ताकत कम कर देता है।
मैं प्रजा अधीन राजा समूह के सदस्य के रूप में यह शपथ लेता हूँ कि किसी भी पार्टी के लिए 5 वर्षों तक मुफ्त में प्रचार करूँगा और कर अदा की हुई अपनी गाढ़ी कमाई का 10 लाख रुपया खर्च करूँगा उस पार्टी के अभियान के लिए कि प्रधानमंत्री अथवा मुख्य मंत्री जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली कानून पर हस्ता क्षर करे। मैं इस जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली चाहता हूँ। चुनाव जीतना मेरा लक्ष्यल नहीं है | मैं नहीं चाहता लोग मुझे वोट देने की तकलीफ उठाएं – मैं नागरिकों से केवल यही चाहता हूँ कि वे प्रधानमंत्री, मुख्य मंत्रियों से इस सरकारी अधिसूचना(आदेश) पर हस्ताीक्षर करने की मांग करें। मैं लोगों से प्रजा अधीन राजा समूह के किसी उम्मीदवार को वोट देने को तब कहूंगा यदि और केवल यदि वो सचमुच जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली चाहते हैं और वे इस बात से संतुष्टप हों कि अन्यम दलों के मुख्य्मंत्री, प्रधानमंत्री इसपर हस्ता क्षर नहीं करेंगे।
जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली हमारी प्रजा अधीन राजा समूह के राजनीतिक आन्दोलन का केंद्र है जो भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था को सुधारना चाहता है और हमारी प्रजा अधीन राजा समूह का दावा है : – नागरिकों द्धारा प्रधानमंत्री को जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली पर हस्तापक्षर करने के लिए बाध्य् करने के बाद सिर्फ 4 महीनों के अन्दर गरीबी कम हो जाएगी और पुलिस, न्यापयालय और शिक्षा से भ्रष्टाचार लगभग खत्मट हो जायेगा और नागरिकों द्धारा प्रधानमंत्री को जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली पर हस्तायक्षर करने के लिए बाध्यय करने के 10 वर्षों के अन्दर भारत प्रौद्योगिकी, अर्थव्यसवस्थार और सेना के मामले में पश्चिमी देशों के समकक्ष आ जाएगा।

मैं अपने इस दावे को एक बॉक्स में दोहराता हूँ :

`जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)` का मेरा दावा :- नागरिकों द्धारा प्रधानमंत्री को जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली पर हस्ता क्षर करने के लिए बाध्यण करने के बाद सिर्फ 4 महीनों के अन्दर गरीबी कम हो जाएगी और गरीबी से होने वाली मौंतें नगण्यत हो जाएंगी और भारत के पुलिस, न्याएयालय और शिक्षा में भ्रष्टाचार लगभग समाप्ता हो जायेगा: और नागरिकों द्धारा प्रधानमंत्री को जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली पर हस्तााक्षर करने के लिए बाध्य( करने के 10 वर्षों के अन्दर भारत प्रौद्योगिकी, अर्थव्यदवस्थाम और सेना के मामले में पश्चिमी देशों के समकक्ष आ जाएगा।
3.4) नागरिकों से हमारा अनुरोध

हम लोग सभी नागरिकों से निम्न प्रार्थना करते है :-
1. कृपया कुछ समय निकालकर जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली प्रस्तासव पढ़ें जिसे मैंने प्रस्तावित किया है
2. कृपया जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली का अनुवाद अपनी मातृभाषा में करें जिस से यह सुनिश्चिवत हो सके कि आप जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली ज्यादा अच्छी तरह से समझते हैं
3 अगर आप जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली से नफरत करते है तो आप जा सकते हैं, हमारे पास आपको देने के लिए कुछ नहीं है – मेरे सभी प्रस्ताव जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली पर आधारित हैं।

4 जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट अगर आपको पसंद है, तो –
• अगर आप भाजपा के समर्थक हैं तो मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप भाजपा के मुख्यगमंत्रियों से जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट पर हस्तांक्षर करने को कहें।
• अगर आप कांग्रेस के समर्थक हैं तो मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप कांग्रेस के प्रधानमंत्री/मुख्यरमंत्रियों से जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट पर हस्तासक्षर करने को कहें
• अगर आप सीपीएम के समर्थक हैं तो मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप सीपीएम के मुख्यगमंत्रियों से जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट पर हस्ता/क्षर करने को कहें।
• अगर आप बीएसपी के समर्थक हैं तो मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप बीएसपी के मुख्यगमंत्रियों से जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट पर हस्तााक्षर करने को कहें।
• आप जिस भी पार्टी के समर्थक हैं, मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप उस पार्टी के नेताओं से जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली प्रारूप/क़ानून-ड्राफ्ट का समर्थन करने को कहें।
अगर ये सभी जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली पर हस्तायक्षर करने से मना कर दें तो मैं प्रधानमंत्री , मुख्य्मंत्रियों को जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली पर हस्ता्क्षर करने के लिए दबाव बनाने का अनुरोध करूंगा और आपसे अनुरोध करूंगा कि आप प्रजा अधीन राज समूह के उम्मीशदवार को वोट दें।

(3.5) `जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)` और नौकरियों में आरक्षण

मैं कुछ वर्षों से इस प्रस्ताव का प्रचार करता रहा हूँ जो लोगों को अधिकार देता है कि वे सरकारी वेबसाइट पर लिख सकें। मैं ऊँची जाति के अनेक युवाओं से एक वैध/जायज प्रश्न सुनता हूँ कि ‘क्या जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली से आरक्षण में वृद्धि नहीं होगी? क्या अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ी जाति इस सरकारी अधिसूचना(आदेश) का इस्तेमाल करके ज्यादा आरक्षण कि मांग नहीं करेंगे? इसका उत्तर है – नहीं। वास्तव में, इससे आरक्षण कम होगा, क्योंणकि दलित जाति के गरीब, अनुसूचित जाति के गरीब और पिछड़ी जाति के गरीब लोग “आर्थिक विकल्प बनाम आरक्षण” कानून का समर्थन करेंगे जिसका प्रस्तापव मैने ‘राजा अधीन प्रजा समूह का आरक्षण के मुद्दे पर विचार/स्टै ण्डे’ अध्यााय में किया है। इस कानून के अनुसार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ी जाति के किसी व्यजक्तिि के पास यह विकल्प होगा कि वह आरक्षण के बदले 600 रुपये प्रति वर्ष ले सकता है। इसलिए यदि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ी जाति के 80% व्ययक्तिव आर्थिक/पैसे की मदद लेते हैं तो कुल आरक्षण 50% से कम होकर 10% रह जाएगा। इस अध्या य में प्रस्तावित कानून को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ी जाति के उन 80% से ज्यादा लोगों का समर्थन मिलेगा जो गरीब हैं और 12 कक्षा तक भी नहीं पंहुच सकते और इससे जाति आधारित कुल आरक्षण में कमी आएगी। इसलिए यदि कोई यह चिंता करता है कि जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली से आरक्षण बढ़ेगा, तो वह गलती पर है। इस प्रकार, जनता की आवाज (पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली हमें “आर्थिक विकल्प् बनाम आरक्षण” की ओर ले जाएगा जिससे आरक्षण में कमी आएगी।

(3.6) क्यों हम पहले कदम के रूप में `जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)` जैसे छोटे

परिवर्तन की मांग कर रहे हैं?

मेरे अंतिम उद्देश्य आम जनता को खनिज रॉयल्टी दिलाना है, उच्चरतम न्या यालय के न्या याधीशों को हटाने की प्रक्रिया दिलाना है, इत्या दि। लेकिन मेरी पहली मांग बहुत छोटी है – हम सर्वसाधारण लोगों को हाँ-ना दर्ज कराने का अधिकार मिले और वह भी ऐसे कि हाँ-ना का कोई कानूनी वजन नहीं है, इसलिए हालांकि हमारे कार्यसूची में अन्यव शासनिक बदलाव शामिल हैं तो भी मेरी पहली मांग बहुत छोटी (मामूली) है । मैं नागरिकों से इस मामूली से बदलाव के लिए क्यों कह रहा हूँ ?
क्योंएकि यदि हम नागरिक किसी बड़े बदलाव की मांग करेंगे तो हमें मुख्येमंत्री, प्रधानमंत्री और बुद्धिजीवियों को वर्षों का समय देना पड़ेगा। यदि सर्वसाधारण बड़े बदलाव की मांग करता है जैसे रोजगार या गरीबी का पूर्ण उन्मूेलन अथवा इसी प्रकार के बदलाव, तो इससे नेता को स्वेत: ही महीनों और वर्षों का समय लेने का बहाना मिल जाएगा। इन लम्बे वर्षों में मुख्येमंत्री, बुद्धिजीवी कुछ भी नहीं करेंगे और हमारा लम्बाम समया बेकार हो जाएगा । साथ ही जब कोई नेता किसी छोटे बदलाव से मना करता है तो कार्यकर्ताओं के लिए उसके विरूद्ध आन्दो लन के लिए लोगौं को इकट्ठा करना आसान हो जाएगा। नेताओं से बड़े बदलाव के लिए न कहकर छोटे बदलाव के लिए कहें और जब नेता, बुद्धिजीवी उस छोटे बदलाव को लागू करने से मना करता है तो नि:स्वा र्थ कार्यकर्ताओं के लिए आम लोगों और आम लोगों के समर्थकों को इस बात पर संतुष्टक करना संभव हो जाएगा कि नेता,उच्चवर्गीय लोग और बुद्धिजीवी भ्रष्टत हैं।

(3.7) क्याट अमीर लोग हमारे नागरिकों को खरीदने में सफल नहीं हो जाएंगे?

एक प्रश्नी जिसका सामना मुझे अक्स र करना पड़ता है – क्याउ अमीर लोग हमारे नागरिकों को खरीदने में सफल नहीं हो जाएंगे?
इसे एक उदाहरण से समझिए , मान लीजिए मैं एक सरकारी अधिसूचना(आदेश), विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) अधिनियम 2005 को रद्द करने का प्रस्तागव करता हूँ।
मान लीजिए भारत में 72 करोड़ मतदाता हैं । इस प्रकार प्रस्ताकवित सरकारी अधिसूचना(आदेश) को सफल होने के लिए लगभग 37 करोड़ नागरिक मतदाता से हां की जरूरत पड़ेगी । निश्चिएत तौर पर सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्र) समर्थक उच्चवर्गीय लोग यह सुनिश्चि़त करने के लिए सैंकड़ो करोड रूपए खर्च करने का निर्णय कर सकते हैं कि इस प्रस्तािव को 37 करोड़ हां न मिल सके । क्या उनका रूपए मदद करेगा?

1 अब यदि यह प्रस्ता7व 38 करोड़ नागरिकों के कानों तक पहुंचने में असफल रहता है तो यह असफल होगा लेकिन सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्र) समर्थक उच्चवर्गीय लोगों के रूपए के कारण कदापि नहीं।
2 यदि यह प्रस्ता्व 10 करोड़ से ज्यामदा मतदाताओं तक पहुंचता है और उन्हों ने हां दर्ज करने से मना कर दिया तो यह असफलता सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्र) समर्थक उच्चवर्गीय लोगों के कारण नहीं मिली।
3 मान लीजिए कुछ प्रस्तातव 50 करोड़ से 70 करोड़ मतदाताओं तक पहूंच ही गया । मान लीजिए लगभग 45 करोड़ मतदाताओं ने हां दर्ज करने का निर्णय लिया अर्थात सेज अधिनियम रद्द किया जाये ।
4 अब सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्र) समर्थक उच्चवर्गीय लोगों के लिए क्यान यह संभव हो पाएगा कि वे 50 अथवा हजार रूपए या कुछ भी खर्च करें ताकि लगभग चार करोड़ मतदाता हां दर्ज न करें ?
मान लीजिए कि सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्र) समर्थक उच्चवर्गीय लोग यह देखते हैं कि लगभग 40 करोड़ नागरिक सेज रद्द करो के प्रस्ता्व पर हां रजिस्टलर करने वाले हैं । मान लीजिए सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्र) समर्थक उच्चवर्गीय लोग 5 करोड़ मतदाताओं को घूस/रिश्व त देने का निर्णय करते हैं और उन्हेंक हां दर्ज न करने को कहते हैं । मान लीजिए वे प्रति मतदाता 100 रूपए देने का प्रस्तांव देते हैं । यदि वे ऐसा करते हैं तो प्रत्येनक नागरिक 100 रूपए की मांग करेगा और इसलिए सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्र) समर्थक उच्चवर्गीय लोगों को सभी 75 करोड़ नागरिकों को 100-100 रूपए देने होंगे और इस प्रकार उनका 7200 करोड़ रूपया खर्च हो जाएगा। पर क्या यह कहानी यहीं खत्मथ हो जाएगी। नहीं ! मान लीजिए सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्र) समर्थक उच्चवर्गीय लोग 72 00 करोड़ रूपए खर्च करते हैं और आम लोगों को इस प्रस्तापव पर हां दर्ज करने से रोकने में सफल हो जाते हैं तो मुझे बस इतना भर करने की जरूरत है कि मैं अपने मित्रों में से एक मित्र को कहूँगा कि वह सेज अधिनियम 2005 को खत्मत करो का प्रस्ता व कुछ शब्दों को बदलकर प्रस्तुित कर दे । अब लोगों को इस नए प्रस्ताकव पर हां दर्ज करना है आखिरकार यह एक नया प्रस्ताबव है। पहले प्रस्तारव के लिए खर्च किया गया पैसा गिनती में नहीं आएगा। इसलिए सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्र) समर्थक उच्चवर्गीय लोगों को 7200 करोड़ रूपए फिर से देना होगा ।यदि वे ऐसा कर भी लेते हैं तो मैं अपने एक और मित्र को कुछ शब्दोंन को बदलकर एक तीसरा प्रस्तायव प्रस्तुेत करने को कह सकता हूँ। अब या तो इस तीसरे प्रस्तानव पर नागरिक हां दर्ज करेंगे अथवा सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्र) समर्थक उच्चवर्गीय लोगों से एक और सौ रूपए की मांग करेंगे । कुछ ही महीने में सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्र) समर्थक उच्चवर्गीय लोग पीढ़ियों से जमा किए गए धन और सम्पषत्ति से हाथ धो बैठेंगे। भारत में सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्र) समर्थक उच्चवर्गीय लोगों की पूरी दौलत 100000000 करोड़ रूपए से ज्याेदा नहीं होगी यदि वे आम जनता हितैषी और सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्र) समर्थक उच्चवर्गीय लोगों के विरोधी प्रस्तािव को प्रति मतदाता सौ रूपए खर्च करके रोकने का निर्णय करते हैं तो लागत प्रति प्रस्तासव 7200 करोड़ रूपए होगी और छह महीने के भीतर 2000 ऐसे प्रस्ता व जिसमें मुझे और मेरे दास्तोंि को केवल 20000 रूपए की लागत आएगी, दर्ज करने से सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्र) समर्थक उच्चवर्गीय लोगों का सारा धन छह से आठ महीने के भीतर उड़ जाएगा। उच्चेवर्गीय लोग हानि-लाभ का ध्याोन रखकर काम करते हैं । वे लोग इस प्रकार अपना धन बरबाद नहीं करेंगे जिससे कुछ ना मिले। दूसरे शब्दोंध में, `जनता की आवाज` यह सुनिश्चिंत करेगा कि नागरिकों को दिया गया घूस/रिश्वखत पैसे को बरबाद करता है और इसका कोई लाभप्रद नतीजा नहीं निकलेगा। इसलिए किसी व्यकक्ति का यह दावा करना कि जनता की आवाज कोई ऐसी चीज है जिसे सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्र) समर्थक उच्चवर्गीय लोग खरीद सकते हैं, केवल यही दर्शाता है कि वह व्यथक्ति अर्थात जीवन की गणित से निराशाजनक रूप से अनजान/अनभिज्ञ है । `जनता की आवाज` धन की ताकत का रोग प्रतिरोधक है क्योंकि यह नागरिकों को किसी प्रस्ता व को बार-बार और बार-बार दर्ज करने का विकल्पक देता है और इस प्रकार बार-बार और बार-बार पैसा जमा करता है। निश्चिबत रूप से यह व्ययवहारिक नहीं है।

(3.8) भारत के अमीर वर्ग की गलतफहमी से उनके जनसाधारण-समर्थक कानूनों का विरोध

भारत बहुराष्ट्रीय कंपनी का दास या गुलाम बनने की रह पर है| पहले से ही बहुराष्ट्रीय कंपनी 50% या अधिक तो कामयाब (सफल) हो गयी है| बहुराष्ट्रीय कंपनी ने पूरी तरह से भारत को प्रौद्योगिकी/तकनीकी क्षेत्र में उनपर निर्भर बना दिया है , कृषि या खेती में आंशिक रूप से एवम रक्षा, सैन्य और युद्ध क्षेत्र में अपने ऊपर पूरी तरह से आश्रित या आधीन कर लिया है|
भारत में पैसेवाला विशिष्ट वर्ग का बहुमत ,आम नागरिको का अहित करने वाले कानूनों जैसे कि `पारदर्शी शिकायत प्रणाली के बिना जन-लोकपाल` का समर्थन करके तथा `भ्रष्ट अधिकारी को नौकरी में से निकालने की प्रक्रिया` (राइट टू रिकोल)(चैप्टर 6 देखें) का विरोध करके, कोर्ट, न्यायलय/कोर्ट में आम नागरिकों द्वारा भ्रष्ट को सजा देने का अधिकार (ज्यूरी सिस्टम)(चैप्टर 21 देखें), `नागरिक और सेना के लिए खनिज रोयल्टी (आमदनी)`(चैप्टर 5 देखें) का विरोध करके बहुराष्ट्रीय कंपनी की यह दासता (गुलामी) आगे बढा रहे हैं|
हम मानते हैं की भारत में ऊपर का 5% पतिशत, पैसेवाला ,विशिष्ट वर्ग का बहुमत यह सब भारत के गरीब लोगों को दबाकर रखने के लिए कर रहा है जिससे उन पैसे वाले लोगों को सस्ते दाम पर काम या नौकरी करने वाले लोग मिलें और उनका शोषण कर सके जिससे उनकी आने वाली पुश्तें आराम से जी सकें लेकिन पैसेवाला बहुमत वर्ग की यह सोच एक दम गलत है और ये उनकी गलतफहमी है ये दिखाना चाहेंगे |

चलिए दो स्थितियों के बारे में बात करते हैं –

(1) अगर भारत में ऊपर का 5% पतिशत पैसेवाला,विशिष्ट वर्ग का बहुमत आम नागरिक के हित करने वाले कानूनों का समर्थन करे-

इस परिस्थिति में भारत के सामान्य नागरिकों को शक्ति मिल जायेगी और भ्रष्टाचार तथा गरीबी कम हो जायेगी| इस परिस्थिति में पैसेवालों को कुछ भी खोना नहीं पड़ेगा | उनकी जीवन शैली वेसी ही रहेगी | कोई भी पैसेवाला गरीब लोगों का शोषण किये बिना भी अपनी समृद्ध जीवन- शैली जी सकती है | अंबानी सात माले के अपने महेल में ही रहेंगे सिर्फ उनको थोडा सा ही टेक्स ज्यादा देना पड़ेगा क्योंकि संपत्ति कर तथा एम.आर.सी.एम. के कानून आ जाएँगे| उनको बडी आसानी से नौकरी करने वाले लोग मिल जायेंगे ,सिर्फ अंतर यही होगा की वो बहुत सस्ता/कौडियों के मोल नहीं मिलेगा | ज्यूरी सिस्टम तथा राईट टू रिकोल न्यायाधीश, मंत्रियो, पुलिस पर आने से कोर्ट के हालात में सुधार होगा | वो आम नागरिकों का शोषण नहीं कर पाएंगे लेकिन उनकी अमीरी में कोई अंतर नहीं पड़ेगा |

(2) अगर भारत में ऊपर 5% पतिशत पैसेवाला,विशिष्ट वर्ग का बहुमत आम नागरिक के हित करने वाले कानूनों का विरोध करते हैं और बहुराष्ट्रीय कंपनीओ

द्वारा हो रही लूट को सक्रीयता/निष्क्रियता से समर्थन करेगा तो भारत बहुराष्ट्रीय कंपनियों की गुलाम हो जायेगा-

भारत फिर से गुलाम हो जायेगा| बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अंग्रेजों की तरह ही भारत को लूटेंगी| गरीब और गरीब हो जायेगा | लाखों लोग मर जायेंगे | लेकिन यह बहुराष्ट्रीय कंपनी अधिकतर अमीर लोगों को भी नहीं छोड़ेंगी | बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अमीर लोगो की कोई सगी नहीं हैं कि उनको छोड़ दे| अगर भारत फिर से बहुराष्ट्रीय कंपनीओ का गुलाम बन गया तो वो किसी भी समय अंबानी की सात माले के महल छीन सकती हैं और वो अंबानी को मजबूर करेगी की उनको ज्यादा कर/टैक्स भरना पड़े | पैसा ही अपराधियों तथा बहुराष्ट्रीय कंपनी का जाति या धर्म है | भारत में रोजगार बिलकुल भी न मिले ऐसा हो सकता है , अराजकता में इतनी वृद्धि होगी कि ईमानदार व्यक्ति नहीं मिलेगा, कोर्ट तथा पुलिस बहुराष्ट्रीय कंपनी की गुलाम बनकर कुछ कानून और व्यवस्था संभाल नहीं पाएगी | सब जगह गुंडा-राज होगा और अधिकतर पैसे वाले लोगों को ही उसमें ज्यादा भुगतना पड़ेगा क्योंकि उनके पास पैसा है |
इस तरह जनसाधारण-समर्थक कानूनों का विरोध करके, और जनसाधारण को कमजोर बनाकर ,भारत के पैसे वाले लोग बहुराष्ट्रीय कंपनीओ के दोस्त बन रहे हैं, लेकिन यह दोस्ती ज्यादा नहीं चलेगी| जैसे ही बहुराष्ट्रीय कंपनीओ के पास सेना, पुलिस तथा कोर्ट पर नियंत्रण आ जायेगा तो इन पैसे वाले लोगों को भी लूट लेंगे और कमजोर सेना और आम नागरिक भी देश की रक्षा नहीं कर पाएंगे | क्या यह पैसे वाले लोग बहुराष्ट्रीय कंपनियों से खुदको लुटने से बचा पाएँगे ? क्या एक आध परिवार के अलावा कोई बच पाएगा ? कोरिया, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, फिलिपाईन्स, इराक इसके जिवंत उदाहरण हैं जहा पर इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अमीर तथा गरीब किसी वर्ग के लोगों को नहीं छोड़ा |
पहले अंग्रेजों ने `फूट डालो और राज करो` की निति अपनाई, अभी यह बहुराष्ट्रीय कंपनी भारत के अमीर तथा गरीब वर्ग के बीच में वो ही निति अपना रहे हैं |
अभी यह भारत के अमीर लोगों पर है की वो कौन सी परिस्थिति देखना चाहते हैं तथा वो आम-नागरिक-समर्थक सामान्य कानूनों जैसे कि पारदर्शी शिकायत प्रणाली/सिस्टम (चैप्टर 1), `नागरिक और सेना के लिए खनिज रोयल्टी (आमदनी)`(एम.आर.सी.एम)., राईट टू रिकोल(आम नागरिकों का भ्रष्ट को बदलने का अधिकार )(चैप्टर 6) के क़ानून-ड्राफ्ट , ज्यूरी सिस्टम (भ्रष्ट को सज़ा देने का आम नागरिकों का अधिकार) (चैप्टर 7,21) का विरोध या समर्थन करते हैं |
नोट – हमें कोई भी अमीर से या किसी और से ,किसी भी प्रकार के दान की आवश्यकता नहीं है | सिर्फ सभी लोगों का कुछ समय चाहिए ये सब कानूनों का प्रचार करने के लिए | हम दान के सख्ती से खिलाफ हैं |

समीक्षा प्रश्नह

1 `नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी समूह` द्वारा हां अथवा नहीं दर्ज करने के लिए प्रस्तारवित शुल्क कितना है ?
2 मान लीजिए हमारे द्वारा मांगी गई प्रथम सरकारी अधिसूचना(आदेश) पर प्रधानमंत्री हस्तााक्षर कर देता है । मान लीजिए, 65 करोड़ दर्ज मतदाता आई पी सी 498 ए पर ना दर्ज करते हैं । तो क्या प्रथम सरकारी अधिसूचना(आदेश) के अनुसार यह कानून स्व8त: रद्द हो जाएगा?
3 मान लीजिए, 35 करोड़ नागरिक किसी कानून पर ना दर्ज करते हैं। तो उनके द्वारा किया गया पैसों का खर्च कितना होगा?
4 मान लीजिए, औसतन, कोई नागरिक ऐसे 100 कानूनों पर हां /नहीं दर्ज करता है जिसे वह पसंद/नापसंद करता है। तो उपयोग किए गए कुल समग्र घरेलू उत्पातद (जी डी पी) का प्रतिशत क्या/ होगा? औसतन इस कार्य को पूरा करने के लिए कितने क्लहर्कों की जरूरत होगी?
5 मान लीजिए, किसी प्रस्ता वित सरकारी अधिसूचना(आदेश) को 51 प्रतिशत नागरिकों द्वारा अनुमोदित कर दिया जाता है तो क्याग यह कानूनन अनिवार्य होगा कि प्रधानमंत्री इस सरकारी अधिसूचना(आदेश) पर ह्स्ताअक्षर करे?
6 मान लीजिए, कोई नागरिक 15 पृष्ठोंि की सरकारी अधिसूचना(आदेश) का प्रस्तागव प्रस्तु त करता है। दर्ज करने की लागत क्याठ होगी?
7 मान लीजिए, 40 करोड़ जनता किसी सरकारी अधिसूचना(आदेश) का अनुमोदन/स्वीकृति करती है। तो किया गया कुल खर्च कितना होगा?

अभ्यादस

  • 1.     कृपया इस पाठ का अनुवाद अपनी मातृभाषा में करें। 2. स्वीट्जरलैण्डस, अमेरिका आदि देशों में तब के लोगों के शिक्षा के स्तर पर जानकारी जुटाएं जब उन्हों ने जनमत-संग्रह समाज का का चलन शुरू किया था।

  • 2.    पिछले पांच वर्षों में कितने लोगों को धारा 498 ए के तहत कारावास की सजा हुई ? आपके अनुमान के अनुसार उन्हें कितना समय और पैसा खर्च करना पड़ा? आपके अनुमान के अनुसार, इन मुकद्दमों में पुलिसवालों और वकीलों ने कितना पैसा बनाया होगा? पुलिसवालों के बनाए पैसों में से कितना मंत्रियों, विधायकों और सांसदों को गया होगा?

  • 3.   क्या आप किसी ऐसे विधायक, सांसद को वोट देंगे जो खुले आम कहता है कि वह नागरिकों को हां/नहीं दर्ज करने की अनुमति नहीं देगा?

  • 4.    कृपया आप जिन मुख्यकमंत्रियों, प्रधानमंत्री और पार्टी का समर्थन करते हैं उन्हें फोन कीजिए और उनका जवाब मांगिए कि क्योंं वे इस आम लोगों की मांग का विरोध कर रहे हैं और हमें उनके बनाए कानूनों पर हां/नहीं दर्ज करने की अनुमति नहीं देते।

  • 5.    क्योंे नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टीन(एम आर सी एम) के समर्थक हम लोग हां/नहीं की गिनती का प्रधानमंत्री के लिए बाध्य न बनाने का प्रस्ता व करते हैं?

  • 6.    क्योंे धर्मनिरपेक्ष और हिंदूवादी बुद्धिजीवी लोग दूसरी सरकारी अधिसूचना(आदेश) नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टीद(एम आर सी एम) का विराध करते हैं?

  • 7.     यदि आप नागरिकों और राईट टू रिकाल ग्रुप/समूह (आर.आर.जी) की पहली दो सरकारी अधिसूचनाओं(आदेश) का समर्थन करते हैं तो हम आपसे अनुरोध करते हैं कि आप ऐसे 10 प्रमुख बुद्धिजीवियों के नामों की सूची/लिस्टआ बनाइए जो आपको जानते हैं, और पता लगाइए कि वे इन दो प्रस्तावित सरकारी अधिसूचनाओं(आदेश) का विरोध क्योंन करते हैं?

  • 8.    आप जिस पार्टी का समर्थन करते हैं कृपया उसके मुख्यंमंत्रियों, प्रधानमंत्री को फोन करके उनसे संपर्क करें और जवाब मांगें कि क्योंा वे सभी दूसरे नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम आर सी एम) समूह की मांग के दुश्म न हैं?

अध्याय 53

सूची (लिस्ट) – 3 : `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` और बुद्धिजीवियों के प्रस्‍तावों के बीच

अन्‍तर

बुद्धिजीवियों के प्रस्‍ताव

मेरा प्रस्‍ताव

मानवीय / मनुष्यता वाले समाधान मेरे कुछ (सभी नहीं) प्रतियोगी/विरोधी मानवीय/मनुष्यता वाले समाधान पर ध्‍यान/जोर देते हैं, और इसमें से कुछ लोगों को व्‍यवस्‍था (में बदलाव करके निकाले जाने वाले) समाधानों में जरा भी विश्‍वास नहीं है। वे दान/चन्‍दा और मानवीय/मनुष्यता के  मूल्‍यों में सुधार आदि पर जोर देते हैं।

मैं निम्‍नलिखित दो कारणों से मानव/मनुष्य के मूल्‍यों द्वारा समाधान को रद्द/खारिज करता हूँ :-

(क) यदि पश्‍चिमी देशों में लोग भ्रष्‍ट नहीं हैं तो पश्‍चिमी देशों में भी कुछ विभाग/क्षेत्र अनियमितताओं/भ्रष्‍टाचार का बोलबाला क्‍यों है?

(ख) यदि भारत के लोग भ्रष्‍ट हैं तो अनेक विभागों/क्षेत्रों (रेलवे में टिकट छपाई, चेक क्‍लीयरिंग जैसे) में क्‍यों भ्रष्‍टाचार बिलकुल भी नहीं है?

अधिकारीयों , प्रबंधकों , जजों के विवेक / समझ और अधिकार द्वारा समाधानों पर जोर वे लोग जो व्‍यवस्‍था द्वारा (किए जाने वाले) समाधान में विश्‍वास करते हैं वे ऐसे समाधानों में विश्‍वास करते हैं जिसमें अधिकारियों/ जजों/ प्रबंधकों(नियामकों) को विवेकाधिकार दे दिए जाते हैं।

सांठ-गाँठ रहित समाधानों पर जोर मेरे प्रस्‍तावों में  सांठ-गाँठ रहित अनेक समाधान शामिल हैं जिनमें नागरिक या जूरी देखभाल करने वाले / र्निरीक्षक के रूप में होंगे।

गरीबी की समस्‍याअधिकांश बुद्धिजीवी अब गरीबी को मुख्‍य/प्रमुख समस्‍या के रूप में नहीं मानते। उनके जोर शिक्षा, कुछ अन्‍य कारकों का विकास और एक सुनहरी आशा कि शिक्षा, विकास आदि से गरीबी अपने आप कम हो जाएगी।

मेरे अनुसार, “गरीबी कम करना” मुख्‍य समस्‍या है और मैं मानता हूँ कि गरीबी कम/दूर करने से शिक्षा, विकास/वृद्धि अपने आप आ जाएगी । मेरे विचार में, गरीबी कम करने का एकमात्र रास्‍ता प्राकृतिक संसाधनों / साधनों पर सबका बराबर हक लागू करके निकलेगा।

भ्रष्‍टाचार कम करने से संबंधित प्रस्‍ताव अधिकांश बुद्धिजीवी अधिकारीयों/प्रबंधकों/जजों के विवेक/समझ और अधिकार के साधनों पर विश्‍वास करते हैं जिसमें सबसे ऊंचे पदों के  भ्रष्‍टाचार पर लगाम लगाने के लिए उच्‍च अधिकार प्राप्‍त अधिकारी-गण जैसे निगरानी आयोग और लोकपाल, न्‍यायिक कमीशन(आयोगों) आदि के लिए रखा जाता है।

 भ्रष्‍टाचार को कम करने के रास्ते और साधन के रूप में मेरा सिर्फ जूरी, पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम),भ्रष्ट को बदलने/सज़ा देने का अधिकार और प्रतियोगी(मुकाबले वाली) परीक्षाओं पर ही भरोसा है किसी भी और पर नहीं।

पुलिस में भ्रष्‍टाचार / अत्याचार की समस्‍यातत्‍काल समाधान ; विशेष कुछ नहीं

मेरे प्रस्‍ताव के तीन भाग हैं :- वेतन बढ़ाने के लिए सम्‍पत्‍ति-कर ; सभी नियमित/रूटिन स्‍थानान्‍तरण केवल क्रमरहित मिलान के माध्‍यम से ही ; पुलिसकर्मियों को अनियमित स्‍थानान्‍तरित करने/नौकरी से हटाने की शक्‍ति जूरी सदस्‍यों को दी जाए।

कानून बनाने (की प्रक्रिया) में सुधारकानून बनाने में सुधार करने के लिए, मेरे प्रतियोगी/विरोधी लोक-सभा और राज्य-सभा में अपराधियों को प्रतिबंधित करने के कानूनों पर सहमति जताते हैं। और कानूनों के स्‍तर में सुधार करने का कोई और विशेष समाधान नहीं है।

मेरे विचार से, कानून बनाने का सबसे अच्‍छा और शायद एकमात्र तरीका है – नागरिकों को नगर-निगम परिषदों, पंचायतों, विधानसभाओं और संसद में सीधे मतदान करने का अधिकार प्रदान करना/देना। इसके लिए आने वाली लागत की भरपाई 2 से 5 रूपए का शुल्‍क लेकर की जाए।

न्‍यायालयों / कोर्ट में सुधार मेरे विरोधियों/प्रतियोगियों का जज-वकील सांठ-गाँठ/मिली-भगत की समस्‍याओं का समाधान निकालने का कोई इरादा ही नहीं है।

मेरा प्रस्‍ताव सभी जजों को हटा करके उनके स्‍थान पर क्रम-रहित तरीके से चुने गए, हर मामले के लिए अलग-अलग माननीय जूरी सदस्‍यों की जूरी-मंडल लाना है।

प्राकृतिक साधन / संसाधनों का आवंटन / बंटवारा मेरे विरोधी/प्रतियोगी कृषि भूमि को छोड़कर, यह पक्‍का/सुनिश्‍चित करने में बहुत कम रूची दिखलाते हैं कि प्राकृतिक संसाधनों से प्राप्‍त आय को नागरिकों के बीच बांटा जाना चाहिए। विरोधियों/प्रतियोगियों में से बहुत कम ही लोग “प्राकृतिक साधन/संसाधन” को एक महत्‍वपूर्ण मुद्दा मानते हैं।

मेरे प्रस्‍तावों में, नागरिकों सांठ-गाँठ रहित  अच्छी तरह से लिखी हुई प्रक्रियाएं/तरीके हैं जिसके माध्‍यम से वे प्राकृतिक साधनों/संसाधनों के उनके अपने हिस्‍सों पर पहले उपयोग करने वाले को सीधे ही/खुद ही चुन/बदल सकते हैं। इसके अलावा, मेरे प्रस्‍तावों में, नागरिकों के पास साधनों/संसाधनों की निगरानी करने वाले अधिकारियों को हटाने की सांठ-गाँठ/मिली-भगत  रहित प्रक्रियाएं/तरीके हैं।

बरबादी / बेकार के सरकारी खर्चों को कम करना मेरे विरोधी/प्रतियोगी उच्‍च अधिकार प्राप्‍त कमीशन(आयोग)/प्रभंधक(नियामक) वाले समाधान में विश्‍वास करते हैं।

मेरे प्रस्‍तावों में, जूरी के पास किसी अधिकारी द्वारा प्रस्‍तुत किए गए खर्च के विनती/अनुरोध को रद्द करने का अधिकार होगा और इस तरह बेकार/फालतू के खर्चे रूकेंगे।

घाटा कम करना किसी क्लीयर/स्‍पष्‍ट दिशा-निर्देशों के बिना ही कर्मचारियों/अधिकारियों की संख्‍या कम करना।

वेतन/किराया और टैक्‍स/कर वसूली(संग्रहण) को आपस में सीधे जोड़कर एक करना। ताकि घाटा बिलकुल ही न हो।

शिक्षा मेरे अनेक विरोधी/प्रतियोगी शिक्षा के संबंध में बहुत ही आशावादी हैं। एक ओर तो वे शिक्षा के महत्‍व पर जोर देते ही चले जाते हैं तो दूसरी ओर उनमें से कुछ ही लोग शिक्षा में सुधार लाने के लिए किसी प्रकार की सही-सही प्रशासनिक प्रक्रियाओं/तरीकों का सुझाव देते हैं। साथ ही, कुछ ही विशेषज्ञ/एक्सपर्ट ,कानून और हथियारों की शिक्षा देने पर जोर देते हैं।

मेरे प्रस्‍तावों में विस्‍तृत प्रशासनिक प्रक्रियाऐं/तरीके शामिल हैं जो नागरिकों को यह अधिकार/अनुमति देती हैं कि वे जिला शिक्षा अधिकारी और स्‍कूल के प्राचार्य को बदल सकें। इसके अलावा, मेरे प्रस्‍तावों में शिक्षकों/छात्रों के लिए एक पूरी(विस्‍तृत) जांच/पुरस्‍कार प्रणाली शामिल है जो उच्‍च स्‍तर की प्रेरणा देती है और धन/पैसे की कम बरबादी कराती है।

कबेल / टेलीफोन को नियंत्रित करना मेरे विरोधी/प्रतियोगी सबकुछ प्रभंधाकों/नियामकों और प्राइवेट/निजी कम्‍पनियों पर ही छोड़ देने में विश्‍वास रखते हैं और नागरिकों को कोई अधिकार देना ही नहीं चाहते।

मेरे प्रस्तावों अनुसार , नागरिकों को कबेल कम्पनियाँ और फोन कंपनियों को बदलने की प्रक्रियाएँ/तरीके मिलते हैं |

बिजली सप्लाई को नियंत्रित करना मेरे विरोधी/प्रतियोगी सबकुछ प्रभंधाकों/नियामकों और प्राइवेट/निजी कम्‍पनियों पर ही छोड़ देने में विश्‍वास रखते हैं और नागरिकों को कोई अधिकार देना ही नहीं चाहते।

मेरे प्रस्‍तावों के अनुसार, नागरिकगण को विद्युत/बिजली बांटने वाली(वितरण) कम्‍पनी को बदलने, नगर के मालिकी वाली बांटने वाली (वितरण) कम्‍पनी को बदलने और नगर के मालिकी वाली, बिजली बनने वाली(निर्माण) कम्‍पनी के अध्‍यक्ष हो बदलने की प्रक्रिया मिलती है।

करेंसी / नोट प्रणाली(सिस्टम) को नियंत्रित करना मेरे विरोधी/प्रतियोगी संपूर्ण/पूरी वैध निविदा टेंडर प्रणाली(सिस्टम) को भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर, डाइरेक्टर/निदेशकों और विशेषज्ञों पर छोड़ देना चाहते हैं क्‍योंकि ये यह मानकर चलते हैं कि ये लोग/व्‍यक्‍ति ईमानदार हैं और आम नागरिकों की भलाई पर ध्‍यान देते हैं। मेरे विरोधियों/प्रतियोगियों के अनुसार, निदेशकों, गवर्नरों और विशेषज्ञों को उनकी अपनी इच्‍छा से रुपये की सप्लाई(धन आपूर्ति) को बदलने का अधिकार दिया जाना चाहिए।

मेरे प्रस्‍तावों के अनुसार, नागरिकों को वह प्रक्रियाएं/तरीके मिलते हैं जिनसे वे भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नरों और डाइरेक्टर/निदेशकों को बदल सकें। ये लोग `जनता की आवाज़-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) `अथवा जनमतसंग्रह द्वारा केवल नागरिकों की इजाजत/अनुमति मिलने के बाद ही धनापूर्ति बढ़ा सकते हैं यानि और रूपए बना सकते हैं।

अध्याय 51

सूची (लिस्ट) 1 : `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के प्रस्‍तावों से हम आम नागरिकों को मिलने वाली शक्‍तियों / अधिकारों की सूची (लिस्ट)

[वर्तमान में, भारत के हम आम लोग को केवल तीन ही शक्‍तियां दी गई हैं: पंचायत सदस्‍यों, विधायकों, सांसदों के चुनावों में मतदान करने का अधिकार। कोई और विशेष शक्‍तियां हमें नहीं मिली हैं। सुझाई गई प्रशासनिक प्रक्रियाएं आम लोगों को दर्जनों विस्‍तृत/स्पष्ट/निश्चित शक्‍तियां प्रदान करेगी, जिनमें से कुछ नीचे दी गई हैं]

जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम) से हम आम लोगों को मिलने वाली शक्‍तियों की सूची (लिस्ट)

1.    ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ क्‍लॉज/खण्‍ड 1 : यदि कोई नागरिक चाहे तो अपनी शिकायत प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर डाल सकता है।

2.    ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ क्‍लॉज/खण्‍ड 2: यदि कोई नागरिक चाहे तो प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर डाली गई शिकायत में अपना नाम जोड़ सकता है।

नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.)’  क़ानून-ड्राफ्टों से हम आम लोगों को मिलने वाली शक्‍तियों की सूची (लिस्ट)

3.    नागरिक भारत सरकार के सभी प्लाटों से जमीन किराया सीधे ही प्राप्‍त करेंगे।

4.    नागरिक खनिज रॉयल्‍टी सीधे ही प्राप्‍त करेंगे।

5.    नागरिक राष्‍ट्रीय भूमि किराया अधिकारी को बदल सकते हैं।

प्रजा अधीन राजा / राईट टू रिकाल (भ्रष्ट को बदलने का अधिकार) कानून के प्रथम चार क़ानून-ड्राफ्टों से हम आम लोगों को मिलने वाली शक्‍तियों की सूची (लिस्ट)

6.    नागरिक बिना पांच वर्ष इंतजार किए प्रधानमंत्री, मुख्‍यमंत्रियों को बदल सकते हैं।

7.    नागरिक किसी भी दिन सुप्रीम कोर्ट के चीफ जज, हाई कोर्ट के चीफ जज को बदल सकते हैं।

8     नागरिक किसी भी दिन भारतीय रिजर्व बैंक के प्रमुख को बदल सकते हैं।

9.    नागरिक किसी भी दिन जिला पुलिस प्रमुख को बदल सकते हैं।

आरक्षण के संबंध में हम आम लोगों को मिलने वाली शक्‍तियों की सूची (लिस्ट)

10.   अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अथवा अन्‍य पिछडे वर्ग के किसी भी व्‍यक्‍ति को आरक्षण के बदले 600 रूपए प्रति वर्ष प्राप्त करने का विकल्‍प/`चुनाव की छूट` होगा।

प्रजा अधीन राजा/राईट टू रिकाल (भ्रष्ट को बदलने का अधिकार) कानून के विभिन्‍न कानून-ड्राफ्टों से हम आम लोगों को मिलने वाली शक्‍तियों की सूची (लिस्ट)

11.   प्रजा अधीन – जिला कोर्ट के प्रिंसिपल/मुख्य जज

12.   प्रजा अधीन – चार वरिष्ठे/बड़े  सुप्रीम कोर्ट जज

13.   प्रजा अधीन – चार वरिष्ठे/बड़े  हाई कोर्ट जज

14.   प्रजा अधीन – चार वरिष्ठे/बड़े  जिला कोर्ट जज

15.   प्रजा अधीन – भारत का जूरी प्रशासक

16.   प्रजा अधीन – राज्‍य जूरी प्रशासक

17.   प्रजा अधीन – जिला जूरी प्रशासक

18.   प्रजा अधीन – राष्‍ट्रीय भूमि किराया अधिकारी

19.   प्रजा अधीन – राज्‍य भूमि किराया अधिकारी

20.   प्रजा अधीन – सांसद

21.   प्रजा अधीन – विधायक

22.   प्रजा अधीन – कॉरपोरेटर, जिला पंचायत सदस्‍य

23.   प्रजा अधीन – तहसील पंचायत सदस्‍य, ग्राम पंचायत सदस्‍य

24.   प्रजा अधीन – मेयर,  प्रजा अधीन – जिला पंचायत सरपंच

25.   प्रजा अधीन – तहसील पंचायत सरपंच

26.   प्रजा अधीन – ग्राम पंचायत सरपंच

27.   प्रजा अधीन – भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर

28.   प्रजा अधीन – चीफ स्‍टेट एकाउन्‍टेन्‍ट/मुख्‍य राज्‍य लेखाकार(मुनीम)

29.   प्रजा अधीन – चीफ डिस्‍ट्रिक्‍ट एकाउन्‍टेन्‍ट/मुख्‍य जिला लेखाकार(मुनीम)

30.   प्रजा अधीन – भारतीय स्‍टेट बैंक के अध्‍यक्ष

31.   प्रजा अधीन – भारत के सॉलिसिटर जेनरल(भारत की सरकार की तरफ से अदालतों में स्वयं या सहायक द्वारा हाजिर होने वाला वकील ; सरकारी न्यायिक एजेंट) (महा न्यायाभिकर्ता)

32.   प्रजा अधीन – भारत के ऐटार्नी जनरल(भारत सरकार का मुख्य कानूनी सलाहकार)( महान्यायवादी)

33.   प्रजा अधीन – राज्‍य सॉलिसिटर जेनरल

34.   प्रजा अधीन – राज्‍य ऐटार्नी जनरल

35.   प्रजा अधीन – जिला प्रमुख लोक/जन दण्‍डाधिकारी(जनता का फर्यादी)

36.   प्रजा अधीन – जिला सिविल प्‍लीडर/वकील(न्यायालय आदि में नागरिकों के  पक्ष का समर्थन करनेवाला)( नागरिक अधिवक्ता)

37.   प्रजा अधीन – भारतीय चिकित्‍सा परिषद(इलाज सभा) के अध्‍यक्ष

38.   प्रजा अधीन – राज्‍य चिकित्‍सा परिषद के अध्‍यक्ष

39.   प्रजा अधीन – भारत के गृह मंत्री

40.   प्रजा अधीन – सी.बी.आई. के निदेशक/डाइरेक्टर

41.   प्रजा अधीन – राज्‍य गृह मंत्री

42.   प्रजा अधीन – सी.आई.डी. के निदेशक/डाइरेक्टर

43.   प्रजा अधीन – जिला पुलिस कमिश्‍नर

44.   प्रजा अधीन – भारत के वित्‍त-मंत्री

45.   प्रजा अधीन – राज्‍य वित्‍त-मंत्री

46.   प्रजा अधीन – भारत के शिक्षा मंत्री

47.   प्रजा अधीन – राष्‍ट्रीय पाठ्य पुस्‍तक अधिकारी

48.   प्रजा अधीन – राज्‍य के शिक्षा मंत्री

49.   प्रजा अधीन – राज्‍य पाठ्य पुस्‍तक अधिकारी

50.   प्रजा अधीन – जिला शिक्षा अधिकारी

51.   प्रजा अधीन – भारत के स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री

52.   प्रजा अधीन – राज्‍य स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री

53.   प्रजा अधीन – जिला स्‍वास्‍थ्‍य अधिकारी

54.   प्रजा अधीन – यू.जी.सी.(विश्वविद्यालय अनु-दान आयोग/यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन) (बड़े कालेज के लिए विशेष दान अरने वाली समिति)के अध्‍यक्ष

55.   प्रजा अधीन – विश्‍वविद्यालय उप-कुलपति(बड़ा कालेज का उप-राष्ट्रपति)

56.   प्रजा अधीन – वार्ड स्‍कूल के प्रिंसिपल(कालेज का अध्यक्ष)

57.   प्रजा अधीन – भारत के कृषि मंत्री

58.   प्रजा अधीन – राज्‍य कृषि मंत्री

59.   प्रजा अधीन – भारत के नागरिक राशन(आपूर्ति) मंत्री

60.   प्रजा अधीन – राज्‍य नागरिक राशन(आपूर्ति) अधिकारी

61.   प्रजा अधीन – राज्‍य नागरिक राशन(आपूर्ति) मंत्री

62.   प्रजा अधीन – जिला राशन(आपूर्ति) अधिकारी

63.   प्रजा अधीन – भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक/ कम्‍पट्रोलर आडिटर जनरल(भारत-सरकार के हिसाब-किताब को रखने व जाँच करने वाले)

64.   प्रजा अधीन – राज्‍य प्रमुख  निरीक्षक

65.   प्रजा अधीन – प्रमुख लेखा परीक्षक/ऑडिटर/प्रमुख हिसाब-किताब रखने वाला

66.   प्रजा अधीन – नगर निगम आयुक्‍त/कमिश्नर, प्रजा अधीन – प्रमुख अधिकारी

67.   प्रजा अधीन – राष्‍ट्रीय बिजली(विद्युत) मंत्री

68.   प्रजा अधीन – राज्‍य बिजली(विद्युत) मंत्री

69.   प्रजा अधीन – जिला बिजली सप्लाई(ऊर्जा आपूर्ति) अधिकारी

70.   प्रजा अधीन – केन्‍द्रीय प्रत्‍यक्ष(सीधा/खुला) कर(टैक्स) बोर्ड के अध्‍यक्ष

71.   प्रजा अधीन – केन्द्रीय अप्रत्‍यक्ष(छुपा हुआ) कर बोर्ड के अध्‍यक्ष

72.   प्रजा अधीन – राज्‍य कर इकठ्ठा करने वाला/वसूली(संग्रहण) अधिकारी

73.   प्रजा अधीन – जिला कराधन/टैक्‍सेशन अधिकारी

74.   प्रजा अधीन – रेल मंत्री

75.   प्रजा अधीन – राज्‍य ढुलाई/यातायात/परिवहन मंत्री

76.   प्रजा अधीन – जिला ढुलाई/परिवहन अधिकारी

77.   प्रजा अधीन – ट्राई/दूरसंचार नियामक (टेलीफ़ोन प्रबंध करने वाला)  के अध्‍यक्ष

78.   प्रजा अधीन – राष्‍ट्रीय विद्युत नियामक(बिजली प्रबंध करने वाला)

79.   प्रजा अधीन – राज्‍य विद्युत नियामक (बिजली प्रबंध करने वाला)

80.   प्रजा अधीन – केन्‍द्रीय दूरसंचार(टेलीफ़ोन) मंत्री

81.   प्रजा अधीन – जिला दूरसंचार(टेलीफ़ोन) मंत्री

82.   प्रजा अधीन – जिला दूरसंचार(टेलीफ़ोन) केबल अधिकारी

83.   प्रजा अधीन – जिला जलापूर्ति(पानी सप्लाई) अधिकारी

84.   प्रजा अधीन – केन्‍द्रीय चुनाव कमिश्नर(आयुक्‍त)

85.   प्रजा अधीन – राज्‍य चुनाव कमिश्नर(आयुक्‍त)

86.   प्रजा अधीन – राष्‍ट्रीय पेट्रालियम मंत्री

87.   प्रजा अधीन – जिला पेट्रोलियम मंत्री

88.   प्रजा अधीन – राष्‍ट्रीय कोयला मंत्री

89.   प्रजा अधीन – राष्‍ट्रीय खनिज/खान मंत्री

90.   प्रजा अधीन – राज्‍य कोयला मंत्री

91.   प्रजा अधीन – राज्‍य खनिज/खान मंत्री

92.   प्रजा अधीन – भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण(पुरानी,इतिहास की चीजों/वस्तुओं की जांच) के अध्‍यक्ष

93.   प्रजा अधीन – राज्‍य पुरातत्‍व सर्वेक्षण(पुरानी,इतिहास की चीजों/वस्तुओं की जांच)  के अध्‍यक्ष

94.   प्रजा अधीन – राष्‍ट्रीय इतिहास परिषद्(सभा) के अध्‍यक्ष

95.   प्रजा अधीन – राज्‍य इतिहास परिषद्(सभा) के अध्‍यक्ष

96.   प्रजा अधीन – संघ लोक सेवा आयोग के अध्‍यक्ष (यू.पी.एस.सी) (भारत के नागरिक सेवा के नौकरी के लिए परीक्षा का प्रबंध करने के लिए जनसमूह/समिति)

97.   प्रजा अधीन – राज्‍य लोक सेवा आयोग के अध्‍यक्ष (भारत के नागरिक सेवा के नौकरी के लिए परीक्षा का प्रबंध करने के लिए जनसमूह/समिति)

98.   प्रजा अधीन – केन्‍द्रीय सरकार भर्ती बोर्ड के अध्‍यक्ष

99.   प्रजा अधीन – राज्‍य सरकार भर्ती बोर्ड के अध्‍यक्ष

100.  प्रजा अधीन – जिला भर्ती बोर्ड  के अध्‍यक्ष

101.  प्रजा अधीन – राष्‍ट्रीय महिला आयोग(सरकारी संस्था/कमीशन) की अध्‍यक्ष (महिला मतदातागण उन्‍हें बदल सकती हैं)

102.  प्रजा अधीन – राज्‍य महिला आयोग (सरकारी संस्था ) की अध्‍यक्ष

103.  प्रजा अधीन – जिला महिला आयोग (सरकारी संस्था ) की अध्‍यक्ष

104.  प्रजा अधीन – राष्‍ट्रीय दलित अत्याचार रोकथाम (निवारण) आयोग (सरकारी संस्था )  के अध्‍यक्ष (दलित मतदातागण उन्‍हें बदल सकते हैं)

105.  प्रजा अधीन – राज्‍य दलित अत्याचार रोकथाम (निवारण) आयोग (सरकारी संस्था )  के अध्‍यक्ष

106.  प्रजा अधीन – जिला दलित अत्याचार रोकथाम (निवारण) आयोग (सरकारी संस्था ) के अध्‍यक्ष

107.  प्रजा अधीन – राष्‍ट्रीय धर्मार्थ आयोग के कमिश्नर/अध्‍यक्ष (जरूरतमंद लोगों के लिए सरकारी संस्था )

108.  प्रजा अधीन – राज्‍य धर्मार्थ आयोग के कमिश्नर/अध्‍यक्ष (जरूरतमंद लोगों के लिए सरकारी संस्था )

109.  प्रजा अधीन – राष्‍ट्रीय बार काउन्‍सिल के अध्‍यक्ष (वकीलों की संचालन/प्रबंध करने वाली संस्था)

110.  प्रजा अधीन – राज्‍य बार काउन्‍सिल के अध्‍यक्ष (वकीलों की संचालन/प्रबंध करने वाली संस्था)

111.  प्रजा अधीन – जिला बार काउन्‍सिल के अध्‍यक्ष (वकीलों की संचालन/प्रबंध करने वाली संस्था)

112.  प्रजा अधीन – राष्‍ट्रीय लोकपाल के अध्‍यक्ष

113.  प्रजा अधीन – राज्‍य लोकपाल के अध्‍यक्ष

114.  प्रजा अधीन – जिला लोकपाल के अध्‍यक्ष

115.  प्रजा अधीन – राष्‍ट्रीय सूचना कमिश्नर/आयुक्‍त

116.  प्रजा अधीन – राज्‍य सूचना कमिश्नर/आयुक्‍त

117.  प्रजा अधीन – जिला सूचना कमिश्नर/आयुक्‍त

118.  प्रजा अधीन – राज्‍य मिलावट रोकथाम(अपमिश्रण निवारण) अधिकारी

119.  प्रजा अधीन – जिला मिलावट रोकथाम(अपमिश्रण निवारण) अधिकारी

120.  प्रजा अधीन – राष्‍ट्रीय समाचारपत्र के संपादक

121.  प्रजा अधीन – राज्‍य समाचारपत्र के संपादक

122.  प्रजा अधीन – जिला समाचारपत्र के संपादक

123.  प्रजा अधीन – राष्‍ट्रीय महिला समाचारपत्र के संपादक (महिला मतदाताओं द्वारा बदले जा सकते हैं)

124.  प्रजा अधीन – राज्‍य महिला समाचारपत्र के संपादक (महिला मतदाताओं द्वारा बदले जा सकते हैं)

125.  प्रजा अधीन – जिला महिला समाचारपत्र के संपादक (महिला मतदाताओं द्वारा बदले जा सकते हैं)

126.  प्रजा अधीन – दूरदर्शन के अध्‍यक्ष

127.  प्रजा अधीन – राज्‍य दूरदर्शन के अध्‍यक्ष

128.  प्रजा अधीन – जिला चैनल के अध्‍यक्ष

129.  प्रजा अधीन – आकाशवाणी के अध्‍यक्ष

130.  प्रजा अधीन – राज्‍य रेडियो चैनल के अध्‍यक्ष

131.  प्रजा अधीन – जिला रेडियो चैनल के अध्‍यक्ष

132.  प्रजा अधीन – राष्‍ट्रीय पहचानपत्र प्रणाली(सिस्टम) के अध्‍यक्ष

133.  प्रजा अधीन – राज्‍य पहचानपत्र प्रणाली(सिस्टम) के अध्‍यक्ष

134.  प्रजा अधीन – राष्‍ट्रीय जमीन/भूमि रिकॉर्ड प्रणाली(सिस्टम) के अध्‍यक्ष

135.  प्रजा अधीन – राज्‍य जमीन/भूमि रिकॉर्ड प्रणाली(सिस्टम) के अध्‍यक्ष

136.  प्रजा अधीन – जिला जमीन/भूमि रिकॉर्ड प्रणाली(सिस्टम) के अध्‍यक्ष

137.  प्रजा अधीन – लोकसभा के अध्‍यक्ष

138.  प्रजा अधीन – राज्‍यसभा के अध्‍यक्ष

139.  प्रजा अधीन – विधानसभा के अध्‍यक्ष

140.  प्रजा अधीन – विधानपरिषद् के अध्‍यक्ष

141.  प्रजा अधीन – जिला पंचायत, नगर परिषद(सभा) के स्‍पीकर/अध्यक्ष

142.  प्रजा अधीन – तहसील पंचायत के स्‍पीकर/अध्यक्ष

143.  प्रजा अधीन – `तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग(ओ.एन.जी.सी)` के अध्‍यक्ष

144.  प्रजा अधीन – `हिन्‍दुस्‍तान पेट्रोलियम निगम लिमिटेड(एच.पी.सी.एल)` के अध्यक्ष

145.  प्रजा अधीन – राज्‍य पेट्रोल कंपनी के अध्‍यक्ष

यह सूची(लिस्ट) 10 अगस्‍त, 2010 की तिथि के अनुसार है। यह सूची(लिस्ट) केवल बढ़ती ही है घटती नहीं।

ऊंचे पद पर बैठे लोगों का भ्रष्टाचार कम करने के लिए हम आम लोगों को मिलने वाली शक्तियों की सूची (लिस्ट)

146.  प्रजा अधीन – उंच्‍च पद पर बैठा कोई भी व्‍यक्‍ति/अधिकारी

147.  बहुमत(आबादी) के मतदान द्वारा अर्थदण्‍ड/जुर्माना

148.  बहुमत(आबादी) के मतदान द्वारा जेल/कैद की सजा

149.  बहुमत(आबादी) के मतदान द्वारा फांसी की सजा

पानी से संबंधित प्रस्‍तावों से हम आम लोगों को मिलने वाली शक्‍तियों की सूची (लिस्ट)

150.  ई.ए.एस. .01 : नागरिकगण भूजल के लिए वाटर गार्ड बदल सकते हैं अफसर को बदलने की प्रक्रियाओं द्वारा (जो अध्याय 9 में दिए प्रजा अधीन-रिसर्व बैंक गवर्नर के सामान होगा)

151.  ई.ए.एस. .01 : कोई नागरिक अपने पानी भत्ते को किसी बोरिंग-मालिक को दे(आवंटित कर) सकता है

152.  नागरिकगण डैम/नदी/तालाब के पानी के लिए वाटर गार्ड बदल सकते हैं

153.  कोई नागरिक अपनी पानी भत्ता खरीददार के प्राप्‍तकर्ता को बदल सकता है

 

कोर्ट / न्‍यायालय से संबंधित `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के प्रस्‍तावों से हम आम लोगों को मिलने वाली शक्‍तियों की सूची (लिस्ट)

154.  प्रजा अधीन – सुप्रीम कोर्ट के मुख्‍य जज

155.  प्रजा अधीन – हाई कोर्ट के मुख्‍य जज

156.  प्रजा अधीन – जिला कोर्ट के प्रमुख जज

157.  प्रजा अधीन – सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठे/बड़े  जज

158.  प्रजा अधीन – हाई कोर्ट के चार बड़े/वरिष्ठे जज

159.  प्रजा अधीन – जिला कोर्ट के चार बड़े/वरिष्ठे जज

160.  निचली अदालतों में जूरी प्रणाली(सिस्टम)

161.  हाई कोर्ट में जूरी प्रणाली(सिस्टम)

162.  सुप्रीम कोर्ट में जूरी प्रणाली(सिस्टम)

163.  छात्रगण कक्षा 6 से कानून की पढ़ाई प्रारंभ करेंगे

164.  सभी वरिष्ठे/बड़े नागरिकों के लिए कानून की नि:शुल्‍क शिक्षा

 

पुलिस से संबंधित `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के प्रस्‍तावों से हम आम लोगों को मिलने वाली शक्‍तियों की सूची (लिस्ट)

165.  प्रजा अधीन – जिला पुलिस प्रमुख

166.  नागरिकगण पुलिसकर्मी पर जूरी सुनवाई का प्रयोग करके कनिष्‍ठ/छोटे पुलिसकर्मियों को हटा/बर्खास्‍त कर सकते हैं

 

बैंक से संबंधित `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के प्रस्‍तावों से हम आम लोगों को मिलने वाली शक्‍तियों की सूची (लिस्ट)

167.  प्रजा अधीन – रिजर्व बैंक के गवर्नर

168.  प्रजा अधीन – भारतीय स्‍टेट बैंक के अध्‍यक्ष

169. भारतीय रिजर्व बैंक/भारतीय स्‍टेट बैंक के बैंक कर्मचारियों पर जूरी सुनवाई

170.  रूपए की मात्रा केवल नागरिकों के अनुमोदन/स्वीकृति के बाद ही बढ़ाई जाएगी

 

टैक्‍स / कर लगाने से संबंधित `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के प्रस्‍तावों से हम आम लोगों को मिलने वाली शक्‍तियों की सूची (लिस्ट)

171.  प्रजा अधीन – प्रत्‍यक्ष-कर(खुला टैक्स) बोर्ड के अध्‍यक्ष

172.  प्रजा अधीन – अप्रत्‍यक्ष-कर(छुपा हुआ टैक्स) बोर्ड के अध्‍यक्ष

173.  नागरिकगण टैक्‍स/कर अधिकारियों पर जूरी सुनवाई का प्रयोग करके उन्‍हें हटा/बर्खास्‍त कर सकते हैं

 

शिक्षा से संबंधित `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के प्रस्‍तावों से हम आम लोगों को मिलने वाली शक्‍तियों की सूची (लिस्ट)

174.  प्रजा अधीन – शिक्षा मंत्री

175.  प्रजा अधीन – जिला शिक्षा अधिकारी

176.  प्रजा अधीन – स्‍कूल के प्रधानाचार्य/ प्रिंसिपल(कालेज का अध्यक्ष)

177.  जूरी सुनवाई का प्रयोग करके स्‍कूल शिक्षकों को हटाना/बर्खास्‍त करना

 

चुनाव सुधारों से संबंधित `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के प्रस्‍तावों से हम आम लोगों को मिलने वाली शक्‍तियों की सूची (लिस्ट)

178.  नागरिकगण आई.आर.वी. अर्थात तत्‍काल निर्णायक मतदान (यानि अधिक पसंद और कम पसंद बताने के लिए मतदान) में एक से ज्‍यादा मत/वोट देने में समर्थ होंगे यानि इसके पात्र होंगे

अध्याय 50 –

आखरी में बात / उपसंहार

(50.1) जमीन किराया और खदान रॉयल्‍टी के लिए लड़ाई / संघर्ष के कुछ संभव / संभावित भविष्‍य


भविष्‍यवाणी करना ज्‍योतिष-विज्ञान (एस्‍ट्रोलॉजी) है। मैं इससे नफरत/घृणा करता हूँ लेकिन ऐतिहासिक/इताहस के घटनाओं पर आधारित संभव परिस्थितियों/स्थितयों का अनुमान लगाना उपयोगी है। इतिहास के बारे में एक चेतावनी जो मैं देना चाहता हूँ – इतिहासकारों के कारण इतिहास बेकार/अनुपयोगी हो गया है। अधिकांश इतिहासकार विशिष्ट/उच्च लोगों के ऐजेंट रहे हैं और इसलिए उन्‍होंने सावधानीपूर्वक उन ऐतिहासिक जानकारियों/सूचनाओं के पन्ने/पृष्‍ठ किताबों से निकाल दिए हैं जिनमें कार्यकर्ताओं को ऐसी बातों का पता चलता जो विशिष्ट/उच्च लोग नहीं चाहते हैं और इतिहासकारों ने अपने लोगों के विचार-नजरियों और मतों को “सत्य/तथ्‍यों” और  “सत्य/तथ्‍यों पर आधारित विचार” के रूप में बताया है। तब भी, इतिहास जितना भी उपयोगी है, उसके आधार पर मैं उन परिस्थितयां/स्थितियां बताता/कल्पना करता हूँ कि तब क्‍या हो सकता है, यदि हजारों कार्यकर्ता करोड़ों नागरिकों को राजी/आश्‍वस्‍त कर सकें कि वे मुख्‍यमंत्रियों, प्रधानमंत्री को प्रजा अधीन समूह द्वारा प्रस्तावित पहली सरकारी अधिसूचना(आदेश)(पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)) पर हस्‍ताक्षर करने पर मजबूर/बाध्य कर दें।

यदि पहली सरकारी अधिसूचना(आदेश) पर हस्‍ताक्षर हो जाता है तो कुछ ही सप्‍ताहों में करोड़ों आम आदमी को जमीन किराया और खदान रॉयल्‍टी देने की मांग स्‍पष्‍ट हो जाएगी। विशिष्ट/उच्च लोगों के धन और उनकी आय में भारी गिरावट आएगी। यदि ऐसा हो गया तो बुद्धिजीवी लोग, जो विशिष्ट/ऊंचे लोगों के ऐजेंट होते हैं, वे भी अपनी आय में गिरावडेट देखेंगे। इसलिए विशिष्ट/उच्च लोग और बुद्धिजीवी लोग सभी सरकारी आदेशों के खुलेआम विरोधी हो जाएंगे। चाहे यह पहला सरकारी आदेश हो या दूसरा,तीसरा या चौथा या पांचवीं या सौंवा। तब क्‍या होगा जब गैर-80-जी कार्यकर्ता (जो 80-जी आयकर में छूट के खंड/नियम को रद्द करवाना चाहते हैं क्योंकि ये आय के चोरी करने में मदद करती है जिससे सेना,कोर्ट,पोलिस और देश के अन्य विकास लिए जरुरी धन में कमी आती है | ) जमीन किराया की मांग करेंगे अथवा दूसरा या तीसरा सरकारी आदेश की मांग करेंगे और विशिष्ट/उच्च लोग इस को पास करने से ईनकार करेंगे। कुछ परिस्थितियाँ इस प्रकार हैं :-

50.1.1      पहली परिस्थिति :

 

बुद्धिजीवी विशिष्ट / उच्च लोग बिना किसी हिंसा के हार स्‍वीकार कर लेंगे

एक संभावना यह है कि विशिष्ट/उच्च और उनके ऐजेंट बुद्धिजीवी लोग बहुमत के फैसले को स्‍वीकार कर लेंगे। मुख्‍यमंत्रियों, प्रधानमंत्री तीसरे सरकारी आदेश और 50 प्रतिशत नागरिकों के द्वारा अनुमोदित/स्वीकृत सरकारी आदेशों पर हस्‍ताक्षर कर देंगे और आम आदमी की ही तरह रहने लगेंगे। यह एकमात्र परिस्थिति/परिदृष्‍य है, जिसमें खून खराबा नहीं है और मुझे उम्‍मीद है कि ऐसा ही होगा। पहले भी ऐसा हो चुका है। वर्ष 1930 के दशक में अमेरिकी और यूरोपियन विशिष्ट/उच्च लोगों ने 70 प्रतिशत विरासत- कर, 75 प्रतिशत आयकर और 1 प्रतिशत संपत्‍ति कर लागू करने (के फैसले) को स्‍वीकार कर लिया ताकि एक कल्‍याणकारी राज्‍य की स्थापना हो सके । ऐसा इसलिए हुआ क्‍योंकि पश्‍चिमी देशों में 70 प्रतिशत से अधिक आम लोगों के पास हथियार थे। यह एक ऐसी स्‍थिति है जो भारत में नहीं है। इसलिए हांलांकि भारत के विशिटवर्ग/ऊंचे लोगों  द्वारा ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.)’-रिकॉल(भ्रष्ट को बदलने का अधिकार) कानूनों को बिना किसी हिंसा के स्‍वीकार करने की संभावना है, लेकिन इसकी 100 प्रतिशत गारंटी नहीं है।

50.1.2       परिस्थिति 2: बुद्धिजीवी, विशिष्ट / उच्च लोग पुलिसवालों और सिपाहियों से उन गैर-80-जी कार्यकर्ताओं की हत्‍या करने के लिए कहेंगे, जो पहली सरकारी अधिसूचना(आदेश) की मांग कर रहे हैं।

 

मैं इतिहास से कुछ उदाहरण दूंगा।

कृपया http://en.wikipedia.org/wiki/Tiberius_Gracchus  और  http://en.wikipedia.org/wiki/Gaius_Gracchusपढ़ें।    

टिबेरियस ग्राकूस

(नि:शुल्‍क इनसाइक्‍लोपिडीया के विकिपेड़िया से)

भूमिका / शुरुवात 

टिबेरियस का जन्‍म 168 ईसा पूर्व में हुआ था। वह टिबेरियस ग्राकुस मेजर और कॉरनेलिया अफ्रिकाना का बेटा था। ग्राकची रोम के सबसे ज्‍यादा राजनीतिक रूप से संपर्क वाले परिवार हुआ करते थे। उसके नाना-नानी प्‍यूब्‍लियस कार्नेलियस स्किपियो अफ्रिकानस और ऐमिलिया पाउला थे। उसकी बहन,सेम्प्रोनिया प्‍यूबिलियस कोरनेलियस स्‍क्रिपीयो ऐमिलियानुस, एक महत्‍वपूर्ण जनरल की पत्नी थी । टिबेरियस की सेना की नौकरी पूनिक युद्ध में अपने साले स्‍क्रिपीयो ऐमिलियानुस के स्‍टॉफ में सेना का प्रबंधकर्ता के रूप में नियुक्‍त होकर शुरू हुई। 147 ईसा पूर्व में वह सेनापति (कॉउन्‍सल) गैयस्‍क होस्‍टिलियस मैन्‍सीनस के अफसर(क्‍वास्‍टर) के रूप में नियुक्‍त हुआ और अपना कार्यकाल न्‍यूमान्‍टिया (हिस्‍पानिया जिला) में पूरा किया। अभियान सफल नहीं हुआ और मॉन्‍सिनस की सेना को बड़ी हार का सामना करना पड़ा। अफसर(क्‍वास्‍टर) के रूप में यह टिबेरियस ही था जिसने दुश्‍मन के साथ शांति संधि पर हस्‍ताक्षर करके सेना को बरबाद होने से बचा लिया। इधर रोम में स्‍क्रिपियो ऐमिलियानुस ने टिबेरियस के इस कार्य को कायरतापूर्ण समझा और इस शांति संधि को रद्द करवाने के लिए सिनेट में कार्रवाई करवाई। यह टिबेरियस और सिनेट के बीच राजनैतिक शत्रुता की शुरूआत थी।

भूमि का झगड़ा

 

रोम की आंतरिक राजनैतिक स्‍थिति शांतिपूर्ण नहीं थी। पिछले 100 वर्ष में अनेक युद्ध हुए थे। चूंकि सैनिकों को एक सम्‍पूर्ण अभियान के लिए काम करना पड़ता था इसलिए चाहे कितना भी लम्‍बे समय के लिए क्‍यों न हो, सैनिकों को अक्‍सर अपने खेत पत्‍नियों और बच्‍चों के हाथ छोड़ने पड़ते थे। इन परिस्‍थितियों में चुंकि ये खेत दीवालिया होने की ओर तेजी से अग्रसर हो गया और उंच्‍च वर्ग के धनवानों द्वारा उन्हें खरीद लिया गया इसलिए, बड़ी भूमि-सम्‍पदाओं (लैटिफुन्‍डिया) का निर्माण हुआ। इसके अलावा, कुछ जमीनें इटली और दूसरे स्‍थानों में यानि दोनों जगह युद्ध लड़ रहे राज्‍यों द्वारा ले लिए जाने के कारण समाप्‍त हो गईं।

युद्ध समाप्‍त हो जाने के बाद, अधिकांश जमीनें जनता के विभिन्‍न सदस्‍यों को बेच दी जाती थी या किराए पर दे दी जाती थी। इससे बहुत सी जमीनें केवल कुछ ही किसानों को दे दी गई थी, जिनके पास तब बड़ी मात्रा में जमीनें थीं । बड़े खेतों वाले किसानों के जमीन पर कृषि कार्य गुलामों द्वारा कराए जाते थे और वे खुद काम नहीं करते थे, जबकि छोटे खेतों के किसान लोग अपनी खेती का काम खुद ही किया करते थे। जब फ़ौज(लेजियन्स) से वापस लौटे तो उनके पास कोई ठिकाना नहीं बचा था। इसलिए वे रोम में जाकर उन हजारों की भीड़ में शामिल हो गए जो शहरों में बेकार/बेघर घूमा करते थे।चूँकि केवल जिन लोगों के पास जमीन थी, वे ही सेना में जा सकते थे, इसके कारण, सेना की ड्यूटी के लिए योग्‍य माने जाने के लिए पर्याप्‍त सम्‍पत्‍ति वाले लोगों की संख्‍या कम होती जा रही थी।

133 ईसा पूर्व में टिबेरियस लोगों का हाकिम/नेता(ट्रिब्‍यून) चुन लिया गया। जल्‍दी ही उसने बेघर सैनिकों(लोगोनियरियों) के मामले पर विधान/कानून बनाना शुरू कर दिया। लिबेरियस ने देखा कि कितनी ही जमीन बड़ी भू-संपदाओं(लाटिफुन्‍डिया) में एक ही जगह थी जो कि बड़े खेतों के कब्‍जे में थी, जिन पर गुलाम काम करते थे। और दूसरी ओर छोटी सम्‍पदा थी जिसके मालिक छोटे किसान थे और खुद ही अपनी खेती करते थे।

लैक्‍स सेम्‍प्रोनिया ऐग्रेरिया

इसके विपरित, टैबेरियस ने लैक्‍स सेम्‍प्रोनिया ऐग्रेरिया  नामक कानूनों का प्रस्‍ताव किया। उन्‍होंने यह सुझाव दिया कि सरकार को उन सार्वजनिक जमीनों को वापस दिलाना चाहिए, जिन्‍हें पहले राज्‍य द्वारा प्रारंभिक युद्धों के दौरान ले लिया गया था और वे 500 युगेरिया अर्थात लगभग 310 एकड़ (1.3 वर्गकिलोमीटर से ज्‍यादा) बड़े क्षेत्र में फैले थे और उन्‍हें पहले के जमीन कानूनों में इजाजत/अनुमति दी गई थी। इन जमीनों में से कुछ जमीनें बड़े भूस्‍वामियों के कब्‍जे में थी जिन्‍होंने इन्‍हें बहुत ही पहले के काल/समय में यानि अनेक पीढ़ियों पहले खरीदा था, उसपर बसे थे अथवा उस सम्‍पत्‍ति को किराए पर दिया हुआ था। कभी –कभी इन जमीनों को पट्टे या किराए पर दिया जाता था या प्रारंभिक बिक्री या किराया लेने के बाद दूसरे भूस्‍वामियों को फिर से बेच दिया जाता था।

किसी न किसी तरीके से यह 367 ईसा पूर्व में पारित किए गए लिसिनियन कानूनों को लागू करने का एक प्रयास था जिन्‍हें कभी रद्द भी नहीं किया गया था और न ही कभी लागू किया गया था। इससे दो समस्‍याओं का समाधान हो सकता था :- सेना के लिए सेवा कर लगाए जा सकने वाले लोगों की संख्‍या बढ़ सकती थी और बेघर लेकिन युद्ध में निपूर्ण लोगों की देखभाल हो सकती थी।

सिनेट और उसके रूढ़िवादी(कंजर्वेटिव) लोग सेम्‍प्रोनियन ऐग्रेरियन सुधारों के घोर विरोधी थे और टिबेरियस के सुधारों को पास/पारित करने के अत्‍यन्‍त पारंपरिक तरीके का भी खासकर विरोध करते थे क्‍योंकि टिबेरियस अच्‍छी तरह यह जानता था कि सिनेट उसके सुधारों का अनुमोदन नहीं करेगी इसलिए वह सीधे ही कान्‍सिलियम प्‍लेविस (लोकप्रिय विधानसभा) में चला गया और सीनेट की उपेक्षा की। इस विधान सभा ने इन सुधारों का पूरा समर्थन किया। ऐसा करना वास्‍तव में न कानून के खिलाफ थे और न हीं परंपरा के (मौसमई ओरम) के खिलाफ थे। लेकिन यह कुछ ऐसा था कि जिससे सीनेट का अपमान होता था और यह सीनेटरों को अलग करने का खतरा भी पैदा कर दिया था जो इसका समर्थन कर सकते थे |

लेकिन सीनेट के पास एक और तरकीब थी। एक नेता(ट्रिब्‍यून) कोई प्रस्ताव को “नहीं” कहा अथवा रोक/वीटो का इस्‍तेमाल करके उसे विधानसभा में आने से रोक सकता था | इसलिए टिबेरियस को रोकने के प्रयास के रूप में सीनेट ने एक और नेता(ट्रिब्‍यून) ओक्‍टावियस का सहारा लिया ताकि वह अपने वीटो का इस्‍तेमाल करके विधान सभा में विधेयक प्रस्‍तुत न कर सके। टिबेरियस ने तब यह प्रस्ताव रखा कि एक ट्रिब्‍यून के रूप में औक्‍टावियस को तुरंत हटाया जाये क्योंकि उसने अपने लोगों के खिलाफ काम किया था । औक्‍टावियस डटा रहा। लोगों ने औक्‍टावियस को हटाने के लिए वोट देना शुरू किया लेकिन औक्‍टावियस ने उनकी कार्रवाईयों पर वीटो लगा दिया। टिबेरियस ने उसे विधान सभा की बैठक के स्‍थान से बलपूर्वक हटा दिया और उसे ठप करने के लिए वोट की कार्रवाई जारी रखी।

इन कार्रवाईयों ने औक्‍टावियस के पवित्र-पावन अधिकार(सेक्रोसेंकटिटी) का उल्‍लंघन किया और टिबेरियस के समर्थकों को चिन्‍ता में डाल दिया और इसलिए औक्‍टावियस को हटाने की कार्रवाई के बजाए टिबेरियस ने अपने रोक/वीटो का इस्‍तेमाल करना प्रारंभ किया, जब नेताओं(ट्रिब्‍यूनों) से यह पूछा गया था कि क्‍या वे अनुमति देंगे कि मुख्य पब्लिक स्थान जैसे बाजार , मंदिर खुल जायें | इस तरह टिबेरियस सभी व्‍यावसायों, व्‍यापार और उत्‍पादन सहित पूरे रोम शहर को बन्‍द कर सका ,जब तक सीनेट और विधान सभा द्वारा कानूनों को पारित ना करे । विधानसभा ने टिबेरियस की सुरक्षा के डर से उसे उसकी सुरक्षा करते हुए घर पहुंचा दिया।

सीनेट ने टिबेरियस के कानूनों को लागू करने के लिए नियुक्‍त किए गए अग्रेरियन आयोग को मामूली धन दिया हालांकि, 133 ईसा पूर्व के अन्‍त में पेरगामम का राजा अटालूस III की मौत हो गई। टिबेरियस ने मौका देखा और तुरंत ही धन बांटने की अपनी कानूनी शक्‍तियों का प्रयोग करते हुए नए कानून को धन दे दिया। यह सीनेट की शक्‍ति पर सीधा प्रहार था क्‍योंकि यह खजाने के प्रबंधन के लिए और विदेशी मामलों के संबंध में निर्णय लेने के लिए परंपरागत रूप से जिम्‍मेदार था। सीनेट का विरोध बढ़ता गया।

टिबेरियस की मौत

टिबेरियस ग्राकूस जिसने एक नेता(ट्रिब्यून) के रोक/वीटो की अनदेखी की थी, उसे अवैध समझा गया और उसके विरोधी उसके एक वर्ष के शासन के अन्‍त में उसपर महाभियोग लगाने का निश्‍चय कर चुके थे क्‍योंकि उसे संविधान का उल्‍लंघन करने और एक नेता(ट्रिब्यून) के खिलाफ ताकत का इस्‍तेमाल करने का दोषी पाया गया था। अपने आप को आगे बचाने के लिए टिबेरियस ग्राकुस ने 133 ईसा पूर्व में नेता(ट्रिब्यून) के रूप में पुनर्मतदान की कोशिश की और वायदा किया कि वह सैनिक शासन की अवधि कम कर देगा, केवल सिनेटर की जूरी सदस्‍य के रूप में कार्य करने के विशेषाधिकार को समाप्‍त कर देगा और देश के सहयोगियों को रोमन नागरिकता मिल सकेगी । चुनाव के दिन टिबेरियस ग्राकूस रोम के सीनेट में सशस्‍त्र गार्डों/रक्षकों के साथ प्रकट हुआ ।

जैसे-जैसे मतदान की प्रक्रिया आगे बढ़ी, दोनों पक्षों से हिंसा फूट पड़ी। टिबेरियस का भतीजा प्‍यूबिलियस कार्नेलियस स्‍कीपीयो नासका यह कहते हुए, कि टिबेरियस राजा बनना चाहता है, सीनेटरों को लेकर टिबेरियस की ओर आगे बढ़ा। निर्णायक लड़ाई में टिबेरियस मारा गया। उसके कई सौ समर्थक जो सीनेट के बाहर इंतजार कर रहे थे, उसके साथ ही मारे गए या दफन हो गऐ। प्‍लूटार्च कहता है कि “टिबेरियस की सीनेट में हुई मौत अचानक और कम समय में हो गई हालांकि वह सशस्‍त्र था फिर भी उस दिन अनेक सीनेटरों के सामने ये हथियार उसके काम न आए।”

 

टिबेरियस ग्राकूस का विरोध

टिबेरियस का विरोध तीन लोगों ने किया : मारकस ऑक्‍टावियस, सीपीयो नासिका और सीपीयो ऐमिलियानुस । ऑक्‍टावियस ने टिबेरियस का विरोध इसलिए किया कि टिबेरियस ने उसे लेक्‍स सेम्‍प्रोनिया अग्रेरिया पर रोक/विटो लगाने नहीं दिया। इसने ऑक्‍टावियस का विरोध किया जिसने तब सीपीयो नासिका और सीपीयो ऐमिलियानस के साथ मिलकर टिबेरियस की हत्‍या करने का षड़यंत्र किया। नासिको को इससे लाभ होता क्‍योंकि टिबेरियस ने एक ऐसी जगह से कुछ जमीन खरीदी थी जो नासिका खरीदना चाहता था। इसके कारण नासिका को 500 सेसटेर्स(रोम साम्राज्य के चांदी के सिक्के) का नुकसान हुआ। नासिका अक्‍सर इस मामले को सीनेट में उठाकर टिबेरियस का मजाक उड़ाया करता था। ऐमिलियानुस ने टिबेरियस ग्राकूस का विरोध किया क्‍योंकि टिबेरियस ने उसे राजी किया था कि वह उसकी बहन सेम्‍प्रोनिया से शादी कर ले । यह शादी असफल हो गई और अलगाव के समझौते में ऐमिलियानुस को काफी ज्‍यादा लागत देनी पड़ी। ऐमिलियानुस भी कड़वाहट से भर गया क्‍योंकि टिबेरियस लोगों के बीच बेहतर भाषण दिया करता था जिससे अक्‍सर अमेलियानुस को सिनेट में शर्मनाक स्‍थिति का सामना करना पड़ता था।

इसके प्रभाव / परिणाम

सिनेट ने तब ग्राकसन कानूनों को लागू कराने के लिए परामर्श करके प्‍लेबियन्‍स को शांत कराने का कार्य किया। अगले दशक में नागरिकों के पंजीकरण में वृद्धि से भूमि आवंटन की बड़ी संख्‍या का संकेत मिलता है। हालांकि ऐग्रेरियन आयोग को अनेक कठिनाईयों और बाधाओं का सामना करना पड़ा। टिबेरियस का उत्‍तराधिकारी उसका छोटा भाई गाइयस था जो एक दशक के बाद और भी ज्‍यादा क्रांतिकारी विधान/कानून लागू करने की कोशिश में टिबेरियस के ही भाग्‍य का साझेदार बना यानि उसकी तरह का ही भाग्‍य पाया।

गाईयस ग्राकूस

(विकिपेडिया से, नि:शुल्‍क इनसाइक्‍लोपिडिया देखें)

प्रारंभिक जीवन

गाईयस का जन्‍म 154 ईसा पूर्व में हुआ था, वह टिबेरियस सेम्‍प्रोनियस ग्राकूस (टिबेरियस ग्राकूस मेजर, जिसकी मौत उसी वर्ष हो गई थी) और कार्नेलिया अफ्रिकाना का बेटा था और टिबेरियस सेम्‍प्रोनियस ग्राकूस का भाई था। ग्राकची महान खनदान से थे और वह खानदान रोम के राजनीतिक रूप से सबसे महत्‍वपूर्ण परिवारों में से एक था जो कि बहुत ही अमीर और अच्‍छी पहुंच वाले थे । उसकी मां कार्नेलिया अफ्रिकाना, सीपीयो अफ्रिकनस मेजर की बेटी थी और उसकी बहन सेम्‍प्रोनिया सीपीयो ऐमिलियानस, जो कि एक और महत्‍वपूर्ण जनरल था, की पत्‍नी थी। गाईयस का पालन-पोसन उसकी मां, जो कि उंची नैतिक स्‍तर और भाग्‍य वाली थी, के द्वारा हुआ था। सेना में गाईयस का कैरियर/नौकरी न्‍यूमान्‍तिया में अपने साले सीपीयो आमेलियानस के स्‍टाफ में भर्ती सेना अफसर के रूप में शुरू हुआ। अपनी जवानी में ही उसने अपने बड़े भाई टिबेरियस ग्रकूस द्वारा किए गए राजनीतिक उथल-पुथल को ध्‍यान से देखा था जब उसने ऐग्रेरियन सुधारों के लिए कानून लागू करने की कोशिश की थी। टिबेरियस 133 ईसा पूर्व में कैपिटोल के निकट मारा गया था जब वह अपने चचेरे भाई प्‍यूब्लियस कोर्नेलियस सीपीयो नासिका के नेतृत्‍व में राजनैतिक प्रतिद्वंद्वियों से सशस्‍त्र युद्ध करता हुआ मारा गया था। इस मौत के साथ ही, गाईयस ने ग्राकूस परिवार की सम्‍पदा को विरासत में मिल गयी | इतिहास यह साबित करता कि उसने अपने भाई के आदर्शों को भी विरासत में मिला था।

अफसरी(क्‍वास्‍टरशिप) और पहला नेता का पद(ट्रिब्‍यूनेट)  

गाईयस अपने भाई और ऐपियस क्‍लॉडियस के साथ ऐग्रेरियन आयोग में रहा था। गाईयस ने अपना राजनैतिक जीवन/कैरियर 126 ईसा पूर्व में सारडिनिया में ल्‍यूसियस ऑरेलियस ऑरेस्‍ट के राजनयिक के अफसर(क्‍वास्‍टर) के रूप में शुरू किया। रोम में कुछ वर्षों की राजनीतिक शांति के बाद, 123 ईसा पूर्व में, गाईयस, लोगों का नेता(ट्रिब्यून) चुना गया जैसा कि उससे पहले उसके परिवार के हर सदस्‍य पहले ही चुन लिए गए थे। रूदिवादियों(केजरवेटिवों) ने पहले ही महसूस कर लिया कि उनको उससे कुछ कठिनाईयां हो सकती हैं। गाईनियस के विचार टिबेरियस के ही समान थे, लेकिन उसके पास अपने भाई की गलतियों से सीखने का मौका/समय था। उसके कार्यक्रमों में न केवल ऐग्रेरियन कानून ही शामिल थे, जिसके कारण यह शुरू हुआ कि अमीरों द्वारा गैरकानूनी रूप से अधिग्रहित की गई जमीन गरीबों में बांटी जानी चाहिए, बल्‍कि ऐसे भी कानून थे जिसने अनाज के मूल्‍यों को निश्‍चित कर दिया। उसने भी यह कोशिश की कि किसी व्‍यक्‍ति द्वारा सेना में अनिवार्य रूप से की जाने वाली सेवा और अभियान के वर्ष सीमित किए जाएं। अन्‍य उपायों में वसूली कोर्ट में सुधार ,एक कानून द्वारा ,करना शामिल था। इस कोर्ट में सीनेट के सदस्‍यों द्वारा धन के गैरकानूनी अनियमितताओं के लिए मुकद्दमा चलाया जाता था और जूरी का गठन केवल सीनटरों द्वारा होता था जिसे दोषी सेनेट के सदस्य और जूरी के सदस्यों में सांठ-गाँठ हो जाती थी । उसके(गाईनियस) कानून ने ये बदलाव लाया कि जूरी-ड्राफ्ट पूल में आम लोगों को शामिल करने की इजाजत दे दी । उसने अनेक इटलीवासियों और संबंद्ध राष्‍ट्रों को रोम की नागरिकता के देने का भी प्रस्‍ताव किया। इन सभी कार्रवाईयों ने सीनेटरों को नाराज कर दिया।

दूसरा नेता का पद(ट्रिब्‍यूनेट) और मौत

122 ईसा पूर्व में, गाईयस ने लोगों के नेता(ट्रिब्‍यून) के रूप में एक और अवधि के लिए पाया और रोम के निम्‍नवर्गों के असंख्‍य/जोरदार समर्थन से सफल भी रहा। इस वर्ष के दौरान, उसने अपने सुधार कार्य करना और सीनेट के बढ़ते विरोध से निपटना जारी रखा। गाईयस ने मार्कस फ्युलवियस फ्लॉकूस को अपने सहयोगी और भागीदार के रूप में रखकर तीसरी बार शासन चलाना चाहा लेकिन वे हार गए और नए कंजरवेटिव/रूढ़िवादी राजदूतों, क्‍विंटस फाबियस माक्‍सिमस और ल्‍यूसियस ओपिमियस द्वारा अपने लागू किए गए सभी कानूनों को हटते देखने के सिवाय और कुछ न कर सके। अपने द्वारा किए गए सभी कार्यों की हानि को रोकने के लिए गाईयस और फ्यूलवियस फ्लाकूस ने हिंसक तरीकों का सहारा लिया। सीनेट ने उन्‍हें गणतंत्र के दुश्‍मन के रूप में बदनाम/चित्रित किया और उन्‍हें आखिरकार भागना पड़ा था। फ्लूवियस फ्लाकूस और उसके बेटों की हत्‍या कर दी गई लेकिन गाईयस अपने विश्‍वस्‍त गुलाम, फिलोक्रेट्स के साथ बच निकलने में कामयाब रहा। बाद में, शायद उसने फिलोक्रैट्स को आदेश दिया कि वह उसे मार डाले। उसके मरने के बाद लगभग 3000 वैसे लोगों को भी मार दिया गया था और सम्‍पदाएं जब्‍त कर ली गई थी, जिन लोगों पर उसका समर्थन करने का शक था। प्‍लुतार्श की लाइव्स ऑफ नोबल ग्रीक्स एण्‍ड रोमन्स(पुस्तक) के अनुसार, गाईयस ग्राकूस, फिलोक्रैट्स द्वारा मारा गया था, जिसने खुद भी बाद में आत्‍महत्‍या कर ली थी। ग्राक्‍शू के एक शत्रु ने उसके सर को धड़ से अलग कर दिया और सर को सेप्‍टिम्‍यूलियस (ओपीमियस का एक ग्राहक) द्वारा ले लिया गया जिसने, ऐसा कहा जाता है कि, खोपड़ी को तोड़कर खोल दिया और इसमें पिघला हुआ शीशा भर दिया जिसे फिर ओपिमियस के पास ले जाया गया। इसे तराजू में तौला गया और यह 17 पाउन्‍ड का निकला। इसलिए ओपीमियस ने इतने ही वजन का सोना सेप्‍टीमुलियस को दिया जैसा कि उसने वायदा किया था।

———————–

दूसरे शब्‍दों में, इन विशिष्ट वर्गों/ऊंचे लोगों और बुद्धिजीवियों ने मानवाधिकारों और आजादी के बारे में बहुत शोर मचाया लेकिन वे सभी जानते थे कि खदान रॉयल्‍टी और जमीन किराया के बिना उनकी तथाकथित “गुणों/खूबियों” का कोई उपयोग नहीं है। और वे उसी दिन आम आदमी की तरह बन जाएंगे जिस दिन बैंकों , खदानों, भारत सरकार के प्‍लॉटों आदि तक उनकी पक्षपातपूर्ण पहुंच खत्‍म हो जाएगी। इसलिए शायद वे `प्रजा अधीन समूह` द्वारा प्रस्तावित प्रथम सरकारी अधिसूचना(आदेश)(चैप्टर 1 देखें) की मांग करने वालों के खिलाफ पूरी हिंसा का सहारा ले सकते हैं क्‍योंकि उन्‍हें यह समझ आ जाएगा कि पहला सरकारी आदेश ही दूसरे सरकारी आदेश का रास्‍ता खोल देगा जो जमीन किराया और खनिज रोयल्टी (आमदनी) से संबंधित है और वो पास हो जायेगा और आम लोगों को उनका ये हक वाला पैसा मिल जायेगा ।

रोम में 2000 वर्ष पहले ठीक यही हुआ था। ऐसा इतिहास में सैंकड़ो बार हो चुका है। इसलिए व्‍यावहारिक रूप से कहा जाए तो इस बात की संभावना है कि भारतीय विशिष्ट/उच्च लोग और बुद्धिजीवी कानूनी शक्‍तियों का प्रयोग करके सैनिकों और पुलिसकर्मियों से कहेंगे कि वे इन गैर 80 जी कार्यकर्ताओं को मौत के घाट उतार दें जो `प्रजा अधीन-रजा समूह` द्वारा प्रस्तावित प्रथम सरकारी अधिसूचना(आदेश) की मांग कर रहे हैं।

यदि ऐसा होता है तो गैर 80-जी कार्यकर्ताओं के पास ताकत से उलटा प्रहार करने के अलावा और कोई रास्ता/विकल्‍प नहीं बचेगा। (भारत में) 15 लाख पुलिसकर्मी और 10 लाख सैनिक हैं। एक ऐसी ताकत का निर्माण करने के लिए, जो पुलिस और सैनिकों के बीच के स्तर के अफसर(प्रबंधन) को गैर 80 – जी कार्यकर्ताओं और प्रथम सरकारी आदेशों की मांग करने वाले आम लोगों की हत्‍या नहीं करने का निर्णय करने से रोक सके, कम से कम 25 लाख हथियारों से लैस(सशस्‍त्र), ट्रेनिंग लिए हुए(प्रशिक्षित) आम नागरिकों की जरूरत होगी। यही कारण है कि मैं जोर देता हूँ कि प्रत्‍येक ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.)’-रिकॉल सदस्‍य को चाहिए कि वे जितनी अधिक संख्‍या में संभव हो, आम युवाओं को बंदूकों का ट्रेनिंग/शिक्षा दे।

50.1. 3      परिस्थिति 2 (क) : पहले,दूसरे सरकारी आदेश की मांग कर रहे आम आदमियों को मौत के घाट उतारने का सैनिकों और पुलिसकर्मियों का फैसला

सेना के 35,000 अधिकारियों में से, 33,000 से ज्‍यादा अधिकारी, भ्रष्‍ट नहीं हैं और उनकी राजनीतिक मांगों को पूरा करने के लिए साधारण गैर-अलगाववादी  आम लोगों को जान से मारने के लिए सैनिकों को आदेश देने के भयंकर परिणाम को अच्‍छी तरह जानते हैं। लेकिन तब, सैनिकों को आदेश मानने का ट्रेनिंग/शिक्षा दी जाती है और मैं उनसे यह आशा नहीं करूंगा और यह चाहूंगा भी नहीं कि वे प्रधानमंत्री के आदेशों की अवहेलना/अनदेखी करें। इसलिए यदि प्रथम ‘ प्रजा अधीन-राजा समूह` सरकारी अधिसूचना(आदेश) की मांग कर रहे गैर – 80 – जी कार्यकर्ताओं की हत्‍या का आदेश प्रधानमंत्री सैनिकों को दे देते हैं तो इसके परिणाम  अराजकता फैलाने वाले होंगे।

50.1.4     परिस्थिति 2 ख : सैनिकों के शीर्ष(सबसे ऊंचे पद वाले)/मध्‍य स्तर के अफसर विशिष्ट वर्ग(ऊंचे लोगों) को राजी कर लें कि वे आम आदमियों की हत्‍या न करवाएं 

 

भारतीय सेना की मध्‍य प्रबंधन अधिकतर भ्रष्‍ट नहीं है और इसमें प्रतिबद्ध/कर्तव्‍यनिष्‍ठ अधिकारी हैं जो यह पक्का/सुनिश्‍चित करने में दिलचस्‍पी रखते हैं कि भारत किसी विदेशी ताकत का गुलाम न बने, जैसा कि नेपाल बन गया है। इसलिए वे शायद मंत्रियों को आश्‍वस्‍त करने में सफल हो जाएं कि वे मंत्री आम लोगों और गैर – 80- जी कार्यकर्ताओं की हत्‍या करने का आदेश न दें और हम लोगों द्वारा मांग की जा रही पहली सरकारी अधिसूचना(आदेश) पर हस्‍ताक्षर करके तीसरी (अधिसूचना(आदेश)) की मांग स्‍वीकार कर लें। यही वह मांग है जिसकी आशा मैं कर रहा हूँ। मैं सच्‍चे मन से यह आशा करता हूँ कि सैन्य अधिकारी मंत्रियों, बुद्धिजीवियों और विशिष्ट वर्गों/ऊंचे लोगों को मनाने में सफल रहेंगे कि वे भारत पर पुलिस राज/सैनिक शासन न थोपें। हालांकि, यदि भारतीय विशिष्ट/उच्च लोग, मंत्री आदि सेना के बीच के स्तर के अफसर(मध्‍य प्रबंधन) की बातों को अनसुनी कर देते हैं और भारत में सैनिक राज/पुलिस शासन थोप देते हैं तो भारत एक और नेपाल बन जाएगा और उससे भी बुरी स्‍थिति कि एक और पाकिस्‍तान बन जाएगा और छोटे-छोटे बांग्‍लादेश की तरह के कई इलाके चारों ओर उभरने लगेंगे। इन नए राज्‍यों में से अधिकांश अमेरिका/इंग्‍लैण्‍ड के प्रति भक्‍ति दिखलाएंगे और भारत फिर से वर्ष 1757 की स्‍थिति में पहुंच जाएगा।

अब निर्णय भारतीय विशिष्ट/उच्च लोगों को ही करना है। उनके निर्णय ही भारत का भविष्‍य तय करेंगे।

अध्याय 49

`राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के क़ानून-ड्राफ्ट को कौन-कौन समर्थन दे सकता है ? और

कौन `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के क़ानून-ड्राफ्ट का विरोध अवश्‍य करेगा?

                       

1.         यदि आप हम आम लोगों को “अच्छे बर्ताव/नैतिकता” का पाठ पढ़ाना चाहते हैं अथवा यदि आप आम लोगों के व्‍यवहार/दृष्‍टिकोण को बदलना चाहते हैं तो `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` आपके लिए नहीं है। `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` ड्राफ्ट/प्रारूप इस तथ्‍य/सुक्‍ति का अनुसरण करता है कि हम आम लोग मंत्रियों आई.ए.एस.(भारतीय प्रशाशनिक सेवक/बाबू), जजों, विशिष्ट/उच्च लोगों और बुद्धिजीवियों से ज्‍यादा अच्छा व्यवहार वाले(नैतिकतावादी) नहीं हैं और न ही इनसे कम अच्छे व्यवहार वाले(नैतिकतावादी) हैं।

2.    यदि आप हम आम लोगों को “जगाने/सचेत करने” के इच्‍छुक हैं तब `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के कानून प्रारूप/ड्राफ्ट आपके लिए नहीं हैं। `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` ड्राफ्ट मौन/सांकेतिक रूप से यह मान कर चलता है कि हम आम लोग उतने ही जागरूक/सचेत हैं जितने जागरूक ये मंत्री आई.ए.एस., जज, विशिष्ट/उच्च लोग और बुद्धिजीवी हैं।

3.    यदि आप आम लोगों की गरीबी दूर/कम करना चाहते हैं और जिस अत्‍याचार का ये आम लोग सामना करते हैं, उसे दूर करना चाहते हैं तो `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के कानून प्रारूप/ड्राफ्ट आपके लिए हैं।

4.    सबसे ऊपर/शीर्ष पर बैठे 2 करोड़ लोगों में से अनेक लोगों का मानना है कि भारत के आम लोगों के पास अच्छा व्यवहार/नैतिकता नहीं है, इनका कोई अच्छा, राष्ट्रिय चरित्र/चाल-चलन नहीं है, ये नासमझ/अविवेकी होते हैं, ये भावुक होते हैं (पढ़ें : अनिश्चित स्वाभाव वाले) और आम लोगों बुरे व्‍यवहार वाले होते हैं, आदि। और उनका यह भी मानना है कि विशिष्ट/उच्च लोग और बुद्धिजीवी लोग, जो ईमानदार और `दूध के धुले` हैं, उन्‍हें पूरी तरह से अधिकार/शासन दिया जाना चाहिए। वे हम आम लोगों का अपमान करना पसंद करते हैं और यह कहने में गर्व महसूस करते हैं कि भारत के आम लोग कायर, डरपोक, आलसी आदि हैं। यदि आप इन सभी आम आदमी-विरोधी और विशिष्ट/उच्च हितैषी की फालतू/बेकार की बातों पर विश्‍वास रखते हैं तो `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के कानून प्रारूप/ड्राफ्ट आपके लिए नहीं हैं।

5     मैंने यह भी देखा/पाया है कि तथाकथित “जनता हितैषी” लोग शायद ही मेरे `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के कानून-ड्राफ्टों को पसंद करते हैं। ये तथाकथित “जनता हितैषी” जो अपने को सामाजिक कहते हैं और मिलना जुलना पसंद करते हैं और वे लोग जो “मानव स्‍वभाव” और संस्कार/संस्कृति को जानने/समझने का दावा करते हैं वे `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के ड्राफ्टों को कभी पसंद नहीं करते। सबसे खराब बात यह है कि वे इस बात/विचार से ही नफरत करते हैं कि पार्टी/दल के कानून प्रारूप/ड्राफ्ट होने चाहिएं – वे जोर देते हैं कि पार्टी की राजनीतिक कथन/विचार बिलकुल अनिश्चित/अस्‍पष्‍ट होने चाहिए, यानि समझ में आने लायक नहीं होने चाहिए। तकनीकी और हिसाब-किताब के काम-काज करने वाले लोग `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के प्रारूपों/ड्राफ्टों को कहीं ज्‍यादा पसंद करने वाले होते हैं।

6.    सेना विरोधी लोगों की तुलना में, सेना समर्थक लोग द्वारा `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के प्रारूपों/ड्राफ्टों को पसंद करने की संभावना ज्‍यादा होती है।

7.    भ्रष्‍टाचार के “छिपे सकारात्‍मक/अच्छा पक्ष ” को देखने वाले लोग, जैसे कि `भ्रष्टाचार से काम हो जाता है`, वे `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के कानूनों के प्रारूप/ड्राफ्टों को पसंद नहीं करना चाहेंगे।

8.    कई लोगों का मानना है कि भ्रष्‍टाचार भारत के लोगों के स्‍वभाव में ही है, इसलिए जजों, आई.ए.एस., आई.पी.एस., मंत्रियों आदि के अधिकार कम करने के कोई प्रयास नहीं किए जाने चाहिए बल्‍कि केवल लोगों को ही सुधारना चाहिए। ऐसे लोग भी `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के कानून के प्रारूप/ड्राफ्टों से नफरत करेंगे।

9.    सबसे बड़ी बात कि ऐसे लोग भी होते हैं, जो मानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में भाई-भतीजावाद कभी नहीं चलता। ऐसे लोग भी ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.) – प्रजा अधीन जैसे कार्य-सूची/ऐजेंडे से नफरत करेंगे क्‍योंकि ये कार्य-सूची/ऐजेंडे यह मानकर चलते हैं कि भाई भतीजावाद व्‍याप्‍त है, यानि भाई भतीजावाद का बोलबाला है।

10.   और यदि आपका लक्ष्‍य चुनाव जीतना है या किसी सांसद या विधायक का नजदीकी/मित्र बनना है तो आपको कभी भी ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.) – रिकॉल पार्टी/दल में शामिल नहीं होना चाहिए। इस पार्टी/समूह का आधारभूत और सबसे महत्‍वपूर्ण लक्ष्‍य है – मुख्‍य मंत्रियों और प्रधानमंत्री को पहला प्रस्‍तावित सरकारी अधिसूचनाओं(आदेश) पर हस्‍ताक्षर करने के लिए मजबूर/बाध्‍य करना। चुनाव लड़ना केवल इन प्रस्‍तावित सरकारी अधिसूचनाओं(आदेश) का प्रचार-प्रसार करना मात्र है।

सामान्‍यतया, जनसंख्‍या के शीर्ष/सबसे उपर बैठे एक करोड़ में से 98,00,000 लोग जानबूझकर ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.) समूह/पार्टी और इसके ऐजेंडे/कार्यसूची से घृणा करेंगे। भारत के शीर्ष 1 प्रतिशत लोगों में से केवल 2 प्रतिशत लोग ही ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.) के कार्य-सूची/ऐजेंडे को पसंद करेंगे। जैसे-जैसे आम लोगों की आय/सम्‍पत्‍ति घटती जाएगी वैसे-वैसे (इस ऐजेंडे को) चाहने वाले लोगों का प्रतिशत बढ़ता जाएगा।

एक संक्षिप्‍त प्रश्‍नोत्‍तरी (प्रश्न और उत्तर)  

मैं आपसे निम्‍नलिखित प्रश्‍न पूछूंगा। कृपया जैसे उत्‍तर/बात आप जनता के सामने खड़े होकर खुलासा करेंगे/बताएंगे, वैसे ही “पूरी तरह से, पक्के से सहमत” अथवा  “पूरी तरह से, पक्के से सहमत नहीं” में से एक उत्‍तर दें। दूसरे शब्दों में, कल्‍पना कीजिए, कि निम्‍नलिखित प्रश्‍नों पर आपके दिए गए उत्‍तर की जानकारी आपके हरेक दोस्‍त, ग्राहक, साथी/सहकर्मी, रिश्‍तेदार आदि को हो जानी है। तब आपका उत्‍तर क्‍या होगा : “पूरी तरह से ,पक्के से सहमत” अथवा  “ पूरी तरह से, पक्के से सहमत नहीं”?

1.    प्रधानमंत्री को भेजी गई जनता की शिकायतें एवं सुझाव कुछ शुल्‍क लेकर प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर आनी चाहिए

2.         जनता द्वारा प्रस्‍तावित सुझावों पर नागरिकों से कुछ शुल्‍क लेकर उन्‍हें हां/नहीं दर्ज करने की इजाजत/मंजूरी दी जानी चाहिए

3.    जनता को सांसदों और विधायकों द्वारा पारित/पास किए गए कानूनों पर कुछ शुल्‍क देकर हां/नहीं दर्ज करने की इजाजत/मंजूरी देना चाहिए

4     आई.आई.एम.ए., जे.एन.यू. आदि सार्वजनिक,आम जनता के, प्‍लॉटों से जनता को जमीन का किराया मिलना चाहिए

5.    नागरिकों को हवाई अड्डे/एयरपोर्ट से जमीन का किराया मिलना चाहिए

6     नागरिकों को खदानों से जमीन का किराया मिलना चाहिए

7.    जनता के पास प्रधानमंत्री को बदलने की प्रक्रिया/तरीका अवश्‍य होनी चाहिए

8.    90 प्रतिशत से अधिक जज अपने रिश्‍तेदार वकीलों का पक्ष/तरफदारी करते हैं

9.    हर नागरिक को कानून का ज्ञान दिया जाना चाहिए

10.       जजों का चयन लिखित परीक्षा के आधार पर अथवा चुनावों द्वारा किया जाना चाहिए, इसके लिए साक्षात्‍कार नहीं लिया जाना चाहिए

11.   नागरिकों के पास सुप्रीम-कोर्ट के जजों को बदलने की प्रक्रिया/तरीका अवश्‍य होनी चाहिए

12.   संपत्‍ति-कर और विरासत-कर का प्रयोग करके हमें अपनी सेना को दिए जा रहे पैसा/धन को अवश्‍य बढ़ाना चाहिए

13.   मैं वैट और उत्पादन-शुल्‍क(एक्स्साईज़) के स्‍थान पर विरासत-कर का समर्थन करता हूँ।

14.   मैं सेना, पुलिस और कोर्ट को पैसा/धन दिलवाने/देने के लिए तम्‍बाकू पर कर/टैक्‍स लगाने का विरोध करता हूँ।

15.   आज की स्‍थिति में सेना का वेतन बहुत ही कम है और इसे कम से कम दोगुना किया जाना चाहिए

16.   भारत को परमाणु जांच/परीक्षण और तैयार परमाणु हथियार के मामले में चीन के साथ बराबरी करनी होगी।

17.   जनता के पास भारतीय रिजर्व बैंक के प्रमुखों को बदलने की प्रक्रिया/तरीका अवश्‍य होनी चाहिए

18.   हर नागरिक को हथियार चलाना सिखाना होगा।

19.   हर नागरिक को बंदूक रखना जरूरी है

20.   जनता के पास भारतीय जिला पुलिस प्रमुखों को बदलने की प्रक्रिया/तरीका अवश्‍य होनी चाहिए

21.   आई.ए.एस.(भारतीय प्रशासनिक सेवक/बाबू), आई.पी.एस.(पोलिस-कर्मी), जजों आदि को अपनी सम्‍पत्‍ति और उन संस्थाओं/ट्रस्ट की संपत्ति जिससे वे या उनके रिश्तेदार जुड़े हैं, का खुलासा/विवरण इंटरनेट पर देना होगा।

22.   सेना/पुलिस को पूंजी/फंड/कोष के लिए मैं बिक्री-कर के बदले सम्‍पत्‍ति-कर का समर्थन करता हूँ।

23.   संस्थाओं/ट्रस्‍टों/न्‍यासों को दी गई टैक्‍स से छूट समाप्‍त की जानी चाहिए

24.   सेज को दी गई टैक्‍स से छूट समाप्‍त की जानी चाहिए

25.   498 ए और डी.वी.ए. कानून समाप्‍त किए जाने चाहिए

26.   बुद्धिजीवी और जज आदि उतने ही बुरे बर्ताव/अनैतिक होते हैं जितना कि आम लोग

27.   बुद्धिजीवी और जज आदि उतने ही भाई-भतीजावाद और भ्रष्‍टाचार करने वाले हो सकते हैं जितना कि आम लोग

यदि आप इन सभी 27 प्रश्‍नों का उत्‍तर “पूरी तरह से, पक्के से सहमत” देते हैं तो आप जितनी जल्‍दी ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.) पार्टी/समूह में शामिल हो सकते हैं, उतनी जल्‍दी आपको शामिल हो जाना चाहिए। और यदि आपका उत्‍तर 15 से अधिक प्रश्‍नों के लिए “पूरी तरह से सहमत” है तो आपको ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.) पार्टी/दल और अन्‍य दलों के बारे में और अधिक अध्‍ययन करना/पढ़ना चाहिए और कुछ समय गुजरने के बाद ही आप सभी 27 प्रश्‍नों से सहमत हो जाएंगे। यदि आपका उत्‍तर 15 से कम प्रश्‍नों के लिए ही “दृढ़ता से सहमत” है तो ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.) पार्टी/दल आपके लिए नहीं है। और यदि आपका उत्‍त्‍र 5 से कम प्रश्‍नों पर “पूर्ण सहमत” है तो आपको यह भी सीखना चाहिए कि ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.)  पार्टी/दल से नफरत कैसे करें।

अध्याय 47

`राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` की सदस्‍यता, सदस्‍य / उम्‍मीदवार का चयन आदि (से

संबंधित) नियम

(47.1) विभाजन (अलग दल बनाना)

मैं `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के सदस्‍य के रूप में आधिकारिक तौर पर सदस्‍यों को ‘प्रजा अधीन राजा/राईट टू रिकाल (भ्रष्ट को बदलने का अधिकार)’ कानून के लिए प्रचार-प्रसार करने हेतु एक और दल/समूह बनाने के लिए उत्‍साहित करता हूँ। वास्‍तव में, मैं सांसद/विधायक स्‍तर के किसी उम्‍मीदवार का स्‍वागत करूंगा यदि वह अपना अलग दल बनाए और सांसद/विधायक चुनाव-क्षेत्र में `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के मामलों/विषयों की व्यवस्था/संचालन करे। इससे उसे इस बात की पूरी सुरक्षा मिलेगी कि उसे ही (चुनाव में) टिकट मिलेगा और वह अपने चुनाव क्षेत्र में ध्‍यान केन्‍द्रित करके इस बात की पूरी गारंटी/वायदे के साथ काम कर सकता है कि टिकट उसे ही मिलेगा।

(47.2) वित्‍त पोषण / धन जुटाना

`राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` किसी सदस्‍य या बाहरी लोगों से कोई चंदा/दान नहीं लेगा। कृपया साफ-साफ जान लें कि `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` किसी से भी चंदा/दान का एक भी पैसा नहीं लेगा, सदस्‍यों से भी नहीं। सदस्‍यगण या समर्थकगण समाचारपत्रों में प्रचार/विज्ञापन दे सकते हैं या होर्डिंग लगा सकते हैं अथवा जेरोक्‍स/फोटोकॉपी ,पर्ची/पम्‍फलेट्स (छपवाकर) लगवा सकते हैं लेकिन किसी भी समर्थक को `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के किसी भी पदधारी/अधिकारी को नकद पैसा नहीं देना चाहिए। दल/समूह के पदधारियों/अधिकारियों और समर्थकों को कोई वेतन नहीं मिलेगा और न ही उनके द्वारा किए गए किसी भी खर्चे की भरपाई/प्रतिपूर्ति ही की जाएगी।

(47.3) सदस्‍य बनना

कोई सदस्‍यता-शुल्‍क/फीस अथवा (`राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` में) शामिल होने के लिए कोई शुल्‍क नहीं है। दल/समूह में दान/चन्‍दा लाने की कोई जरूरत नहीं होगी। वास्‍तव में, `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` नकद चन्‍दा/दान के खिलाफ है। समाचार पत्रों में प्रचार/विज्ञापन देने के लिए पैसा लगाने का खुली विनती/अनुरोध किया जाएगा, लेकिन इसकी भी अपेक्षा/उम्‍मीद नहीं की जाती है। व्‍यक्‍ति को भारत का नागरिक होना चाहिए, 18 वर्ष से अधिक आयु का होना चाहिए, और एक पंजीकृत मतदाता होना चाहिए। वह दूसरे दल/पार्टी का सदस्‍य हो भी सकता है अथवा नहीं भी हो सकता है।

(47.4) सदस्‍यों से खुली / साफ-साफ अपेक्षा (उम्मीद)

1.   सदस्‍यों से आशा/उम्‍मीद की जाती है कि वह http://righttorecall.info/003.h.pdf में उल्‍लिखित कदम उठाएगा।

2.    उसे http://www.petitiononline.com/rti2en/ पर दी गई याचिका पर हस्‍ताक्षर करना चाहिए।

3.    उसे निम्‍नलिखित 14 नेताओं में से किसी को भी पत्र लिखना चाहिए : प्रधानमंत्री, मुख्‍यमंत्री, विधायक, सांसद, सांसद के लिए हुए पिछले चुनाव में दूसरे नम्‍बर पर रहने वाले उम्‍मीदवार, तीसरे नम्‍बर पर रहने वाले उम्‍मीदवार, विधायक के लिए हुए पिछले चुनाव में दूसरे नम्‍बर पर रहने वाले उम्‍मीदवार, तीसरे नम्‍बर पर रहने वाले उम्‍मीदवार, उन दलों/पार्टियों के नेताओं को, जिनकी पार्टी ने (पिछले चुनाव में) भारत में और अपने-अपने राज्‍यों में पहला, दूसरा और तीसरा स्‍थान प्राप्‍त किया है। इन नेताओं को लिखे जाने वाले पत्र में कहा जायेगा कि पब्लिक/स्‍पष्‍ट/सार्वजनिक रूप से `प्रजा-अधीन समूह` की पहली मांग- `जनता की आवाज़-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम)` सरकारी आदेश का समर्थन करे ।पत्र में यह भी उल्‍लेख होना चाहिए कि यदि वह नेता `प्रजा अधीन-राजा समूह`की पहली मांग- `जनता की आवाज़-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम)`सरकारी आदेश का समर्थन नहीं करता तो पत्र लिखने वाला, प्रत्‍येक नागरिक को सार्वजनिक रूप से बता देगा कि वह नेता आम आदमी के खिलाफ है।

4     यदि सदस्‍य को कम्‍प्यूटर का ज्ञान है तो उसे ऑर्कूट.कॉम, फेसबुक.कॉम और लिंक्‍ड-इन. कॉम पर अपना एकाउन्‍ट/खाता खोलना चाहिए और उसे http://www.orkut.co.in/Community.aspx?cmm=21780619 पर समूह/पार्टी के ऑर्कूट समुदाय(समूह), फेसबुक समुदाय और लिंक्‍डइन समुदाय – “नागरिकों के लिए खनिज रॉयल्‍टी” में शामिल हो जाना चाहिए।

5.    यदि सदस्‍य को कम्‍प्यूटर का ज्ञान नहीं है तो उसे किसी ऐसे `प्रजा अधीन-राजा समूह/राईट-टू-रिकाल ग्रुप (एम.आर.सी.एम.-रिकॉल)` के सदस्‍य का पता लगाना चाहिए जिसे कम्‍प्‍यूटर का ज्ञान है और जिसपर वह भरोसा कर सकता है। वह अपना खाता कम्‍प्‍यूटर का ज्ञान रखने वाले `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` सदस्‍य के द्वारा/जरिए चला सकता है। लेकिन ऑर्कूट खाता रखना अनिवार्य होगा। और कम्‍प्‍यूटर का ज्ञान रखने वाला एक `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` सदस्‍य अधिक से अधिक 100 वैसे सदस्‍यों के लिए कम्‍प्‍यूटर खाता संचालित करने/चलाने का काम कर सकता है इससे ज्‍यादा का नहीं।

6.    सदस्‍य को हफ्ते/सप्‍ताह में एक बार अपने संदेशों/मैसेजेज को खोलना चाहिए और लिखना चाहिए कि पिछले एक सप्‍ताह में उसने पार्टी/समूह के एजेंडे को फैलाने/इसमें अन्‍य लोगों को शामिल करने के लिए क्‍या कार्यकलाप चलाया/किया है।

7.    सदस्‍य को दल/समूह के अध्‍यक्ष द्वारा पूछे गए हरेक/प्रत्‍येक इंटरनेट सर्वेक्षण/चुनाव में मतदान अवश्‍य करना चाहिए।

8.    सदस्‍य को ऐसेम्‍बली स्‍तर की बैठक में वर्ष में चार बार भाग लेना होगा, लोक सभा स्‍तर की बैठक एक वर्ष में 4 बार होती है, राज्‍य स्‍तर की बैठक वर्ष में एक बार होती है, और राष्‍ट्रीय स्‍तर की बैठक प्रत्‍येक 2 साल/वर्ष में एक बार होती है।

9.    राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष 24 सदस्‍यों की जूरी बुला सकता है और यदि 18 से अधिक जूरी सदस्‍यों ने किसी सदस्‍य को हटाने/बर्खास्‍त करने का सुझाव दे दिया तो उसने पार्टी/समूह पर अब तक जितना भी पैसा खर्च किया है, उतना पैसा उसे देकर पार्टी/समूह से निकाल दिया जाएगा।

10.   यदि कोई सदस्‍य ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ , प्रजा अधीन राजा/राईट टू रिकाल (भ्रष्ट को बदलने का अधिकार), `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के कानूनों के प्रचार-प्रसार के लिए पैसे खर्च करने का निर्णय करता है तो उसका बढ़ावा दिया जाएगा लेकिन उसे `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के कार्यकलाप के लिए अलग से बचत खाता खोलने और समय-समय पर उस बचत खाते की जानकारी देने और/अथवा उसने ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’, ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.), प्रजा अधीन राजा/राईट टू रिकाल (भ्रष्ट को बदलने का अधिकार)  कानूनों के प्रचार-प्रसार के लिए उसके द्वारा खर्च किए गए पैसे की पूरी जानकारी देने की जरूरत नहीं है।

शेष/बाकी के कार्यकलाप http://righttorecall.info/003.h.pdf पर विस्‍तार से बताए गए हैं।

(47.5) लोकसभा के लिए पहले उम्‍मीदवार का निर्णय करना

1.    किसी जिले का पहला व्‍यक्‍ति ,जिसने जिले के किसी प्रमुख समाचारपत्र में 1,00,000 रूपए का विज्ञापन `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के पक्ष में दिया है, वह उस संसदीय चुनावक्षेत्र से `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` का उम्‍मीदवार होगा।

2.    यदि ज्‍यादा लोग उम्‍मीदवार हो/बन जाते हैं तो इस राशि को बढ़ा दिया जाएगा।

3.    यह राशि दर्जे/श्रेणी-3 के शहर के लिए दोगुनी, दर्जे/श्रेणी-2 के शहर/नगर के लिए चार गुनी और दर्जे/श्रेणी-1 के लिए छह गुनी बढ़ा दी जाएगी। उदाहरण – यदि कोई व्‍यक्‍ति मुंबई से `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` का उम्‍मीदवार होना/बनना चाहता है तो प्रचार/विज्ञापन की राशि 600,000 रूपए होगी।

4.    ऊपर दी गई राशि वर्ष 2009 के आधार पर है। यह धनराशि समाचारपत्र के प्रचार/विज्ञापनों में होने वाली वृद्धि/बढ़ोत्‍तरी के तुलना/अनुपात में बढ़ा दी जाएगी।

(47.6) सांसद पद का उम्‍मीदवार बदलना

यदि कोई व्‍यक्‍ति `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के प्रचार/विज्ञापन देकर सांसद का उम्‍मीदवार बन जाता है ,तो वह तब तक के लिए सांसद उम्‍मीदवार रहेगा जब तक कि उसे पार्टी/समूह के आंतरिक मतदान द्वारा हटा नहीं दिया जाता। ऐसा तभी होगा जब प्रतिद्वंद्वी/`मुकाबले में` उम्‍मीदवार को मतदाताओं की कुल संख्‍या के कम से कम 5 प्रतिशत के बराबर मत मिल जाएं और पिछले चुनाव में उसे जितने वोट मिले थे, उससे अधिक वोट मिल जाएं।

साथ ही, जीतने वाले उम्‍मीदवार को उसके द्वारा समाचारपत्र के प्रचार/विज्ञापनों में सांसद उम्‍मीदवार के लिए खर्च की गई धनराशि का तीन गुना/तिगुना पैसे का भुगतान करना होगा।(ये एक सुरक्षा/बचाव है) उदाहरण – मान लीजिए, श्री `क` ने ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ और प्रजा अधीन राजा/राईट टू रिकाल (भ्रष्ट को बदलने का अधिकार)  के लिए समाचार पत्र विज्ञापनों पर 5,00,000 रूपए खर्च करके सांसद पद के लिए उम्‍मीदवार बने हैं। मान लीजिए, उस संसदीय चुनाव क्षेत्र में 15,00,000 मतदाता हैं। अब यदि श्री `ख` श्री `क` को हटाकर खुद उम्‍मीदवार बनना चाहते हैं, तब श्री `ख` को कम से कम 75,000 मतदाताओं को 10 रूपए, उनके अपने मोबाईल नम्‍बर और बिलिंग पता  दर्शाने वाला बिल प्रमाण भेजने के लिए कहना/राजी करना पड़ेगा और मोबाईल नम्‍बरों को `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के पास दर्ज/पंजीकृत कराना होगा। `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के अध्‍यक्ष (मैं खुद) एस.एम.एस. द्वारा मतदान/सर्वेक्षण करवाएंगे। वे लोग जो श्री `क` अर्थात वर्तमान उम्‍मीदवार का समर्थन कर रहे हैं, वे दर्ज/पंजीकरण नि:शुल्‍क/बिना कोई पैसा दिए करा सकते हैं। और यदि एक बार श्री `ख` विजेता साबित हो जाते हैं तो उन्‍हें श्री `क` को 15,00,000 रूपए का भुगतान करना होगा।

(47.7) विधायक, नगर निगम के लिए पहले उम्‍मीदवार का निर्णय

विधानसभा की सीट के लिए प्रचार/विज्ञापन की धनराशि संसदीय सीट के लिए प्रचार/विज्ञापन धनराशि का एक तिहाई होगी और नगर निगम के लिए यह धनराशि विधानसभा के लिए धनराशि का एक तिहाई होगी।

(47.8) चुनाव में सदस्‍यों की भूमिका

चुनाव में सदस्‍यों को खुली छूट होगी कि वे उस उम्‍मीदवार के लिए चुनाव प्रचार करें जिसे वे समझते हैं कि वह उम्‍मीदवार ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’, प्रजा अधीन राजा/राईट टू रिकाल (भ्रष्ट को बदलने का अधिकार), ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.) आदि कानून लाने के लिए सबसे अच्‍छा उम्‍मीदवार है। सदस्‍यों को पार्टी/समूह द्वारा अधिकारिक तौर पर खड़े किए गए उम्‍मीदवार के लिए चुनाव प्रचार करने की जरूरत/बंधन नहीं होगा ।

(47.9) पार्टी / समूह के अध्‍यक्ष को बदलना

1.    इसके लिए चुनाव आर्कूट समूह/समुदाय अथवा किसी अन्‍य कम्‍प्‍यूटर समुदाय के जरिए ही होगा।

2.    कोई भी सदस्‍य पार्टी/समूह के अध्‍यक्ष के पद के लिए खड़ा हो सकता है।

3.    सदस्‍यों के पास मतों की अलग अलग गिनती/संख्‍या होगी। किसी सदस्‍य के वोटों की संख्‍या की गिनती होगी – (समाचार प्रचार/विज्ञापन पर उसके द्वारा खर्च किए गए रूपए)/1000

4.    सदस्‍य अपना-अपना वोट डालेंगे।

5.    सबसे अधिक मत पाने वाला व्‍यक्‍ति पार्टी/समूह का अध्‍यक्ष बनेगा।

6.    जिन लोगों/सदस्‍यों को कम्‍प्यूटर का ज्ञान नहीं है वे लोग अपने ऐसे मित्र, रिश्‍तेदार आदि के जरिए अपना वोट डाल सकेंगे जिन्‍हें कम्‍प्यूटर का ज्ञान हो।

7.    चुनकर आनेवाला अध्‍यक्ष ,वर्तमान अध्‍यक्ष द्वारा समाचार पत्र प्रचार/विज्ञापनों पर किए गए खर्च का तीन गुना खर्च करेगा। हटने वाले अध्‍यक्ष को कोई मुआवजा/पैसा नहीं मिलेगा।

8.    किसी अध्‍यक्ष को आने वाले आम लोक सभा चुनाव के खत्‍म होने से केवल, कम से कम एक वर्ष पहले ही बदला जा सकता है।

(47.10) अन्‍य पदाधिकारियों की नियुक्‍ति

अध्‍यक्ष के अलावा, प्रतीक्षारत/इन्तेज़ार-में उम्‍मीदवार होंगे और कोई अन्‍य पदाधिकारी नहीं होगा।

(47.11) चुनाव आयोग को दिया गया पार्टी-संविधान

चूंकि चुनाव आयोग ने पार्टी/दल के गठन से संबंधित कोई विस्‍तृत नियम नहीं बनाए हैं, इसलिए चुनाव आयोग को दी जाने वाली संविधान की प्रति `छोटे में`/संक्षिप्‍त होगी, पूरा/विस्‍तृत नहीं। संविधान में मेरे द्वारा प्रस्‍तावित ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ और प्रजा अधीन राजा/राईट टू रिकाल (भ्रष्ट को बदलने का अधिकार) के प्रारूप/ड्राफ्ट का उल्‍लेख होगा।

(47.12) `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` जैसे अन्‍य समूहों की पहचान करना

यदि भारत का कोई नागरिक किसी पार्टी/दल का बनाता(गठन करता) है जिसके संविधान में ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ और प्रजा अधीन राजा/राईट टू रिकाल (भ्रष्ट को बदलने का अधिकार) के ड्राफ्ट हों, तो मैं `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के सदस्‍य के रूप में उस दल/पार्टी को सहयोगी पार्टी/दल के रूप में समझूंगा। और यदि उस दल/पार्टी का अध्‍यक्ष ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ और प्रजा अधीन राजा/राईट टू रिकाल (भ्रष्ट को बदलने का अधिकार) प्रारूपों/ड्राफ्टों के प्रचार/विज्ञापन समाचार पत्रों में देता है तो जिस संसदीय या विधान सभा चुनाव क्षेत्र में वह अपने उम्‍मीदवार खड़े करेगा ,वहां मैं कोई उम्‍मीदवार खड़े नहीं करूंगा। असल/वास्‍तव में, मैं इसे पसंद करूंगा यदि सांसद, विधायक उम्‍मीदवार अपने अपने दल/पार्टी का गठन करें/बनाये – हर चुनाव क्षेत्र के लिए एक दल/पार्टी। इस प्रकार से कुल लगभग 543 उम्‍मीदवार `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` संसदीय चुनाव क्षेत्र स्‍तर के होंगे और लगभग 5000 `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` विधायक/विधानसभा स्‍तर के होंगे। जितने अधिक समूह हों उतना ही अच्‍छा है।

अध्याय 46

               

                यदि विशिष्ट / ऊंचे लोग या राजनेता तानाशाही चलाते हैं , तो महात्मा उधम सिंह योजना

यदि विशिष्ट/ ऊंचे लोग भारत में तानाशाही चलाना चाहते हैं तो, यदि सिर्फ 500 महात्मा उधम (सिंह) कार्यकर्ता उधम सिंह योजना लागू करने का फैसला/निर्णय करें, तो ऐसी तानाशाही का तख्‍ता पलटा जा सकता है। कैसे?

  1. सबसे महत्‍वपूर्ण भाग यह है कि उधम को अकेले ही काम को अंजाम देना होगा और उसे कभी भी कोई संगठन नहीं बनाना होगा। यदि कोई व्‍यक्‍ति इतिहास पढ़े तो उसे पता चलेगा कि भगत सिंह (अपनी जान) हारे क्‍योंकि उनके समूह में विभिषण था। और कोई भी व्‍यक्‍ति ऐसी लंका नहीं बना सकता जिसमें विभिषण न हों। यदि हिंदुस्‍तान सामाजिक क्रांति दल(हिंदुस्‍तान सोसलिस्‍ट रिवोल्‍यूशन पार्टी) के सभी अच्‍छे लोग अकेले-अकेले काम कर रहे होते तो वे ज्‍यादा अंग्रेजों को मार सकते थे, अनेक अन्‍य लोगों को प्रेरणा दे सकते थे, और अंग्रेजों के लिए और अंदरूनी व गंभीर खतरा पैदा कार सकते थे। लेकिन चूंकि उन्‍होंने एक समूह बनाया और किसी भी समूह में एक विभिषण होता ही है, इसलिए वे सभी पकड़े गए और मारे गए और वे केवल एक ही अंग्रेज को मार सके। इसलिए किसी भी उधम सिंह को कोई समूह कभी बनाना/तैयार करने की गलती कदापि नहीं करनी चाहिए। क्‍योंकि ऐसे समूहों में 10 में से कोई 1 विभिषण होगा, और वह शेष/बाकी 9 लोगों को गिरफ्तार करवा देगा या मरवा देगा।

  2. प्रत्‍येक उधम को अकेले ही काम करना चाहिए और किसी तानाशाही शासन, जिसमें एक तानाशाह और उसके अनेक अधिकारी होते हैं, उनमें से क्रमरहित तरीके से किसी एक को चुन लेना चाहिए जो किसी डॉयर की ही तरह का हो।

  3. और उधम को इन डॉयरों से छोटे समूह या बड़े समूह में निपटना चाहिए। समूह के सदस्‍य जितने अधिक हों, उतना ही अच्‍छा होगा। और जितने ही ऊंचे पद पर बैठा अधिकारी हो, उतना ही अच्‍छा होगा। लेकिन बहुत ही ऊंचे पदों पर बैठे लोगों/डॉयरों को निशाना नहीं बनाएं क्‍योंकि इन लक्ष्‍यों/निशानों की सुरक्षा बहुत ही कड़ी होती है और इन तक पहुंचने में खतरा बहुत ही ज्‍यादा रहता है।

  4. सैकड़ों डॉयरों की मौत से डॉयर का उत्साह/मनोबल टूट जाएगा और तानाशाह अपने को अकेला महसूस करेगा।

चाहे कोई उधम अकेला काम करे या समूह में काम करे, किसी भी स्‍थिति में उसे मरना ही है। लेकिन यदि वह समूहों में काम करता है, मान लीजिए, 10 अथवा 50 उधम एक साथ काम करते हैं और उनमें से एक भी सदस्‍य विभिषण निकला तो सारे उधम एक भी डॉयर को मौत के घाट उतारे बिना खुद शहीद हो जाएंगे। जबकि यदि ये 10 या 50 उधम अकेले-अकेले काम करते हैं तो यह पक्‍का/गारंटी है कि हर एक उधम शहीद होने से पहले कम से कम 1 या 10 डॉयरों से निपटेगा। इस तरह यदि उधम समूह में काम करने की बजाए अकेले-अकेले काम करते हैं तो जिन डॉयरों से वे निपटेंगे उनकी संख्‍या कहीं ज्‍यादा होगी।

यदि पहले वर्ष में, यदि 10 उधम तैयार होते हैं तो अनेक लोगों को प्रेरणा मिलेगी और वे उनके (10 के) कदमों/पदचिन्‍हों पर चलेंगे।

उधमों का खतरा सभी डॉयरों का साहस/मनोबल तोड़ कर रख देगा और तानाशाह तो मर ही जाएगा।

मैं और थोड़ा भी विस्‍तार से बताना नहीं चाहता। और मुझे ऐसा करने/विस्‍तार से बताने की जरूरत भी नहीं है – कोई भी बुद्धिमान पाठक समझ जाएगा कि मैंने क्‍या लिखा है।

(46.1) सबसे अहिंसक तरीका

मैं अहिंसा को पूरी तरह से समर्थन करता हूँ और हिंसा को पूरी तरह से विरोध करता हूँ | लेकिन मोहनभाई (मोहन चंद करम दस गाँधी) के पास कोई एकाधिकार/समस्त अधिकार नहीं है | खुले मन से , बिना किसी पक्ष के , किसी को फैसला/निर्णय करना चाहिए कि उसे मोहनभाई के अहिंसक तरीकों पर चलना है या उधम सिंह के अहिंसक तरीकों पर | हरेक को फैसला/निर्णय करने की छूट होनी चाहिए कि उसे कौन से अहिंसक तरीकों पर चलना है, जब तक कि वो अहिंसक तरीकों पर चल रहा है |

कुल मिलाकर, मैं मोहनभाई के चेलों के मोहनभाई के अहिंसक तरीकों को थोपने का विरोध करता हूँ कि ये ही केवल और केवल तरीके हैं |

क्या हिंसा है और क्या अहिंसा(किसी को ना मरने की भावना ) है, इसपर निर्भर करता है कि आप इसे कैसे परिभाषा करते हैं | मेरे अनुसार, मोहनभाई के तरीकों से ज्यादा हिंसा हुई उधम सिंह और भगत सिंह जी के तरीकों के मुकाबले |

मोहनभाई ने बाद में लोगों को हथियार न रखने के लिए राजी किया ( हथियार चलाना तो भूल ही जाएये) जब कि 1931 में उसने और दूसरे कांग्रेसी नेताओं ने `हथियार रखने के लिए अधिकार` की मांग की थी | और लाखों लोग बंगाल में गरीबी से मर गए क्योंकि वे अंग्रेजों के लूट से अपने को बचा नहीं सके |और लाखों , निहत्थे लोग , अपने आपको बटवारे के दौरान हिंसक लोगों से बचा नहीं पाये, जिससे लाखों लोगों की जानें गयीं | दूसरे व्यक्ति के पास हथियार है, का डर ,हथियार से भी ज्यादा काम करता है | और इसीलिए ये स्थिति ज्यादा अहिंसक है , उस स्थिति के मुकाबले जिसमें केवल एक पक्ष के पास ही (वैध/`लिसेंसे के साथ`  या अवैध/`बिना लिसेंस) के` हथियार हैं |

`हथियार रखने का अधिकार 1931 में मोहनभाई, सरदार, नेहरु आदि कांग्रेसी द्वारा माँगा गया था, ये कई लोगों को सदमा(शौक)/हैरानी हो सकता है, लेकिन नीचे लिखी ,इसका सबूत है, जो `महात्मा गाँधी के एकत्र लेख ` नाम की पुस्तक से लिए गया है |  उसका लिंक ये है-

http://www.gandhiserve.org/cwmg/VOL051.PDF

उसमें पन्ना 327 देखें और आयटम संख्या 1(h) देखें –

“ लोगों के मूल अधिकार , जिसमें सम्मिलित है-

(a)सम्बन्ध रखने की स्वतंत्रता;
)b)भाषण/बोलने और प्रेस की स्वतंत्रता

….

(h) हथियार रखने का अधिकार , उसके लिए बनाये गए नियम और रोक के अनुसार ;


तो नेहरु, सरदार और गांधी ने “ हथियार रखने का अधिकार” को एक मूल/मुख्य अधिकार बनाने की मांग की थी | एक तरह से, इस का मतलब एक वायदा था , कि `हम हथियार रखने का अधिकार` को नागरिकों के लिए मूल अधिकार बनायेंगे यदि हम सट्टा में आये !!

खूब निभाया गया वायदा !

—–

कोई काम/क्रिया तभी अहिंसक है जब, लंबे समय में, उससे कम से कम हिंसा होती है | उदाहरण, यदि दावूद आता है, और आप उसको मार देते हो —तो आपने एक व्यक्ति को मारा |  क्या ये हिंसा लगती है ? देखिये, यदि आप उसे नहीं मारते, तो वो 1000 लोगों को बम से उड़ा देगा | और इसीलिए आपका दावूद को ना मरने के कार्य ने 1000 लोगों को मारा | तो क्या कम हिंसक है ? मेरे अनुसार, दावूद को मारना कम हिंसक है उसको छोड़ देने से | इसीलिए कि कौन सा तरीका कम अहिंसक है- मोहनभाई का तरीका या भगत सिंह का तरीका या उधम सिंह का तरीका या सुभाष चन्द्र बोसे का तरीका या मदन लाल का तरीका आदि, ये सब व्यक्ति की सोच पर निर्भर है | मेरे अनुसार, उधम सिंह का तरीका सबसे अधिक अहिंसक है |

———-
एक कार्यकर्ता को केवल अहिंसक तरीकों तक ही सीमित रहना चाहिए | उसे पहले ये साबित करना होगा कि बहुमत उसका प्रस्ताव का समर्थन कर रहा है | फिर , वो या तो महात्मा गाँधी के अहिंसक तरीके का चुनाव कर सकता है, या तो महात्मा उधम सिंह जी का या महात्मा भगत सिंह का या तो महात्मा सुभाष चन्द्र बोस का | मैं महात्मा उधम सिंह का तरीका सबसे अच्छा मानता हूँ- हरेक अपने दम पर ,आज़ाद हो कर ,काम करे |

अध्याय 45 –

                                   यदि खून की नदियां नहीं , तो खून की कुछ बूंद बह सकती हैं

(45.1) ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम)’  के खिलाफ इतनी शत्रुता / दुश्‍मनी क्‍यों?

जैसा कि हम लोगों में से अधिकांश लोग जानते हैं कि भारत की शीर्ष राजव्‍यवस्‍था और प्रशासनिक व्‍यवस्‍था लगभग 10,000 विशिष्ट/उच्च लोगों द्वारा चलाई जाती है, जिसमें से अधिकांश विशिष्ट/उच्च लोग अब विदेशी विशिष्ट/उच्च लोगों के हितों के लिए काम करते हैं। यदि ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.) कानून लागू हो जाए तो 10000 देशी/विदेशी विशिष्ट/उच्च लोगों के हाथों से खनिजों की रॉयल्‍टी(आमदनी) निकलकर नागरिकों के हाथों में आ जाएगी। इससे विशिष्ट/ऊंचे लोग कमजोर होंगे और आम आदमी की ताकत बढ़ेगी। इसी प्रकार, प्रजा अधीन राजा/राईट टू रिकाल (भ्रष्ट को बदलने का अधिकार) कानून से विशिष्ट/उच्च लोगों की मंत्रियों, अधिकारियों, जजों आदि को घूस देने की अधिकार/क्षमता कम हो जाएगी। इससे विशिष्ट/उच्च लोगों की ताकत एक बार फिर घटेगी। अब ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ का सहारा लेकर 3 से 4 महीने के भीतर ही ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी(आमदनी) (एम. आर. सी. एम.), प्रजा अधीन राजा/राईट टू रिकाल (भ्रष्ट को बदलने का अधिकार) कानून लागू कर/करवा दिए जाएंगे। और इसलिए विशिष्ट/उच्च लोग ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ से नफरत/घृणा करते हैं।

अब जैसा कि हम लोगों में से अधिकांश लोग यह जानते हैं कि सभी मुख्‍यमंत्री और प्रधानमंत्री इन 10000 विशिष्ट/उच्च लोगों के खिलौने हैं, वे खुद भी इन विशिष्ट/उच्च लोगों में से कोई एक हो सकते हैं। ये लोग इन 10000 विशिष्ट/उच्च लोगों की सामूहिक इच्‍छा/हितों के खिलाफ कहीं किसी भी कागजात पर हस्‍ताक्षर नहीं कर सकते। ये बुद्धिजीवी लोग बड़े लालची होते हैं और आर्थिक मदद(अनुदान) चाहते हैं, इसलिए अधिकांश बुद्धिजीवी लोग इन विशिष्ट/उच्च लोगों के हितों को साधने के लिए पूरी ताकत से काम करते हैं। विशिष्ट/उच्च लोग ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ से नफरत करते हैं और लगभग सभी बुद्धिजीवी लोग ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ से नफरत करते हैं। और अधिकांश विधायक, सांसद, मुख्‍यमंत्री, प्रधानमंत्री आदि भी ऐसा ही करते हैं। नफरत/घृणा इसका कारण नहीं है बल्‍कि इसका कारण है कि यदि ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ लागू हो जाएगी तो विशिष्ट/उच्च लोग घूस के जरिए और खनिजों के जरिए जो आय प्राप्‍त करते हैं, उसका 95 प्रतिशत उनके हाथ से निकल जाएगा।

(45.2) तो क्‍या विशिष्ट / उच्च लोग , मंत्री, आई.ए.एस. (सरकारी बाबू) बिना एक भी बूंद खून बहाए हथियार डाल देंगे?

मैं `राईट टू रिकाल ग्रुप`/`प्रजा अधीन राजा समूह` के सदस्‍य के रूप में प्रधानमंत्री, मुख्‍यमंत्रियों के सामने ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ का केवल तीन लाईन के ड्राफ्ट का प्रस्‍ताव करता हूँ। मेरी और कोई मांग नहीं है। मैं ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.) अथवा प्रजा अधीन राजा/राईट टू रिकाल (भ्रष्ट को बदलने का अधिकार) कानून अथवा कुछ भी और नहीं मांग रहा हूँ। ‘नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.)`, `प्रजा अधीन राजा/राईट टू रिकाल (भ्रष्ट को बदलने का अधिकार)` आदि कानून लागू करवाना तब नागरिकों से मेरा विनती/अनुरोध होगा जब एक बार प्रधानमंत्री ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ ड्राफ्ट पर हस्‍ताक्षर करने की मांग मान लें।

और ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ केवल यही कहती है कि “जनता को उनकी शिकायतें प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर डालने (की अनुमति) दी जाए।”

तो क्‍या इतनी छोटी मांग खून खराबा करेगी?

क्‍या विशिष्ट/उच्च लोग बिना किसी खून खराबे के प्रधानमंत्री और मुख्‍यमंत्रियों को ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ प्रारूप पर हस्‍ताक्षर करने  दे देंगे?

(45.3) मेरा विचार

मैं कोई खून खराबा नहीं चाहता, लेकिन यह आशा करता हूँ कि विशिष्ट/उच्च लोग खनिजों से होनेवाली आय नागरिकों के लिए छोड़ देंगे और मंत्री आदि हिंसा का सहारा लिए बिना घूस से होनेवाली आय छोड़ देंगे। यह इतनी अच्‍छी बात है कि सच हो ही नहीं सकती है। मैं केवल प्रधानमंत्री, मुख्‍यमंत्रियों पर जनता द्वारा दबाव डलवाकर ही ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ लागू करवाना चाहता हूँ। मैं नहीं चाहता कि कोई नागरिक किसी प्रधानमंत्री, मुख्‍यमंत्री विधायक, सांसद और आई.ए.एस., आई.पी.एस., जज, विशिष्ट/उच्च लोगों आदि के खिलाफ किसी प्रकार की हिंसा करें। और मेरी कामना है कि प्रधानमंत्री, मुख्‍यमंत्री विशिष्ट/उच्च लोग आदि भी हम ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसा का प्रयोग न करें। लेकिन विशिष्ट/ऊंचे लोग ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसा का प्रयोग करने का फैसला/निर्णय करते हैं तब भी मैं ‘जनता की आवाज़ पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)’ कार्यकर्ताओं से हिंसा का प्रयोग न करने का ही अनुरोध करूंगा लेकिन मैं नहीं कह सकता कि तब क्‍या होगा?

अभी की स्‍थिति के अनुसार मेरा ऐसा मान लेता हूँ कि विशिष्ट/उच्च लोग, मंत्रियों आदि की ओर से कोई हिंसा नहीं होगी और इसलिए नागरिकों की ओर से भी कोई हिंसा नहीं होनी चाहिए। यदि विशिष्ट/उच्च लोग, मंत्री आदि हिंसा का सहारा लेते हैं तब हम नागरिकों को भी फिर से विचार करने की जरूरत होगी।